Monday, December 18, 2017

यू आई डी - भाग 3 (अन्तिम भाग)

थोड़ी ही देर बाद प्रोफेसर ने अपने को एक अलग अनोखी दुनिया में पाया। ऐसी अनोखी दुनिया उसने सपने में भी कभी नहीं देखी थी। उसके आसपास हर तरफ रंग बिरंगी तरह तरह की धारियाँ लहरा रही थीं। उन धारियों का न तो कोई शुरूआती सिरा दिख रहा था न ही कोई अंतिम छोर।

जब फिज़ा में लहराती वे धारियां प्रोफेसर के और क़रीब आयीं तो प्रोफेसर ने उनमें कुछ और खास बात देखी।
दरअसल फिज़ा में लहराती वे धारियां अनगिनत नंबरों का पैटर्न थीं जो एक दूसरे से जुड़े हुए अंतहीन चेन बना रहे थे। और यही चेन दूर से देखने पर रंग बिरंगी धारियों जैसी दिख रही थी।

प्रोफेसर के साथ तैरती हुई दोनों लहराती हुई ज्वालाएं एक धारी के पास पहुंचीं और उसके चारों तरफ इस तरह मंडराने लगीं जैसे उसका अध्ययन कर रही हों। उस धारी की चमक बाकियों से बढ़ गयी थी।
फिर लहराती हुई ज्वाला यानि हब्बल यूनिवर्स के सम्राट ने उस धारी पर कोई कार्रवाई की जिसके नतीजे में वह धारी अपनी जगह छोड़कर प्रोफेसर के गिर्द मँडराने लगी।

‘‘मेरा शक सही निकला। गड़बड़ यूआईडी नंबर में ही हुई है। उस बच्चे का यूआईडी नंबर बदला हुआ है। और इस व्यक्ति के शरीर व पृथ्वी के किसी प्राणी के शरीर की इन्फार्मेशन से मैच नहीं कर रहा है।’’
‘‘ओह! लेकिन ये अपराध किया किसने?’’ 

‘‘वह जो भी है, इस यूआईडी नंबर में गड़बड़ करते समय अपने व्यक्तित्व का सुबूत छोड़ गया है। क्योंकि उसे हमारे ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम की पूरी जानकारी नहीं थी। वह हमारे सृजनकर्ताओं में से एक है। और अब हम उसे ऐसी सज़ा देंगे जो लोगों के लिये एक सबक होगी।’’
----- 

सम्राट के सामने उस सृजनकर्ता का लौ रूपी शरीर इस तरह लहरा रहा था मानो डर के कारण पूरे जिस्म में कंपकंपी तारी है। 

‘‘स...सम्राट। मैं बेकुसूर हूं। मैंने कोई जुर्म नहीं किया है।’’ वह कंपकंपी भरी आवाज़ में कह रहा था।

‘‘बेवकूफ सृजनकर्ता। तुम्हें ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम के बारे में कुछ नहीं पता। वह न केवल हब्बल यूनिवर्स के समस्त प्राणियों का रिकार्ड रखता है बल्कि अपने अन्दर होने वाली तमाम गतिविधियों का भी रिकार्ड रखता है। लेकिन उस रिकार्ड को केवल हम ही देख सकते हैं। उस रिकार्ड से साफ ज़ाहिर है कि तुमने उस बच्चे के यूआईडी नंबर में बदलाव किया था। अब तुम ये बताओ कि ऐसा तुमने क्यों किया?’’ 

‘‘म..मुझे माफ कर दीजिए सम्राट। ये सब मैंने गैम्बल यूनिवर्स के सम्राट के कहने पर किया था। क्योंकि उसने मुझे अपना वज़ीर बनाने का वादा किया है।’’ 
‘‘अच्छा वो मेरा प्रतिद्वंदी। जब मैंने हब्बल यूनिवर्स को एक बिग बैंग द्वारा जन्म दिया था उसी समय उसने गैम्बल यूनिवर्स को बिग क्रंच द्वारा जन्म दिया था। वह हमेशा मुझे नुकसान पहुंचाने की सोचता रहता है। लेकिन एक बच्चे के यूआईडी नंबर में बदलाव करके वह क्या नुकसान पहुंचायेगा।’’ 

