भागने वाला और कोई नहीं बल्कि दल्लू ही था। उसकी बगल में गोला दबा हुआ था और वह बदहवास भागता जा रहा था। और पीछे पीछे था पूरा गाँव।
अभी तक तो सब ठीक चल रहा था फिर पता नहीं कहाँ से वह मनहूस रिपोर्टर नमूदार हो गया जिसने पूरे गाँव को भड़का दिया। किसी को नहीं पता था कि वह रिपोर्टर किसी न्यूज़ पेपर का है, न्यूज़ चैनल का या फिर सिर्फ सोशल मीडिया का।
एक दिन वह दल्लू के दरबार में हाज़िर हुआ और फिर जो उसने उल्टे सीधे सवाल पूछने शुरू किये तो पूछता ही चला गया।
‘‘जनाब क्या ये जिन आपसे बात भी करता है?’’ उसने पहला सवाल दाग़ा। और इस पहले सवाल पर ही दल्लू चकरा कर रह गया कि हाँ में जवाब दे या न में।
‘‘नहीं जी ये बात नहीं करता।’’ कुछ सोचकर उसने जवाब दिया। अगर हाँ में जवाब देता तो शायद रिपोर्टर बात करवाने पर ही अड़ जाता।
‘‘तो फिर आपको पता कैसे चला कि ये कोई जिन है?’’ रिपोर्टर के सवाल पर दल्लू गड़बड़ा कर दो सेकंड के लिये सोच में पड़ गया।
‘‘तुम भी अजीब चुग़द टाइप के रिपोर्टर हो।’’ मद्दन बोल पड़ा। जब हमारे करामाती दल्लू बाबा इसे गोले में बन्द कर सकते हैं तो ऐसे करामाती बाबा को जिन पहचानने में क्या दिक्कत?’’
‘‘हाँ और क्या।’’ दल्लू ने जल्दी से हाँ में हाँ मिलायी,
‘‘मैंने अपने इल्म यानि ज्ञान से मालूम कर लिया कि ये एक जिन है।’’
‘‘आपका ज्ञान कहाँ तक है बीए या एम ए? पूछता है भारत।’’ अब तक रिपोर्टर पूरी तरह फार्म में आ चुका था।
‘‘हमारा ज्ञान स्कूली टाइप का नहीं है। ये अन्दर का ज्ञान है।’’ दल्लू मुंह बनाकर बोला।
‘‘आप इसे गुप्त ज्ञान कह सकते हैं।’’ बिक्कू ने साफ किया।
रिर्पोटर अब अपना मोबाइल ऑन करके शायद उस कवरेज को सीधे यू टयूब पर प्रसारित भी करने लगा था अपनी कमेण्ट्री के साथ।
‘‘तो दर्शकों आज हम आपके सामने एक बाबा दिखा रहे हैं जो किसी जिन को पकड़ने का दावा कर रहा है। क्या इसका ये दावा असली है या फिर कोई फर्जी कहानी - पूछता है भारत। बहुत जल्द इस बाबा की पोल आपके सामने खुलने वाली है।’’
उसके शब्द पूरे होते, उससे पहले ही एक ज़ोरदार लात उसकी कमर पर पड़ी और उसका फोन छिटक कर दूर चला गया।
लात मारने वाला नब्बन था जिसे उसकी बात पसंद नहीं आयी थी।
‘‘दल्लू बाबा की करामत को फर्जी कहने की तेरी हिम्मत कैसे हुई।’’ वह गुर्राकर बोला।
