Tuesday, July 14, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 11

इस समय शमशेर सिंह का दिल बल्लियों उछल रहा था। क्योंकि उसे इंटरव्यू में चुन लिया गया था। इंटरव्यू कमेटी के चेयरमैन ने उससे कहा था, ‘‘मि0 शमशेर सिंह, इंटरव्यू के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आप एक निडर, साहसी और ज्ञानी व्यक्ति हैं। अत: हम आपको अपनी कंपनी में एप्वाइंट कर रहे हैं।’’
‘‘क्या सच!’’ शमशेर सिंह ने उछलते हुए कहा।
‘‘जी हां। फिलहाल तो आप इसे सच ही समझिए।’’

‘‘अब मैं देवीसिंह और रामसिंह को बताऊंगा, जो वह कह रहे थे कि मेरा कहीं सेलेक्शन ही नहीं हो सकता।’’ वह ऊंची आवाज में बड़बड़ाया।
‘‘ये देवीसिंह और रामसिंह कौन हैं?’’ लाल टाईवाले ने पूछा।

‘‘हैं दो साले। बनते हैं दोस्त, लेकिन हमेशा जड़ खोदने में लगे रहते हैं। उस देवीसिंह को तो वैज्ञानिक बनने का शौक है। साला अपने को प्रोफेसर कहलवाता है। आज तक ढंग की कोई चीज़ नहीं बना सका। उसकी बात मानना तो सीधे कुएं में गिरने के बराबर होता है। कब कौन सा मिक्सचर पिलाकर ऊपर का टिकट काट दे कुछ कहा नहीं जा सकता।’’ इस समय उसके बड़बड़ाने के साथ साथ दांत पीसने की भी आवाज़ें आ रही थीं।
‘‘ये लोग कहां रहते हैं?’’ चेयरमैन ने पूछा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
‘‘हमारे घर से थोड़ी ही दूर पर जी। किन्तु आप उनके बारे में क्यों पूछ रहे हैं?’’ उसने चौंक कर पूछा।

‘‘कुछ नहीं। कोई विशेष बात नहीं। बात यह है कि हम जिसे अपनी कंपनी में एप्वाइंट करते हैं, उसके दोस्तों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं।’’
‘‘अच्छा अच्छा। रामसिंह का मकान मेरे घर के बायीं ओर चलने पर चौथी गली का पांचवां मकान है। किसी ज़माने में काफी बड़ा मकान था, लेकिन अब टूट फूट कर केवल दो कमरों का रह गया है। रामसिंह को आप दूर ही से पहचान लेंगे। क्योंकि उसके जितना दुबला पतला और लम्बा व्यक्ति पूरे मुहल्ले में दूसरा कोई नहीं है।’’

‘‘वह करता क्या है?’’ चेयरमैन ने पूछा।
‘‘कुछ नहीं। दिवंगत बाप की दौलत पहले ही उड़ा चुका है। अब किसी पुराने खजाने की तलाश है जो उसे फिर से पुरानी हालत में लौटा दे।’’

‘‘और तुम्हारा दूसरा दोस्त?’’
‘‘देवीसिंह, रामसिंह की गली से मिली एक दूसरी गली में रहता है। उसके मेन गेट पर एक बड़ी सी परखनली बनी हुई है।’’
‘‘वह कहीं नौकरी करता है?’’

‘‘उसका एक बुक स्टाल है। जहां से उसे अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। लेकिन उसी बुक स्टाल ने उसे किताबें पढ़ने और नये नये एक्सपेरीमेन्ट करने का चस्का लगा दिया है। उसकी इस आदत से हम लोग काफी परेशान हैं।’’

इस प्रकार शमशेर सिंह ने अपना तथा अपने दोस्तों का पूरा परिचय दे दिया था। इंटरव्यू कमेटी ने उसके दोस्तों से मिलने की इच्छा प्रकट की थी जिस पर कुछ पलों के लिए उसका मुंह बना था। किन्तु बाद में नौकरी मिलने की खुशी में वह नार्मल हो गया।