‘‘सम्राट, व..वह कह रहा था कि शुरूआत के छोटे बदलाव बाद में बहुत बड़ी घटनाओं को जन्म दे देते हैं। हो सकता है कि हब्बल यूनिवर्स पूरे का पूरा नष्ट हो जाये। और उसके बाद जो स्पेस-टाइम फ्री होगा उसमें वह अपने गैम्बल यूनिवर्स का विस्तार कर लेगा।’’   
      
‘‘उसका कहना कुछ हद तक सही है। मैं देख रहा हूं कि तुम्हारी इस करतूत के नतीजे में हब्बल यूनिवर्स में एक ब्लैक होल पैदा हो गया है जो अपने आसपास के मैटर को तेज़ी के साथ अपने अन्दर खींच रहा है। लेकिन मेरे पास इस समस्या का एक हल है।’’ 
‘‘वह क्या?’’ सम्राट उसके वज़ीर ने पूछा।

‘‘हल ये है कि इस मुजरिम को उस ब्लैक होल में डाल दिया जाये। फिर वह ब्लैक होल हब्बल यूनिवर्स के लिये निष्प्रभावी हो जायेगा।’’
सुनते ही उस सृजनकर्ता के लौ रूपी शरीर की थरथराहट और बढ़ गयी। क्योंकि उसे मालूम था कि किसी ब्लैक होल से बाहर निकलना असंभव होता है। 

‘‘म..मुझे माफ कर दीजिए सम्राट। आइंदा ऐसी गलती कभी नहीं होगी।’’ 
‘‘सॉरी। हब्बल यूनिवर्स को बचाने के लिये तुम्हें ब्लैक होल में फेंकना ज़रूरी है। मैं तुम्हारे साथ कोई ज़ुल्म नहीं कर रहा हूं बल्कि तुमने खुद अपने साथ ज़ुल्म किया है। जाओ।’’ 

वहाँ मौजूद प्रोफेसर ने देखा कि एक तेज़ चीख के साथ उस सृजनकर्ता का लौ रूपी जिस्म तेज़ी के साथ एक दिशा को रवाना हो गया था। जो शायद ब्लैक होल की ही दिशा थी। 
‘‘अब इस व्यक्ति का क्या किया जाये?’’ वज़ीर ने सम्राट से पूछा।

‘‘इसे वापस पृथ्वी पर इसकी जगह पर पहुंचा दो। और उस बच्चे को नष्ट कर दो वरना पूरा सिस्टम गड़बड़ा जायेगा।’’ 
‘‘लेकिन इसे यहाँ की बातें तो याद रहेंगी।’’ 

‘‘उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इन बातों को ये एक सपने से ज़्यादा अहमियत नहीं देगा।’’
एक बार फिर प्रोफेसर का जिस्म फिज़ा में तैरने लगा था। पृथ्वी पर वापस लौटने के लिये।
-----

‘‘भाई साहब। अगर आपको कार में ही सोना था तो किनारे लगाकर सोते। बीच सड़क पर क्यों खर्राटें मार रहे हैं। पूरा जाम लगा दिया है।’’ 
प्रोफेसर ने देखा एक सज्जन गुस्से में भरे हुए कार की साइड खिड़की से हाथ डालकर उसे झिंझोड़ रहे थे।

‘‘ओह आई एम सॉरी। न जाने कैसे मुझे नींद आ गयी। शायद लाँग ड्राइविंग का असर है।’’ कहते हुए उसने कार स्टार्ट की किनारे लगाने के लिये। 
लेकिन उसे अपना दिमाग़ पूरी तरह धुंधलाया हुआ लग रहा था। और उस धुंध में दो लहराती हुई ज्वालाएं चमक रही थीं। और एक तेज़ चीख। इससे पहले कि वह कुछ देर पहले देखे गये सपने के बारे में दिमाग पर और ज़ोर डालता, मोबाइल कॉल ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी। 

वह काल प्रोफेसर के जीजा की थी जिसमें उसने अपने पोते की मौत की खबर दी थी। प्रोफेसर एक ठंडी साँस लेकर सीट से टिक गया।
--समाप्त--
---ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक)