दूसरे रिपोर्टरों की तरह ये रिपोर्टर भी चिकना घड़ा ही था। वह अपनी पैंट झाड़कर फिर बैठ गया। और फिर उंगली उठाकर वार्निग देने के अंदाज़ में बोला, ‘‘देखो, इस समय ये प्रसारण पूरा देश देख रहा है। अगर मेरे साथ किसी ने भी बदसुलूकी करने की कोशिश की तो पूरे देश को मालूम हो जायेगा। और फिर पूरा भारत मेरा हिसाब तुम सबसे पूछ लेगा।’’
दल्लू ने नब्बन को हाथ के इशारे से शांत किया। बात नब्बन की समझ में आ गयी और उसके साथ साथ बाकी भी शांत हो गये।
अब रिपोर्टर और चौड़ा हो गया।
‘‘हाँ तो करामाती या फिर पाखंडी बाबा जी! पूछता है भारत - कि आपने इसे गोले में क्यों रख छोड़ा है? इतनी छोटी जगह में इसे रखकर आप मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं।’’ रिपोर्टर अब चीखकर पूछ रहा था।
‘‘अब ये किस बला का नाम ले रहा है? हम किसको लांघ के क्या कर रहे हैं?’’ दल्लू ने झुक कर बिक्कू से पूछा।
‘‘अब ये पाखंडी बाबा अपने असिस्टेंट
को समझा रहा है कि इस रिर्पोटर को कुछ दे दिला कर चलता कर दिया जाये। लेकिन आप चिंता न करें। आपका ये वफादार भारत का सबसे ईमानदार रिपोर्टर है। जो सच्चाई होगी उसे इस पाखंडी बाबा के गले में हाथ डालकर निकाल लेगा।’’
‘‘अबे उल्लू की आँख।’’ इसबार मद्दन तिलमिला कर खड़ा हो गया, ‘‘कसम खुदा की इस बार बकरीद में बकरे की बजाय तुझे ही...।’’
दल्लू ने उसे जल्दी से वापस घसीट लिया वरना मामला काबू से बाहर होने के पूरे आसार बन गये थे।
‘‘रिपोर्टर महोदय। आप साबित करें कि मैं पाखंडी हूं।’’ इस बार दल्लू शांत स्वर में बोला।
‘‘इसमें साबित क्या करना। जिन, चुड़ैल भूत प्रेत जैसी कोई चीज़ दुनिया में पायी ही नहीं जाती। इन सबका मानना अंधविश्वास है।’’
इस बार दल्लू उससे भिड़ने की बजाय गाँववालों से मुखातिब हुआ, ‘‘गाँव वालों, अगर जिन नहीं होते - तो फिर गोले में मौजूद ये इंसान कौन है? क्या आप किसी जीते जागते इंसान को इस तरह गोले में बन्द कर सकते हैं? अरे दो सेकंड भी नहीं लगेंगे और वह परलोक सिधार जायेगा।
अब आप कई दिन से देख रहे हैं, ये जिन इस गोले के अन्दर से दो सेकंड के लिये भी बाहर नहीं निकला। फिर भी जिंदा है और हाथ पैर चला रहा है। क्या कोई इंसान ऐसा कर सकता है?’’