और इस समय राह चलते हुए उसके पांव भूमि पर नहीं टिक रहे थे और मन कुछ गुनगुनाने को कर रहा था। फिर वह वास्तव में ऊंची आवाज में किसी नयी फिल्म का गाना गुनगुनाने लगा। गाने के साथ साथ वह थिरकता भी जा रहा था। और इस कार्य में उसकी तोंद उसका पूरा साथ दे रही थी।

पास से गुजरने वाले राहगीर उसे पागल समझकर उसका पूरा आनन्द ले रहे थे। किन्तु शमशेर सिंह आंखें बन्द किये अलाप लेने में लीन था।

फिर उसे तब होश आया जब एक जोरदार धक्के ने उसे किनारे पड़े कूड़े के ढेर पर विराजमान कर दिया। उसने आँखें खोलीं तो दुर्घटना का कारण भैंसों की लाइन दिखाई पड़ गयी जो नदी की सैर करके आ रही थीं।
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Monday, July 13, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 10

‘‘मैं जल्दी से वहां बनी एक झोंपड़ी के अन्दर पहुंचा और दरवाजा बन्द कर लिया।’’
‘‘फिर क्या हुआ?’’ इंटरव्यू कमेटी के दूसरे सदस्य ने पूछा।

‘‘फिर मैं घुटनों में सर देकर वहीं भूमि पर बैठ गया। और उसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा। सुबह तब होश आया जब एक मोटे तगड़े व्यक्ति ने मुझे झिंझोड़कर जगाया। मालूम हुआ कि वह उस बगीचे का चौकीदार था, और उसी झोंपड़ी में रहता था।’’

‘‘बगीचा? लेकिन तुमने तो पहले जंगल कहा था?’’ लाल टाई वाले ने पूछा।
‘‘जी हां। बाद में मुझे मालूम हुआ कि वह वहां के करोड़पति सेठ मूलचन्द का विशाल बगीचा था और वह खरगोश भी पालतू थे। इस कारण मुझे बाद में काफी जुर्माना भी भरना पड़ा था।’’ कहते हुए शमशेर सिंह का चेहरा किसी उल्लू की तरह उदास हो गया।

‘‘जब तुमने सारी रात किसी बगीचे में बिताई तो यह साहसपूर्ण कारनामा कैसे हुआ?’’ चेयरमैन ने पूछा।
‘‘रात भर तो मैं उसे जंगल ही समझता रहा। बगीचे का पता तो सुबह चला।’’ शमशेर सिंह ने तर्क दिया।

‘‘चलो ठीक है। यह बताओ क्या तुम अंग्रेजी में बात कर सकते हो?’’ नीले स्वेटर वाले ने पहली बार अपना मुंह खोला।
‘‘यस यस। वाई नहीं।’’
‘‘व्हाट इस द नेम ऑफ कैपिटल ऑफ इंडिया?’’
‘‘द कैपिटल ऑफ इंडिया नेम इस भारत।’’ शमशेर सिंह ने जवाब दिया।
‘‘और दिल्ली किसकी राजधानी है?’’ चेयरमैन ने पूछा।
‘‘जी, वह भारत की राजधानी है।’’

‘‘अच्छा, एक इतिहास का सवाल बताओ। विश्व की सबसे लम्बी लड़ाई किसके बीच हुई और कितने दिन चली?’’
‘‘मेरे विचार में सबसे लम्बी लड़ाई मेरे मुहल्ले की रामकली और उसकी सास के बीच हुई थी, जब उसका पति हवालात में मुर्गी चुराने के आरोप में बन्द था। पूरे दो दिन चली थी यह लड़ाई।’’

‘‘मेरा मतलब हथियारों द्वारा लड़ाई से है।’’
‘‘वह लड़ाई भी बावर्ची खाने के बर्तनों और बेलन पटरों से लड़ी गई थी। एक भी बर्तन साबुत नहीं बचा था।’’

फिर वहां कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, उसके बाद चेयरमैन बोला, ‘‘ठीक है मि0 शमशेर सिंह, आपका इंटरव्यू पूरा हो गया। अब आप जा सकते हैं।’’

‘‘ओ0के0 बहुत बहुत ध्न्यवाद।’’ शमशेर सिंह कुर्सी से उठते हुए बोला।

शमशेर सिंह के जाने के बाद चेयरमैन ने घण्टी बजाई और चपरासी अप्दर आया।
‘‘अभी कितने लोग बाकी हैं?’’ चेयरमैन ने पूछा।
‘‘जी, दो लोग और बचे हैं।’’
‘‘ठीक है। अगले को आधे घण्टे के बाद भेजना। अब कुछ नाश्ते का प्रबंध् करो।’’
चपरासी सर हिलाकर वापस चला गया।