Sunday, December 17, 2017

यू आई डी - भाग 2 (विज्ञान कथा)


अभी प्रोफेसर घनश्याम ने अपने शहर पहुंचने का आधा रास्ता ही तय किया था कि तेज़ आँधी तूफान ने उसे घेर लिया। बादल इतने घने थे कि हेड लाइट जलानी पड़ी थी। लेकिन मूसलाधार बारिश में उसे आगे का रास्ता मुश्किल से ही दिखाई दे रहा था। बिजलियाँ भी कड़क रही थीं। प्रोफेसर घनश्याम जल्दी से जल्दी अपनी लैब पहुंच जाना चाहता था ताकि उस अद्वितीय बच्चे का डीएनए टेस्ट कर सके। लेकिन घनघोर गरज के साथ होने वाली बारिश उसकी कार की स्पीड को रोक रही थी। 
अचानक तेज़ चमक में प्रोफेसर की आँखें बन्द हो गईं। लगातार कड़कने वाली बिजली उसकी कार के ऊपर ही गिरी थी। फिर उस भयंकर चमक ने प्रोफेसर के ज़हन को अँधकार के शून्य में डुबो दिया।
-----

जब प्रोफेसर का ज़हन फिर से कुछ सोचने के क़ाबिल हुआ तो उसे महसूस हुआ कि उसका जिस्म हल्का हो गया है और वह हवा में उड़ रहा है। और जब उसने आँखें खोलीं तो उसे लगा कि वह प्रकाश के एक घेरे में कैद शून्य में तेज़ी के साथ कहीं चला जा रहा है। 
‘‘तो क्या मैं मर चुका हूं?’’ उसके मन में पहला विचार यही आया। उसने अपने हाथ पैरों को हिलाना चाहा लेकिन उसे महसूस हुआ कि प्रकाश के उस घेरे ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा है और वह अपनी मर्ज़ी से उंगली भी नहीं हिला सकता है।
‘‘ठीक है। अभी देख लेते हैं कि मरने के बाद इंसान का क्या अंजाम होता है।’’ प्रोफेसर घनश्याम का वैज्ञानिक दिमाग इस हालत में भी अपने ही नज़रिये से सोच रहा था।
-----

ऐसा मालूम होता था जैसे आकृति प्रकाश से बन रही हो। जिस तरह दीपक की लौ होती है उसी तरह वह आकृति हवा में लहरा रही थी। लेकिन उस आकृति के नीचे कोई दीपक नहीं था। वह लौ निर्वात में बिना किसी स्रोत के स्वयं बन रही थी।
फिर उस जगह पर एक और उसी तरह की आकृति का प्रवेश हुआ। दूसरी आकृति पहली के सामने इस तरह लहराई मानो वह पहली का सम्मान कर रही हो। और साथ ही हवा में एक आवाज़ भी गूंजी जो शायद उसी आगंतुक आकृति की आवाज़ थी।
‘‘हब्बल यूनिवर्स के सम्राट के जय हो।’’ दूसरी आकृति की अपनी एक अलग ही भाषा थी जिसका मतलब पृथ्वी की भाषा में शायद यही था।

‘‘क्या खबर है?’’ पहली आकृति ने भी उसी भाषा में पूछा।
‘‘हमने उस बच्चे का जेनेटिक कोड प्राप्त कर लिया है। और जो व्यक्ति उस कोड पर रिसर्च करने जा रहा था, उसे भी हम ले आये हैं।’’ जैसे ही उस आकृति की बात खत्म हुई, प्रकाश के घेरे में कैद प्रोफेसर घनश्याम का वहाँ पर तेज़ी के साथ प्रवेश हुआ।
‘‘लेकिन मैंने सिर्फ जेनेटिक कोड लाने को कहा था, इस व्यक्ति को लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। खैर इसे बाद में देखूंगा हो सकता है जाँच में इसकी ज़रूरत पड़े। पहले तो ये मालूम होना ज़रूरी है कि सिल्टर ग्रह का जेनेटिक कोड पृथ्वी पर बने शरीर में कैसे पहुंच गया। हब्बल यूनिवर्स में ऐसी गड़बड़ पहली बार हुई है। क्या हमारे सृजनकर्ताओं का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है?