दल्लू की बात दिल को लगती थी सभी गाँव वाले उसके समर्थन में सर हिलाने लगे। और कई लोग अपनी चप्पलें उतारकर रिपोर्टर की मरम्मत को तैयार हो गये।
लेकिन रिपोर्टर भी पूरा घाघ था। उसने एक संभाला लिया और चीखा, ‘‘भारत के इस सबसे ईमानदार रिपोर्टर ने कब कहा कि गोले के अन्दर कोई इंसान है।’’
उसकी बात सुनकर सभी चकराकर उसका मुंह देखने लगे।
‘‘अबे इंसान भी नहीं - और जिन भी नहीं तो क्या तेरे अब्बा की आँख है अन्दर?’’ राम भरोसे झुंझलाकर बोला।
‘‘मेरे अब्बा की आँख नहीं बल्कि अमरीका की आँख है अन्दर।’’ रिपोर्टर ने एक नया शोशा छोड़ दिया था अब।
‘‘तू कहना क्या चाहता है। अब इसमें अमरीका की आँख किधर से घुस गयी। नब्बन ने आगे बढ़कर उसकी गर्दन पकड़ ली।’’
‘‘अमरीका में आँख को आई बोलते हैं। यानि ए आई। तुम लोगों को क्या पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच गयी है। अमरीका और जापान ने तरक्की करके ऐसे मशीनी इंसान बना लिये हैं जो बिल्कुल असली इंसानों जैसे ही दिखाई देते हैं और काम भी करते हैं। इस गोले के अन्दर बिल्कुल वैसा ही एक आई इंसान बन्द है।’’
‘‘अब तुम यहाँ से फूट लो तो ही अच्छा है। हमारा दल्लू तो गाँव के बाहर निकला ही नहीं तो इसके पास अमरीका की आँख कहाँ से आई?’’ इसबार नजीबन बुआ ने रिपोर्टर को आड़े हाथों ले लिया।
‘‘कहाँ से आई अभी बस इसी सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है। लेकिन इस तरह की आई दुनिया में है इसका जवाब देखना हो तो आप लोग ये वीडियो देखें।’’ कहते हुए रिपोर्टर ने शायद मोबाइल पर हालीवुड की कोई फिल्म चला दी थी जिसमें हीरो किसी गोले के अन्दर कैद था और बाहर निकलने की कोशिश में था।’’
इस फिल्म को देखकर गाँव वालों को यकीन हो गया कि गोले के अन्दर अमरीका की आँख ही मौजूद है।
फिर वह सब दल्लू के सर पर सवार हो गये कि वह बताये कि अमरीका की वह स्पेशल आँख उसे कहाँ से मिली।
दल्लू के पास जवाब होता तो बताता। उसने धीरे से गोला उठाया और भाग खड़ा हुआ। अब आगे आगे वह था और पीछे पीछे गाँव वाले।
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हाबू बार बार मंदोरा से सम्पर्क करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उधर से जवाब नदारद था।
शीबू उसके मैसेज भेजने के अंदाज़ को देख रहा था और हैरत कर रहा था। थोड़ी थोड़ी देर बाद हाबू को मानो कोई दौरा पड़ता था। वह अपने जिस्म को बुरी तरह तोड़ने मरोड़ने लगता था। और फिर शांत हो जाता था।
‘‘तुम कर क्या रहे हो?’’ शीबू पूछने लगा।
‘‘मैं मंदोरा को मैसेज भेज रहा हूं। लेकिन वह कोई जवाब नहीं दे रहा।’’ हाबू ने गुस्से के साथ जवाब दिया।
‘‘ये मैसेज भेजने का कौन सा नचनिया टाईप तरीका है? मुझे तो लगता है जबसे तुम्हारे बेटे ने तुम्हें गद्दी से उतारा है, तुम्हारी मानसिक स्थिति थोड़ी बिगड़ चुकी है।’’
‘‘हाबू इतने कमज़ोर दिमाग का नहीं है।’’ हाबू मुस्कुराया, ‘‘सुनो। जब मैं अपने जिस्म को इस तरह से मरोड़ता हूं तो मेरे जिस्म के सेल्स एक दूसरे से टकराते हुए खास फ्रीक्वेंसी की तरंगें पैदा करने लगते हैं। इन तरंगों को सिर्फ मेरे पक्के वफादार ही कैच कर सकते हैं। जैसे कि मंदोरा।’’
‘‘लेकिन वह कैच नहीं कर रहा। इसका मतलब कि अब वह वफादार नहीं रह गया।’’ शीबू व्यंग्य के साथ बोला।
‘‘कोई बात नहीं। जब मेरा सगा बेटा ही बदल गया तो दूसरे से क्या शिकायत। फिर भी मैं अपने को कभी मजबूर नहीं समझता। अब मैं खुद ही कुछ करने जा रहा हूं।’’
‘‘क्या करने?’’
‘‘पहले मैं इस जेल से बाहर निकलूंगा।’’
‘‘वह कैसे? तुमने ही मुझे इस जेल में कैद किया है और ये सोचकर इसे मज़बूत ही बनाया होगा। ताकि मैं इससे कभी न निकल सकूं। अब खुद तुम कैसे निकलोगे?’’
