Welcome in the world of Hindi Science Fiction. In this blog you will see the science fiction Stories/Novels of Zeashan Zaidi. In addition you will also read the latest discussions/news related to Indian (Hindi) science fiction.

Monday, November 23, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 62

ये वही जंगली थे जो प्रोफेसर और रामसिंह के साथ मुर्गिया पकड़ने निकले थे।
‘‘य--ये कौन हैं?’’ शमशेर सिंह ने घबरा कर पूछा।

‘‘ये हमारे भक्त हैं। हम इनके देवता हैं।’’ प्रोफेसर ने अकड़ कर कहा फिर जंगलियों से संबोधित हुआ, ‘‘क्या बात है?’’
‘‘हम लोग अब तक बीस मुर्गियां पकड़ चुके हैं। और अब वापस हो रहे हैं।’’ एक ने कहा।
‘‘ठीक है चलो।’’ प्रोफेसर ने खड़े होते हुए कहा। उसके साथ रामसिंह और शमशेर सिंह भी खड़े हो गये।

‘‘आपने कितनी मुर्गियां पकड़ीं देवताओं?’’ एक जंगली ने चलते हुए पूछा।
‘‘हमने तुम लोगों के लिए एक देवता और पकड़ लिया।’’ प्रोफेसर ने जवाब दिया।
‘‘इसका फैसला हमारे सरदार करेंगे कि ये हमारे तीसरे देवता हैं या नहीं।’’ जंगली ने शमशेर सिंह की ओर संकेत करके कहा।
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‘‘देवता पुत्रों, हमें अफसोस है कि आप एक भी मुर्गी नहीं पकड़ सके।’’ सरदार ने दोनों की ओर देखा।
‘‘हमने इसका कारण बता दिया है।’’ प्रोफेसर ने शमशेर सिंह की ओर देखकर कहा।

‘‘जब हमारे देवता हमारे पूरे खेत की गोभियाँ पल भर में चट कर जाते थे तो हम अपने पड़ोसी कबीले को यह बात गर्व से बताया करते थे। लेकिन आज हम उन्हें शर्म से यह बताएंगे कि उसी देवता के पुत्र इतने नालायक निकले कि एक मुर्गे ने उन्हें मात दे दी।’’ सरदार ने अपना सर पकड़ कर कहा।
‘‘किन्तु पड़ोसी कबीले को यह बताने की आवश्यकता क्या है?’’ रामसिंह बोला।

‘‘आवश्यकता है। हमारा पड़ोसी कबीले से अनुबंध हुआ है कि हम लोग एक दूसरे को अपनी बातें बतायेंगे।’’
‘‘आप उनसे झूठ बोल दीजिए कि हमने भी मुर्गियां पकड़ी हैं।’’

‘‘देवता होकर आप हमें झूठ बोलने की सीख दे रहे हैं। लेकिन हम ऐसा कदापि नहीं करेंगे।’’ सरदार ने घूरकर रामसिंह की ओर देखा और वह सकपका कर चुप हो गया। सरदार फिर बोला,
‘‘अब हमने चूंकि नये आगंतुक को भी देवता पुत्र मान लिया है अत: अब तीनों से मेरी प्रार्थना है कि वे पकड़ी गयी मुर्गियों की देखभाल करें और उन्हें अधिक से अधिक अण्डे देने पर विवश करें।’’

‘‘यह काम मैं कर लूंगा।’’ प्रोफेसर बोला, ‘‘मैं आज ही से रिसर्च आरम्भ कर दूंगा कि किस प्रकार मुर्गियों से अधिक से अधिक अण्डे दिलवाये जायें।’’
‘‘अब हमें परिणाम की प्रतीक्षा है।’’ सरदार उठते हुए बोला।
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Sunday, November 22, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 61