‘‘सम्राट। हमारे सृजनकर्ताओं का कहना है कि उनसे कोई गलती नहीं हुई है। यहाँ तक कि जब इस बच्चे के बाप का स्पर्म माँ के अंडे को भेद रहा था उस समय भी सृजनकर्ताओं ने चेक किया था कि स्पर्म व अंडे दोनों के जेनेटिक कोड पृथ्वी के अनुसार ही हैं। फिर षुरूआती तीन हफ्तों की स्टेज यानि प्री एम्ब्रायनिक स्टेज तक बच्चे के बनने की प्रोसेस की पूरी निगरानी की गयी। और फिर उसके बाद बच्चे की पैदाईश तक पूरी निगरानी होती रही लेकिन उसके जन्म से पहले तक किसी गड़बड़ का पता नहीं चला।’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ सम्राट बड़बड़ाया। उसके जिस्म को इंगित करने वाली लौ इस समय शांत थी। जिसका मतलब था कि वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ है। 
‘‘एक काम करो तुम।’’
‘‘जी हुक्म कीजिए सम्राट।’’

‘‘हब्बल यूनिवर्स में हम जब भी कोई नया स्पर्म या नया अण्डा बनाते हैं तो उसको एक नंबर देते हैं। यूनीक आईडी नंबर। यही यूआईडी नंबर डिटेक्ट करता है कि किसी स्पर्म या अण्डे को यूनिवर्स के किस ग्रह पर भेजना है। और इसी यूआईडी नंबर के द्वारा हमारे सृजनकर्ता सृजन की समस्त प्रक्रिया पर नज़र भी रखते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि इसी यूआईडी नंबर में कुछ गड़बड़ हुई है या किसी ने गड़बड़ की है।’’

‘‘लेकिन यूआईडी नंबर जिस ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम में स्टोर होता है उससे ज़्यादा सुरक्षित कोई स्पेसटाइम नहीं है। नामुमकिन है कि यूआईडी नंबर में कुछ गड़बड़ हुई हो या किसी ने गड़बड़ कर दी हो।’
‘‘फिर भी हर चीज़ की जाँच करनी ज़रूरी है। चाहे वह चीज़ कितनी ही सुरक्षित क्यों न हो। तुम मेरे साथ अभी ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम की तरफ चलो। और हब्बल यूनिवर्स के इस प्राणी को भी ले चलो। जाँच में इसकी ज़रूरत पड़ेगी । उस खास यूआईडी नंबर में स्टोर इन्फार्मेशन को इसके जेनेटिक कोड के साथ मैच कराना पड़ेगा क्योंकि ये उस बच्चे के बाप का क्लोज़ रिलेटिव है।’’

उसी समय प्रोफेसर को महसूस हुआ कि वो दो लहराती हुई ज्वालाएं अपनी जगह छोड़कर किसी अनजान दिशा में चल पड़ी है। और साथ में उसका जिस्म भी फिज़ा में तैर रहा था। इसका तो उसे यकीन हो ही चुका था कि वह मर कर दूसरी दुनिया में पहुंच चुका है। 
-----

(जारी है )
---ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक) 

Saturday, December 16, 2017

यू आई डी - भाग 1

देश के जाने माने साइंटिस्ट प्रोफेसर घनश्याम की कार जब उसकी बहन के दरवाज़े पर रुकी तो उस समय रात के दो बज रहे थे। प्रोफेसर घनश्याम इस समय दूसरे शहर में रहने वाली अपनी बहन से मिलने आया था और इसके लिये पूरी रात उसने खुद ही कार ड्राइव की थी।
उसने काल बेल पर उंगली रखी। 
इससे पहले कि वह दूसरी बार बेल पर उंगली रखता, अप्रत्याशित रूप से दरवाज़ा जल्दी खुल गया। वरना रात को दो बजे कौन इतनी जल्दी बिस्तर से उठना गवारा करता है।

दरवाज़ा खोलने वाली उसकी बहन ही थी जिसकी उम्र अब ढलने लगी थी। वह प्रोफेसर घनश्याम से दस साल बड़ी थी और घनश्याम की उम्र भी पचपन के लगभग थी। 
प्रोफेसर ने देखा कि उसकी आँखें लाल हैं मानो वह रोती रही हो, और ऐसा बिल्कुल नहीं मालूम हो रहा था कि वह सोते से उठकर आयी है। 