‘‘सुनो!’’ हाबू ने जवाब दिया, ‘‘जब मैंने तुम्हें हराकर इस जेल में कैद किया था तो मेरे दिमाग में आया कि कोई मुझे भी ऐसे ही कभी हराकर किसी जेल में बन्द कर सकता है। इसलिए मैंने हर तरह की जेल से भागने का सिस्टम अपने अन्दर ही तैयार कर लिया। अभी तुम तमाशा देखो।’’
कहते हुए हाबू ने पहना हुआ लंबा सा कोट उतार दिया और हाफ आस्तीन शर्ट में आ गया।
फिर उसने दोनों हथेलियां ज़मीन पर टिकाई और उन पर ज़ोर देने लगा। शीबू एक तरफ खड़ा हुआ चुपचाप उसकी हरकत देख रहा था। फिर उने दखा कि हाबू के हाथों का रंग बदलने लगा था। और वह हरे रंग में ढलते जा रहे थे।
बाकोल वासियों के लिये ये हैरत की बात नहीं थी। क्योंकि वहाँ सभी मेकअप करके दूसरे प्राणियों में बदल सकते थे।
लेकिन हैरत की बात ये ज़रूर थी कि वहाँ मेकअप करके शरीर बदलने वाली डिवाईस तो मौजूद ही नहीं थी। शायद हाबू ने वह सिस्टम अपने अन्दर ही इन्स्टॉल करा लिया था।
हाबू के हाथों का रंग बदलकर गहरे हरे रंग का हो गया और वह उठ खड़ा हुआ। अब मालूम हो रहा था कि दो ठोस व मज़बूत शायद किसी ऑक्सोर के हाथ उसके हाथों की जगह पर फिट कर दिये गये हों।
हाबू धीरे धीरे चलता हुआ एक दीवार के पास पहुंचा और उसने उस दीवार पर पूरी ताकत के साथ उनही हाथों से प्रहार किया।
शीबू ने आँखें फाड़कर देखा क्योंकि उस प्रहार से दीवार में बड़ा सा सूराख हो गया था। मतलब ये कि हाबू का हाथ मेकअप से न सिर्फ दिखने में बदला था बल्कि ताकत में भी हज़ारों गुना बढ़ चुका था।
हाबू ने अपने हाथों से दीवार पर कई बार प्रहार किया और दीवार में इतना बड़ा होल बन गया कि एक इंसान आराम से उसमें से फरार हो सकता था।
‘‘मुझे यकीन है कि इससे बाहर निकलते ही हम आज़ादी की हवा में साँस लेने लगेंगे।’’
हाबू ने एक पैर अन्दर दाखिल किया।
‘‘क्या मैं भी तुम्हारे साथ आऊं?’’ बेवकूफों की तरह पूछा शीबू ने।
‘‘आ जाओ। इस वक्त मुझे तुम्हें अपनी कैद में रखने में कोई फायदा नहीं। और न ही तुमसे दुश्मनी निभाने में।’’
फिर दोनों उस बड़े से होल के ज़रिये बाहर की तरफ कूद गये।
लेकिन उन्हें ये देखकर मायूसी हुई कि दूसरी तरफ भी कोई खुला मैदान नहीं था बल्कि शायद वे उसी जेल की किसी दूसरी कोठरी में पहुंच गये थे। ये अलग बात है कि वह किसी भी तरह कोठरी नहीं मालूम हो रही थी बल्कि एक निहायत सजा धजा कमरा था ये तो।
और उस कमरे के एक किनारे पर खूबसूरत सा बेड नज़र आ रहा था। जिसपर कम्बल लपेटे हुए कोई खर्राटें मार रहा था।
‘‘क्या हम लोग जेल के किसी चौकीदार के कमरे में पहुंच चुके हैं?’’ शीबू बड़बड़ाया।
‘‘अभी मालूम हो जायेगा।’’
कहकर हाबू आगे बढ़ा और अपने उसी हाथ से कम्बल के ऊपर ही एक घूंसा जड़ दिया।