‘‘मैं आज ही से इसके ऊपर प्रयोग करना शुरू कर दूंगा।’’ प्रोफेसर ने दिलासा दिया।
‘‘यह तुम इन लोगों से क्या बकवास कर रहे हो। ये लोग कौन हैं?’’ मोगीचना ने शमशेर सिंह को संबोधित करके क्रोधित स्वर में कहा।

‘‘ये लोग बहुत ऊंची हस्ती हैं। और इत्तेफाक से मेरे मित्र हैं। कुछ दिन पहले बिछड़ गये थे। आज फिर मिल गये।’’ शमशेर सिंह ने बताया।
‘‘तो फिर इन्हें मेरे कबीले में ले चलो। सरदार इनसे मिलकर अवश्य प्रसन्न होगा।’’
मोगीचना की बात सुनकर प्रोफेसर और रामसिंह ने उसके साथ जाने का इरादा किया किन्तु शमशेर सिंह ने तुरन्त उन्हें रोक दिया।

‘‘सरदार अवश्य खुश होगा। इसलिए क्योंकि उसे तुम्हारे रूप में मानव भोजन मिल जायेगा। प्रोफेसर, रामसिंह, तुम लोग भूल कर भी इसके कबीले मत जाना। इसका कबीला आदमखोर है।’’ उसकी बात सुनकर उनके कदम वहीं रुक गये। शमशेर सिंह ने यह बात अपनी भाषा में कही थी अत: मोगीचना उसे नहीं समझ सकी।

शमशेर सिंह ने उसे संबोधित किया, ‘‘तुम बस्ती में वापस जाओ, हम लोग थोड़ी देर में आयेंगे।’’
‘‘किन्तु हमारे प्रेम का क्या होगा?’’

‘‘वह कहीं नहीं भागेगा। वापस आकर कर दूंगा। अभी मैं अपने दोस्तों के साथ कुछ काम करना चाहता हूं।’’ शमशेर सिंह ने उसे धकेलते हुए कहा और वह जबरन वापस हो गयी। जब वह दूर निकल गयी तो शमशेर सिंह बोला, ‘‘अब जल्दी से यहां से भागो वरना अगर वह पलट गयी तो फिर जान बचाना मुश्किल हो जायेगा।’’ फिर वे लोग वहां से तुरन्त चल पड़े।

जब वे लोग उस स्थान से काफी दूर निकल आये तो शमशेर सिंह हाँफते हुए बोला, ‘‘अब जाकर कुछ चैन मिला वरना मैं तो आत्महत्या करने की सोच रहा था।’’
‘‘तुम्हें अब चैन मिला है और हमारा चैन अब प्रस्थान कर गया है।’’ रामसिंह बोला।
‘‘अरे हाँ। तुमने तो अपने बारे में बताया ही नहीं कि कहां गायब हो गये थे।’’ शमशेर सिंह ने चौंक कर कहा।

‘‘बड़ी लम्बी कहानी है। चलो कहीं आराम से बैठते हैं फिर बताऊंगा।’’ रामसिंह बोला और वे लोग वहीं पत्थरों पर बैठ गये।
‘‘हां। अब बताओ।’’ शमशेर सिंह बोला।
रामसिंह ने कहानी बतानी आरम्भ की। बीच बीच में उसे रोककर प्रोफेसर भी बोलता जा रहा था। अन्त में रामसिंह बोला, ‘‘इस प्रकार अभी तक हम लोग आराम कर रहे थे। लेकिन अब हमें काम सौंप दिया गया है। मुर्गियां पकड़ने का।’’
‘‘तो अब तक कितनी मुर्गियां पकड़ चुके हो?’’