‘‘तो मि0 शमशेर सिंह के बारे में आप लोगों का क्या विचार है?’’ चेयरमैन ने बाकी सदस्यों से पूछा।
‘‘मुझे लगता है किसी गधे ने मनुष्य रूप में जन्म ले लिया है।’’ लाल टाई वाले ने कहा।
‘‘लेकिन गधे बहुत तगड़ी दुलत्ती मारते हैं।’’ चेयरमैन ने कहा और बाकी सदस्य उसका मुंह देखने लगे। किसी की समझ में उसकी बात नहीं आयी थी। चेयरमैन ने आगे कहा, ‘‘अगर हम अपने उद्देश्य को ध्यान में रखें तो हमें ऐसे ही व्यक्तियों को आवश्यक्ता है। जो डील डौल में तो अच्छे हों लेकिन ऊपरी खाना खाली हो।’’

चपरासी वेटर के साथ दाखिल हुआ जो जलपान का सामान लाया था। चेयरमैन ने उसे संबोधित किया, ‘‘मि0 शमशेर सिंह को रोक लेना। दो घण्टे के बाद उनका फिर से इंटरव्यू होगा।’’

Sunday, July 12, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 9

उसने पीछे मुड़कर देखा तो इंटरव्यू कमेटी दूर बैठी हुई थी। और वह स्वयं उस स्टूल पर बैठा था जो चपरासी के बैठने के लिए रखा हुआ था।

जब वह उठकर वहाँ पहुंचा तो इंटरव्यू कमेटी के चारों व्यक्तियों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। शमशेर सिंह सामने पड़ी खाली कुर्सी पर धंस गया और पसीना पोंछने के लिए जेब से रुमाल निकालने का प्रयत्न करने लगा। किन्तु बहुत देर टटोलने के बाद भी जब रुमाल नहीं मिला तो उसने टाई को इस काम के लिए इस्तेमाल कर लिया।

चेयरमैन ने अपनी बगल में बैठे व्यक्ति की ओर देखा और वह व्यक्ति बोला, ‘‘मैं भी यही सोच रहा था कि यह टाई तो हो नहीं सकती।’’

‘‘हां तो मिस्टर आपका नाम?’’ चेयरमैन ने शमशेर सिंह को संबोधित किया और शमशेर सिंह जो पसीना पोंछने में लीन था हड़बड़ा कर आगे की ओर झुका, ‘‘ज--जी, मेरा नाम दिलावर सिंह है।’’
‘‘और पिता का नाम?’’
‘‘जी--शमशेर सिंह।’’ कह कर शमशेर सिंह अपना सर खुजलाते हुए कुछ सोचने लगा। मानो उसने कुछ गलत कह दिया हो।

चेयरमैन ने अपने सामने रखी शमशेर सिंह की फाइल खोली और बोला, ‘‘लेकिन इसमें तो आपका नाम शमशेर सिंह और पिता का नाम दिलावर सिंह है।’’
‘‘वही तो मैंने भी बताया है।’’ विस्मय से शमशेर सिंह ने चेयरमैन का चेहरा देखा।

‘‘ठीक है, ठीक है।’’ चेयरमैन ने अपना गंजा सर खुजलाते हुए कहा, ‘‘क्या तुम इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो?’’
‘‘जी हां बिल्कुल।’’

‘‘हमें ऐसे आदमियों की तलाश है जो एडवेंचर को पसंद करते हों और खतरों से खेलने के आदी हों। कया तुम इसके लिए तैयार हो?’’ चेयरमैन ने पूछा।

‘‘एडवेंचर तो मुझे बहुत पसंद है। मैं एडवेंचर वाली कोई फिल्म नहीं छोड़ता।’’

‘‘फिल्मी एडवेंचर और वास्तविक जीवन के एडवेंचर में बहुत फर्क होता है। क्या तुम अपना कोई साहसपूर्ण कारनामा सुना सकते हो?’’ चेयरमैन की बगल में बैठे व्यक्ति ने पूछा। इस व्यक्ति ने लाल टाई लगा रखी थी।

