Showing posts with label Articles and Reviews. Show all posts
Showing posts with label Articles and Reviews. Show all posts

Saturday, June 7, 2014

इब्ने सफी - जासूसी साइंस फिक्शन का महान उपन्यासकार


इब्ने सफी के नाम से मेरी मुलाकात पहली बार उस समय हुई जब मैं कक्षा पाँच में पढ़ता था। और कामिक्सों की दुनिया छोड़कर उपन्यासों के पाठक वर्ग में अपनी जगह बना रहा था। बाल उपन्यासों से उठकर बड़ों के उपन्यासों में शुरूआत हुई इब्ने सफी से, जो चाचा के यहाँ पूरे चाव से पढ़े जाते थे। वहीं से मुझे भी चस्का लग गया और इब्ने सफी की जासूसी दुनिया की हम दिन रात सैर करने लगे। ये सैर पूरी तरह घरवालों को बताये बिना चोरी छुपे होती थी क्योंकि कक्षा पाँच का छात्र और जासूसी उपन्यास! इससे बड़ी नालायकी और क्या होगी।

खैर कक्षा छह में पहुंचने पर आखिरकार एक दिन प्रिंसिपल ने बुला ही लिया मुझे। मैडम ने धड़ से सवाल किया, ‘‘सुना है तुम इब्ने सफी पढ़ते हो?’’ मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। आखिर इन्हें कैसे पता चल गया? फिर भी हिम्मत करके मैंने नहीं में सर हिलाया। जवाब में उसी वक्त मेरे बैग की तलाशी ली गयी और बदकिस्मती से इब्ने सफी के दो उपन्यास उसमें से निकल भी आये जो फौरन मैडम ने ज़ब्त कर लिये। मैं आंसुओं को गला घोंटता हुआ और चुगलखोरों को सलवातें सुनाता हुआ घर वापस आ गया। लेकिन अगले दिन जब स्कूल गया तो मैडम ने आफिस में बुलाकर एक नावेल वापस किया और प्यार से कहा, बेटा, इसे तो मैंने पूरा पढ़ लिया है, दूसरा पढ़ रही हूं। आइंदा जब भी तुम्हें नया नावेल मिले, पढ़ने के लिये मुझे दे देना।

इस तगड़े अनुबंध के बाद प्रिंसिपल मैडम को मैं इब्ने सफी पढ़ने के लिये देता रहा और बदले में टेस्ट में हमेशा पूरे नंबर पाता रहा।

Thursday, May 29, 2014

इलेक्ट्रानिकी आपके लिये - विज्ञान व तकनीक की उत्कृष्ट हिन्दी पत्रिका

--जीशान हैदर ज़ैदी

आमतौर पर जब हिन्दी की विज्ञान पत्रिकाओं की बात होती है तो एकमात्र पत्रिका ‘विज्ञान प्रगति ही ज़हन में उभरती है। लेकिन ये तथ्य है कि कुछ ऐसी भी पत्रिकाएं देश में प्रकाशित हो रही हैं जिनकी सामग्री कुछ मायनों में विज्ञान प्रगति से भी ज़्यादा बेहतर है। विज्ञान प्रगति में जीव विज्ञान की सामग्री ज़्यादा होती है जबकि अन्य विषयों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता।

अन्य विषयों पर अच्छी सामग्री हासिल करने के लिये एक बेहतर पत्रिका है ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिये जिसमें भौतिकीरसायनअंतरिक्ष विज्ञानभूगर्भ विज्ञानकम्प्यूटर  इलेक्ट्रानिकी इत्यादि विषयों पर उत्कृष्ट सामग्री प्रदान कर रही है। यह मासिक पत्रिका आईसेक्टभोपाल द्वारा प्रकाशित है। इसके मुख्य सम्पादक हैं श्री संतोष चौबे जीजो डा0सी0वीरमन यूनिवर्सिटी के चाँसलर हैं। जबकि उप सम्पादक विनीता चौबे  पुष्पा असिवाल हैं। अन्य मुख्य सहयोगियों में पत्रिका के सह सम्पादक रवीन्द्र जैन  मनीष श्रीवास्तव हैं।

इस पत्रिका के प्रमुख लेखकों में हैं डा0अरविन्द मिश्रडा0ज़ाकिर अली रजनीशअर्शिया अलीसंजय गोस्वामीसंजय वर्माबालेन्दु शर्मा दधीचमुकुल व्यासडा0प्रदीप कुमार मुखर्जीडा0विजय कुमार उपाध्यायशुकदेव प्रसादडा0इरफान ह्यूमनश्रीश बेंजवाल शर्मारविशंकर श्रीवास्तवदर्शनलाल बवेजाशशांक द्विवेदीकालीशंकर शुक्लाराकेश शुक्लाविजन कुमार पाण्डेयडा0दिनेश मणिडा0डी0डी0ओझाहरीश गोयलकल्पना कुलश्रेष्ठमनीष मोहन गोरेबुशरा अलवेरा, काजल कुमारसंगीता चतुर्वेदी  मैं स्वयं।     

इस पत्रिका में अनेक लेखों के साथ मेरी अब तक नौ विज्ञान कथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनका विवरण इस प्रकार है,
1. बचाने वाला (जून - 2005)
2. परिवर्तन (जुलाई 2006)
3. जुड़वां (फरवरी 2007)
4. असली खेल (जुलाई 2008)
5. दंगाई बंजारे (मई 2010)
6. असली नक़ली (जनवरी 2011)
7. आभासी सुबूत (सितंबर 2011)
8. अपनी दुनिया से दूर (नवंबर-दिसम्बर 2012)
9. खून का रिश्ता (अप्रैल 2014)

इस पत्रिका का पता है,
इलेक्ट्रानिकी आपके लिए,
सेक्टस्कोप कैम्पसएन.एच-12,
होशंगाबाद रोड,
भोपाल (.प्र.) - 47
फोन: 0755-2499657
व वेबसाइट : electroniki.com  

Tuesday, May 6, 2014

विज्ञान कथा - विज्ञान कथाओं को समर्पित हिन्दी पत्रिका

---जीशान हैदर ज़ैदी

हिन्दी की एकमात्र पत्रिका जो विज्ञान कथाओं को समर्पित है वह फैज़ाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘‘विज्ञान कथा’’ है। यह त्रैमासिक पत्रिका 2002 से अनवरत रुप से प्रकाशित हो रही है। इसके मुख्य सम्पादक हैं डा0राजीव रंजन उपाध्याय, जबकि सह सम्पादक डा0अरविन्द मिश्र व श्री हरीश गोयल हैं। इसका प्रथम अंक सितम्बर-नवम्बर 2002 था जिसमें मेरी भी कहानी ‘एडहिसिव’ शामिल थी।

इस पत्रिका के प्रमुख लेखकों में हैं, डा0राजीव रंजन उपाध्याय, डा0अरविन्द मिश्र, हरीश गोयल, डा0ज़ाकिर अली रजनीश, कल्पना कुलश्रेष्ठ, मनीष मोहन गोरे, डा0रचना भारतीय, डा0 सुबोध महंती, मेघना शर्मा, बुशरा अलवेरा, अमित कुमार, आइवर यूशिएल, डा0श्रीगोपाल काबरा, डा0विष्णु दत्त शर्मा, विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी, अभिषेक मिश्र व मैं स्वयं।
 
इस पत्रिका में मेरी अब तक पन्द्रह विज्ञान कथाएं व उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। जिनका विवरण इस प्रकार है,
1. एडहिसिव - कहानी (सितम्बर-नवम्बर 2002)
2. रोशनी का वाहन - कहानी (मार्च-मई 2003)
3. ज़ेड वन - कहानी (सितम्बर-नवम्बर 2003)
4. ख्याली संगीतकार - कहानी (मार्च-मई 2004)
5. अनजान मुजरिम - कहानी (सितम्बर-नवम्बर 2004)
6. ताबूत - उपन्यास (मार्च-मई 2005 से दिसम्बर-फरवरी 2007 तक धारावाहिक रूप में)
7. अवतार - कहानी (जून-अगस्त 2007)
8. बुड्ढा फ्यूचर - नाटक (दिसम्बर-फरवरी 2008)
9. अण्डर एस्टीमेट - कहानी (जून-अगस्त 2008)
10. बरमूदा त्रिकोण की यात्रा - कहानी (सितम्बर-नवम्बर 2009)
11. मजबूर आसमाँ - कहानी (मार्च-मई 2010)
12. मौत की तरंगें - उपन्यास (मार्च-मई 2011)
13. उल्टा दाँव - कहानी (जनवरी-मार्च 2013)
14. खून का रिश्ता - कहानी (अक्तूबर-दिसम्बर 2013)
15. नक़ली जुर्म - कहानी (जनवरी-मार्च 2014)

इस पत्रिका का पता है,
विज्ञान कथा, भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति,
परिसर कोठी काके बाबू, देवकाली मार्ग,
फैज़ाबाद 224001
फोन: 9838382420
  

Monday, March 19, 2012

बस पलक झपकी ---- और सितारों के पार!


