Sunday, July 3, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 3 (अन्तिम भाग)

‘‘क्योंकि मैं उसकी पत्नी हूँ।’’
प्रो.डेनियल का मुँह खुला रह गया। फिर लगभग चौंकते हुए उसने बेल पर उंगली रखी। और जब चपरासी हाजिर हुआ तो उसने उससे डा.आनन्द को बुलाने के लिए कहा।

‘‘डा.आनन्द काफी खुशनसीब है।’’ प्रो.डेनियल खुद से बड़बड़ाया।
‘‘पता नहीं।’’ कहते हुए डा.आनन्द की पत्नी कुर्सी पर बैठ गयी।

उसी समय वहाँ डा.आनन्द ने प्रवेश किया। साथ में विनय और गौतम भी थे।

‘‘ओह! नेहा तुम यहाँ?’’
‘‘शुक्र है कि तुमने मुझे पहचान लिया। मैं तो समझ रही थी कि तुम मुझे भूल चुके होगे। आखिर हम दो साल बाद मिल रहे हैं।’’ नेहा कुछ गुस्से में मालूम हो रही थी।

‘‘क्या तुम बाहर गयी थीं?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘नहीं। इसी शहर में रहते हुए मेरे पति को मुझसे मिलने की फुर्सत नहीं।’’

‘‘नेहामेरे लिए मेरा प्रोजेक्ट इतना महत्वपूर्ण था कि मैंने इसके पीछे सभी से मिलना छोड़ दिया था।’’ डा.आनन्द बोला।

‘‘लेकिन मुझे तुम्हारे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं। दो साल अकेले रहते रहते मैं ऊब चुकी हूं। और मुझे अब तलाक चाहिए।’’

‘‘यह डा.आनन्द की बदनसीबी होगी।’’ प्रो.डेनियल ने टुकड़ा लगाया।
‘‘आप प्लीज खामोश रहें।’’ नेहा ने प्रोफेसर को भी नहीं बख्शा।

‘‘नेहाबेहतर है यह प्राब्लम हम घर चलकर साल्व करें।’’ डा.आनन्द ने समझाने के अंदाज में कहा।
‘‘घर जाने की तुम्हें फुर्सत ही कहाँ है।’’ नेहा की आवाज में दर्द था।

‘‘मेरा प्रोजेक्ट कम्प्लीट हो गया है। अब मैं कहीं भी जा सकता हूँ। चलोमैं इसी वक्त तुम्हारे साथ चलता हूँ।’’ आनन्द उठ खड़ा हुआ और फिर प्रोफेसर डेनियल से मुखातिब हुआ,

‘‘प्रो.डेनियल! आप प्लीज मेरी गैरमौजूदगी में इस लैब का चार्ज संभाल लेंगे?’’
‘‘श्योर, वाई नाॅट डा.आनन्द। तुम बेफिक्र होकर अपनी बीवी के साथ जाओ।’’
.............

लेकिन प्रो.डेनियल को लैब का चार्ज संभालना मंहगा पड़ा।
क्योंकि अगले दिन जब वह एक्सपेरीमेन्टल रूम में पहुंचा तो वहाँ गौतम को मृत पाया। उसका अकड़ा हुआ जिस्म सूक्ष्म शरीर बनाने वाली मशीन के बीचोंबीच पड़ा हुआ था।

आनन फानन में वहां सभी लोग इकट्ठा हो गये। डा.आनन्द को भी उसके घर से बुला लिया गया था।
‘‘ऐसा लगता है इसने रात को अपना सूक्ष्म शरीर बनाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ गड़बड़ हो गयी।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।

‘‘मशीन तो पूरी तरह ओ.के. थी। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मशीन ने गड़बड़ की।’’ डा.आनन्द ने मशीन की तरफ देखते हुए कहा।

प्रो.डेनियल गौर से लाश का निरीक्षण कर रहा था।

‘‘एक बड़ा सवाल यह भी है कि यह रात के सन्नाटे में मशीन का इस्तेमाल करने क्यों आया था। इसे अगर कुछ करना था तो हम लोगों के सामने करता।’’
‘‘अब तो यह मर चुका है। इसलिए इन सवालों का जवाब भी नहीं मिल सकता।’’ विनय बोला।

‘‘जवाब मिल सकता है। यह मशीन ही हमें जवाब देगी।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।
‘‘कैसे?’’ डा.आनन्द ने पूछा।

‘‘तुम्हें शायद याद नहींइस मशीन में एक ब्लैक बाक्स भी है जो सूक्ष्म शरीर द्धारा देखी गयी समस्त पिक्चर को रिकार्ड करता रहता है। उस ब्लैक बाक्स से मेमोरी चिप निकाल कर उसे कम्प्यूटर पर देखो कि गौतम के सूक्ष्म शरीर ने गौतम के मरने से पहले क्या क्या देखा।’’

‘‘ठीक है। डा.आनन्द मशीन से मेमोरी चिप निकालने लगा, ‘‘वैसे चिप तभी मेमोरी रिकार्ड दिखाएगी जब गौतम का सूक्ष्म शरीर निर्मित हुआ होगा।’’

‘‘अभी थोड़ी देर में सब मालूम हो जायेगा।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।
...........

अब वे सब मेमोरी चिप को कम्प्यूटर पर लगाकर गौतम के सूक्ष्म शरीर की गतिविधियां देख रहे थे जो निर्मित हो चुका था।

‘‘यह तो लैब के बाहर जा रहा है।’’ विनय ने कहा।
फिर उन्होंने देखा वह सूक्ष्म शरीर शहर के एक रास्ते पर चला जा रहा है।
‘‘लेकिन यह जा किधर रहा है?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘रास्ते तो जाने पहचाने लग रहे हैं।’’ विनय बोला।

‘‘वो तो होंगे ही। क्योंकि रास्ते तुहारे ही शहर के हैं।’’

‘‘लेकिन यह रास्ता तो मेरे ही घर की तरफ जा रहा है।’’ डा.आनन्द हैरत से बोला, ‘‘और अब मेरे ही घर में यह प्रवेश भी कर रहा है। इसे ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी मुझसे?’’

जल्दी ही यह राज भी खुल गया। क्योंकि अब गौतम का सूक्ष्म शरीर नेहा के चारों तरफ चक्कर काट रहा था। फिर वह डा.आनन्द की पत्नी के शरीर में विलीन हो गया।

उसी समय रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और कम्प्यूटर स्क्रीन पर अंधेरा छा गया। डा.आनन्द ने आगे बढ़कर कई बटन दबायेलेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।

‘‘रहने दो। मेमोरी चिप में आगे कुछ भी रिकार्ड नहीं हुआ है।’’ प्रो.डेनियल ने उसे रोका।
‘‘इसका मतलब कि गौतम कैसे मरामेमोरी चिप भी इसके बारे में कुछ नहीं बता सकी।’’

‘‘मेरा ख्याल हैमेमोरी चिप बहुत कुछ बता रही है।’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अभी मैं कुछ नहीं कह सकता। पहले तो मुझे सारी कड़ियां मिलानी होंगी। कुछ इन्क्वायरी भी करनी होगी। तभी कोई नतीजा निकाल पाऊँगा।’’ प्रो.डेनियल उठकर कमरे में टहलने लगा। गौतम की लाश अभी भी मशीन के बीचोंबीच पड़ी हुई थी।
............