‘‘एक बार मैंने पूरी रात एक जंगल में बिताई थी।’’ शमशेर सिंह ने बताया।
‘‘वह किस प्रकार?’’ उसी व्यक्ति ने उत्सुकता से पूछा।

‘‘एक बार मैं शिकारियों की टीम के साथ एक जंगल में शेर का शिकार करने गया। वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उस जंगल में केवल खरगोश रहते हैं। निराश होकर हमने केवल दो तीन खरगोशों का शिकार किया और वापस लौटने का इरादा किया। किन्तु वापसी के समय मेरे साथी मुझे साथ लेना भूल गये और मैं वहां अकेला रह गया।’’

Saturday, July 11, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 8

‘‘आखिर यह कंपनी करती क्या है?’’ मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ाये दुबले पतले युवक ने पूछा।
‘‘कमाल है। क्या तुमने पूरा ऐड नहीं पढ़ा था?’’ पहले ने उसे घूरा।
‘‘शायद पढ़ा होगा। मैं तो जहां भी अखबार में वैकेन्सी देखता हूं, फट से एप्लाई कर देता हूं। अब मुझे यह कहां याद रहेगा कि कौन सी कंपनी ने काल लेटर भेजा है।’’

‘‘मुझे पहले ही लग रहा था कि तुमने अच्छी तरह ऐड नहीं पढ़ा है। क्योंकि इस कंपनी को तगड़े और ऐडवेंचर के शौकीन लोगों की जरूरत है। और मेरा विचार है कि तुम शायद कालेज जाने के अलावा घर से बाहर ही नहीं निकले।’’

‘‘क्यों? निकला क्यों नहीं हूं। घर के लिए सब्जी खरीदने मैं ही तो निकलता हूं।’’ उंगली से अपना चश्मा सही करते हुए दुबला पतला युवक बोला। उसकी बात सुनकर अन्य उम्मीदवारों के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गयी।

थोड़ी देर बाद चपरासी वापस आया और इस बार उस दुबले पतले युवक को अंदर ले गया। पहला युवक वापस नहीं आया था। जिसका मतलब था कि इंटरव्यू के बाद वह बाहर ही से चला गया था।
दोबारा जब चपरासी तीसरे युवक को बुलाने आया तो उसके साथ वह दुबला पतला युवक भी था। जो अपने माथे के पसीने को रुमाल से साफ कर रहा था।

‘‘कैसा हुआ इंटरव्यू??’’ एक दूसरे उम्मीदवार ने पूछा।
‘‘कुछ मत पूछा। बुरी तरह झिला रहे हैं।’’ वह बोला और वापस जाने के लिए मुड़ गया।
उसकी बात सुनकर शमशेर सिंह के पेट में फिर उथल पुथल होने लगी। और उसका नर्वसपन कुछ और बढ़ गया।

दो तीन और लोगों के जाने के बाद इस बार चपरासी ने पुकारा, ‘‘समसेर सिंह जो शज्जन हों, खड़े हो जावैं।’’
‘‘ज---जी साहब। मैं हूं शमशेर सिंह।’’ हड़बड़ा कर शमशेर सिंह बोला।
चपरासी ने उसे एक बार ऊपर से नीचे तक घूरा फिर बोला, ‘‘जावो इंटरव्यू के लिए।’’

शमशेर सिंह उस कमरे की ओर बढ़ा जिसमें इंटरव्यू हो रहा था। इस समय उसका पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और टांगें लड़खड़ा रही थीं।

किसी प्रकार उसने इंटरव्यू रूम तक की दूरी तय की और दरवाजे तक पहुँच गया जिस पर पर्दा पड़ा हुआ था।
उसने पहले तो पर्दे पर आँखें गड़ाकर अंदर देखने की कोशिश की। किन्तु जब उसे इसमें सफलता नहीं मिली तो उसने डरते डरते उंगली से पर्दा थोड़ा सा हटाया और फिर तुरंत पीछे की ओर हट गया।

कुछ देर वहीं खड़े होकर उसने दो तीन गहरी सांसें लीं और एक बार फिर आगे बढ़ने के लिए उसने अपना सारा साहस एकत्र किया।
इस बार उसने पर्दा खिसकाते हुए एक कदम अंदर रखा और मिनमिनाती हुई आवाज में बोला, ‘‘सर! मे आई कम सकता हूं?’’