‘‘एक भी नहीं। एक मुर्गा पकड़ने का प्रयत्न किया था, लेकिन वह भी धोखा देकर भाग गया। उसके बाद तुम मिल गये।’’
‘‘अब तुम अपनी कहानी सुनाओ।’’ प्रोफेसर ने कहा।

इससे पहले कि शमशेर सिंह अपनी कहानी आरम्भ करता पाँच छह जंगली पीछे से निकलकर उनके सामने आ गये।

Friday, November 20, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 60

तभी दूर से एक आवाज आयी, ‘‘बचाओ।’’
रामसिंह ने चौंक कर प्रोफेसर की ओर देखा, ‘‘प्रोफेसर, क्या तुमने भी वह आवाज सुनी?’’
‘‘हां। यह तो किसी व्यक्ति की आवाज है।’’

आवाज एक बार फिर आयी।
‘‘यह तो शमशेर सिंह की आवाज है।’’ रामसिंह उछल कर खड़ा हो गया।

‘‘लगता है वह किसी मुसीबत में है। हमें तुरंत जाना चाहिए।’’ दोनों उस ओर चल पड़े जिधर से शमशेर सिंह की आवाज आयी थी।
अब तक बचाओ बचाओ की तीन चार आवाजें आ चुकी थीं।
जल्दी ही आवाज का पीछा करते हुए वे पेड़ों के एक झुरमुट के पास पहुंच गये। फिर उन दोनों ने जो दृश्य देखा वह उन्हें हैरान करने के लिए काफी था।

शमशेर सिंह बचाव बचाव चीखता हुआ भाग रहा था और एक मोटी तगड़ी औरत उसका पीछा कर रही थी।
‘‘शमशेर सिंह!’’ प्रोफेसर चिल्लाया। उसकी आवज सुनकर शमशेर सिंह ने मुड़कर देखा और फिर तीर की तरह उसकी ओर आया। प्रोफेसर ने अपनी बाहें फैला दीं और शमशेर सिंह आकर उससे लिपट गया।

‘‘प्रोफेसर मुझे इस औरत से बचाओ। तुम्हारे अलावा और कोई ये काम नहीं कर सकता।’’
वह औरत दूर खड़ी कमर पर हाथ रखे शमशेर सिंह को घूर रही थी।

‘‘किन्तु वह है कौन?’’ रामसिंह ने पूछा।
‘‘झींगा बेलू कबीले के सरदार की बेटी है। मेरे पीछे पड़ गयी है।’’
‘‘लेकिन तुम बचाव बचाव क्यों चिल्ला रहे थे?’’ प्रोफेसर ने पूछा।
‘‘उसी के कारण। वह जबरदस्ती मुझसे प्रेम करना चाहती है। और इसीलिए दो घंटे से मुझे दौड़ा रही है।’’

‘‘ओह मैं समझा। लेकिन इसमें घबराने की क्या बात है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि एक औरत ने तुम्हें लिफ्ट दे दी। वरना महिला कालेजों के सामने तो तुम हमेशा पिट कर आये हो।’’ रामसिंह बोला।

‘‘तुम्हें नहीं मालूम कि इससे प्रेम करने के लिए मुझे क्या क्या करना पड़ेगा। मुझे इसके बालों मे सजाने के लिए रोजाना छिपकलियां ढूंढनी पड़ेगी। और हर रोज चूहे की कलेजी खानी पड़ेगी।’’
‘‘ओह फिर तो मामला गंभीर है। मुझे इसका हल सोचना पड़ेगा।’’ प्रोफेसर ने अपना सर खुजलाते हुए कहा।

‘‘तुम कोई ऐसी दवा तैयार करो, जिसे पीने के बाद इसके सर से प्रेम का भूत उतर जाये।’’ शमशेर सिंह ने प्रार्थना की।

Thursday, November 19, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 59

‘‘तुम ऐसा करो प्रोफेसर कि मुर्गे पकड़ने पर एक रिसर्च कर डालो।’’ रामसिंह ने सुझाव दिया।
‘‘रिसर्च तो बाद में होती रहेगी। पहले हमें कुछ मुर्गे हर हाल में पकड़ना हैं। वरना जंगलियों के सामने हमारी इंसल्ट हो जायेगी कि देवता होकर हम एक भी मुर्गा नहीं पकड़ पाये।’’