पुलिस गौतम की लाश को कस्टडी में लेकर अपनी इन्क्वायरी कर रही थी। लेकिन डा.आनन्द और विनय को पुलिस के नतीजों से ज्यादा इंतिजार प्रो.डेनियल के नतीजों का था।
और आखिरकार उसने उन्हें अपने कमरे में बुला ही लिया।

‘‘तुम यह बताओ कि गौतम सबसे पहले तुम्हें कहां मिला था?’’ प्रो.डेनियल ने आनन्द से पूछा।
‘‘वह तो इस प्रोजेक्ट की शुरूआत से ही से मेरे साथ था। नेट इक्जाम क्लीयर करने के बाद वह मेरी गाईडेन्स में आया था।’’

‘‘और उसका आना जाना तुम्हारे घर में काफी था?’’
‘‘हाँ। जब तक यह प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआवह अक्सर मेरे घर आया करता था।’’
‘‘बस। तो फिर बात साफ हो गई।’’ प्रो.डेनियल ने हाथ हिलाया।

‘‘किधर से साफ हो गई?’’ डा.आनन्द ने हैरत से पूछा।

‘‘सुनो। मसला ये है कि तुम्हारी बीवी बहुत खूबसूरत है। मैं भी उसपर पहली ही नजर में आषिक हो गया था।...नहींनाराज होने की जरूरत नहीं। यह तो नेचुरल है। नेचर की इसी हरकत की वजह से गौतम भी तुम्हारी बीवी पर पर मिटा था। लेकिन उसके अंदर आगे कुछ करने की हिम्मत नहीं थी। और न ही पावर। क्योंकि बहरहाल वह उसके गाइड की बीवी थी।’’

डा.आनन्द मन ही मन प्रो.डेनियल को गालियां दे रहा था। क्योंकि उसकी इस कवायद में उसकी पत्नी का नाम बार बार उछल रहा था।

प्रो.डेनियल ने आगे कहा, ‘‘इन सब के बावजूद उसके दिमाग में तुम्हारी बीवी को पाने की ख्वाहिश कहीं छुपी रही। और दो साल बाद पिछले दिनों जब उसने दोबारा तुम्हारी बीवी को देखा तो उसके दिल के अंदर छुपी यह ख्वाहिश दोबारा उभर आयी। जाहिर हैवह अब भी उसकी पहुँच से दूर थी। अब उसके दिमाग ने एक तरकीब सोची। क्यों न मशीन के द्धारा वह अपना सूक्ष्म शरीर बनाकर तुम्हारी बीवी के पास पहुँच जाये। यानि मामला थाजिस्मानी तौर पर न सही रूहानी तौर पर ही सही।’’

अब डा.आनन्द को भी प्रो.डेनियल की बातों में दम नजर आने लगा था। क्योंकि उसने गौतम के सूक्ष्म शरीर को अपनी आँखों से अपने घर जाते और नेहा के शरीर में प्रवेश होते देखा था।

‘‘उसने अपने मकसद के लिए रात का सन्नाटा चुना और मशीन के पास जाकर उसमें बैठ गया और मषीन चालू कर दी।’’ डा.डेनियल कह रहा था, ‘‘उसका सूक्ष्म शरीर बना और तुम्हारी बीवी तक पहुँच गया। फिर उसके शरीर के भीतर भी पहुँच गया। लेकिन यहीं पर वह घटना हुई जिसकी उम्मीद हमें भी नहीं थी।’’

‘‘कैसी घटना?’’ डा.आनन्द और विनय दोनों ही चैंक पड़े।

‘‘प्रकृति को यह दुनिया शायद ही कभी पूरी तरह समझ पाये। हुआ यह कि जब गौतम के सूक्ष्म शरीर ने तुम्हारी बीवी के शरीर में घुसपैठ करने की कोशिश की तो तुम्हारी बीवी के शरीर को घुसपैठिए की खबर लग गयी। और उसने एक प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न कर दी। चूंकि घुसपैठिया विद्युत रूप में थाइसलिए तुम्हारी बीवी के शरीर की प्रतिरोधक शक्ति भी विद्युत रूप में ही पैदा हुई।

इस प्रतिरोधक शक्ति ने गौतम के सूक्ष्म शरीर को नष्ट करना षुरू कर दिया। गौतम का सूक्ष्म शरीर एक एम्प्लीफायर द्धारा गौतम से जुड़ा हुआ था। जब वह विद्युतीय शरीर नष्ट हुआ तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़कर गौतम के शरीर में पहुंच गया। नतीजे में एक तीव्र विपरीत धारा गौतम के शरीर में पैदा हुई और उसके तेज झटके ने गौतम की जान ले ली।’’ प्रो.डेनियल अपनी बात पूरी करके खामोश हो गया।

डा.आनन्द की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने असिस्टेंट की मौत का अफसोस करे या खुशियां मनाए। क्योंकि बहरहाल उसने उसकी बीवी पर बुरी नजर डाली थी। 
....समाप्त....
ज़ीशान हैदर ज़ैदी
लेखक 

Saturday, July 2, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 2

‘‘किसी जीवित शरीर की प्रत्येक हरकत एक विद्युतीय स्पंद का नतीजा होती है जो उस शरीर के मस्तिष्क से उत्पन्न होती हैया फिर कभी कभी मेरूदण्ड से। मस्तिष्क द्धारा दिये गये आदेश शरीर के न्यूरानों द्धारा विद्युतीय स्पंद के रूप में उस अंग तक पहुंचता है जिसके लिए वह आदेश होता है। फलस्वरूप वह अंग हरकत में आता है। उदाहरण के लिए अगर मेरा मस्तिष्क मेरे हाथ को कुछ लिखने का आदेश देगा तो यह आदेश विद्युतीय रूप में न्यूट्रानों द्धारा हाथ को मिलेगा और फिर हाथ कलम उठाकर लिखना शुरू कर देगा।’’

डेनियल अब मौन होकर डा.आनन्द की बात सुन रहा था। क्योंकि अब उसे लग रहा था कि डा.आनन्द कुछ खास बताने जा रहा है।

‘‘अब इन विद्युतीय स्पंदों की खास बात यह है कि ये नियत न होकर लगातार बदलते रहते हैं। सो इनमें हम फैराडे का नियम लागू कर सकते हैं। यानि किसी जन्तु के शरीर के पास अगर कोई क्वायल रख दी जाये तो उसमें विद्युत धारा पैदा हो जायेगी। ये अलग बात है कि यह धारा इतनी कम होगी अत्यधिक सेन्सेटिव अमीटर भी उसे नहीं नाप सकता।’’
‘‘ठीक है।’’ काफी देर बाद प्रो.डेनियल बोला।

‘‘लेकिन एक तरीका हैजिससे हम यह धारा बढ़ा सकते हैं।’’
‘‘वह क्या?’’

‘‘शारीरिक धारा और क्वायल की धारा को परस्पर संयुक्त करने का काम करते हैं फोटाॅन। अगर किसी तरकीब से हम उन फोटाॅनों की एनर्जी बढ़ा सकें तो क्वायल में पैदा हुई धारा इतनी बढ़ सकती है कि हम उसका इस्तेमाल कर लें।’’
‘‘लेकिन फोटाॅनों की एनर्जी कैसे बढ़ेगी?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।

‘‘इसके लिए हम लेंसप्रिज्म और एल.सी.डी. जैसे प्रकाशीय यन्त्रों का उपयोग कर सकते हैं। यहाँ का पूरा सेटअप इसी थ्योरी पर आधारित है।’’ डा.आनन्द ने चारों तरफ घूमते हुए कहा।

‘‘लेकिन इस तरह क्वायल की करंट बढ़ाकर तुम करना क्या चाहते हो?’’