‘‘विमला तुम शिकायत कर रही थीं कि मैं तुमसे मिलने नहीं आता। देखो आज मैं सारे काम छोड़कर चला आया।’’ प्रोफेसर घनश्याम गर्मजोशी के साथ बोला। 

‘‘अन्दर आओ घनश्याम।’’ विमला सपाट आवाज़ में बोली और वापस जाने के लिये घूम गयी। 

घनश्याम को एक बार फिर अचरज हुआ लेकिन वह बिना कुछ बोले अपनी बड़ी बहन विमला का अनुसरण करने लगा। जब दोनों ड्राइंग रूम में पहुंचे तो विमला का अधेड़ पति भी मौजूद था और उसके चेहरे पर भी परेशानी की सिलवटें साफ ज़ाहिर हो रही थीं।
‘‘आओ घनश्याम बड़े दिनों के बाद आये।’’ उसने घनश्याम का स्वागत किया लेकिन उस स्वागत में गर्मजोशी तो बिल्कुल नहीं थी।

‘‘लगता है मैं गलत वक्त पर आया हूं। दो बजे रात को मुझे नहीं आना चाहिए था।’’ घनश्याम जो काफी देर से महसूस कर रहा था इस बार उसे ज़बान पर ले आया। वह हमेशा का स्पष्टवादी था क्योंकि वह एक वैज्ञानिक था।
‘‘घनश्याम, तुम गलत समझ रहे हो। सच्ची बात ये है कि हम लोग बहुत परेशान हैं।’’ विमला बुझे हुए स्वर में बोली।

‘‘अरे! तो मैं कोई गैर हूं? आप अपनी परेशानी मुझे बताईए न। हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूं।’’
‘‘इसमें कोई किसी की मदद नहीं कर सकता। प्रकृति के आगे किसका बस चला है।’’

‘‘लेकिन आप लोग अपनी परेशानी बताईए तो सही।’’

‘‘मैं बताता हूं।’’ इस बार विमला का पति यानि प्रो0घनश्याम का जीजा बोला, ‘‘हम लोग अभी थोड़ी ही देर पहले अस्पताल से आये हैं।’’ कहकर वह एक क्षण के लिये चुप हो गया। अब घनश्याम भी बेचैन हो उठा था। उसे मालूम था कि विमला के एक ही इकलौता लड़का है जिसकी अभी पिछले साल ही शादी हुई है। तो क्या लड़का या बहू ...?

‘‘हमारी बहू ने दरअसल एक लड़के को जन्म दिया है।’’ उसकी तन्द्रा को उसके जीजा ने भंग कर दिया।
‘‘ओह! लेकिन ये तो खुशी की बात है। इसमें परेशानी....’’

‘‘परेशानी ये है कि वह लड़का अत्यन्त कुरूप है।’’ इसबार विमला बोल उठी।
‘‘ओह। लेकिन ये तो कोई ऐसी बात नहीं। जन्म के समय तो सारे बच्चे एक ही जैसे दिखते हैं। हो सकता है बड़ा होकर वह अच्छा दिखे। और फिर वह लड़का है, कोई लड़की नहीं जिसकी सुंदरता की आप चिंता करें।’’

’’आप मेरी बात नहीं समझ रहे हो। बेहतर होगा आप खुद उस बच्चे को देख लो।’’ न जाने जीजा के स्वर में क्या था कि घनश्याम फौरन उसके साथ हास्पिटल जाने को तैयार हो गया।
-----

वाकई उस बच्चे को देखकर घनश्याम चौंक गया था। 

पूरी पृथ्वी पर शायद ही कहीं और ऐसी शक्ल व सूरत के बच्चे का जन्म हुआ हो।

नाक हरे रंग की किसी छोटे से पेड़ की तरह दिख रही थी, जिसकी कई शाखाएं हों।
खूबसूरती में गुलाब के फूल की मिसाल दी जाती है। लेकिन अगर किसी बच्चे के कान गुलाब जैसी सूरत में हों तो वो बदसूरत ही कहलायेगा।
और आँखों की जगह दो लहरदार चमकीली लकीरें दिख रही थीं। 