मुर्गा अभी भी दूर खड़ा हुआ टुकुर टुकुर उनकी ओर देख रहा था।
‘‘तो फिर किसी दूसरे मुर्गे पर कोशिश करते हैं। यह तो बहुत चालाक है।’’ रामसिंह ने कहा।
‘‘मैं तो अब इसी को पकड़ कर रहूंगा। मुझे भी जिद हो गयी है।’’ प्रोफेसर ने कहा और मुर्गे की ओर बढ़ा। फिर कुछ सोच कर रुक गया।

‘‘मैं तुम्हें अब तरकीब से पकड़ूंगा।’’ वह मुर्गे की ओर देखकर बड़बड़ाया फिर रामसिंह से संबोधित हुआ, ‘‘रामसिंह तुम अपनी शर्ट उतारो।’’
‘‘क ---क्यों?’’ रामसिंह ने घबरा कर पूछा।
‘‘मैं उधर झाड़ियों में जाकर मुर्र्गी की आवाज निकालता हूं। मेरी आवाज सुनकर मुर्गा उधर आकर्षित होगा। जैसे ही वह झाड़ियों में घुसे, तुम अपनी शर्ट उसपर डालकर पकड़ लेना।’’
‘‘ठीक है।’’ रामसिंह अपनी शर्ट उतारने लगा जबकि प्रोफेसर पास की एक झाड़ी में घुस गया।

थोड़ी देर बाद झाड़ियों से आवाज आयी, ‘‘पक ---पक---पक---पोकाक --पक --पक।’’ यह प्रोफेसर था जो अपने मुंह से आवाजें निकाल रहा था।
मुर्गे ने भी अपने कान खड़े करके ये आवाजें सुनीं किन्तु फिर वह उस झाड़ी में घुसने की बजाय दूसरी झाड़ी में घुस गया।
‘‘यह तो दूसरी झाड़ी में घुस गया कमबख्त। अब मैं क्या करूं।’’ रामसिंह बड़बड़ाया। फिर वह अपनी शर्ट लेकर आगे बढ़ा और उस झाड़ी के पास पहुंच कर इस ताक में लग गया कि कब मुर्गा बाहर निकले और कब वह उसपर हमला कर दे।

तभी उसे एक स्थान पर झाड़ी हिलती दिखाई दी। उसने आव देखा न ताव और झट से अपनी शर्ट उसपर डाल दी। दूसरे ही पल वह दोनों हाथों से अपनी शर्ट दबाये हुए चीख रहा था, ‘‘पकड़ लिया, मैंने पकड़ लिया।’’
‘‘क्या मुर्गा पकड़ा गया?’’ प्रोफेसर जल्दी से झाड़ियों से निकलकर बाहर आया।

‘‘हां । मैंने उसे दबा रखा है।’’
‘‘तो फिर जल्दी से उसे रस्सियों से बाँध दो वरना वह फिर भाग जायेगा।’’
रामसिंह ने मुर्गे को पूरी तरह ढंके हुए अपनी शर्ट झाड़ी से बाहर निकाली जबकि प्रोफेसर अपनी जेब से पतली लताओं से बनी डोर निकालने लगा।
‘‘अब तुम मुर्गे पर से अपनी शर्ट थोड़ी सी हटा दो ताकि मैं उसे बाँध सकूं।’’ प्रोफेसर ने कहा और रामसिंह धीरे धीरे अपनी शर्ट उठाने लगा।

जैसे ही उसने शर्ट थोड़ी सी हटाई, नीचे से एक गिलहरी फुदकती हुई भाग निकली।
‘‘हाँय। मुर्गा गिलहरी में कैसे परिवर्तित हो गया।’’ प्रोफेसर ने अचरज से कहा।

तभी उन्हें पीछे से मुर्गे के बाँग देने की आवाज आयी। दोनों ने मुड़कर देखा तो मुर्गा दूर खड़ा उनकी ओर देखकर बाँग दे रहा था। दोनों सर पकड़कर वहीं बैठ गये।