‘‘फैराडे नियम के अनुसार जिस पैटर्न में पहली क्वायल में धारा परिवर्तित होती हैवही पैटर्न दूसरी कवायल में धारा परिवर्तन का बनता है। ठीक इसी नियम पर जैसे जैसे जीवित शरीर का मस्तिष्क आदेशों की श्रृंख्ला बनायेगाउसी क्रम में क्वायल द्धारा पैदा हुई धारा कार्य करेगी। दूसरे शब्दों में हम विद्युत धारा के रूप में एक ऐसा सूक्ष्म शरीर बना लेंगे जो पूरी तरह जीवित शरीर के मस्तिष्क से जुड़ा रहेगा और उसके आदेशों पर अमल करेगा।’’

‘‘गुड! आईडिया बढ़िया है। और मेरा ख्याल है वह सूक्ष्म शरीर हमारे बहुत काम का होगा।’’

‘‘श्योर। चूंकि वह सूक्ष्म शरीर हाड़ मांस का नहीं होगा इसलिए हम उसे कहीं भी भेज सकते हैं। अंतरिक्ष मेंसमुन्द्र मेंकिसी जीवित शरीर के भीतरकहीं भीकिसी भी समय। इस तरह हम किसी भी जगह पर खोज कार्य कर सकते हैं। परोक्ष रूप से वहां मौजूद रहते हुए। यहां तक कि अपने उस सूक्ष्म शरीर का उपयोग करते हुए अणुओं को आपस में जोड़ सकते हैंकोई सूक्ष्म सर्जरी कर सकते हैं।या फिर शरीर में मौजूद बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ सकते हैं।’’

‘‘तो फिर देर किस बात की? अपना एक्सपेरीमेन्ट चालू करो फौरन।’’

‘‘बात यहीं पर आकर रूक जाती है। समस्या ये है कि हम अपने एक्सपेरीमेन्ट को कम से कम पांच सौ बार दोहरा चुके हैं। लेकिन सूक्ष्म शरीर बनाने में कामयाबी अभी तक नहीं मिल पायी।’’

‘‘हूँ!’’ प्रो.डेनियल ने सर हिलाया, ‘‘सबसे पहले मैं तुम्हारे प्रोजेक्ट का मैथैटिकल माडल देखना चाहूँगा।’’

डा.आनन्द उसे एक दूसरे कमरे में ले गया और एक मोटी फाइल उसके हाथ में थमा दी। प्रो.डेनियल उसके पन्ने पलटने लगा। थोड़ी देर बाद उसने आनन्द को संबोधित किया, ‘‘तुमने फोटाॅनों के पाथ की जो इक्वेशंस लिखी हैंउसमें प्रोबेबिलिटी का इस्तेमाल तो किया नहीं!’’
‘‘उसकी क्या जरूरतफोटाॅनों का पाथ तो निश्चित होगा न?’’

‘‘यही तो गलती की है तुमने। क्वांटम लेवेल पर किसी भी कण का व्यवहारउसका पथ निश्चित नहीं होता। इसलिए कोई भी वाक्य हम प्रोबेबिलिटी के इस्तेमाल के साथ कहते हैं। अब तुम मुझे इस कमरे में अकेला छोड़ दो। मैं इसपर काम करना चाहता हूँ।’’

डा.आनन्द उठा और खामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल आया। उसे पता था कि अब अगर वह कुछ बोला तो प्रो.डेनियल उसका गरेबान पकड़ लेगा।
...........

पूरे एक सप्ताह बाद प्रो.डेनियल उस कमरे से बाहर निकला था। और यह पूरा सप्ताह उसने एक ही सूट में गुजारा था। जब वह बाहर निकला तो उसकी दाढ़ी और सर के बाल बुरी तरह बढ़े हुए थे।

‘‘चलो काम शुरू करते हैं।’’ वह डा.आनन्द से बोला। दोनों लैबोरेट्री में पहुंचे और उसकी मशीनों में फेरबदल करने लगे।
लगभग दो दिन की मेहनत के बाद प्रो.डेनियल डा.आनन्द के असिस्टेन्ट विनय से मुखातिब हुआ, ‘‘आ जाओ डियर। सबसे पहले मैं तुम्हारा ही सूक्ष्म शरीर बनाऊँगा।’’

‘‘म..मेराक..क्यों?’’ घबराहट के कारण विनय हकलाने लगा था।
‘‘डर क्यों रहे हो डियर। कुछ नहीं होगा तुम्हें। जो कुछ होगातुम्हारे सूक्ष्म शरीर को होगा।’’

विनय को कुर्सी पर बिठा दिया गया। जो एक गोलाकार मशीन के बीचोंबीच स्थित थी। फिर डेनियल ने एक बटन दबाया। और मशीन में मौजूद लेंसों से रंग बिरंगी किरणें निकलकर विनय पर पड़ने लगीं। विनय का पूरा शरीर उन किरणों के कारण इतना चमक रहा था कि बाकी लोगों को उसे देख पाना मुष्किल हो रहा था। खुद विनय की आँखें उन किरणों की चकाचौंध के कारण बन्द हो गयी थीं।

‘‘कुछ दिख रहा है तुम्हें?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘इतनी तेज लाइट में आंखें बन्द हो गयी हैं। दिखाई कहाँ से देगा!’’ विनय के स्वर में झल्लाहट थी।

‘‘अपने दिमाग को केन्द्रित करो और आँखें बन्द किये हुए कोशिश करो कुछ देखने की।’’

विनय थोड़ी देर कुछ नहीं बोलाफिर कहने लगा, ‘‘हां। अब मुझे दिखाई दे रहा हैमेरे चारों तरफ छोटे छोटे गोले घूमते दिखाई दे रहे हैं।’’

‘‘गुड!’’ प्रो.डेनियल अब डा.आनन्द की तरफ मुड़ा, ‘‘हमारा एक्सपेरीमेन्ट कामयाब हो चुका है। अब तुम सामने दीवार की तरफ देखो। वहां तुम्हें एक छोटा प्रकाशिक बिन्दु दिख रहा है। वही विनय का सूक्ष्म शरीर है।’’
‘‘करेक्ट डा.डेनियल। हम कामयाब हो गये।’’ डा.आनन्द खुशी से उछल पड़ा।

‘‘लेकिन विनय किस तरह के गोले देख रहा है?’’ इस बार डा.आनन्द के दूसरे असिस्टेन्ट गौतम ने पूछा।
‘‘दरअसल अब बन्द आंखों से जो कुछ भी देख रहा हैअसलियत में वह सब उसका सूक्ष्म शरीर देख रहा है। और वह अपने चारों तरफ घूमते हवा के अणुओं को देख रहा है।’’ डा.आनन्द ने बताया।

‘‘विनयक्या तुम उनमें से किसी गोले को छू सकते हो?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘कोशिश करता हूँ।’’ विनय ने हाथ उठाया और हवा में इधर उधर लहराने लगा।

‘‘नहीं सर। इन गोलों की गति बहुत तेज है।’’ आखिर में उसने कहा।

‘‘ठीक है। नाऊ स्टाप दि एक्सपेरीमेन्ट।’’ प्रो.डेनियल के कहने पर डा.आनन्द ने स्विच आॅफ कर दिया। विनय ने आंखें खोल दीं। अब वह चुंधियाई नजरों से चारों तरफ देख रहा था।
.............