साइंस के अनुसार दूरी का सीधा सम्बन्ध् उस रास्ते से होता है जिसपर चलकर कोई एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक पहुंचता है। उदाहरण के तौर पर दो शहर अ और ब हैं। अ और ब को आपस में जोड़ने वाले तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता सौ किलोमीटर लंबा है, दूसरा अस्सी किलोमीटर और तीसरा साठ किलोमीटर लंबा है। तो पहले रास्ते से अ और ब के बीच दूरी हुई सौ किलोमीटर और तीसरे रास्ते से अ और ब के बीच दूरी हुई साठ किलोमीटर। यह नियम पूरे यूनिवर्स पर लागू होता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि कोई चीज़ एक ही समय में हमारे पास भी हो सकती है और हमसे दूर भी। जैसा कि हम जानते हैं पृथ्वी गोल है। इसपर मान लिया दो शहर हैं जो एक ही देश के अन्दर हैं। अगर इन दो शहरों के बीच देश के अन्दर बनाये गये रास्तों में यात्रा करें तो यह दूरी कम होगी, और अगर एक शहर से उल्टी दिशा में चलकर पूरी पृथ्वी की गोलाई तय करते हुए दूसरे शहर में पहुचें तो यह दूरी बहुत ज्यादा होगी। और इस तरह एक ही समय में दोनों शहरों के बीच दूरी बहुत कम भी कही जा सकती है और बहुत ज्यादा भी। और साथ ही ‘कम’ वाली दूरी जितनी कम से कम होगी (यानि दोनों शहर जितने करीबतर होंगे) उतनी ही ‘ज्यादा’ वाली दूरी ज्यादा से ज्यादा होगी (यानि दोनों शहर उतने ही दूरस्थ होंगे)। ऐसा संभव है पृथ्वी के गोल होने की वजह से। तो इस तरह दूरी उस सतह पर भी निर्भर करती है जिसपर वह दूरी तय होती है।
अब बात करते हैं गणित की एक शाखा की जिसका नाम है कैलकुलस ऑफ वैरिएशंस (Calculus of Variations)। इसकी शुरुआत 18 वीं सदी के मशहूर गणितज्ञ लिओन्हार्ड यूलर और लाग्रांज ने की थी। इस गणित के द्वारा हम कुछ चीज़ों की ऊंचाई या गहराई की सीमा (Maxima or Minima) मालूम करते हैं। इन चीज़ों में ’शामिल हैं दूरी, समय या फिर ऊर्जा इत्यादि। इस गणित के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।
माना किसी ऊंची जगह से किसी निचली जगह को जोड़ने के लिये एक रास्ता बनाना है, और उस रास्ते पर कोई गेंद लुढ़काई जानी है। तो गेंद को नीचे पहुंचने में कम से कम समय लगे, इसके लिये रास्ते का आकार विशेष रूप का बनाना होगा। और इस आकार का नाम है सायक्लॉयड। इसे कैलकुलस ऑफ वैरियेशन्स से मालूम किया गया है।
मान लिया आपके पास एक निश्चित लम्बाई की रस्सी है। उस रस्सी से आपको एक मैदान इस तरह घेरना है कि मैदान का ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रफल अन्दर समा जाये। ऐसी हालत में रस्सी से जो आकार बनेगा वह एक वृत्त होगा। इसी तरह अगर दो अलग अलग तरह की सतहें हैं (जैसे कि एक घड़े जैसी है और दूसरी गिलास जैसी) तो एक सतह से दूसरी सतह तक कम से कम दूरी एक ऐसी रेखा के रास्ते पर होगी जो दोनों सतहों को 90 डिग्री के कोण पर काटेगी।
भौतिकी की समस्याएं भी कैलकुलस ऑफ वैरियेशन्स से हल की जाती हैं। मान लिया अंतरिक्ष में किसी कण को एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा करनी है। मान लिया कि अंतरिक्ष में कण की गतिज व स्थितिज ऊर्जा हर बिंदु पर अलग अलग है। इस हालत में कण एक ऐसे रास्ते को चुनेगा जहाँ गतिज व स्थितिज ऊर्जा का अन्तर न्यूनतम हो जाये।
इस तरह कैलकुलस ऑफ वैरिये’शन्स के द्वारा हम किसी वस्तु की ‘न्यूनतम’ (Minimum) और अधिकतम (Maximum) दशा ज्ञात कर सकते हैं। लेकिन इस कैलकुलस में एक कमी है। जब किसी वस्तु की न्यूनतम दशा मालूम की जाती है तो आमतौर पर अधिकतम दशा मालूम नहीं हो पाती, या फिर ये दशा अनन्त आती है। इसी तरह अधिकतम दशा मालूम करते समय न्यूनतम दशा मालूम नहीं हो पाती या फिर ये ऋणात्मक अनन्त आती हैं। 
लेकिन अगर उपरोक्त धारणा को ध्यान में रखा जाये कि एक न्यूनतम दूरी किसी और पथ के द्वारा अधिकतम भी होती है तो इसे कैलकुलस ऑफ वैरिये’शन्स के साथ जोड़ने पर कुछ महत्वपूर्ण परिणाम निकल सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि एक अधिकतम दशा किसी और पथ के द्वारा न्यूनतम दशा भी होगी। जैसा कि इससे पहले पृथ्वी पर दो बिन्दुओं के उदाहरण में देखा गया। अगर ये दो बिन्दु एक दूसरे को छू रहे हों तो एक रास्ते से इनके बीच दूरी शून्य हो गयी। लेकिन अगर उल्टा रास्ता लिया जाये जो पहली लोके’शन से निकलकर पूरे ग्लोब को घूमते हुए दूसरी लोके’शन पर आकर मिले तो इस रास्ते पर दूरी अधिकतम हो जायेगी। यानि हम कह सकते हैं कि दोनों एक्सट्रीमम यानि अधिकतम व न्यूनतम की सिचुएशन एक ही है, जबकि हम रास्तों को परिभाषित कर रहे हैं। और अगर ये रास्ते किसी बन्द सतह पर हैं (जैसे कि गोल ज़मीन) तो अधिकतम-न्यूनतम का साथ होना पूरी तरह स्पष्ट है।
अब एक दूसरी परिस्थिति की बात करें। मान लिया दो लोके’शन के बीच हम सिर्फ ‘न्यूनतम’ दूरी ही चाहते हैं। तो ये दूरी भी उस सतह पर निर्भर करेगी जो दोनों लोके’शन के बीच में है। अगर ये सतह बदल दी जाये तो न्यूनतम भी बदल जायेगा। हो सकता है कभी ये दूरी शून्य हो जाये तो कभी अनन्त। यही बात अधिकतम के लिये भी लागू होगी। इस तरह हम देखते हैं कि दो लोकेशन के बीच दूरी अलग अलग सिचुएशन में कई तरीकों से अधिकतम और न्यूनतम होती है।
ये बात न सिर्फ दूरी के लिये बल्कि समय, ऊर्जा, गति जैसी कई भौतिक राशियों के लिये लागू होती है। फिर अगर सतह भी रफ्तार में हो या लोके’शन बदल रही हो तो अधिकतम-न्यूनतम की एक पूरी चेन बन जायेगी जिनमें एक अधिकतम कुछ समय के बाद न्यूनतम हो जायेगा और एक न्यूनतम कुछ समय के बाद अधिकतम हो जायेगा।
कुछ इसी तरह की सिचुएशन आइन्स्टीन के सामने भी आयी थी जब उसने सापेक्षता का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा। और तब उसने ये स्टेटमेन्ट दिया था, The most incomprehensible thing about the world is that it is comprehensible. सापेक्षता के सिद्धांत में जिस गणित का इस्तेमाल हुआ है वह कैलकुलस ऑफ वैरिये’शन्स से ही विकसित हुई है। आज हम उसे डिफरें’शियल ज्योमेट्री के नाम से जानते हैं।  डिफरें’शियल ज्योमेट्री यूनिवर्स को समझने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है और आज गणित की इसी शाखा पर सबसे ज्यादा काम हो रहा है। लेकिन इस ज्योमेट्री का जो अहम नतीजा है वह यही है कि ‘जो चीज़ जितनी दूर होती है वह उतनी ही करीब भी हो सकती है।’ और यह वाक्य केवल कोरी फिलास्फी नहीं है बल्कि वार्महोल (Wormholes) के रूप में एक संभाव्य भौतिक सच्चाई है। 
जब आइंस्टीन ने अपने सापेक्षता के सिद्धान्त को  डिफरें’शियल ज्योमेट्री की समीकरणों के द्वारा प्रस्तुत किया तो वैज्ञानिकों ने उन समीकरणों का हल ज्ञात करने की कोशिश की। इन समीकरणों का हल सबसे पहले पेश किया शिवर्ज़चाइल्ड नाम के वैज्ञानिक ने। इस हल के द्वारा जो चौंका देने वाले नतीजे सामने आये उनमें शामिल थे ब्लैक होल और वार्महोल । वार्महोल स्पेस टाइम में बने ऐसे रास्तों को कहते हैं जो यूनिवर्स के दो बिन्दुओं या दो यूनिवर्स के बीच शार्ट कट्‌स होते हैं। यानि ज़ाहिरी तौर पर दोनों जगहें एक दूसरे से निहायत दूर होती हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना लगभग नामुमकिन होता है। लेकिन वार्महोल के द्वारा ये दूरी बहुत ही कम वक्त में तय हो जाती है।
वार्महोल्स बनना कैसे मुमकिन हो सकता है, इसे समझ पाना निहायत मुश्किल है। क्योंकि सब कुछ गणितीय समीकरणों में सिमटा हुआ है। लेकिन मोटे तौर पर यह इस नियम ‘जो चीज़ जितनी दूर होती है वह उतनी ही करीब भी होती है।’ का ही समीकरणीय रूप होता है।
इसे भौतिक रूप में समझने के लिये एक उदाहरण पर विचार कीजिए। मान लिया हमारी ज़मीन से कुछ दूर पर एक तारा मौजूद है। उस तारे की रो’शनी हम तक दो तरीके से आ सकती है। एक सीधे रास्ते के द्वारा, और दूसरे एक भारी पिण्ड से गुजरकर जो किसी और दिशा में जाती हुई तारे की रो’शनी को अपनी उच्च ग्रैविटी की वजह से मोड़ कर हमारी ज़मीन पर भेज देता है। जबकि तारे से आने वाली सीधी रोशनी की किरण एक ब्लैक होल द्वारा रुक जाती है जो कि पृथ्वी और तारे के बीच में मौजूद है। अब पृथ्वी पर मौजूद कोई दर्शक जब उस तारे की दूरी नापेगा तो वह वास्तविक दूरी से बहुत ज्यादा निकल कर आयेगी क्योंकि यह दूरी उस किरण के आधार पर नपी होगी जो पिण्ड द्वारा घूमकर दर्शक तक आ रही है। जबकि ब्लैक होल के पास से गुजरते हुए उस तारे तक काफी जल्दी पहुंचा जा सकता है। बशर्ते कि इस बात का ध्यान रखा जाये कि ब्लैक होल का दैत्याकार आकर्षण यात्री को अपने लपेटे में न ले ले। इस तरह की सिचुएशन ऐसे शार्ट कट्‌स की संभावना बता रही है जिनसे यूनिवर्स में किसी जगह उम्मीद से कहीं ज्यादा जल्दी पहुंचा जा सकता है। इन्ही शार्ट कट्‌स को वार्म होल्स (Wormholes) कहा जा सकता है।
ये एक आसान सी सिचुएशन की बात हुई। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब हम देखते हैं कि ज़मीन, पिण्ड, तारा, ब्लैक होल सभी अपने अपने पथ पर गतिमान हैं। ऐसे में कोई नतीजा निकाल पाना निहायत मुश्किल हो जाता है।
हालांकि वार्महोल्स का कांसेप्ट अभी सिर्फ थ्योरी की हद तक है। सापेक्षता सिद्धांत की गणितीय समीकरणें इसको मुमकिनात में से दिखाती हैं और ये मुमकिन मालूम होता है एक तरीके से बहुत ज्यादा दिखने वाली दूरियां वार्महोल के तरीकों में बहुत कम हो सकती हैं। लेकिन प्रायोगिक रूप से अभी इनका सिद्ध होना बाकी है। लेकिन ये भी तय है कि अगर वार्महोल की हकीकत साइंस ने देख ली तो यूनिवर्स का हज़ारों मील का सफर मिनटों में तय होना मुमकिन हो जायेगा।
’शिवर्जचाइल्ड वार्महोल ऐसे रास्तों की बात भी करता है जो दो ऐसी कायनातों को जोड़ता है जिनमें से एक खत्म हो रही हो और दूसरी पैदा हो रही हो। दोनों कायनातों को अलग करने की खाई है ब्लैक होल। और वार्महोल इसी ब्लैक होल को पार करने का पुल है। ये अलग बात है कि फिलहाल ’शिवर्जचाइल्ड की मैथेमैटिक्स इस वार्महोल के ज़रिये एक यूनिवर्स से दूसरे तक पार होने को नामुमकिन बताती है क्योंकि उससे पहले ही ये वार्महोल खत्म हो जायेगा और उससे गुज़रने वाला ब्लैक होल में गिर जायेगा।
वार्महोल टाइम मशीन का बनना भी मुमकिन बताते हैं जिसके ज़रिये इंसान बीते हुए कल में या आने वाले कल का सफर कर सकता है।