Wednesday, November 18, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 58

मुर्गियों की तलाश आरम्भ हो गयी थी।
जंगलियों ने आपस में कई ग्रुप बना लिये थे। हर ग्रुप अलग अलग स्थानों पर मुर्गियों की खोज कर रहा था। इन्हीं में से एक ग्रुप में प्रोफेसर और रामसिंह थे।

‘‘प्रोफेसर, वह रही एक मुर्गी।’’ रामसिंह ने एक ओर संकेत किया।
प्रोफेसर ने गौर से उधर देखा फिर बोला, ‘‘वह मुर्गी नहीं बल्कि मुर्गा है।’’
‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो?’’

‘‘इसलिए क्योंकि उसकी पूंछ ऊपर की ओर उठी है। जबकि मुर्गियों की पूंछ नीचे की ओर झुकी होती है।’’
‘‘हो सकता है उसने अपनी मर्जी से पूंछ ऊपर उठा ली हो।’’
‘‘वह मुर्गियों की मर्जी है, तुम्हार मर्जी नहीं कि जब जी चाहा उसे बदल दिया।’’

‘‘अगर वह मुर्गा है तो उसकी कलगी कहां है?’’ रामसिह ने दलील दी।
‘‘मेरा विचार है कि वह बिना कलगी का मुर्गा है।’’

‘‘लेकिन उसे पकड़ने में क्या हर्ज है? जंगलियों का पोलेट्री फार्म बनाने के लिए मुर्गा और मुर्गी दोनों की आवश्यकता पड़ेगी।’’
‘‘ठीक है। चलो उसे पकड़ते हैं। लेकिन वह गया कहां?’’ प्रोफेसर ने उस स्थान की ओर देखा जहां अब मुर्गा नदारद था।
‘‘हम लोगों की बहस में वह निकल गया।’’ रामसिंह ने मायूस होकर कहा।
‘‘मेरा विचार है कि वह यहीं कहीं होगा। चलो उसे तलाश करते हैं।’’

दोनों आगे बढ़े। झाड़ियां फलांगने के बाद मुर्गा फिर से दिख गया।
‘‘ऐसा करते हैं कि मैं इधर से जाता हूं और तुम घूम कर दूसरी ओर से उसे घेरो। जब वह दो ओर से घिर जायेगा तो भाग नहीं पायेगा और आसानी से हमारी पकड़ मे आ जायेगा।

‘‘ठीक है ऐसा ही करते हैं।’’ रामसिंह घूम कर दूसरी ओर जाने लगा जबकि प्रोफेसर धीरे धीरे आगे की ओर बढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद दोनों उसके पास पहुंच गये। मुर्गे ने अभी तक भागने का प्रयत्न नहीं किया था बल्कि गौर से प्रोफेसर की ओर देख रहा था।
फिर रामसिंह और प्रोफेसर ने एक साथ मुर्गे की ओर अपने हाथ बढ़ाये। किन्तु इससे पहले कि वे मुर्गे को पकड़ पाते वह कूदकर बगल से निकल गया।

‘‘यह तो मैंने सोचा ही नहीं था कि वह बगल से भी निकल सकता है।’’ प्रोफेसर ने कहा फिर वह मुर्गे की ओर दौड़ा। अब पोजीशन यह थी कि मुर्गा आगे आगे दौड़ रहा था, प्रोफेसर पीछे पीछे तथा रामसिंह प्रोफेसर के पीछे था।

मुर्गा अपने मोटापे के कारण अधिक तेज नहीं दौड़ पा रहा था अत: प्रोफेसर और उसके बीच फासला कम होने लगा।
‘‘बस एक छलांग और फिर तुम मेरे हाथ में होगे।’’ प्रोफेसर बोला और मुर्गे के ऊपर छलांग लगा दीं किन्तु मुर्गा प्रोफेसर का इरादा भांपकर पहले ही किनारे हो चुका था। अत: अगले ही पल प्रोफेसर मुंह के बल जमीन पर था। उसके ठीक पीछे रामसिंह था, वह भी अपनी झोंक में प्रोफेसर के ऊपर पसर गया।