फिर उसने यह ध्यान नहीं दिया कि किसी ने उसे अंदर आने की आज्ञा दी या नहीं और वह लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ आया। इस समय वह पूरी तरह बौखलाया हुआ था। और जब उसे खाली कुर्सी दिखाई पड़ी तो वह तुरंत उसपर बैठ गया।

जब उसके सामने अंदर का दृश्य कुछ साफ हुआ तो उसने आश्चर्य से सामने देखा। जहां बजाय इंटरव्यू कमेटी के केवल एक मेज पर घोड़े का मूर्ति रखी थी।

Thursday, July 9, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 7

यह होटल का हॉल था और अच्छी संख्या में बैठे हुए लोग वहा गूंज रहे मधुर संगीत का आनन्द ले रहे थे। शमशेर सिंह के बैठने के थोड़ी देर बाद उधर एक वेटर आया और उसे सलाम किया।
‘‘नमस्कार भाई साहब।’’ शमशेर सिंह तुरंत खड़ा हो गया और उससे हाथ मिलाने लगा। जबकि वेटर भौंचक्का होकर उसकी शक्ल देखने लगा था।

शमशेर सिंह ने यही समझा था कि वह कोई पुरानी जान पहचान का व्यक्ति है, तभी तो उसने नमस्कार किया है। वह कहने लगा, ‘‘अच्छा हुआ आप यहां मिल गये। दरअसल मैं यहां इण्टरव्यू देने आया हूं। आप जरा ये बता दीजिए कि मुझे किधर जाना होगा।’’ उसने जेब से काल लेटर निकालकर वेटर को दिखाया।
वेटर ने लेटर देखकर कहा, ‘‘इसके लिए आपको पांचवें फ्लोर पर जाना होगा। यह रूम वहीं पर है। आप उधर से जा सकते हैं।’’ उसने लिफ्ट की ओर संकेत किया, और शमशेर सिंह उधर बढ़ गया।

फिर जब वह पांचवें फ्लोर पर स्थित इंटरव्यू रूम में पहुंचा तो उसकी सांस बुरी तरह फूल रही थी। उससे गलती यह हुई कि उसने लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों का प्रयोग कर लिया था।
अन्त में वह अपनी मंजिल पर पहुच गया। वहां उपस्थित इंटरव्यू के लिए आये अन्य व्यक्तियों ने उसे आश्चर्य से देखा। क्योंकि शमशेर सिंह का हुलिया किसी भी प्रकार से इंटरव्यू देने आये व्यक्ति का नहीं लग रहा था।

‘‘शमशेर सिंह को मिलाकर अब वहां कुल पांच व्यक्ति हो गये थे। वे सभी साक्षात्कार के लिए बुलावे की प्रतीक्षा कर रहे थे।
‘‘ऐ, एक गिलास पानी पिलाओ, बहुत देर से हलक सूख रहा है।’’ स्मार्ट दिखने वाले एक युवक ने शमशेर सिंह को संबोधित किया।

‘‘जरूर भाई साहब। लेकिन यहाँ पानी किधर मिलता है?’’
‘‘कमाल है। चपरासी होकर तुझे इतना भी नहीं पता कि पानी किधर मिलता है?’’ उस युवक ने अक्खड़ता से कहा।
‘‘चपरासी? लेकिन मैं तो इंटरव्यू देने आया हूं।’’ शमशेर सिंह ने विस्मय से कहा।
‘‘ऐं। आई एम सॉरी।’’ उस युवक ने इस प्रकार माफी मांगी मानो थप्पड़ मार रहा हो।

शमशेर सिंह वहां रखी एक खाली कुर्सी पर बैठ गया और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा।
फिर लगभग एक घण्टे के बाद, जब शमशेर सिंह की दृष्टि सामने रखे अखबार की सुर्खी ‘उद्योग मन्त्री पर एक विधायक ने चप्पल खींचकर मारी’ पर पच्चीसवीं बार पड़ी, उसी समय एक चपरासी अन्दर दाखिल हुआ।