वह एक औरत थी और खूबसूरती में अपनी मिसाल आप थी। चेहरे पर कुछ ऐसा आकर्षण था कि देखने वाला अपनी निगाह चाहते हुए भी नहीं हटा पाता था।

कुछ इसी तरह की हालत प्रो.डेनियल की भी हुई थी। जिसके सामने वह औरत मौजूद थी।
‘‘फर्माईएमैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’ उसने नर्म अंदाज में पूछा।

‘‘मैं डा.आनन्द से मिलना चाहती हूँ।’’ औरत ने कहा।
‘‘वह अंदर मौजूद हैं। लेकिन आप उनसे क्यों मिलना चाहती हैं?’’

---- जारी है

Friday, July 1, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 1

लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी 

उसने कमरे का दरवाजा खटखटाने से पहले उसपर लगी तख्ती पढ़ीलिखा था, ‘‘डाग्स एण्ड लो नालेज पर्सन्स आर नाट एलाउड।’’
एक पल को उसे अपने कदम डगमगाते महसूस हुए। उसके पास नालेज तो थीलेकिन पता नहीं अंदर बैठे व्यक्ति को कितनी नालेज वाला व्यक्ति पसंद था। अंदर मौजूद व्यक्ति थाप्रोफेसर डेनियल कूपर,  विश्व का जाना माना भौतिकविद व गणितज्ञ।’’

बहरहाल उसने दरवाजा नाॅक किया।

‘‘कम इन।’’ अंदर से आवाज आयी। वह दरवाजे को धक्का देते हुए अंदर दाखिल हुआ। सामने प्रोफेसर डेनियल मौजूद था उसके सामने मेज पर पेपर्स और किताबों का ढेर लगा हुआ था। उसने मेज के दूसरी तरफ रखी कुर्सी पर बैठना चाहा।
‘‘रुको!’’ प्रो. डेनियल ने उसे फौरन रोक दिया, ‘‘पहले मैं तुम्हारी नालेज का टेस्ट लूँगा। मुझे मालूम तो हो कि तुम मुझसे बात करने के काबिल हो या नहीं।’’

इससे पहले कि वह कुछ समझ पाताप्रो. डेनियल ने पहला सवाल दाग़ा, ‘‘एक मीनार की चोटी से दो गेंदें गिरायी गयीं। एक भारीदूसरी हल्की। ग्राउण्ड पर कौन सी गेंद पहले पहुँचेगी?’’
‘‘न्यूटन और गैलीलियो के नियमों के अनुसार दोनों गेंदें एक साथ ग्राउण्ड पर पहुँचेंगी।’’ उसने जवाब दिया।

‘‘गलत!’’ प्रो.डेनियल ने मेज पर हाथ मारा, ‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हलकी पर ज्यादा होगा इसलिए भारी गेंद पहले पहुँचेगी।’’
‘‘ओह!’’
‘‘दूसरा सवाल...एक मीनार की चोटी से दो गेंदें गिरायी गयीं। एक भारीदूसरी हल्की। ग्राउण्ड पर कौन सी गेंद पहले पहुँचेगी?’’

‘‘यह तो वही सवाल....’’
‘‘तुम जवाब दो बेवकूफ!’’

‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हलकी पर ज्यादा होगा इसलिए भारी गेंद....’’
‘‘रांग अगेन! हवा का प्रेशर हारीजोण्टल डायरेक्शन में ज्यादा होगा। इसलिए दोनों गेंदें एक साथ जमीन पर पहुँचेंगी।’’

उसने एक गहरी साँस ली।
‘‘तीसरा सवाल.....एक मीनार की चोटी से दो गेंदें....’’
‘‘आप तो फिर वही सवाल....’’
‘‘बीच में मत टोका करो। अब जवाब दो हाफ माइंड।’’
‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हारीजोण्टल डायरेक्शन में ज्यादा होगा। इसलिए दोनों गेंदें एक साथ जमीन पर पहुँचेंगी।’’

‘‘तुम मुझसे बात करने के काबिल ही नहीं हो। अरे बेवकूफगेंदों के प्रारम्भिक वेग पर भी तो बहुत कुछ निर्भर करेगा। डांट वेस्ट माई टाइम एण्ड गेट आउट।’’

वह मायूसी के साथ जाने को मुड़ाफिर वापस घूमकर प्रो.डेनियल से मुखातिब हुआ, ‘‘प्रोफेसर साहबजाने से पहले मैं भी आपसे एक सवाल करना चाहता हूँ।’’
‘‘और वह यकीनन कोई बेवकूफी भरा सवाल होगा। खैर पूछो।’’

‘‘आपके गले में जो टाई लटक रही हैउसके नीचे की शर्ट किधर है?’’
‘‘ऐं!’’ प्रो.डेनियल चैंक कर अपने को देखने लगा। वास्तव में उसके जिस्म पर से कमीज नदारद थी और गले से लटकती टाई उसके नंगे पेट पर इधर उधर झूल रही थी।

‘‘ओ माई गाॅड! आज मैं शर्ट पहनना कैसे भूल गया।’’ प्रो.डेनियल बदहवास होकर बोला।
‘‘अच्छा सरतो मैं चलता हूँ।’’
‘‘नहींरुकोतुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘सरमैं डा.आनन्द हूँ। फ्राम इण्डियायानि कि भारत।’’
‘‘काम क्या है तुम्हें मुझसे?’’

‘‘मैं अपने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आपसे मदद चाहता हूँ। क्योंकि इसमें फिजिक्स की एक बहुत ही मुश्किल प्राब्लम सामने आ रही है।’’
‘‘मैं मदद करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन इसमें मेरी एक शर्त होगी।’’

आनन्द सहमति में सर हिलाते हुए अपने प्रोजेक्ट के बारे में संक्षेप में बताने लगा।

और थोड़ी देर बाद जब वह बाहर निकला तो उसके चेहरे पर इत्मिनान के भाव थे। क्योंकि प्रोफेसर डेनियल ने उसके प्रोजेक्ट में मदद देना स्वीकार कर लिया था। हालाँकि अब उसके जिस्म से कमीज नदारद थी। शर्त के अनुसार प्रोफेसर ने उससे कमीज माँग ली थी।
...........