------ जीशान हैदर जैदी 

Tuesday, January 24, 2012

क्या था परम अन्धकार (Absolute Darkness)?


आमतौर पर अँधेरा ऐसी जगह को कहते हैं जहाँ रोशनी की कोई किरण मौजूद न हो। रोशनी हमारी आँखों और किसी वस्तु के बीच देखने के लिये सेतु का काम करती है। वस्तु से होकर आने वाली रोशनी की किरणें जब आँखों तक पहुंचती हैं तो उस वस्तु के देखने का एहसास हमारे मस्तिष्क को होता है। इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप जैसे उपकरणों की सहायता से चीज़ों को देखने के लिये रोशनी की किरणों की बजाय इलेक्ट्रान बीम की सहायता ली जाती है। दूसरी तरफ इन्फ्रा कैमरों में रोशनी से इतर इन्फ्रारेड तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है। बगैर कैमरे के ये तरंगें चूंकि आँखों को संवेदित नहीं करतीं अत: केवल इन्फ्रा तरंगों की उपस्थिति में नंगी आँखों से चीज़ों को देखा नहीं जा सकता। लेकिन उपकरणों की मौजूदगी में चीज़ों के देखने के औज़ारों में इलेक्ट्रान बीम व इन्फ्रारेड तरंगों को भी शामिल किया जा सकता है। अब अपने दायरे को और बढ़ाते हुए वस्तुओं को महसूस करने की बात की जाये और इसके लिये आँखों के अलावा दूसरी इन्द्रियों को भी नज़र में रखा जाये तो रोशनी के अलावा ध्वनि और तमाम तरंगें जो हमें किसी चीज़ के अस्तित्व का एहसास कराती हैं, इस परिभाषा में आ जायेंगी। रेडियो और एक्सरे जैसी चीज़ों को भी अगर शामिल कर लिया जाये तो तमाम विद्युत चुम्बकीय तरंगों और तमाम तरंगों को ‘रोशनी’ के दायरे में रखा जा सकता है क्योंकि ये तमाम तरंगें किसी न किसी तरीके से चीज़ों के अस्तित्व का एहसास मस्तिष्क को कराती हैं। यानि ये सब उपरोक्त परिभाषा के अन्तर्गत चीज़ों को देखने में मदद देती हैं या चीज़ों को दिखाती हैं। 

साइंस के अनुसार तमाम इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें ‘फोटॉन’ नामी कणों की शक्ल में होती हैं जबकि आवाज़ जैसी लहरें हवा के कणों के माध्यम द्वारा आगे बढ़ती हैं। और ये तमाम तरह की तरंगें या लहरें ऊर्जा की अलग अलग किस्में होती हैं। तो इन तमाम बातों का निष्कर्ष ये हुआ कि ऊर्जा ही वह साध्ना है जिसके द्वारा हमें किसी भी चीज़ के अस्तित्व का ज्ञान होता है। किसी वस्तु व हमारी इन्द्रियों के बीच सम्पर्क स्थापित करने का काम ऊर्जा की कोई न कोई अवस्था करती है। अब अँधेरे की परिभाषा के अनुसार कोई क्षेत्र ऐसी अवस्था में हो जहाँ पर मौजूद कोई भी वस्तु दिखाई न दे। इसलिए देखने की उपरोक्त परिभाषा में अँधेरा ऐसी अवस्था को कहेंगे जहाँ पर किसी भी तरह की ऊर्जा मौजूद न हो। सवाल ये पैदा होता है कि ऐसी अवस्था ब्रह्माण्ड में कहां पर है या थी? देखा जाये तो वर्तमान में ब्रह्माण्ड में कोई भी ऐसी जगह नहीं जहाँ ऊर्जा मौजूद न हो। लेकिन एक कल्पना ज़रूर की जा सकती है कि अगर कोई ऐसी जगह हो जहाँ पर किसी भी तरह की ऊर्जा मौजूद न हो तो किस तरह की परिस्थिति सामने आ सकती है।

इस परिस्थिति को समझने के लिये एक भौतिक राशि एण्ट्रोपी (Antropy) की सहायता ली जा सकती है। किसी खास ताप पर किसी सिस्टम में जितनी ऊर्जा होती है, उस ऊर्जा को ताप से विभाजित करने पर एण्ट्रोपी मिलती है। यानि अगर किसी सिस्टम में 10 जूल एनर्जी 2 कैल्विन ताप पर मौजूद है तो उसकी एण्ट्रोपी होगी 5 जूल/कैल्विन। एक हकीकत ये भी है कि किसी खास ताप पर किसी सिस्टम की एण्ट्रोपी की गणना करना नामुमकिन है क्योंकि उस सिस्टम में जो भी इलेक्ट्रान, प्रोटान, एटम या अणु होंगे, उनकी तमाम ऊर्जा की गणना करना नामुमकिन है। इतना ज़रूर है कि सिस्टम को बाहर से कुछ ऊर्जा देने पर उसकी एण्ट्रोपी में कितना बदलाव होगा, इसे मापा जा सकता है। अब ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के एक नियम के अनुसार किसी सिस्टम की एण्ट्रोपी हमेशा या तो बढ़ती है या उसमें कोई बदलाव नहीं होता। सिस्टम की एण्ट्रोपी कभी कम नहीं होती। इसीलिए ये कहा जाता है कि यूनिवर्स की पैदाइश के बाद से उसकी एण्ट्रोपी लगातार बढ़ रही है।

किसी खास ताप पर एण्ट्रोपी ज़ीरो होने का मतलब हुआ कि सिस्टम में उस ताप पर कोई भी ऊर्जा मौजूद नहीं। दूसरे शब्दों में अगर उस सिस्टम में एटम है तो उसके इलेक्ट्रान नाभिक के चारों तरफ चक्कर नहीं लगा रहे होंगे। क्योंकि वहाँ गतिज ऊर्जा भी नहीं होगी। न ही प्रोटॉन आपस में बंध्कार न्यूक्लियस बना रहे होंगे और न ही क्वार्क एक दूसरे से मिलकर मूल कणों की रचना कर रहे होंगे। इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि वहाँ पर किसी एटम का अस्तित्व ही सिरे से नहीं होगा। इन तमामतर बातों का निष्कर्ष ये हुआ कि परम अन्धकार (Absolute Darkness) एक ऐसी स्पेस लोकेशन हुई जहाँ न तो किसी तरह का पदार्थ पाया जाता है और न ही ऊर्जा। मौजूदा वक्त में यूनिवर्स के भीतर ऐसी कोई जगह नहीं है, लेकिन साइंटिफिक सुबूत बताते हैं कि यूनिवर्स के जन्म के समय ऐसी जगह मौजूद थी। जहाँ स्पेस तो था लेकिन न तो वहाँ पदार्थ था और न ही ऊर्जा। ऐसी जगह रोशनी की उत्पत्ति से भी पहले निर्मित हो चुकी थी। क्योंकि ऊर्जा न होने का मतलब यही निकलता है कि रोशनी का जन्म नहीं हुआ था।

अगर परम अन्धकार का अस्तित्व सत्य माना जाये तो इसका मतलब होगा कि पदार्थ व ऊर्जा से पहले निर्माण हुआ स्पेस व डाईमेन्शन का। यही समय था जबकि ब्रह्माण्ड में परम अन्धकार की दशा थी। फिर उसके बाद निर्माण हुआ पदार्थ व ऊर्जा का। इसमें भी ऊर्जा का निर्माण पहले हुआ। उस समय यूनिवर्स के एण्ट्रोपी शून्य थी। तब से आजतक लगातार यह एण्ट्रोपी बढ़ रही है, ऐसा साइंटिफिक रिसर्च से पता चला है। ऊष्मागतिकी का नियम भी यही कहता है कि किसी सिस्टम की एण्ट्रोपी कभी भी नहीं घट सकती। 