‘‘सैलेस शिंह कौन साहब हैं??’’ मुंह ऊंचा करके उसने होंठों का प्याला बनाया। इस प्रकार उसने पान मसाले की पीक को बाहर गिरने से बचाया।
‘‘मैं हूं शैलेश सिंह।’’ एक युवक खड़ा होकर बोला।
‘‘जाईए, आपको इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है।’’

वह युवक टाई की नॉट सही करता हुआ चपरासी के साथ जाने लगा।
‘‘जब यहां के चपरासी का यह हाल है तो इंटरव्यू लेने वाले तो आसमान में उड़ रहे होंगे।’’ दूसरे युवक ने कमेंट किया।

Wednesday, July 8, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 6

‘‘यह रैलियां तो और मुसीबत किये रहती हैं।’’ शमशेर सिंह बड़बड़ाया। ‘‘ठीक है। फिर तुम मुझे कहीं पास में उतार देना।’’
थोड़ी देर बाद आटो उस जगह पहुंच गया जहां से होटल पास था। वह आटो से उतरा और पैदल चलने लगा। उसे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि अब भी आस पास से गुजरने वाले लोग उसे ध्यान से देख कर मुसकुरा रहे थे।’’

‘‘फिर एक सज्जन ने उसे रोक कर कहा, ‘‘क्यों भाई साहब, क्या आप आत्महत्या करने जा रहे हैं??’’
‘ऐसी तो कोई बात नहीं। मैं तो इंटरव्यू देने जा रहा हूं।’’ शमशेर सिंह हड़बड़ा कर बोला।
‘‘फिर आपने यह टाई फांसी के फंदे की तरह क्यों गले में लटका रखी है?’’ उन सज्जन ने कहा।
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘मतलब यह कि आपने टाई ठीक तरह से नहीं बाँधी है। इसके बाँधने का एक विशेष ढंग होता है।’’

‘‘ढंग वंग की ऐसी की तैसी। कृपया मेरा समय मत बर्बाद करें। मुझे एक जगह अर्जेंट पहुंचना है।’’ शमशेर सिंह बोला।
‘‘ठीक है। मेरा क्या जाता है।’’ वह सज्जन बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गये। और शमशेर सिंह भी अपने रास्ते पर बढ़ गया।

आखिरकार वह अपनी मंजिल अर्थात मिरेकिल होटल के सामने पहुंच गया। यह एक शानदार पांच सितारा होटल था।
होटल के गेट पर लाल पगड़ीधारी चौकीदार खड़ा हुआ था।

शमशेर सिंह जैसे ही अन्दर प्रवेश करने लगा, चौकीदार ने उसे रोक दिया, ‘‘ऐ भिखारी! अन्दर कहाँ जाता है।’’ उसने डपट कर कहा।
‘‘क्या! म--मैं तुम्हें भिखारी दिख रहा हूं।’’ शमशेर सिंह ने क्रोधित स्वर में कहने का प्रयास किया किन्तु होटल और होटल के चौकीदार के रोब के कारण उसके स्वर में कंपकपी आ गयी थी।
‘‘भिखारी नहीं तो क्या होटल के मालिक हो। चलो फूटो यहां से।’’ चौकीदार ने डंडा लहराया और शमशेर सिंह बिदक कर पीछे हट गया। फिर उसे कुछ ध्यान आया और उसने अपनी जेब से इंटरव्यू का काल लेटर निकाला।

‘‘देखो ये लेटर। इसमें मुझे यहां आमन्त्रित किया गया है।’’ उसने चौकीदार को लेटर दिखाया।
‘‘अच्छा अच्छा ठीक है। जाओ अन्दर।’’ उसने लेटर देखने के बाद शमशेर सिंह को अन्दर जाने की अनुमति दे दी।

शमशेर सिंह अन्दर प्रविष्ट हुआ और वहां का वातावरण देखकर बौखला गया। किसी पांच सितारा होटल में दाखिल होने का यह उसका पहला मौका था। वह भौंचक्का होकर अन्दर का वैभव देखने लगा। उसका मुंह पूरा खुला हुआ था और दृष्टि किसी ओर टिक नहीं पा रही थी। उसकी समझ में नहीं आया कि किस ओर से वह आगे बढ़े। अत: वह इधर उधर देखकर वहीं पड़ी एक सोफानुमा कुर्सी पर बैठ गया।