इस विशालकाय कमरे में चारों तरफ मशीनों का जाल बिछा हुआ था। प्रत्येक मशीन से जुड़े हुए अनगिनत छोटे बड़े लेंस कमरे की खूबसूरती को बढ़ाने का काम कर रहे थे।
लेकिन इस खूबसूरती से ज्यादा महत्वपूर्ण वह एक्सपेरीमेन्ट था जो यहाँ पर हो रहा था। और यह तथ्य वहाँ मौजूद डा.आनन्द और उसके दोनों असिस्टेन्ट विनय और गौतम भली भाँति जानते थे।

‘‘आज हमें अपने एक्सपेरीमेन्ट को हर हाल में कामयाबी की मंजिल तक पहुँचाना है।’’ डा.आनन्द ने दृढ़ स्वर में कहा।
‘‘कामयाबी तो आज मिलनी ही चाहिए सर।’’ विनय बोला, ‘‘पिछले दो सालों से नाकामी देखते देखते हमारी तो हिम्मत ही जवाब दे गयी है।’’

‘‘क्या गारण्टी है कि हम आज भी कामयाब होंगे?’’ गौतम ने शंका जाहिर की।
‘‘अगर प्रो.डेनियल का दिमाग घूम गया तो हमारे प्रोजेक्ट की कामयाबी निश्चित है।’’

‘‘तो क्या वह यहाँ आ रहे हैं?’’ विनय ने हैरत से कहा। डा.आनन्द को जवाब देने की जरूरत न पड़ी क्योंकि उसी समय वहाँ डेनियल ने प्रवेश किया।
‘‘डा.आनन्दहाऊ आर यू!’’ प्रो.डेनियल ने विनय की तरफ हाथ बढ़ाया।

‘‘एक्सक्यूज मीडा.आनन्द मैं हूँ।’’ डा.आनन्द ने जल्दी से कहा।
‘‘ओह साॅरी। लेकिन मेरी मीटिंग तो इनके साथ हुई थी?’’ डा.डेनियल ने हैरत से कहा।

‘‘आप भूल रहे हैं सरआपकी मीटिंग मेरे साथ ही हुई थी।’’ बड़ी मुश्किल से डा.आनन्द ने अपने ऊपर कण्ट्रोल करते हुए कहा। उसे आश्चर्य हो रहा था कि यह गायब दिमाग प्रोफेसर इतना बड़ा भौतिकविद कैसे बन गया।

‘‘कौन आनन्द है कौन नहींमुझे इससे कोई मतलब नहीं। तुम अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताओ।’’

‘‘प्रोफेसर साहबमेरा प्रोजेक्ट कुछ इस टाइप का है।’’ कहते हुए आनन्द एक मेज के पास पहुँचा। जिसके ऊपर ताँबे के तार की दो क्वायल एक दूसरे से थोड़ी दूर पर रखी दिख रही थीं।

‘‘मैंने पहली क्वायल में ए.सी. करेन्ट पास की और आप देख रहे हैं कि दूसरी क्वायल से जुड़ा अमीटर उसमें भी करेण्ट दिखाने लगा। ऐसा होता है फैराडे के इलेक्ट्रोमैगनेटिक इंडक्शन नियम की वजह से जिसकी वजह से दोनों क्वायल परस्पर जुड़ी न होते हुए भी इलेक्ट्रिक रूप से जुड़ जाती हैं।’’

‘‘तुम मेरा भेजा क्यों चाट रहे हो! दुनिया के जाने माने भौतिकविद को यह हाईस्कूल लेवेल की बच्चों की बातें क्यों बता रहे हो!’’ प्रो.डेनियल लगभग चीखते हुए बोला।
‘‘क्योंकि बिना यह बताये मैं अपने एक्सपेरीमेन्ट को एक्सप्लेन नहीं कर सकता।’’ डा.आनन्द शान्त स्वर में बोला।
‘‘तो फिर चाटते रहो भेजा।’’

डा.आनन्द ने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘दो बिल्कुल अलग अलग क्वायल को जोड़ने में जिम्मेदार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल प्रकाशीय कणों यानि फोटाॅनों के वितरण से पैदा होता है।’’

‘‘ये भी मुझे मालूम है।’’ इस बार प्रोफेसर डेनियल शांत लहजे में बोलालेकिन लग यही रहा था कि अभी वह फट पड़ेगा।

‘‘अब जो मैं बताने जा रहा हूँवह आपको नहीं मालूम। मैं इसी इलेक्ट्रोमैगनेटिक इंडक्शन का इस्तेमाल दो शरीरों को जोड़ने में करने जा रहा हूँजिनमें एक जीवित शरीर होगा और दूसरा उसका इलेक्ट्रिक प्रतिरूप।’’

‘‘क्या मतलब!’’ इस बार वाकई प्रो.डेनियल चौंक पड़ा था।

---- जारी है 

Monday, April 11, 2016

मदर लॉ - भाग 2 (अन्तिम भाग)

जैसे जैसे हारून यानि कैमरून का बेटा बड़ा हो रहा था उसे अनुशा से दूर रहने की आदत डाली जा रही थी। अब फारिया कोशिश कर रही थी कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा अपने पास रखे। हालांकि हारून अभी भी अनुशा से ज़्यादा लगाव दिखाता था और ये बात फारिया को बुरी तरह खल जाती थी। फिर एक दिन वह भी आया जब अनुशा को कुछ रकम देकर उसे चुपचाप हारून की जिंदगी से बहुत दूर जाने को कह दिया गया। अनुशा ने एक नज़र अपने हाथ में पकड़े बड़ी रकम के कार्ड पर डाली और दूसरी फारिया पर। 

‘‘माँ बनने की बड़ी खुशी के बाद मेरी नज़रों में किसी रकम की कोई अहमियात नहीं। आप इससे प्लीज़ हारून के लिये ढेर सारी खुशियाँ खरीद लीजिए। मैं उसकी जिंदगी से बहुत दूर जा रही हूं।’’ अनुशा ने उदासी के साथ कहा और हारून को बिना अंतिम बार देखे उस आलीशान मशीनी महल से बाहर निकल आयी जिसके मालिक भी मशीन ही थे।

वक्त बीतता रहा और अनुशा हर रोज़ दरवाज़े की तरफ आस भरी निगाहें उठाती रही कि शायद हारून के माँ बाप को अपनी गलती का एहसास हो जाये। और वे हारून को अनुशा की मामता के साये में ले आयें। लेकिन उसकी उम्मीद मात्र एक सपना बनकर ही रह गयी और अब वह अपनी उम्र के बयालीसवें पड़ाव पर थी। कैमरून का कहना बिल्कुल सच साबित हुआ था कि किसी और के बच्चे को गर्भ में रखने के लिये उसे काफी समझौते करने पड़ सकते हैं। उसके बाद कोई लड़का उससे शादी पर राज़ी नहीं हुआ था। और वह अपना जीवन अकेले ही काट रही थी।

फिर अचानक एक दिन उसके मोबाइल पर एक खूबसूरत लेकिन अजनबी लड़की का चेहरा उभरा।

‘‘हैलो अनुशा जी। मैं कैमरून स्टेट के चेयरमैन की पर्सनल सेक्रेटरी बोल रही हूं।’’
‘‘क्या?’’ अनुशा को हैरत का एक झटका सा लगा।  
‘‘आप से चेयरमैन साहब मिलना चाहते हैं। क्या आप आ सकती है? हम आपके लिये अपना प्राईवेट प्लेन भेज रहे हैं।’’

'तो क्या कैमरून को अपनी गलती का एहसास हो गया? लेकिन ये भी हो सकता था कि अब हारून ही कैमरून स्टेट का चेयरमैन बन चुका हो।'