एक सवाल ये उठता है कि यूनिवर्स के जन्म के समय ताप कितना था? अगर ये ताप ज़ीरो माना जाये तो एण्ट्रोपी का मान ज़ीरो नहीं होगा। भले ही उस वक्त एनर्जी ज़ीरो रही हो। इसलिए क्योंकि ज़ीरो को ज़ीरो से विभाजित करने पर नतीजा ज़ीरो नहीं मिलता। बल्कि यह मान अनिर्धारित या अस्थिर होता है। बिग बैंग की मान्यता के अनुसार यह ताप अनन्त था। जो बिग बैंग के तुरन्त बाद निश्चित किन्तु अत्यधिक तापमान के रूप में परिवर्तित हो गया। 

एण्ट्रोपी का यही अस्थिर मान इन्फ्लेशनरी यूनिवर्स (Inflationary Universe) को पैदा करता है। यानि ऐसे ब्रह्माण्ड की पैदाइश करता है जो लगातार फैलता जाता है। वर्तमान खोजें भी यही दर्शाती हैं कि ब्रह्माण्ड लगातार विस्तार ले रहा है। इन्फ्लेशनरी थ्योरी के अनुसार मैटर, एण्टीमैटर और फोटॉन वैक्यूम फ्ल्क्चुएशन के ज़रिये झूठे वैक्यूम (False Vacuum) से एक कला संक्रमण (Phase Transition) के बाद पैदा हुए। ये सभी कण धनात्मक ऊर्जा रखते हैं। और इस कारण से हमेशा फैलाव की दशा में रहते हैं। हालांकि उनकी धनात्मक ऊर्जा ऋणात्मक गुरुत्वीय ऊर्जा द्वारा बैलेंस हो जाती है। इस तरह से पूरी ऊर्जा हमेशा ज़ीरो ही रहती है।

यूनिवर्स की शून्य ऊर्जा धनात्मक व ऋणात्मक ऊर्जा में कैसे बदली? यह एक बड़ा सवाल है। एनर्जी पैदा हुई ‘कुछ नहीं’ से। ये ‘कुछ नहीं’ पहले से मौजूद स्पेस टाइम का निर्वात था? या ये स्पेस टाइम भी मौजूद नहीं था। यानि ये सभी चीज़ें यूनिवर्स की पैदाइश के साथ ही पैदा हुईं? इस तरह के बहुत से सवालों पर वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं। लेकिन अब तक मिले कई सुबूत यही कहते हैं कि ‘कुछ नहीं ’ से स्पेस टाइम की रचना हुई। उसके बाद एनर्जी और मैटर की पैदाइश हुई। एनर्जी और मैटर की पैदाइश से पहले स्पेस टाइम की वैक्यूम ही दरअसल ‘परम अन्धकार’ था।

-----उपरोक्त लेख 'इलेकट्रोंनिकी आपके लिए' के जनवरी-2012 अंक में प्रकाशित हुआ.
जीशान हैदर जैदी, लेखक.

Wednesday, December 28, 2011

उर्दू में साइंस फिक्शन - एक मुताल्या


प्रस्तुत लेख मैंने दिनांक 26 व 27 दिसंबर 2011 को नेशनल डिग्री कालेज, लखनऊ मे आयोजित कार्यशाला के दूसरे दिन पढ़ा। ये कार्यशाला विज्ञान प्रसार, नेशनल बुक ट्रस्ट व तस्लीम के संयुक्त तत्वधान में आयोजित हुई।

हिन्दी साइंस फिक्शन के शौकीनों को दो नाम खास तौर पर आकर्षित करते हैं। ये नाम है प्रोफेसर दिवाकर और डा0रमन। लेकिन जब कोई इन नामों के लेखकों के बारे में छानबीन करता है, तो उनका कहीं कोई अता पता नहीं मिलता। दरअसल ये दोनों नाम ही असली नहीं हैं और सच्चाई ये है कि इन नामों से लिखने वाला उर्दू का मशहूर मुसन्निफ इज़हार असर है। इज़हार असर ने एक हज़ार नावेल लिखकर रिकार्ड बनाया जिनमें सौ से ऊपर साइंस फिक्शन शामिल हैं। जबकि इस गिनती से वह नावेल अलग है जो उन्होंने हिन्दी में प्रोफेसर दिवाकर और डाक्टर रमन नामों से लिखे। इससे हम अन्दाज़ा कर सकते हैं कि उर्दू लिटरेचर साइंस फिक्शन के मामले में दूसरी भाषाओं के मुकाबले कहीं कमतर नहीं ठहरता। हालांकि आमतौर पर जब उर्दू लिटरेचर की बात होती है तो शेरो शायरी, ग़ज़ल, जाम व साक़ी का ही तसव्वुर ज़हन में आता है। उर्दू साइंस फिक्शन का वजूद तो बहुत ही दूर की कौड़ी नज़र आता है। लेकिन हक़ीक़त इसके बरअक्स है।
उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन के मामले में निहायत ज़रखेज़ है। उर्दू के कई मुसन्निफों ने साइंस फिक्शन से मुताल्लिक आला दर्जे का लिटरेचर दुनिया के सामने पेश किया है। इस लिटरेचर में बहुत से नये अछूते ख्यालात को जगह दी गयी है। उर्दू को फरोग़ देने में शहरे लखनऊ का नाम अव्वल दर्जे पर आता है। उर्दू का पहला साइंस फिक्शन राइटर देने का भी सेहरा इसी शहर के सर है। और उस राइटर का नाम है खान महबूब तरज़ी। इन्होंने पहला साइंस फिक्शन नावेल आज़ादी से पहले लिख लिया था। हालांकि ये बताना बहुत मुश्किल है कि उनका पहला साइंस फिक्शन नावेल कौन सा था, क्योंकि उनके बारे में बहुत कम रिकार्ड उपलब्ध् है। आज़ादी से पहले के दौर में लिखे गये उनके कुछ नावेल है, ‘क़यामत-ए-सुग़रा’, ‘सफर-ए-ज़ोहरा’, ‘शहज़ादी शब-ए-नूर’ और ‘फौलादी पुतली’ वगैरा। ये सभी नावेल लखनऊ के मशहूर पब्लिकेशन नसीम बुक डिपो ने प्रकाशित किये थे। उनके नावेलों में टाइम मशीन और रोशनी की तेज़ रफ्तार से गुज़रकर महाभारत की लड़ाई जैसे गुज़िश्ता वाक़ियात को देखना शामिल है। आगे उर्दू के जिन मुसन्निफों ने इसपर काम किया है उनमें शामिल हैं इब्ने सफी, इज़हार असर, मज़हर कलीम, मुश्ताक़ क़ुरैशी, एच-इक़बाल, एम-ए-राहत वगैरा। 
अकेले इब्ने सफी ने ही ढाई सौ से ऊपर नावेल लिखे, इनमें सत्तर के लगभग उच्च कोटि के साइंस फिक्शन शामिल हैं। इब्ने सफी के उपन्यास कहने को तो जासूसी हैं किन्तु उनमें सस्पेंस, एडवेंचर, हास्य हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वो पाठक वर्ग को ऐसी रोमांचक दुनिया की सैर कराते हैं जो पाठक को आसपास के वातावरण से बेखबर कर देती है। उनके उपन्यासों में सबसे बड़ा रंग है साइंस फिक्शन का और यह कहने में कोई हिचक नहीं होती कि उर्दू में जासूसी साइंस फिक्शन की शुरूआत की है इब्ने सफी ने। सन 1953 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘मौत की आंधी  इस तरह का पहला उपन्यास था। जिसमें एक ऐसे लौह मानव की कल्पना है जो मशीन से कण्ट्रोल होता था और जानवरों व इंसानों की बू पाकर झपटता था और उनके दो टुकड़े कर देता था। इस लौह राक्षस को बनाने वाले कुछ सिरफिरे वैज्ञानिक थे जो पूरी दुनिया को अपने कब्ज़े में करना चाहते थे।  
इब्ने सफी ने साहित्य में जासूसी साइंस फिक्शन की एक नयी शुरूआत की है। उनकी कहानियां भूत प्रेतों और राक्षस व पिशाचों की कल्पनाओं का मज़ाक उड़ाती हुई हर घटना की साइंटिफिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। उनकी कहानियों में अनेकों अद्भुत वैज्ञानिक कल्पनाएं देखने को मिलती हैं। उनकी शोला सीरीज़ में ऐसी घातक किरणों की कल्पना है जिनसे सिर्फ चमड़े का लबादा पहनकर बचा जा सकता है। उनकी कहानियों में वैज्ञानिक रूप से निहायत तरक्कीयाफ्ता कुछ मुजरिमों ने एक नया मुल्क ज़ीरोलैण्ड नाम से बसाया है और जिनके पास ऐसे उड़नतश्तरी नुमा वायुयान हैं जिन्हें दूसरे देशों का राडार सिस्टम कैच नहीं कर पाता। और जिसे लोग दूसरी दुनिया के प्राणियों का यान समझते हैं। उनके पास गदानुमा ऐसे हथियार भी मौजूद हैं जिनसे गोलियां टकराकर अपनी दिशा बदल देती हैं।
इब्ने सफी के उपन्यासों में ज़ेब्राधारी ऐसे मनुष्य पाये जाते हैं जो हाथी से भी ज्य़ादा शक्तिशाली हैं। ये मनुष्य कुछ वैज्ञानिकों के दिमाग की उपज हैं। ज़ीरोलैण्ड पर हुकूमत करने वाली एक ऐसी औरत है जो अपने यन्त्रों द्वारा किसी को हिप्नोटाइज़ करके उससे अपने आदेश मनवा लेती है। वहाँ ऐसे पक्षी पाये जाते हैं जिनकी आँखों में छोटा कैमरा फिट रहता है और वे जासूसी का काम करते हैं। इब्ने सफी के उपन्यासों में ऊर्जा की ऐसी परछाईयां भी मिलती हैं जिनकी रेंज में आने पर बड़ी से बड़ी इमारत ढेर हो जाती है। मशीनों से कण्ट्रोल होने वाले कृत्रिम तूफान भी उनके उपन्यासों में नज़र आते हैं। इस प्रकार की अनेकों कल्पनाएं उनके उपन्यासों में प्रदर्शित होती हैं जिनमें साइंस का पहलू पूरी मज़बूती के साथ संलग्न रहता है।
मनोविज्ञान पर भी इब्ने सफी का कलम पूरी कुशलता के साथ चला है। स्पिलिट पर्सनालिटी (द्विव्यक्तित्व) का विचार उनके उपन्यास ‘जहन्नुम का शोला’ में प्रदर्शित हुआ। जिसमें एक मासूम लड़की अपनी दूसरी पर्सनालिटी में मुजरिमों की टोली की मलिका है। ‘एडलावा’ रेड इण्डियन जाति का बचा हुआ शक्तिशाली व्यक्ति, जिसके अन्दर अपनी जाति मिटाने वालों के खिलाफ गुस्सा फूटकर निकलता है और वह उनके खून से स्नान करता है। एक अपराधी जब किसी तरीके से अपना मुंह नहीं खोलता तो उसे लिटाकर उसके माथे पर लगातार पानी की बूंदें टपकायी जाती हैं। उन बूंदों की धमक उसे चीखने पर मजबूर कर देती है।
उर्दू साइंस फिक्शन में एक और सशक्त हस्ताक्षर इज़हार असर है। इनकी अभी इसी वर्ष 15 अप्रैल 2011 को मृत्यु हुई है। जासूसी और साइंस फिक्शन का मिक्सचर उनकी बहराम सीरीज़ काफी लोकप्रिय हुई। इज़हार असर के साइंस फिक्शन उपन्यासों में भी कई अछूते ख्यालात देखने को मिलते हैं। 1955 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ एक ऐसी औरत की कहानी है जो अपने मालिक के अनैतिक हुक्म को मानने से इंकार कर देती है। उस समय उसका मालिक उसे बताता है कि वह सिर्फ एक रोबोट है जिसे अपने मालिक का हर हुक्म मानने के लिये बनाया गया है। ‘बीस साल बाद’ में दूसरे ग्रह से आये हुए एलियेन एक सुपर ब्रेन का निर्माण करते हैं जो ध्राती पर खत्म हो रही एक जाति की छानबीन करता है। ‘मशीनों की बग़ावत’ में ऐसी इण्टेलिजेंट मशीनों की कल्पना है जिन्होंने ग्रह पर रहने वाले इंसानों के दिमागों पर अपना कण्ट्रोल कर लिया है और किसी भी इंसान के दिमाग में अगर उनके खिलाफ ख्याल भी आता है तो उन्हें पता चल जाता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ इंसान अपनी अक्ल से उनके खिलाफ जीतने में कामयाब हो जाते हैं। ‘ज़ीरो ज़ीरो ज़ीरो’ में दिमाग को एटामिक रेडियेशन के ज़रिये इतना ताकतवर बनाने की कल्पना है कि सिर्फ सोच के द्वारा किसी का क़त्ल किया जा सकता है। ‘एटामिक कठपुतलियां’ ऐसे इंसानों की कहानी है जो कभी नार्मल थे, लेकिन एटामिक रेडियेशन ने उन्हें अछूत बना दिया है। यह एक इंसानी किरदार के मशीनी डुप्लीकेट की भी कहानी है जो साइंसदानों की तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी असलियत जान जाता है और एक ग्रह को बचाने के लिये अपने को क़ुरबान कर देता है। 
उर्दू साइंस फिक्शन में मज़हर कलीम ने भी बहुत कुछ लिखा है। हालांकि उनके उपन्यासों में इब्ने सफी के ही किरदार यानि अली इमरान व उसकी टीम नज़र आती है। शायद प्रकाशकों के दबाव में उन्होंने पुराने मक़बूल किरदारों को लेकर कहानियां लिखीं। उनके उपन्यास ‘कायापलट’ में अनोखे बायोवीपन की बात हो रही है। एक साइंटिस्ट ने ऐसे जरासीम बनाये हैं जो इंसान को बुज़दिल बना देते हैं। जिनके असर में आते ही फौज के बड़े बड़े बहादुर चींटी काटने से भी डरने लगते हैं। ‘व्हाइट शैडो’ कहानी में साइंटिस्ट ऐसी सोलर माइक्रोचिप बनाने में कामयाब हो जाता है जिसमें स्टोर की हुई सोलर एनर्जी महीनों चलती है। इब्ने सफी के ही किरदारों को लेकर एच-इक़बाल और मुश्ताक कुरैशी ने ऐसे कई नावेल लिखे जिसमें उन्होंने इन किरदारों को दूसरे ग्रहों की अनजानी दुनियाओं की सैर कराई। एम-ए-राहत की ‘सदियों का बेटा’ नाम से एक उपन्यास सीरीज़ काफी मक़बूल हुई। जिसमें उन्होंने हमेशा ज़िन्दा रहने वाले एक कैरेक्टर के ज़रिये ज़मीन बनने की शुरूआत से लेकर उसकी हर सदी में तरक्की की दास्तान सुनाई थी। खास बात ये कि इस पूरी विज्ञान सम्मत दास्तान में कहीं किसी वैज्ञानिक का रोल नहीं है। पाकिस्तान में सिराते इम्तियाज़ से सम्मानित अशफाक अहमद की तिलिस्म होश अफ्ज़ा भी क़ाबिले जिक्र है जिसमें प्योर साइंस फिक्शन कहानियां शामिल हैं। इस तरह उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन लिटरेचर से भरपूर है।