Monday, July 6, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 5

जैसे ही उसने पहला कदम दरवाजे के बाहर रखा, एक काली बिल्ली तेजी से दौड़ती हुई आयी, उसके सामने पल भर को ठिठकी और फिर उछल कर दूर निकल गयी। गली के कुछ आवारा कुत्ते उसका पीछा कर रहे थे।

‘‘अरे बाप रे! ये क्या हो गया। अब तो मेरा इंटरव्यू जरूर गड़बड़ होगा।’
शमशेर सिंह के स्वर में घबराहट थी। वह वापस घर के अंदर पलट आया और घड़े से एक गिलास पानी निकालकर पीने लगा। पानी पीने के बाद उसकी घबराहट में कुछ कमी हुई और वह फिर से कमर कसकर तैयार हो गया।

सड़क पर आकर उसने आटो के लिए इधर उधर दृष्टि दौड़ाई। कुछ आटो उसकी ओर आते दिखाई दिये।
पहला आटो जब पास आया तो उसने हाथ देकर रुकने का संकेत किया। किन्तु वह पास से गुजरता चला गया। ठसाठस भरे होने के कारण उसमें शमशेर सिंह के भारी भरकम शरीर के समाने की कोई जगह न थी।

शमशेर सिंह ने बुरा सा मुंह बनाया और अगले आटो को रुकने का संकेत देने लगा। किन्तु सरदार जी भी शायद उससे खार खाकर ड्राइविंग करने बैठे थे। अत: उनकी टेम्पो भी शमशेर सिंह के पास से गुजरती चली गयी।

झुृझलाहट में एक थप्पड़ शमशेर सिंह ने अपने गाल पर मारा और तीसरे आटो की प्रतीक्षा करने लगा। जो दूर से आती हुई किसी महाराजा की सवारी लग रही थी। शमशेर सिंह ने उसे हाथ दिया और उसकी गति धीमी होने लगी। क्योंकि उसमें एक सवारी की जगह खाली थी।

जैसे ही वह पास आया शमशेर सिंह तेजी से उसकी ओर बढ़ा। किन्तु एक साहब उससे भी अधिक फुर्तीले सिद्ध हुए और सीट घेरकर इस प्रकार उसकी ओर देखने लगे मानो उन्होंने अमेरिका पर विजय प्राप्त कर ली हो। आटो उन्हें लेकर आगे बढ़ गया।

‘‘हे भगवान, मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं धीरज रख सकूं।’’ शमशेर सिंह ने मुंह आकाश की ओर करके विनती की। उसी समय एक आटो उसके पास आकर रुकी। वह भी शमशेर सिंह की तरह जरूरतमन्द थी। क्योंकि उसमें अच्छी खासी जगह खाली थी।
शमशेर सिंह ने आव देखा न ताव और झट से अंदर घुस गया। उसके बैठते ही आटो चल दिया।

कुछ क्षणों तक शमशेर सिंह ठण्डी साँसें लेकर अपना होश ठिकाने लगाता रहा फिर आँखें खोलकर जब उसने आसपास के लोगों को देखा तो सब उसे घूर घूरकर और मुस्कुराकर देख रहे थे। वह चकराकर कनखियों से अपना निरीक्ष्ण करने लगा। किन्तु उसे कोई ऐसी कमी अपने में न दिखाई पड़ी जो लोगों के उपहास का कारण बन सकती। वह निश्चिंत होकर स्वयं भी लोगों को देख देखकर मुस्कुराने लगा।

कुछ देर बाद उसने ड्राईवर को संबोधित किया, ‘‘मिरेकिल होटल के सामने आटो रोक देना।’’
‘‘यह आटो उधर से नहीं जायेगा।’’ आटो वाले ने इत्मिनान से उत्तर दिया और शमशेर सिंह उछल पछ़ा।
‘‘क--क्यों? लेकिन रूट तो वही है।’’
‘‘हा? रूट तो वही है। लेकिन आज उधर दलित पार्टी की रैली होने के कारण रास्ता बन्द है। इसलिए आटो थोड़ा घूमकर जायेगा।’’