‘‘ठीक है। मैं तैयार हूं।’’ अनुशा ने जवाब दिया।
अनुशा को पक्का यक़ीन था कि अगर कैमरून ही चेयरमैन है तो उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है। और वह अपने बेटे को उससे मिलवाना चाहता है। और अगर हारून चेयरमैन बन चुका है तो उस माँ की मोहब्बत उसे अपनी तरफ खींच रही है जिसने अपनी कोख में उसकी परवरिश की थी।
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अनुशा जब चेयरमैन के चैम्बर में पहुंची तो उसका दूसरा अनुमान सच साबित हुआ। यानि चेयरमैन की कुर्सी पर बैठने वाला बदल चुका था। यह बीस साल का हैंडसम जवान बिला शक हारून था।

‘‘वेलकम अनुशा जी। प्लीज़ सिट।’’ हारून का लहजा पूरी तरह प्रोफेशनल था। 
'तो क्या उसने उसे नहीं पहचाना? '

"अनुशा जी। तमाम दुनिया के अरबों लोगों की पर्सनल ई. प्रोफाइल चेक करने के बाद हमारे साइबर एनेलाईज़र ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसके मुताबिक दुनिया में सिर्फ दो ही इंसान ऐसे बचे हैं जो मुकम्मल तौर पर इंसान है। यानि जिनके जिस्म का कोई भी हिस्सा मशीनी नहीं है। "

अनुशा खामोशी से उसकी बात सुन रही थी।

‘‘उन दो लोगों में से पहला इंसान मैं हूं।’’ कहकर हारून एक पल को रुका। अनुशा खामोशी से उसे देखती रही। न जाने उसकी आँखें कितनी प्यासी थीं कि एकटक हारुन के चेहरे पर गड़ी थीं। यही वह इंसान था जिसे उसने अपने गर्भ में पाला था।

हारून ने अपनी बात आगे बढ़ायी, ‘‘और दूसरी इंसान आप हैं अनुशा जी। इसके अलावा और कोई इस दुनिया में कम्पलीट इंसान नहीं। सब साईबोर्ग बन चुके हैं। मेरी बीवी भी।’’

‘‘ओह।’’

‘‘लेकिन मैं अपने बच्चे को एक कम्प्लीट इंसान के रूप में ही देखना चाहता हूं। जैसा कि मैं खुद हूं। और इसके लिये मैं एक पूरी तरह कुदरती कोख चाहता हूं। जो कि इस दुनिया में सिर्फ आपके पास है।’’

‘‘ओह।’’ अनुशा ने एक गहरी साँस ली।

हारून ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘इसके लिये मैं आपको मुंहमांगी कीमत देने के लिये तैयार हूं।’’ कहते हुए उसने जेब से एक प्लास्टिक कार्ड निकाला और उसे अनुशा के सामने रख दिया, ‘‘इस कार्ड के ज़रिये आप किसी भी बैंक से मेरे एकाउंट से कोई भी रकम निकाल सकती हैं। उतनी बड़ी, जितनी कि आप चाहें।’’

अनुशा ने कार्ड लेने के लिये अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया। फिर हारून ने खुद ही कार्ड उसके सामने रख दिया। अनुशा की नज़रें बीस साल पहले की दुनिया देख रही थीं जब ऐसा ही कार्ड हारून के बाप ने उसके सामने रखा था।

‘‘मालूम नहीं तुम्हें याद है या नहीं। बीस साल पहले तुम भी मेरी ही कोख से पैदा हुए थे।’’ वह धीरे से बोली।

‘‘हाँ। मैं अपनी पैदाईश की कहानी जानता हूं। और मुझे ये भी मालूम है कि उसके बदले मेरे बाप ने आपको एक अच्छा एमाउंट पे किया था। लेकिन मैं उससे भी ज़्यादा एमाउंट पे कर सकता हूं। क्योंकि अब कैमरून स्टेट का साम्राज्य बहुत ज़्यादा बढ़ चुका है और उस साम्राज्य का मैं अकेला मालिक हूं।’’ हारून की आवाज़ में गर्व के अलावा और कुछ नहीं था।

अनुशा ने उसकी आँखों में देखा लेकिन शायद जो वह देखना चाहती थी वह देखने में नाकाम रही।

‘‘अब मुझे इसके अलावा और कोई ख्वाहिश नहीं कि मेरा बेटा ठीक मेरी तरह एक मुकम्मल इंसान बनकर पैदा हो। अनुशा जी अब आप इसके लिये तैयारी शुरू कर दें। मेरा फैमिली डाक्टर बहुत जल्द आपसे कान्टेक्ट कर लेगा।’’

अनुशा ने सामने रखा कार्ड उठाया और उसे अपने हाथों में तौलते हुए पूरी तरह शांत स्वर में बोलने लगी, 

‘‘तुम्हारी ये सोच एक बड़ी भूल है कि तुम मुकम्मल मानव हो। भला अधूरे माँ बाप का बेटा मुकम्मल कैसे हो सकता है। तुम सिर्फ एक मशीन हो। एक मुकम्मल मशीन, अपने माँ बाप से भी ज़्यादा मुकम्मल। क्योंकि तमाम मशीनें सिर्फ क्वालिटी देखती हैं। बाक़ी भावनाओं, प्यार और इंसानी कमज़ोरियों के लिये उनके सर्किटों में कोई जगह नहीं होती। माफ कीजिए। किसी मशीन के लिये काम करने से इंसानियत का कोई भला नहीं होने वाला। मुझे आपका आफर स्वीकार नहीं।’’ अनुशा कार्ड को वापस हारून की तरफ रख चुकी थी। जिसे वह जड़ होकर घूर रहा था।

 कुर्सी से उठते समय अनुशा की तमाम बेचैनी खत्म हो चुकी थी। उसका दिल पूरी तरह शांत था।

---समाप्त---  

ज़ीशान हैदर ज़ैदी 
लेखक     

Sunday, April 10, 2016

मदर लॉ - भाग 1

लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी

एक मशीनी मानव जब उसके पास से गुज़रा तो उसने किताब पर से नज़र उठाकर एक उचटती नज़र उसकी ओर डाली। उस गैलरी में मशीनी मानवों का चलना फिरना कुछ अस्वाभाविक नहीं था। क्योंकि वह दुनिया की जानी मानी रिसर्च लैब थी और वहाँ अधिकतर काम रोबोटों के ही जरिये होता था। वह यहाँ एक इंटरव्यू के सिलसिले में आयी थी और अपनी काॅल का इंतिज़ार कर रही थी।

वैसे यह रोबोट उसे कुछ अजीब सा मालूम हुआ। क्योंकि दूसरे रोबोटों की तरह इसकी चाल यान्त्रिक न होकर किसी मानव जैसी लचीली थी। बिल्कुल ऐसा ही मालूम हुआ था जैसे कोई मानव पास से गुज़र गया हो। उसने एक बार फिर किताब पर अपनी नज़रें गड़ा दीं। कुछ क्षणों बाद वहाँ का कर्मचारी उसके पास आया। जिसने उससे थोड़ी देर पहले उसका बायोडाटा लिया था।

‘‘मैडम आप अन्दर चली जाईए। आपको काॅल किया गया है।’’ उसने एक रूम की तरफ इशारा किया और वह अपना पर्स समेटते हुए उठ खड़ी हुई। कमरे में दाखिल होने से पहले उसने बाहर लिखा तख्ती पर नज़र दौड़ाई जिसपर ‘चेयरमैन - डा0 कैमरून’ अंकित था।