--------- ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक)


और अब एक बानगी लखनऊ में पत्रकारिता के मौजूदा स्तर की।

लखनऊ का एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र लिखता है,
‘जीशान हैदर जैदी ने उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए कहा कि इससे पहले भी उर्दू के विज्ञान कथाकार लखनऊ में आ चुके हैं।’
(जबकि मैंने कहा था कि उर्दू जगत में पहला विज्ञान कथाकार लखनऊ का था।) 

एक अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने लिखा,
‘उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए विज्ञान कथाकार जीशान हैदर जैदी ने कहा कि मुट्‌ठी भर विज्ञान कथाओं को छोड़ दें तो उर्दू साहित्य में दूर दूर तक विज्ञान कथाओं का कोई अस्तित्व नहीं है।’
(जबकि मैंने कहा था कि उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन लिटरेचर से भरपूर है।)  
------लेखक           

Tuesday, December 27, 2011

विज्ञान कथा कार्यशिविर में पुस्तक ' बुड्‌ढा फ्यूचर’ का लोकार्पण.


विज्ञान प्रसार, नेशनल बुक ट्रस्ट व तस्लीम के संयुक्त तत्वधान में एक कार्यशाला का आयोजन दिनांक 26 व 27 दिसंबर 2011 को नेशनल डिग्री कालेज, लखनऊ में हुआ। जिसमें देश भर से आये लगभग 20 चोटी के विज्ञान व विज्ञान कथा लेखक सम्मिलित हुए। इनमें प्रमुख नाम थे, मुख्य अतिथि के रूप में शामिल अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान कथाकार अनिल मेनन, डा0अरविन्द मिश्र, श्री हेमन्त कुमार, श्री देवेन्द्र मेवाड़ी, डा0सी0एम0नौटियाल, श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी, श्री हरीश गोयल, डा0विनीता सिंघल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री शुकदेव प्रसाद, श्री चंदन सरकार, श्री अमित कुमार ओम, श्री मुकुल श्रीवास्तव, सुश्री बुशरा अलवेरा, श्री मनीष मोहन गोरे, डा0ज़ाकिर अली रजनीश, सुश्री अरशिया अली व ज़ीशान हैदर ज़ैदी। कार्यक्रम के प्रथम दिन उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थे श्री अनिल मेनन। प्रथम दिन की विस्तृत रिपोर्ट को यहाँ पढ़ें।

उद्घाटन सत्र में अन्य कार्यक्रमों के अलावा दो पुस्तकों का विमोचन भी हुआ जिनमें पहली डा0अरविन्द मिश्र की ‘साइंस फिक्शन इन इंडिया’ व दूसरी ज़ीशान हैदर ज़ैदी की ‘बुड्‌ढा फ्यूचर’ थी।

‘बुड्‌ढा फ्यूचर’ नाट्‌य जगत में एक अनूठा प्रयोग है। यानि किसी साइंस  फिक्शन कथात्मक की नाटक के रूप में प्रस्तुति। नाटक की अपनी सीमाएं होती हैं। और किसी साइंस फिक्शन को उन सीमाओं में बांधना निहायत चुनौतीपूर्ण कार्य है। खासतौर से तब जबकि हम यह तथ्य जानते हैं कि एक साइंस  फिक्शन फिल्म बनाने में आम फिल्म से कई गुना ज्य़ादा पैसा स्वाहा हो जाता है। और हर कदम पर एक नयी कल्पना व नये सीन की ज़रूरत होती है। ऐसे में नाटक के रूप में इसे दर्शाना, जहाँ केवल एक स्टेज होता है और बजट के नाम पर शून्य होता है इसका मंचन एक चैलेंज ही कहा जायेगा। यही कारण है कि साइंस  फिक्शन में ड्रामे की विधा न के बराबर देखने को मिलती है। ज़ीशान हैदर ज़ैदी द्वारा लिखे तीन ड्रामे बुड्‌ढा फ्यूचर, सौ साल बाद व पागल बीवी का महबूब इस दिशा के कार्य हैं।

बुड्‌ढा फ्यूचर पर एक पपेट ’शो भारतीय विज्ञान कथा एसोसिये’शन के 2008 अधिवेशन में हुआ। पपेट माध्यम में विज्ञान कथा पर ये विश्व का पहला शो था। जिसे प्रसिद्ध पपेटियर अरशद उमर ने निर्देशित किया था। और अब इसे किताब की शक्ल में क्वींस पब्लिकेशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है।

Wednesday, June 1, 2011

एक महान विज्ञान कथा लेखक की मृत्यु - खबर जो देर से मिली


जब कल मुझे डा0 अरविन्द मिश्र जी ने फोन पर बताया कि मशहूर उर्दू विज्ञान कथा लेखक इज़हार असर नहीं रहे तो एक झटका सा लगा। और जब उन्होंने ये बताया कि ये सानिहा 15 अप्रैल ही को हो चुका है और इसकी सूचना उन्हें मराठी विज्ञान कथा लेखक व मित्र श्री देशपाण्डे जी से मिली तो मेरे दु:ख का एहसास कुछ और बढ़ गया। क्योंकि अपने बीच के किसी लेखक की खबर डेढ़ महीने बाद और वो भी बाहर से मिले इससे बड़ी अफसोस की बात और क्या होगी। शायद हम अपने में कुछ ज्यादा ही गुम हो चुके हैं।