घूंसा उसने धीरे से ही जड़ा था वरना सोने वाला सोते में ही दूसरी दुनिया में पहुंच जाता। इसके बावजूद अन्दर से ज़ोरदार चीख उभरी और दोनों हड़बड़ा गये।
क्योंकि ये चीख किसी औरत की थी।
फिर उस औरत ने अपना कम्बल पलट दिया। और उसकी शक्ल देखते ही हाबू के मुंह से एक गहरी साँस खारिज हो गयी।
ये तो वही काईडोर थी जिसकी उसने ज़ारा के धोखे में अपने बेटे पीको के साथ शादी रचा दी थी। और फिर वो सभी को चकमा देकर फरार हो गयी थी। लेकिन उसे हाबू ने फिर से पकड़कर जेल में कैद कर दिया था।
और अब किस्मत के खेल ने उसे भी वहीं पहुंचा दिया।
काईडोर भी हाबू को पहचान गयी।
‘‘अब क्या सितम करने का इरादा है बाकोल के सम्राट?’’
वह फीकी हंसी के साथ पूछने लगी।
‘‘फिलहाल तो मैं खुद ही सितम रसीदा हो चुका हूं।’’ वह मुंह बनाकर बोला।
‘‘क्या मतलब?’’ वह हैरत के साथ पूछने लगी।
इसके जवाब में बगल में मौजूद शीबू ने पूरा माजरा कह सुनाया।
‘‘आह! आखिरकार मेरे दिल से निकली बददृआ ने अपना असर दिया ही दिया।’’ वह अजीब से लहजे में बोली।
‘‘बद्दुआ?’’ शीबू हैरत से कहने लगा।
‘‘हाँ। इस कमीने ने मेरे महबूब को निवाला बनाकर मुझे ही खिला दिया था। आज देखो इसी के बेटे ने इसे अपना निवाला बना लिया है।’’
हाबू कुछ नहीं बोला। बोलता भी क्या।
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दल्लू गोले को गेंद की तरह दबाये हुए आगे आगे भाग रहा था और पीछे पीछे गाँव वाले। अब तक वह गाँव से मिले हुए बाज़ार में पहुंच चुका था। और पीछा करने वालों की तादाद धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी। उनमें से आधों को यही नहीं पता था कि वे किसका और क्यों पीछा कर रहे हैं।
पीछे से रिपोर्टर लगातार पकड़ो पकड़ो की आवाज़ लगा रहा था और उसी की हांके पर सब भागे चले जा रहे थे।
‘‘क्या इस मजमें में कोई ऐसा मर्द नहीं जो उस फ्राड को पकड़ सके पूछता है भारत।’’ रिपोर्टर चीखा और बगल में मौजूद राम भरोसे को जोश आ गया।
उन्होंने ज़ोरदार छलांग लगायी। लेकिन बुरा हो उस छप्पर का जो टन से उनकी खोपड़ी से टकराया और वे वहाँ मौजूद गोभी के ढेर पर आलू की तरह ढेर हो गये।
जिस सब्ज़ी वाली के छप्पर में वे गिरे थे उसने गुस्से में आठ दस सड़े टमाटर उसके मुंह में ठूंस दिये।
लेकिन रिपोर्टर का मुंह तो खुला ही हुआ था और वो लगातार दल्लू के फ्राड के बारे में सबको चीख चीखकर बता रहा था।
‘‘अरे तेरा सत्यानाश जाये। कीड़े पडें तेरे पेट में। तेरे चक्कर में मैंने अपनी चार मुर्गियां
कुरबान कर दीं।’’ नद्दा चीखी। जो कई दिन से दल्लू को इस उम्मीद में मुर्गियां खिला रही थी कि वह जिन बाबा से सिफारिश करके उसकी सौत की टाँगें तुड़वा देगा जो उसके शौहर ने शहर से लाकर उसके सर पर लाद दी थी।