रूम के अन्दर घुसते है उसे हैरत का एक झटका लगा। क्योंकि सामने चेयरमैन की कुर्सी पर वही रोबोट विराजमान था जो थोड़ी देर पहले उसके सामने से गुज़रकर गया था।
‘‘आईए मिस अनुशा !’’ उसने अपने यान्त्रिक हाथ से उसको सामने कुर्सी पर बैठने का संकेत किया।
‘‘अ..आप!’’ हैरत से उसे देखते हुए अनुशा ने कुछ कहना चाहा।

‘‘हैरत करने की ज़रूरत नहीं। मैं देखने में मशीनी मानव ज़रूर लगता हूं। लेकिन मैं एक इंसान ही हूं। मेरा दिमाग और जिस्म का अच्छा खासा हिस्सा अभी इंसान रूप में है। वैसे आजकल साईबोर्ग बनना तो एक आम बात हो गयी है।
अनुशा ने चुपचाप उसकी बात पर सर हिलाया। इस दौर में इंसान के ऊपर काम का बोझ बहुत ज्यादा हो गया था। और यह संभव नहीं था कि मानवीय शरीर लेकर वे इतना काम कर पाते। इसलिये अक्सर लोग अपने जिस्म का कुछ कुदरती हिस्सा हटवाकर वहां उच्च कोटि की मशीनें लगवा लेते थे। लेकिन इस सामने वाले इंसान ने तो हद कर दी थी। शायद ही उसके जिस्म में दिमाग को छोड़कर कोई हिस्सा कुदरती रहा हो।

‘‘शायद आप सोच रही हैं कि मैंने अपने मानव रूप की पहचान को बिलकुल ही क्यों मिटा दिया है।’’ वह व्यक्ति शायद सामने वाले के दिमाग को भी पढ़ सकता था।
‘‘जी हां। मगर!’’ अनुशा ने कुछ कहना चाहा मगर उस व्यक्ति ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

‘‘मैं तुम्हें अपनी कहानी इसलिये सुना रहा हूं क्योंकि इस कहानी का सम्बन्ध तुम्हारी जाॅब से है।’’
अनुशा ने हैरत से उसे देखा।
‘‘तुम्हें मालूम है कि आजकल हर इंसान को साईबोर्ग बनने की सनक सवार है। लेकिन मेरे साथ ऐसा मजबूरी में हुआ है। क्योंकि मेरी पिछली कई पुश्तों ने चूंकि अपने को साईबोर्ग बनाकर कुदरती तौर पर अधूरा बना लिया था इसलिए मैं पैदा ही अधूरा हुआ। और मेरे जिस्म को मुकम्मल किया गया मशीनों के द्वारा।’’

‘‘ओह!’’ अनुशा ने एक गहरी साँस ली।
‘‘और मेरी शादी भी एक अधूरी औरत से की गयी। जो मेरी तरह ही जिस्मानी तौर पर विकलांग है और मशीनों के द्वारा उसे कम्पलीट किया गया है।’’

अनुशा को वाकई यह जानकर दुःख पहुंचा था, कि वह एक विकलांग जोड़े से मिल रही थी। लेकिन साथ ही उसे रश्क़ भी था क्योंकि यह जोड़ा एक भारी भरकम कंपनी का मालिक था।
‘‘अब तुम सोच रही होगी कि मेरी इस कहानी का तुम्हारी जाॅब से क्या सम्बन्ध?’’

‘‘ज..जी हां सर।’’ अनुशा ने गड़बड़ा कर कहा।
‘‘बात ये है कि मेरी पत्नी का भीतरी जिस्म भी काफी कुछ मशीनी है। और डाक्टरों ने उसका चेकअप करने के बाद साफ कहा है कि अगर उसने अपने गर्भ में हमारे बच्चे को रखा तो वह बच्चा भी विकलांग पैदा होगा।’’
‘‘ओह!’’

‘‘इसलिए हम अपने बच्चे के लिये ऐसी कोख चाहते हैं जो पूरी तरह कुदरती हो। और यह कोख हमें आप प्रदान कर सकती हैं मिस अनुशा।’’ उसने अपनी आँखें अनुशा के ऊपर गड़ा दीं और अनुशा एकदम से हड़बड़ा गयी।
‘‘म..मैं!’’

‘‘हाँ। हमारे आफिस की एक्सरे मशीनों ने आपके जिस्म की जाँच की है। और उसमें कुछ भी मशीनी नही है। अगर आप हमारा आफर स्वीकार कर लेती हैं तो हम आपको इसके लिये मुंहमांगी कीमत देने के लिये तैयार हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि कैमरून स्टेट का वारिस विकलांग हो।’’ कहते हुए उसने जेब से एक प्लास्टिक कार्ड निकाला और उसे अनुशा के सामने रख दिया।

‘‘इस कार्ड के ज़रिये आप किसी भी बैंक से मेरे एकाउंट से कोई भी रकम निकाल सकती हैं। उतनी बड़ी, जितनी कि आप चाहें। क्योंकि मैं जानता हूं कि अभी आप सिर्फ बीस वर्ष की हैं। ऐसे में किसी और के बच्चे को गर्भ में रखने के लिये आपको काफी समझौते करने पड़ सकते हैं। और इसके लिये निःसंदेह आप बड़ी से बड़ी रकम की हक़दार हैं।’’ उसने अनुशा की आँखों में झांका।

कुछ पल लगे अनुशा को फैसला करने में।
‘‘ठीक है। मुझे यह आफर मंजूर है।’’ अनुशा ने कार्ड उठाकर अपने पर्स में रख लिया।

कैमरून की आधी मशीनी और आधी मानवीय आँखों में चमक आ गयी थी।
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उस समय मौजूद निहायत मामूली तकनीक द्वारा कैमरून व उसकी पत्नी का ज़ायगोट अनुशा के गर्भ में शिफ्ट कर दिया गया। और बच्चा अनुशा के गर्भ में आकार पाने लगा। फिर नौ महीने बाद वह समय भी आया जब उसने प्यारे से गोल मटोल बच्चे को जन्म दिया। कैमरून की ख्वााहिश पर यह नार्मल डिलेवरी हुई थी। वरना उस समय तो एकाध के अलावा सभी औरतों की च्वाइस सीज़ेरियन ही होती थी।

अनुशा ने बच्चे की तरफ नज़र की और फिर मानो उसपर से नज़र हटाना ही भूल गयी। माँ बनने के अनूठे एहसास ने उसके अन्दर एक रोमाँच सा भर दिया था। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया और बेतहाशा उसपर अपना प्यार लुटाने लगी।

अचानक उसे लगा किसी ने सुहावने सपने से उसे जगा दिया हो। क्योंकि दरवाज़ा खोलकर कैमरून अपनी पत्नी के साथ वहाँ दाखिल हो रहा था।
‘‘कैसी हो अनुशा!’’ कैमरून ने नर्म स्वर में पूछा। 
‘‘ठीक हूं।’’ अनुशा ने सर हिलाया।

‘‘फारिया, ये हमारा बच्चा है।’’ अनुशा की गोद में विराजमान बच्चे की तरफ इशारा करके कहा कैमरून ने अपनी पत्नी से।
‘‘मेरा बच्चा।’’ फारिया आगे बढ़ी और उसने अनुशा की गोद से बच्चे को उठा लिया।