एक हज़ार से ऊपर उपन्यास लिखने वाले मशहूर उर्दू उपन्यासकार इज़हार असर उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर के करतपुर गाँव में 15 जून 1928 में पैदा हुए। शुरूआती शिक्षा वहीं हुई और मैट्रिक करने के बाद 1942 में लाहौर जाकर कपड़े की मिल में नौकरी कर ली। उसके बाद उन्होंने जूते की दुकान में भी नौकरी की। फिर 1947 में जब बँटवारे के फसाद शुरू हुए तो वे लाहौर छोड़कर दिल्ली आ गये। ऐसे वक्त में जबकि भारतीय मुसलमान पाकिस्तान जाकर मुहाजिर बनना पसंद कर रहे थे, इज़हार का लाहौर छोड़कर दिल्ली में बसना एक प्रशंसनीय और हालात को देखते हुए साहसिक क़दम था। उनका यह कदम सही साबित हुआ जब दिल्ली ने उनके अन्दर की साहित्यिक प्रतिभा को उभारा। और फिर उनके अनवरत लेखन का सिलसिला शुरू हुआ और जब 15 अप्रैल 2011 में 84 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई तो इस समय तक वे 1000 उपन्यास लिख चुके थे। हालांकि इसमें वो उपन्यास शामिल नहीं जो उन्होंने छद्म नाम से किसी पब्लिकेशन की माँग पर अक्सर लिखे। इनमें हिन्दी में प्रोफेसर दिवाकर और डा0 रमन के नाम से लिखे गये कई साइंस फिक्शन उपन्यास शामिल हैं। 

उनके उपन्यासों के खास विषय रहे जुर्म, जासूसी, रहस्य और साइंस फिक्शन। 1950 में प्रकाशित उनकी नागिन सीरीज़ के उपन्यास बेस्ट सेलर साबित हुए। उनका पहला विज्ञान कथात्मक उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ था जो 1955 में प्रकाशित हुआ था। जासूसी क्षेत्र में उनकी तुलना उर्दू के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार इब्ने सफी से की जाती है। जबकि साइंस फिक्शन के क्षेत्र में इज़हार असर उर्दू साहित्य में सर्वश्रेष्ठ हैं। जासूसी और साइंस फिक्शन का मिक्सचर उनकी बहराम सीरीज़ पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। सन 2006 में इज़हार असर को ग़ालिब सम्मान से नवाज़ा गया। सामाजिक साहित्यकार के तौर पर भी इज़हार का कार्य उल्लेखनीय है। उनके सामाजिक ड्रामे ‘दो आँखें’ और ‘मेहरबान कैसे कैसे’ काफी लोकप्रिय हुए। 

इज़हार के साइंस फिक्शन उपन्यासों में कई नये विचार देखने को मिलते हैं। मिसाल के तौर पर उनका उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ एक औरत की कहानी है जो अपने मालिक के अनैतिक हुक्म को मानने से इंकार कर देती है। उस समय उसका मालिक उसे बताता है कि वह एक रोबोट है जिसे सिर्फ अपने मालिक का हुक्म मानने के लिये बनाया गया है। उनका नावेल ‘शोलों के इंसान’ अन्तरिक्ष यात्रा पर आधारित है। ‘बीस साल बाद’ में दूसरे ग्रह से आये हुए एलियेन एक ‘सुपर ब्रेन’ का निर्माण करते हें जो धरती पर खत्म हो रही एक जाति के बारे में छानबीन करता है। 

इज़हार असर ने आधुनिक साइंस के बारे में आसान अलफाज़ में समझाने के लिये तीन किताबें भी लिखीं। साइंस के प्रति उनका समर्पण उनकी शायरी में भी देखा जा सकता है जहां उन्होंने कई वैज्ञानिक विचारों को जगह दी है। इज़हार असर एक मासिक डाईजेस्ट ‘इज़हार असर डाईजेस्ट’ के ताउम्र प्रकाशक भी रहे। इसकी प्रतियां उनके निवास Y-5, Dda Flats, Ranjit Nagar, Delhi - 110008 (Ph : 011-25702905) से प्राप्त की जा सकती हैं।   
           

Sunday, September 5, 2010

विश्व के महान वैज्ञानिक

मेरी यह श्रृंखला साइंस ब्लोग्गर्स एसोसियेशन पर पिछले साल "जिसपे है दुनिया को नाज़, उसका है जन्मदिन आज" शीर्षक से प्रकाशित हुई थे. इस श्रृंखला के वैज्ञानिकों के बारे में आइन्दा जानकारी हासिल करने में कोई असुविधा न हो इसके लिए इस पोस्ट में उनके लिंक प्रस्तुत हैं :

Thursday, July 29, 2010

'भविष्य का यथार्थ' वर्ष का सर्वश्रेष्ठ विज्ञान लेख

परिकल्पना ब्लॉग उत्सव में मेरे लेख 'भविष्य का यथार्थ' को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान लेख का सम्मान प्राप्त. खबर यहाँ पढ़ें.


Wednesday, November 4, 2009

हास्य नाटक ‘‘पागल बीवी का महबूब’’ का मंचन

लखनऊ की जानी मानी कल्चरल संस्था मून आर्टस एण्ड मोशन पिक्चर्स ने राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में हास्य नाटक ‘‘पागल बीवी का महबूब’’ का मंचन दिनांक 03-11-09 को किया। नाटक का लेखन किया था जीशान हैदर जैदी ने, व निर्देशक थे श्री शराफत खान। लखनऊ के जाने माने लेखक जीशान हैदर जैदी अनेकों नाटक, टेलीफिल्मस, सीरियल व कहानियां लिख चुके हैं। निर्देशक शराफत खान का नाम फिल्म तेरे मेरे सपने, पागलपन, तोहफा मोहब्बत का जैसी फिल्मों व अनेकों सीरियल्स से जुड़ा हुआ है। नाटक में प्रमुख किरदार निभाया, नईम खान, अचला बोस, मो0 मुस्तकीम, सिमरन, मुख्तार अहमद, मिदहत खान, शाकिर सिद्दीकी, आमिर मुख्तार, सरिता श्रीवास्तव, फरीद, अलीम, ताहिर, अनुज, प्रीति, राजकुमारी और मौर्या ने। ये सभी लखनऊ रंगमंच की चर्चित हस्तियां हैं।

नाटक की कहानी फाजिल मियां और उसकी बीवी के गिर्द घूमती है। साथ में है एक पागल साइंटिस्ट जो दुनिया में प्यार मोहब्बत फैलाने का ख्वाब देख रहा है। लड़ाई भिड़ाई, मार काट के इस ज़माने में मोहब्बत की तलाश चिराग लेकर सुई ढूंढने की तरह है। और किसी की मोहब्बत में डूबकर गोते खाना तो और भी मुश्किल है। आज सांइटिस्ट एटम बम और हाईडोजन बम तो बना चुके हैं। तबाही के हथियारों के एक से एक स्टाइल दुनिया को दिखा चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई गोली या कैप्सूल नहीं बना पाये हैं जो किसी के दिल में सोई मोहब्बत और प्यार को बेदार कर दे। एक सनकी साइंटिस्ट डा0 सायनाइड इसी तरह की कोशिश करते हुए कुछ टेबलेट्‌स बनाता है जिसे फाज़िल मियां की तेज़ तर्रार और लड़ाकू बेगम गटक जाती हैं। डोज़ कुछ ज्यादा हो जाती है और बेगम पागलपन की चोटी पर पहुंच जाती हैं। सारे पुराने आशिकों की रूहें उनके दिमाग में समा जाती हैं और अपने को शीरीं समझते हुए वह फरहाद को पुकारने लगती हैं। जो उनके लिए दूध की नहर खोद सके।

फाज़िल मियां अपनी बेगम की ये ख्वाहिश पूरी करने के लिए कमर कस लेते हैं। यहीं से मुसीबतों की शुरुआत हो जाती है। ठेकेदार आकर एक से एक आईडिया पेश करते हैं। उन्हें भगाते हैं तो पड़ोसी आकर परेशान करने लगते हैं। इनकम टैक्स वाले भी सूंघते हुए पहुंच जाते हैं। हेल्थ डिपार्टमेन्ट वाले अलग धमकियाँ दे रहे हैं। बीच बीच में अनाथालय वाले और भिखारी भी लाइन लगाकर पहुंचे हुए हैं। फाज़िल मियां अब उस दिन को कोस रहे हैं जब उन्होंने नहर खोदने की हामी भरी थी। यहां तो एक नाली खोदना दुश्वार हो रहा है। आखिरकार आजिज़ आकर वह दोबारा डा0 सायनाइड के पास पहुंचते हैं। एक दूसरी दवा की खुराक बेगम के दिल से सारी मोहब्बतें गायब करके फिर से उन्हें लड़ाका तबीयत बना देती है। लेकिन अब फाजिल मियां को सुकून है।

Thursday, January 15, 2009

कुछ वैज्ञानिक परिकल्पनाएं (2)

दूसरी परिकल्पना द्रव्यमान ऊर्जा सम्बन्ध के बारे में है. यह तो सर्वविदित है की द्रव्यमान को ऊर्जा में और ऊर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता है. नाभिकीय अभिक्रियाएँ तथा गामा फोटोनों से एलेक्ट्रोन तथा पाजिट्रोन बनना इसके उदाहरण हैं. द्रव्यमान ऊर्जा सम्बन्ध में एक नियम कार्य करता है जिसे द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण के नाम से जाना जाता है. इस नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड के समस्त द्रव्यमान तथा ऊर्जा का योग नियत है. दोनों एक दूसरे में परिवर्तित किए जा सकते हैं. लेकिन उनका कुल योग सदेव एक नियतांक होगा. प्रश्न उठता है कि इस नियतांक का मान क्या होगा? उदाहरण के लिए किसी रासायनिक अभिक्रिया में यदि २ ग्राम तथा ३ ग्राम के दो अभिकारक लिए जाएँ तो अभिक्रिया के बाद बने कुल उत्पादों का द्रव्यमान ५ ग्राम होगा. यहाँ पर नियतांक का मान ५ ग्राम है. इसी प्रकार ब्रह्माण्ड के समस्त द्रव्यमान तथा ऊर्जा के योग के नियतांक का मान भी निश्चित संख्या होना चाहिए. इस बारे में मेरी परिकल्पना है कि इस नियतांक का मान शून्य होगा. कैसे? इसके लिए पहले कुछ छोटे निकायों (सिस्टम्स) को देखना होगा. किसी उदासीन परमाणु में कुल आवेशों का मान शून्य होता है. न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार किसी वस्तु पर बल लगाने पर उतना ही बल विपरीत दिशा में उत्पन्न हो जाता है. अर्थात बल का योग भी शून्य होता है. इस प्रकार विभिन्न निकायों का अध्ययन करने पर अधिकतर भौतिक राशियों का कुल मान शून्य ही आता है. अतः अगर ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े निकाय की बात करें तो इसमें द्रव्यमान - ऊर्जा का योग शून्य ही आना चाहिए. ऐसा इसलिए भी संभव है कि द्रव्यमान और ऊर्जा अलग अलग भौतिक राशियाँ हैं. इसलिए इनका कुल योग तभी संभव है जबकि इस योग का मान इकाई रहित हो जाए. और केवल शून्य संख्या इस कसौटी पर खरी उतरती है.