थोड़ी देर बाद जब प्रोफेसर की आँखों के सामने तारे नाचना बन्द हुए तो उसने कराहते हुए रामसिंह को परे किया और उठकर अपना जबड़ा सहलाने लगा।
‘‘मुझे नहीं मालूम था कि मुर्गे पकड़ना इतना मुश्किल काम है।’’ वह बोला।

Monday, November 16, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 57

‘‘तुमने मेरा दर्पण तोड़ दिया।’’ शमशेर सिंह ने बिसूर कर कहा।
‘‘तो इसे फिर से जोड़ लो।’’

‘‘यह नामुमकिन है। दिल टूट कर फिर जुड़ सकता है लेकिन शीशा कभी नहीं जुड़ता।’’ शमशेर सिंह ने परेशानी बताई।
‘‘और यह क्या है?’’ इस बार मोगीचना ने झपट कर वह पिस्तौल उठा ली जो कंपनी ने शमशेर सिंह को अपनी रक्षा के लिए दी थी।

‘‘अरे इसको फौरन रखो यह बहुत खतरनाक वस्तु है।’’ शमशेर सिंह ने चीख कर कहा। उसकी चीख पर घबराहट में मोगीचना के हाथ से पिस्तौल दब गया। एक धमाका हुआ और दोनों भूमि पर लुढ़क गये। मोगीचना के हाथ से पिस्तौल छिटक कर दूर चला गया था।

‘‘यह भयंकर आवाज कैसी थी?’’ थोड़ा होश आने पर वह भयभीत स्वर में बोली।
‘‘यह आवाज नर्क से आयी थी। तुम्हर नानी बोली थी।’’ क्रोधित स्वर में शमशेरसिंह बोला। धमाके के कारण अभी तक उसका दिल कंपकपा रहा था।

‘‘लेकिन आवाज तो उसमें से आयी थी।’’ मोगीचना ने पिस्तौल की ओर संकेत किया।
‘‘उसे रेडियो कहा जाता है। वह नर्क से सबकी आवाज कैच करके हमारे पास पहुंचाता है।’’

‘‘लाओ मैं फिर से अपनी नानी की आवाज सुनती हूँ ।’’ मोगीचना दोबारा पिस्तौल की ओर बढ़ी किन्तु उससे पहले ही शमशेरसिंह ने झपट कर पिस्तौल अपने अधिकार में कर ली थी।
‘‘अगर इस बार तुमने आवाज सुनने की कोशिश की तो आवाज के साथ साथ नर्क के दूत भी आ जायेगे और तुम्हें सशरीर अपने साथ उठा ले जायेंगे।’’ शमशेर सिंह बोला और मोगीचना के बढ़े हाथ वापस हो गये।

‘‘अब ये बातें छोड़ो और मुझसे प्रेमभरी बातें करो।’’ मोगीचना पूरी तरह प्रेम के मूड में आ गयी थी।
‘‘लेकिन कैसे? मुझे ऐसी बातों का कोई तजुर्बा नहीं है। एक दो बार गर्ल्स कालेज के सामने प्रयत्न किया था किन्तु उस समय पब्लिक ने पीट पीटकर हलुवा बना दिया था।’’ शमशेर सिंह ने विवशता से कहा।

‘‘मुझसे कोई बहाना नहीं चलेगा। तुम्हें मुझसे ऐसी बातें करनी पड़ेंगी।’’ मोगीचना ने क्रोधित स्वर में कहा और शमशेर सिंह को घूरने लगी।
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Sunday, November 15, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 56