उसके साथ साथ नजीबन बुआ और ममता बाई भी सुर में सुर मिला रही थीं। सभी की उम्मीदों पर हिमालय की बर्फ गिर चुकी थी। और अब उन्हें अपनी वो तमाम रक़म याद आ रही थी जो उन्होंने दल्लू की खातिरदारी में बरबाद कर दी थी।
हाँ तीन लोग अभी भी मस्त थे। यानि बिक्कू, मद्दन और नब्बन। क्योंकि दल्लू के दिये हुए कमीशन से उनकी जेब अच्छी खासी भर चुकी थी।
अचानक भागते दल्लू को पास में मौजूद भैंस के खूंटे से ठोकर लगी और वह कलाबाज़ियाँ खाता हुआ मुंह के बल भैंस के आगे मौजूद नांद में घुस गया।
हालांकि वह गोला अभी भी उसके हाथ से नहीं छूटा था जिसमें वह बच्चा या जिन या फिर अमरीका की आँख मौजूद थी।
अब मजमे को मौका मिल गया और सभी एक साथ बुरी तरह दल्लू पर पिल पड़े।
फिर रिपोर्टर ने ही सबको रोका वरना भैंस को पता करने में दुश्वारी हो जाती कि नांद में घास है कि दल्लू मियाँ का अचार।
‘‘देखिए। आप सबने बहुत मेहनत की है इसे पकड़ने में। लेकिन अब भारत को पूछने दीजिए कि इसे ये अमरीका की आँख कहां से मिली?’’
‘‘हाँ हाँ। ये जानना तो बहुत ज़रूरी है ताकि हम अमरीका की दूसरी आँख भी ढूंढ लें।’’ शब्बर दादा पीछे से अपनी कमज़ोर आवाज़ में बोले।
फिर दल्लू को वहीं तबेले में एक औंधी रखी हुई बेकार नांद पर टिका दिया गया और उससे उस अमरीका की आँख के बारे में पूछताछ होने लगी।
अच्छी खासी मरम्मत के बाद दल्लू ने आगे कुछ छुपाने का रिस्क लेना मुनासिब नहीं समझा और जो कुछ उसके साथ घटा था हूबहू बयान कर दिया।
‘‘देखा! मैंने कहा था न।’’ रिपोर्टर बोला, ‘‘अब तो ये कन्फर्म हो गया कि ये गोला अमरीका की आँख ही है।’’
‘‘भला दल्लू की कहानी से ये कैसे कन्फर्म हुआ?’’ नब्बन ने आँखें तरेर कर रिर्पोटर को देखा। दल्लू के सच्चाई बयान करने के बाद उसकी कमाई पर भी असर होना यकीनी था।
‘‘मेरा अंदाज़ा है ये कि शायद कोई प्लेन इस आँख को लेकर जापान जा रहा था। लेकिन बीच में तेज़ हवा से प्लेन का दरवाज़ा खुल गया और उसमें से ये आँख लुढ़कती हुई सरयू के किनारे पहुंच गयी।’’ रिपोर्टर ने गोले को हाथ में लेते हुए अन्दाज़ा लगाया।
‘‘अगर दरवाज़ा खुला तो एक ही आँख क्यों? और भी तो गिरनी चाहिए थीं?’’ मद्दन की बात में दम था।
‘‘हो सकता है और भी गिरी हों। हमें सरयू के किनारे जाकर ढूंढना चाहिए।’’
फिर उन्होंने सरयू के किनारे की तलाशी लेने का इरादा किया और सभी उधर की ओर चल पड़े।
बुरी तरह मार खाया दल्लू वहीं बैठे रहना चाहता था लेकिन उसे भी धक्के मार मारकर आगे बढ़ा दिया गया।

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