और अब आते हैं तीसरी परिकल्पना पर जो एंटी मैटर अर्थात प्रति पदार्थ से सम्बंधित हैं. प्रति कणों की खोज बहुत पहले ही हो चुकी है. और अब तक पाजिट्रान, एंटी प्रोटोन जैसे अनेक प्रतिकण खोजे जा चुके हैं. प्रकृति के प्रत्येक मूल कण का एक प्रतिकण अवश्य है. जो संपर्क में आने पर एक दूसरे को नष्ट कर डालते हैं. अगर मूल कणों का प्रति कण अस्तित्वा में है तो प्रति परमाणु, प्रति अणु और फिर प्रति पदार्थ (एंटी मैटर) भी अस्तित्व में होना चाहिये. लेकिन हम अभी तक कहीं भी प्रति पदार्थ के दर्शन नहीं कर सके हैं. क्यों? इसलिए क्योंकि ब्रह्माण्ड में समस्त स्थानों पर पदार्थ का फैलाव है. अगर इस बीच में कोई प्रति पदार्थ अस्तित्व में आएगा तो पदार्थ से टकराकर नष्ट हो जायेगा. इसलिए कोई ऐसा अलग दायेरा होना चाहिये जहाँ केवल प्रति पदार्थ हो, पदार्थ न हो. प्रश्न उठता है वह दायेरा, वह क्षेत्र कहाँ हो सकता है जहाँ प्रति पदार्थ यानी एंटी मैटर हो लेकिन पदार्थ (मैटर) न हो? स्पष्ट है की वह क्षेत्र एक ऐसा पूरक क्षेत्र (complementary Area) होगा जो हमारे इस अन्तरिक्ष से पूरी तरह अलग होगा. अब अन्तरिक्ष क्या है? चार विमाओं लम्बाई, चौडाई, और समय से निरूपित बिन्दुओं का समूह. इन्हीं बिन्दुओं द्बारा हम किसी पदार्थ और उसकी स्थिति को दर्शाते हैं. यहाँ पर हमें निर्देशांक ज्यामिति द्बारा लम्बाई, चौडाई और ऊंचाई तीनों के दो भाग मिलते हैं. धनात्मक (Positive) और ऋणात्मक (Negative) भाग. लेकिन आश्चर्य की बात है की समय का कोई नेगेटिव नहीं मिलता. तो क्या वास्तव में निगेटिव टाइम का कोई अस्तित्व नहीं है? लेकिन यह कैसे संभव है? जबकि ब्रह्माण्ड में हर चीज़ का एक ऋणात्मक भाग अस्तित्व में है. स्पष्ट है की ब्रह्माण्ड में एक ऐसा क्षेत्र हो सकता है जहाँ निगेटिव टाइम अस्तित्व में है. अगर ऐसा क्षेत्र है तो वह इस प्रकार का पूरक क्षेत्र होगा जहाँ तक हमारी या किसी अन्य पदार्थ की पहुँच असंभव होगी. तो फिर वहां क्या होगा? क्या प्रति पदार्थ वहीँ होगा? अगर ऐसा संभव है तो हमारे इस प्रश्न का जवाब मिल गया कि ब्रह्माण्ड में प्रति पदार्थ मौजूद है. जो एक अलग ही क्षेत्र में है. और वहां का समय हमारे समय का ऋणात्मक है. इस कारण इन दो क्षेत्रों का मिलना असंभव है. और इस तरह पदार्थ तथा प्रति पदार्थ अपना अलग अलग अस्तित्व रखते हैं.

ये थीं कुछ वैज्ञानिक परिकल्पनाएं जो यदि सत्य सिद्ध हो जाएँ तो भौतिक विज्ञान की दुनिया को नई दिशाएँ दे सकती हैं.

Wednesday, January 14, 2009

कुछ वैज्ञानिक परिकल्पनाएं (1)

इस ब्लॉग की यह सौवीं पोस्ट साइंस फिक्शन पर आधारित न होते हुए भी उससे सम्बंधित है. मेरा यह लेख जून २००१ में आविष्कार में प्रकाशित हुआ था. आशा है पाठकों को यह पसंद आएगा.
-जीशान जैदी


परिकल्पनाएं आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति का आधार हैं. आज का विज्ञान जिन सिद्धांतों पर टिका हुआ है वे सिद्धांत प्रारम्भ में परिकल्पनाओं के रूप में जन्मे थे. जब उन परिकल्पनाओं को प्रयोगों और गणितीय रूप में परखा गया और उनकी सत्यता सिद्ध हुई तो वे सिद्धांत बने. प्रमुख परिकल्पनाएं और सिद्धांत जिन पर आधुनिक विज्ञानं की नींव टिकी है उनमें शामिल हैं हाइगेन्स की तरंग संचरण सम्बन्धी परिकल्पना, प्लैंक की प्रकाश फोटोन की परिकल्पना, आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत, गुरुत्वीय बल के कारक ग्रैविटान की परिकल्पना, ब्लैक होल की परिकल्पना इत्यादि. इनमें से बहुतों को सिद्धांत के रूप में मान्यता मिल चुकी है और शेष की पुष्टि न होने के कारण मात्र परिकल्पना के रूप में लिया जाता है. आशा यह की जाती है कि भविष्य में इनकी सत्यता या असत्यता सिद्ध की जा सकेगी.

आधुनिक विज्ञान में अनगिनत प्रकार की परिकल्पनाएं होने के बावजूद ऐसे अनगिनत क्षेत्र हैं जहाँ की घटनाओं या संभावित घटनाओं के बारे में व्याख्या करने के लिए किसी प्रकार की कोई परिकल्पना नहीं की गई है. वे क्षेत्र अभी तक वैज्ञानिक प्रगति से अछूते हैं और विज्ञान को वहां प्रवेश करने के लिए कल्पना रुपी द्वार की सख्त आवश्यकता है. ऐसी ही कुछ परिकल्पनाएं यहाँ प्रस्तुत हैं :

पहली परिकल्पना समय (टाइम) के बारे में है. कुछ विज्ञान कथाओं में टाइम मशीन की संकल्पना मिलती है. जिसमें एक मशीन के सहारे कोई व्यक्ति भूत या भविष्य में पहुँच जाता है. वहां वह उन घटनाओं का अंग बन जाता है, जो उस समय घटित हो रही हैं. प्रश्न उठता है क्या इस तरह की मशीन बनाना संभव है? इसके लिए एक और प्रश्न पर विचार करना होगा. मान लिया कोई व्यक्ति भूतकाल में जाकर अपने दादा की हत्या कर देता है. स्पष्ट है की अब उसका पैदा होना भी असंभव है. लेकिन अगर वह पैदा नहीं होगा तो वर्तमान में उसका अस्तित्व भी नहीं रह जायेगा. यह विरोधाभास सिद्ध करता है की टाइम मशीन का बनना असंभव है. लेकिन अगर हम और गहराई से विचार करें? आइंस्टाइन के द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण के अनुसार पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है.(E=mc2) पदार्थ क्या है? स्पेस में पदार्थ वह आकृति है जो चार विमाओं द्वारा निर्धारित होती है. ये चार विमायें हैं, लम्बाई, चौडाई, गहराई और समय.

दूसरे शब्दों में यदि कोई वस्तु चार विमायें रखती है तो उसे ऊर्जा में बदला जा सकता है. अगर इस ऊर्जा में थोडी कमी करके या बढोत्तरी करके वापस पदार्थ में बदला जाए तो तो उत्पन्न पदार्थ का द्रव्यमान मूल पदार्थ से कम या ज़्यादा होगा. इसी दिशा में यदि विचारों को बढाया जाए तो टाइम मशीन का बनना संभव है. इसके लिए समय को ऊर्जा में बदल कर उस ऊर्जा में कमी या बढोत्तरी करनी होगी. और फ़िर उसे वापस समय में परिवर्तित करना पड़ेगा. उस वक्त वह समय भूत या भविष्य में परिवर्तित हो जायेगा. लेकिन समस्या यह है की कोई वस्तु तभी ऊर्जा में बदल सकती है जब उसमें चारों विमायें हों. जबकि समय मात्र एक विमा है. यहाँ पर यह निष्कर्ष निकल सकता है की समय को वास्तविक ऊर्जा में तो नहीं बदला जा सकता, हाँ काल्पनिक ऊर्जा में ज़रूर बदला जा सकता है. और इस तरह भूत या भविष्य में पहुँचा जा सकता है. लेकिन ठीक उसी प्रकार मानो वहां पहुँचने वाला व्यक्ति कोई सपना देख रहा हो. सपने में ही वह व्यक्ति भूत या भविष्य की घटनाएं देख पायेगा लेकिन उनमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर पायेगा. इस प्रकार उपरोक्त विरोधाभास दूर हो जाता है.
--------cont.