शमशेर सिंह सोचने लगा कि उसके हाथ में कौन सी वस्तु थी। फिर उसे याद आ गया, ‘‘वह मेरा सूटकेस था। अब कहां है वह?’’
‘‘वह एक अलग स्थान पर रखा है। सरदार का विचार था कि वह कोई हथियार है। अत: उसे सावधानीपूर्वक अलग रख दिया गया।’’

‘‘वह कोई हथियार नहीं बल्कि सामान रखने का बक्सा है। अगर तुम उसे ला सको तो मैं उसमें से अद्भुत वस्तुएं निकालकर तुम्हें दिखाऊंगा ।’’ शमशेर सिंह ने बताया।
‘‘ठीक है। मैं अभी लाती हूं।’’ अद्भुत वस्तुएं देखने की उत्सुकता में मोगीचना तुरन्त खड़ी हो गयी और फिर सूटकेस लाने के लिए चली गयी।

कुछ ही देर बाद वह सूटकेस लेकर वहां उपस्थित थी।
शमशेर सिंह ने सूटकेस खोला और मोगीचना की आखें आचर्य से फैल गयीं। क्यांकि अन्दर जो भी सामान रखा था उसे उसने पहली बार देखा था।

सबसे पहले शमशेर सिंह ने कंघा निकालकर अपने सर पर फेरना आरम्भ कर दिया।
‘‘यह क्या है?’’ मोगीचना ने कंघे की ओर संकेत किया।
‘‘यह बाल संवारने का यन्त्र है।’’
कंघा करने के बाद शमशेर सिंह ने सूटकेस में से दर्पण निकाला और उसमें अपना चेहरा देखने लगा।

‘‘यह क्या है?’’ एक बार फिर मोगीचना ने पूछा।
शमशेर सिंह ने दर्पण का मुख उसकी ओर कर दिया।

‘‘इसमें तो कोई औरत बन्द है।’’ मोगीचना ने चीख कर कहा।
‘‘बेवकूफ। ये औरत नहीं बल्कि तुम्हारी शक्ल है। जो इसमें दिखाई पड़ रही है।’’ शमशेर सिंह ने समझाया।

‘‘मैं समझ गयी। इसमें पानी जमा दिया गया है। क्योंकि जिस प्रकार तालाब के पानी में हमें अपनी शक्ल दिखाई देती है। उसी प्रकार इसमें भी दिख रही है।’’

शमशेर सिंह अपने मन में सोचने लगा कि दर्पण किस प्रकार बनाया जाता है किन्तु जब नहीं सोच सका तो बड़बड़ाया, ‘‘पता नहीं। ये तो केवल प्रोफेसर ही बता सकता है।’’

‘‘क्या तुमने कुछ कहा?’’ मोगीचना शमशेर सिंह की बड़बड़ाहट नहीं सुन सकी थी।
‘‘कुछ नहीं। मैं यह देख रहाथा कि जंगल में रहकर रहकर मैं एकदम काला हो गया हूं। तुम लोगों की तरह।’’

‘‘तुम यह दर्पण मुझे दे दो। मैं इसे अन्य कबीलेवासियों को दिखाउंगी ।’’
‘‘हरगिज नहीं। मैंने इसे पूरे पन्द्रह रुपये में खरीदा है’’ शमशेर सिंह ने दर्पण वाला हाथ पीछे कर लिया।
‘‘मेरे कबीले के युवक तो अपनी प्रेमिकाओं को हर वस्तु उपहार में दे देते हैं। और तुम मांगने पर भी नहीं दे रहे हो।’’ उसने शिकायत की।

‘‘वह सब बातें अपनी जगह पर। किन्तु मैं दर्पण नहीं दे सकता।’’
‘‘देखती हूं कैसे नहीं देते हो।’’ फिर दोनों में छीना झपटी होने लगी। मोगीचना की कोशिश थी दर्पण उसके हाथ में आ जाये जबकि शमशेर सिंह उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। इस चक्कर में दर्पण दोनों के हाथ से अलग हो गया। अगले ही पल एक छनाका हुआ और दर्पण चूर चूर हो चुका था।
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