Saturday, December 27, 2008

ताबूत - एपिसोड 36

"यह तो क्रोध में मालूम हो रहा है. क्या बात हो गई?" सियाकरण टी.टी. की ज्वालामय मुख मुद्रा देखकर मारभट से चुपके से बोला.
"मेरा विचार है कि तुमने उसे मुद्राएँ कम दी हैं. थोडी और दे दो." मारभट ने सुझाया.
"ठीक है. मैं और दे देता हूँ." सियाकरण थैले से और मुद्राएँ निकलने लगा किंतु इतनी देर में टी.टी. इन लोगों को सिपाहियों की निगरानी में देकर दूसरी तरफ़ चला गया था.
अतः सियाकरण को दुबारा मुद्राएँ थैले में रख देनी पड़ीं.

उधर एक सिपाही उनके लबादे को देखकर बोला, "क्यों बे, कपड़े तो सन्यासियों वाले पहन रखे हैं और यात्रा बिना टिकट करता है!"
इन लोगों की समझ में उसका एक भी शब्द नहीं आया और ये उसका मुंह देखने लगे.
"क्यों बे, ये भोले लोगों की तरह मुंह क्या देख रहा है. क्या किसी दूसरी दुनिया से आया है!" दूसरे सिपाही ने डपट कर कहा.
ये लोग अब भी उसकी बात नहीं समझे. अंत में मारभट ने टूटी फूटी हिन्दी में कहा, "हम लोग प्राचीन युग से आये हैं अतः आपकी बात नहीं समझ पा रहे है."
"क्या? कौन से शहर से? यह चीनुग कौन सा शहर है? इस रूट पर तो नहीं है."
"कहीं ये चीन तो नहीं कह रहे हैं?" दूसरे ने अनुमान लगाया.
"हे ईश्वर! तुम लोग चीन से बिना टिकट यात्रा करते हुए यहाँ आ रहे हो. तब तो बहुत खतरनाक मुजरिम हो तुम लोग." वह एकदम सीधा सावधान होकर बैठ गया. हाथ अपने होलेस्टर पर रख लिया मानो उन चारों के हिलते ही उनपर गोली चला देगा.


गाड़ी एक बार फ़िर रूक गई. क्योंकि फ़िर से कोई स्टेशन आ गया था. सिपाहियों ने इनसे कहा, "उतरो तुम लोग."
सिपाहियों का हुक्म इनकी समझ में आ गया. वे लोग वहीँ ट्रेन से उतर गए. दोनों सिपाही इनकी बगल में चल रहे थे और साथ ही उन्हें रास्ता भी बताते जा रहे थे.
"इस युग के लोग कितने अच्छे हैं. हम लोगों को रास्ता बता रहे हैं ताकि कहीं हम लोग रास्ता न भूल जाएँ." चीन्तिलाल ने खुश होकर कहा.
"सही कहा तुमने. हम लोग घूमने फिरने के बाद इन्हें अवश्य धन्यवाद देंगे." मारभट ने कहा.

कुछ देर बाद ये लोग पुलिस स्टेशन में थे. यहाँ के लोगों को एक ही प्रकार की वर्दियां पहने देखकर इन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ.
"ये लोग एक ही प्रकार के कपड़े क्यों पहने हुए हैं?" चीन्तिलाल ने आश्चर्य से पूछा.
"हाँ यह बात तो है. हो सकता है इस युग में रास्ता बताने वाले इसी प्रकार के कपड़े पहनते हों. हमारे युग में भी तो बच्चे खिलाने वाले एक ही प्रकार के कपड़े पहनते थे." चोटीराज ने कहा.
उधर सिपाहियों ने जब थानेदार को बताया की ये लोग बिना टिकट यात्रा कर रहे थे तो उसने इनको हवालात में बंद करने का हुक्म दिया. फ़िर ये लोग लाकअप में पहुँचा दिए गए जहाँ पहले से एक मोटा तगड़ा व्यक्ति बैठा हुआ था.
"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अभी तक तो ये हमें घुमा रहे थे और अब कोठरी में बंद कर दिया." चोटीराज बोला.
"इस कोठरी को शायद हवालात कहते है." मारभट ने कहा.

1 comment:

seema gupta said...

इस कोठरी को शायद हवालात कहते है" shayad...... ha ha ha bhut hi rochak..

regards