Wednesday, December 3, 2008

साइंस फिक्शन - भूत, वर्तमान, भविष्य : संस्मरण - 9


लंच टाइम में अमित ओम जी अपनी दुखभरी गाथा सुनाने लगे. दरअसल मोहन जी उन्ही के रूम पार्टनर बने हुए थे. रात को मोहन जी को गर्मी लगने लगी और उन्होंने फुल स्पीड में पंखा चला दिया. अब बनारस का मौसम ऐसा तो था नहीं. नतीजे में अमित को कम्बल ओढ़ना पड़ा. थोडी देर बाद मोहन जी बोले अब मुझे और गर्मी लग रही है. उन्होंने ए.सी. भी चला दिया. अब तो अमित जी कम्बल के अन्दर भी ठिठुरे जा रहे थे.
लेकिन कहानी यहीं पर ख़त्म नही हुई. ए.सी. और पंखा काफी देर चलाने के बाद मोहन जी कहने लगे, अब मुझे कुछ कुछ सर्दी लग रही है. तो बजाये इसके कि वे पंखा और ए.सी. बंद करते, उन्होंने अमित के ऊपर से कम्बल खींचा और ख़ुद ओढ़ लिया. फ़िर तो अमित की रात बुरी गुजरी.
सारे तकनीकी सत्र समाप्त हो चुके थे. अब बारी थी बनारस डाक्यूमेंट की तैयारी की. इस काम के लिए एयर वाइस मार्शल विश्वमोहन तिवारी जी लगाये गए. और साथ में जुटे सभी सत्रों के रिपोर्तिअर. जिन्होंने अपने अपने सत्रों का कच्चा चिटठा बयान किया. और आश्चर्य इस बात का था की जो सत्र एक एक घंटे चले उसमें काम की बात बस एक ही मिनट की थी.( वरना रिपोर्तिअर को भी एक घंटा लेना चाहिए था. ) तो इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे डा. मनोज पटैरिया जी और साथ में थे भारतीय विज्ञान कथा समिति के अध्यक्ष डा. राजीव रंजन उपाध्याय जी. इस सत्र में बहुत ही अहम् मुद्दों पर चर्चा हुई. विज्ञान कथा की एक नई परिभाषा दी जाए, यह सबसे अहम् मुद्दा था. उसके बाद अगला अहम् मुद्दा था, विज्ञान कथा पर पुरूस्कार दिए जायें. भारतीय विज्ञान कथाओं पर अगर रिसर्च हो तो दो चार पी.एच.डी के टोपिक और मिल सकते हैं. इसलिए इस टोपिक को भी चर्चा में शामिल कर लिया गया. और इस तरह धीरे धीरे बनारस डाक्यूमेंट की थीसिस तैयार होने लगी. शाम को एक अलग ही रंग नज़र आ रहा था. दरअसल आज कुछ प्रतियोगिताएं भी प्रायोजित थीं. औरतों के लिए सूप बनाओ और पुरुषों के लिए मछली पकडो. वैसे मछली का सूप भी स्वादिष्ट होता है चीनी और जापानियों के लिए. तालाब में मछलियाँ छोड़ी गईं और आधी से ज़्यादा पहुँचने से पहले ही परलोक सिधार गईं. फ़िर शुरू हुई प्रतियोगिता और दिल्ली के अमित सरवाल एकमात्र मछली पकड़कर बाज़ी मार गए. हमारे अरशद भाई ने भी पूरा ज़ोर लगाया. पूरा तालाब घूम घूम कर मछली पकड़ने की कोशिश की. लेकिन वह ठहरे गोमती वाले जिसमें मछलियाँ तो नहीं हाँ फटे जूते ज़रूर निकलते हैं. तो वह वहां कहाँ मछली पकड़ पाते. फ़िर सूप प्रतियोगिता का रिज़ल्ट आया और रीमा सरवाल जी बाज़ी मार ले गईं. यानी एक तरफ़ अमित सरवाल और दूसरी तरफ़ रीमा सरवाल. अब मैं अरविन्द जी से पूछना भूल गया कि कहीं यह फिक्सिंग का मामला तो नहीं. अरविन्द जी वैसे भी मछलियों का विभाग सँभालते हैं. हो सकता है मछलियों को कुछ समझा दिया हो.
इस बीच वक्त हो गया था हरीश यादव के मैजिक शो का. जो सभी बच्चों को खूब पसंद आया. उन बच्चों में डा. उपाध्याय, डा. पटैरिया, डा. अरविन्द के साथ हम सभी शामिल थे. डा. अरविन्द दुबे जो हरीश यादव के सहयोगी थे, तख्ती दिखा दिखा कर सभी से ताली बजवा रहे थे. और जो नहीं बजाता था उसे स्टेज पर बुलाकर खिंचाई भी करते थे. हमारे जाकिर भाई भी इससे बच नही पाये.
शो देखते देखते हमारी ट्रेन का वक्त हो गया. इसलिए आगे का कार्यक्रम अरविन्द जी के भरोसे छोड़कर हमने सबसे विदा ली, बनारस स्टेशन तक आए और फ़िर ट्रेन में बैठकर लौटके बुद्धू घर को आये.
तो ये किस्सा यहीं ख़त्म हुआ. अब कल से वापस आते हैं किस्सये ताबूत पर.

Sunday, November 30, 2008

साइंस फिक्शन - भूत, वर्तमान, भविष्य : संस्मरण - 8


चौथा सत्र समाप्त हुआ और हम चाये पीने बाहर निकले. देखा मोहन जी हत्थे से उखड़े हुए हैं. पता चला उनका झोला, जो उन्हें यहाँ मिला था, किसी ने शरारत में मार लिया है. आख़िर में उन्हें दूसरा झोला देकर बहलाया गया. हालाँकि उन्हें फ़िर भी अफ़सोस था कि झोले के साथ उनकी कुछ बहुमूल्य कृतियाँ पार हो गई थीं. इस बीच पता चला कि मीनू पुरी जी अपना पेपर पढने से छूट गई हैं. और वह भी तब जबकि अरविन्द जी हर सत्र के बाद उन्हें याद कर रहे थे. बहरहाल बचे खुचे लोगों को किसी तरह अन्तिम सत्र में ठूँसा गया.
पांचवां और अन्तिम तकनीकी सत्र विज्ञान कथा के भविष्य पर आधारित था. प्रोफ़ेसर आर.डी.शुक्ला ने कुर्सी संभाली और संचालन व रिपोर्टिंग का काम संभाला मीनू खरे ने. सबसे पहले बोलने आए हेमंत कुमार जी. एक पाठक की हैसिअत से उन्हें भारत में विज्ञान कथा का भविष्य उज्जवल दिखा. मालुम नहीं एक लेखक की हैसिअत से उन्हें कैसा दिखा. वैसे ख़ुद लेखक का भविष्य तो प्रकाशक पर निर्भर होता है. यह बात हेमंत जी ने भी ढके छुपे लफ्जों में बता दी. विज्ञान कथा लेखक अमित कुमार ने वर्तमान विज्ञानं कथा की अन्य साहित्यिक कथाओं के साथ तुलना की और साहित्यकारों को विज्ञान कथा को मुख्य धारा से अलग करने के लिए लताड़ा भी. उनका यह कदम साहस योग्य कहा जाएगा क्योंकि इस समय चेयरमैन की कुर्सी पर इत्तेफाक से एक साहित्यकार तशरीफ़ रखते थे. बाद में बात बराबर करने के लिए अमित ने विज्ञान कथाकारों से भी कहा कि कम से कम वे अपनी कथाएं साहित्य में शामिल करने लायेक लिखें. साहित्य समाज का दर्पण होता है. बुशरा अल्वेरा ने एक कदम आगे बढ़ते हुए विज्ञान कथा को भविष्य के समाज का दर्पण बता दिया. कुछ महिलाओं ने इस बीच अपने पर्स का दर्पण निकालकर लिपस्टिक सही करनी शुरू कर दी थी.
एक तरफ़ अरशद जी अपना पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार कर रहे थे. उनका नंबर बुशरा अल्वेरा के बाद था. इतने शोर्ट टाइम में किसी ने अपना प्रेजेंटेशन तैयार कर लिया यह एक रिकॉर्ड है. गिनीस बुक में जाने लायेक. बहरहाल अरशद ने गाँव गाँव तक विज्ञान कथा को पहुंचाने की बहुत शानदार तरकीब बताई. यानी उनके पप्पेट शो करवाए जाएँ. साइंस फिक्शन को मीडिया कितनी अहमियत देता है, यह बताया राजस्थान से आये कमलेश मीना ने. और यह बताया कि देशी मीडिया साइंस से ज्यादा अहमियत बॉलीवुड की हीरोइन के जुकाम को देता है.
उन्नीकृष्णन जी ने विज्ञान कथा को आम आदमी से जोड़ने की ज़रूरत बताई. फिर मेरा बोलने का नंबर आया. सॉरी मीनू पुरी जी फ़िर छूट गईं. मेरे बोलने से पहले उन्होंने विज्ञान कथा का इतिहास बताया. और समय कम होने की वजह से केवल डा. राजीव रंजन जी का इतिहास बताकर बैठ गईं. आज पॉवर पॉइंट सिस्टम सही काम कर रहा था इसलिए मेरे घिसे पिटे सब्जेक्ट को उसकी स्लाइड की वजह से लोगों ने काफ़ी शौक से देखा. मैंने तो केवल इतना बताया कि साइंस फिक्शन क्यों ज़रूरी है और कैसे उसे बढ़ावा दिया जाए. इसमें अपने मतलब की कुछ बातें ज़रूर शामिल कर दी थीं. जैसे कि विज्ञान कथा के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए. और आज डा. अरविन्द दुबे जी को भी मौका मिल गया. सबको स्पेस घुमाने का. प्रकाश के वेग से मात्र आठ मिनट में उन्होंने सबको विज्ञान कथाओं में स्पेस घुमा दिया. और एक महत्वपूर्ण जानकारी यह दी कि भारतीय विज्ञान कथाएँ स्पेस के बिना पूरी ही नहीं होतीं.
लेकिन जल्दी ही हमें धरती पर वापस आना पड़ा. क्योंकि भूख जोरों की लग रही थी और बाहर से लंच का बुलावा आ चुका था.