बच्चे का रंग सुर्ख था। यह सुर्खी प्रोफेसर घनश्याम ने आज तक किसी बच्चे या बड़े में नहीं देखी थी।

‘‘अविश्वसनीय!’’ प्रोफेसर के मुंह से अनायास निकला।
‘‘अब इस बच्चे को कुरूप नहीं तो और क्या कहा जाये।’’ बच्चे के दादा के वाक्य में पूरी तरह विवशता झलक रही थी।

‘‘ये बच्चा कुरूप नहीं है ये तो अनोखा है। यूनीक। ऐसा बच्चा पूरी पृथ्वी पर कहीं नहीं।’’

‘‘मामा। आप क्या यहाँ हमारा मज़ाक उड़ाने के लिये आये हैं?’’ उस बच्चे को बाप बोल उठा जो अभी अभी बाहर से कुछ दवाएं लेकर आया था।’’

‘‘नहीं भांजे। मुझे तुम्हारे दुःख का पूरा एहसास है। लेकिन मेरी आदत हर चीज़ को साइंटिस्ट की नज़र से देखने की है। मैं प्रकृति की हर अच्छी बुरी चीज़ को एक ही कोण से देखता हूं कि उसमें खास क्या है।’’

बच्चे की बगल में लेटी हुई उसकी माँ अभी तक मौन थी। शायद उसपर एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वह बच्चा सीज़ेरियन हुआ था।

‘‘लोग कहते हैं कि ईश्वर की बनाई दुनिया परफेक्ट है। तो फिर उसमें  इस तरह की गलतियाँ कैसे हो सकती हैं? वास्तव में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है और न ही ये दुनिया कहीं से परफेक्ट है।’’ प्रोफेसर घनश्याम का जीजा कह रहा था। 
‘‘ये भी मुमकिन है कि इस तरह की गलतियाँ भी परफेक्टनेस का एक हिस्सा हों।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बहुत समय पहले एक व्यक्ति ने सोचा कि ईश्वर ने दुनिया कितनी त्रुटिपूर्ण बनायी है। भारी भरकम तरबूज़ ज़मीन पर कमज़ोर लताओं के साथ बाँध दिये और छोटी छोटी खजूरें बहुत ऊंचे पेड़ों पर लटका दीं। 
लेकिन अगले ही पल जब कुछ खजूरें टूटकर उसके सर पर पड़ीं तो उसे ईश्वर की ‘त्रुटि’ नज़र आ गयी। कई बार हम समझ नहीं पाते कि परफेक्टनेस का मतलब क्या है।’’

‘‘लेकिन इस बच्चे के जन्म में क्या परफेक्टनेस हो सकती है?’’
‘‘कई बार प्रकृति अपनी परफेक्टनेस में लूप होल पैदा कर देती है ताकि उसके द्वारा हम कुदरत के छुपे हुए राज़ों तक पहुंच सकें। अगर इंसान के जिस्म में बीमारियाँ न होतीं तो शायद आज हम मानव शरीर के बारे में कुछ भी न जान पाते। अब मैं इस बच्चे का डी.एन.ए. सैम्पिल ले जाऊँगा और पता लगाने की कोशिश करूंगा कि ये ऐसा क्यों है।’’ 

कहते हुए प्रोफेसर घनश्याम ने बच्चे का डीएनए सैम्पिल लेने की तैयारी शुरू कर दी।
-----
(जारी है )
---ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक) 