अभी तक आराम से सोया हुआ बच्चा अचानक जोर जोर से रोने लगा। मानो उसे एहसास हो गया था कि वह मानव की बजाय किसी मशीनी गोद में पहुंच गया है। फारिया ने उसे बहलाने की कोशिश की लेकिन बच्चा किसी भी तरह चुप नहीं हो रहा था। 

‘‘इसे मुझे वापस दे दीजिए।’’ अनुशा ने उसे लेने के लिये हाथ बढ़ाया लेकिन फारिया बच्चे को लिये हुए उससे दूर हट गयी।

यह मेरा बच्चा है। इसे मेरी गोद में रहने की आदत डालनी ही पड़ेगी। फारिया ने सख्त लहजे में कहा। अनुशा ने दुःखी नज़रों से कैमरून की तरफ देखा। कैमरून शायद सिचुएशन समझ गया था।

‘‘फारिया, अभी बच्चे को अनुशा को दे दो। इसे भूख लगी है। और इसकी ये ज़रूरत फिलहाल तुम पूरा नहीं कर सकतीं।’’
फारिया ने दुःखी नज़रों से कैमरून की तरफ देखा और बच्चे को वापस अनुशा को थमा दिया।
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शेष अगले भाग में.... 

Monday, August 17, 2015

इच्छाधारी - हिंदी विज्ञान कथा (भाग 8 - अन्तिम भाग)

‘‘कैसी दुश्मनी? हमने तो हमेशा आपका सम्मान किया?’’ इस बार संजय ने सवाल उठाया। 
‘‘मेरी दुश्मनी उनसे है जिन्होंने तुम लोगों को पैदा किया। मैं तुम्हारे माँ बाप का दुश्मन हूं।’’ फादर जोज़फ गुर्राकर बोला। 

‘‘लेकिन क्यों?’’ दीपा की आवाज़ में उलझन भरा डर मौजूद था। 

‘‘क्योंकि आज से पच्चीस साल पहले मैं अपने माँ बाप के साथ इस ग्रह पर आया था। हमारा यान इसी जंगल में उतरा था। हम लोग जानवरों का शरीर धारण करके खुशी खुशी इस नये ग्रह का आनंद ले रहे थे। लेकिन उसी समय हमारी खुशियों को ग्रहण लग गया। और इस ग्रहण को लगाने वाले थे तुम दोनों के माँ बाप। जो इस जंगल में शिकार खेलने आये थे। उन्होंने मेरे माँ बाप को अपना निशाना बना लिया। जो उस समय बाघ के रूप में थे। मैं उस समय छोटा बच्चा था। मैंने छुप कर अपनी जान बचायी लेकिन हमारी नस्ल हमेशा के लिये खत्म हो गयी। क्योंकि अब मैं अपने ग्रह वापस नहीं लौट सकता था। जिन टेक्यान किरणों को कैरियर बनाकर हम अपने ग्रह से यहाँ तक आये थे उनका सम्पर्क मेरे बाप की मौत के साथ टूट गया।’’

संजय व दीपा जड़ होकर फादर जोज़फ उर्फ एलियेन की कहानी सुन रहे थे। 

फादर ने कहना जारी रखा, ‘‘फिर मैंने प्रतिशोध की ठान ली। मिस्टर मेहता और मिस्टर कपूर ने जिस तरह मुझे अकेला रहने पर मजबूर किया है, मैं भी उन्हें नस्लविहीन कर दूंगा। हमेशा के लिये अकेले रहने पर मजबूर कर दंगा। दो को मार चुका हूं इसी जंगल में जहाँ मेरे माँ बाप को मारा गया था। अब दो और बचे हैं।’’ फादर ने उन्हें घूरते हुए कहा। 

उसका इरादा भांपकर संजय ने उसपर छलांग लगायी। लेकिन वह एलियेन पूरी तरह सावधान था। उसने अपने हाथ को एक झटका दिया। नतीजे में संजय उछलकर पलटा और दीपा से टकरा गया। उसके जोरदार धक्के से दीपा संभल न सकी। एक पत्थर से उसका सर टकराया और वह अचेत हो गयी।
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दीपा के होश जब दोबारा संभले तो उसे अपने ऊपर किसी का साया महसूस हुआ। जब आँखें कुछ और देखने के काबिल हुईं तो उसने पाया कि संजय उसके ऊपर झुका हुआ है और उसे होश में लाने की कोशिश कर रहा है। 

‘‘स..संजय?’’ 

‘‘तुम ठीक तो हो दीपा?’’ संजय ने नर्म आवाज़ में पूछा। 
‘‘हाँ मैं तो ठीक हूं। ल...लेकिन फादर - एलियेन?’’ 

‘‘उसे मैंने मार डाला। वो देखो।’’ 

संजय की बात सुनते ही दीपा की सारी कमज़ोरी व चोट का एहसास जाता रहा। वह झटके से उठ बैठी और संजय की बतायी दिशा की ओर देखने लगी। वहाँ पर एक चमकदार नेवला मरा हुआ पड़ा था। 

‘‘य...ये तुमने इसे मारा?’’ 

‘‘हाँ। हमारी मदद ईश्वर ने की और मैं इसे मारने में कामयाब हो गया। एक कठिन संघर्ष के बाद। उठो दीपा अब घर चलते हैं।’’ संजय ने उसे सहारा देकर उठाया और गाड़ी की तरफ ले जाने लगा।

दीपा ने देखा कि उनकी गाड़ी सही सलामत थी। गाड़ी से लिपटा हुआ विशालकाय अजगर कहीं गायब हो चुका था। संजय ने दीपा को सहारा देकर गाड़ी में बिठा दिया। 

‘‘मैं उस एलियेन की लाश को जलाकर आता हूं। फिर हम लोग रवाना हो जायेंगे।’’ 
‘‘हाँ। उसका भी अंतिम संस्कार ज़रूरी है।’’ दीपा ने फीकी मुस्कुराहट के साथ कहा। 

संजय ने सर हिलाया और नेवले के मुरदा शरीर के पास पहुंच गया फिर उसे घसीटकर पेड़ों के एक झुरमुट की तरफ ले जाने लगा। जैसे ही उसने उस झुरमुट को पार किया, वहाँ मौजूद छोटे से मैदान में एक और लाश पड़ी दिखाई दी। ये एक मनुष्य की लाश थी। उसने उसे पलटा तो उस लाश का चेहरा सामने आ गया। 

अगर उस चेहरे को दीपा देख लेती तो यकीनन उसके दिल की धड़कन रुक जाती। क्योंकि ये चेहरा संजय का था। आने वाले संजय ने नेवले के शरीर को उसके ऊपर फेंका और फिर दोनों को आग दिखा दी। दोनों मृत शरीर धड़ाधड़ जलने लगे। 

उस आग की रोशनी में जिंदा संजय का चेहरा अचानक भयानक हो गया था। वह बड़बड़ा रहा था, ‘‘अब मैं अपने ग्रह की और अपने बाप की नस्ल को यहीं इसी पृथ्वी पर बढ़ाऊंगा। जिसने मेरे माँ बाप को मारा, उसी की बेटी हमारी नस्ल को आगे बढ़ायेगी। एक इच्छाधारी की नस्ल को।’’ उसके चमकते चेहरे पर एक कुटिल मुस्कुराहट उभर आयी। 

संजय की लाश से फूटते शोले अब बुलन्द हो रहे थे।       
                                                                         
--समाप्त--