Wednesday, May 3, 2017

लघु विज्ञान कथा - जीत

‘‘जिस पड़ोसी से हमारा युद्ध हो रहा है वह टेक्नालाॅजी में हमसे बहुत आगे हो चुका है। उसके पास अपने देश के हर नागरिक का बायोमीट्रिक रिकार्ड है। और हम इस तरह के मामलों में बहुत पीछे हो चुके हैं। ऐसे में हम उसे कैसे हरा सकते हैं जनरल?’’ उस चपटी नाक वाले तानाशाह ने गुस्से के साथ हाथ मलते हुए अपने जनरल को देखा।
‘‘योर एक्सीलेंसी।’’ जनरल ने तानाशाह के सामने अपना सर झुकाया, ‘‘हम उस देश को जीत चुके हैं।’’
’’व्हाट! क्या कह रहे हो?’’ तानाशाह चौंक कर बोला।
‘‘योर एक्सीलेंसी। दरअसल उस देश के तमाम नागरिकों का बायोमीट्रिक रिकार्ड हमने हैक कर लिया। और अभी हमारे मानव किलर ड्रोन मिसाईलों ने उसी आधार पर चुन चुनकर उस देश के एक एक नागरिक को मौत के घाट उतार दिया है।’’
जनरल की बात सुनकर तानाशाह के चेहरे पर सुकून का सूरज जगमगा उठा था।

Sunday, July 3, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 3 (अन्तिम भाग)

‘‘क्योंकि मैं उसकी पत्नी हूँ।’’
प्रो.डेनियल का मुँह खुला रह गया। फिर लगभग चौंकते हुए उसने बेल पर उंगली रखी। और जब चपरासी हाजिर हुआ तो उसने उससे डा.आनन्द को बुलाने के लिए कहा।

‘‘डा.आनन्द काफी खुशनसीब है।’’ प्रो.डेनियल खुद से बड़बड़ाया।
‘‘पता नहीं।’’ कहते हुए डा.आनन्द की पत्नी कुर्सी पर बैठ गयी।

उसी समय वहाँ डा.आनन्द ने प्रवेश किया। साथ में विनय और गौतम भी थे।

‘‘ओह! नेहा तुम यहाँ?’’
‘‘शुक्र है कि तुमने मुझे पहचान लिया। मैं तो समझ रही थी कि तुम मुझे भूल चुके होगे। आखिर हम दो साल बाद मिल रहे हैं।’’ नेहा कुछ गुस्से में मालूम हो रही थी।

‘‘क्या तुम बाहर गयी थीं?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘नहीं। इसी शहर में रहते हुए मेरे पति को मुझसे मिलने की फुर्सत नहीं।’’

‘‘नेहामेरे लिए मेरा प्रोजेक्ट इतना महत्वपूर्ण था कि मैंने इसके पीछे सभी से मिलना छोड़ दिया था।’’ डा.आनन्द बोला।

‘‘लेकिन मुझे तुम्हारे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं। दो साल अकेले रहते रहते मैं ऊब चुकी हूं। और मुझे अब तलाक चाहिए।’’

‘‘यह डा.आनन्द की बदनसीबी होगी।’’ प्रो.डेनियल ने टुकड़ा लगाया।
‘‘आप प्लीज खामोश रहें।’’ नेहा ने प्रोफेसर को भी नहीं बख्शा।

‘‘नेहाबेहतर है यह प्राब्लम हम घर चलकर साल्व करें।’’ डा.आनन्द ने समझाने के अंदाज में कहा।
‘‘घर जाने की तुम्हें फुर्सत ही कहाँ है।’’ नेहा की आवाज में दर्द था।

‘‘मेरा प्रोजेक्ट कम्प्लीट हो गया है। अब मैं कहीं भी जा सकता हूँ। चलोमैं इसी वक्त तुम्हारे साथ चलता हूँ।’’ आनन्द उठ खड़ा हुआ और फिर प्रोफेसर डेनियल से मुखातिब हुआ,

‘‘प्रो.डेनियल! आप प्लीज मेरी गैरमौजूदगी में इस लैब का चार्ज संभाल लेंगे?’’
‘‘श्योर, वाई नाॅट डा.आनन्द। तुम बेफिक्र होकर अपनी बीवी के साथ जाओ।’’
.............

लेकिन प्रो.डेनियल को लैब का चार्ज संभालना मंहगा पड़ा।
क्योंकि अगले दिन जब वह एक्सपेरीमेन्टल रूम में पहुंचा तो वहाँ गौतम को मृत पाया। उसका अकड़ा हुआ जिस्म सूक्ष्म शरीर बनाने वाली मशीन के बीचोंबीच पड़ा हुआ था।

आनन फानन में वहां सभी लोग इकट्ठा हो गये। डा.आनन्द को भी उसके घर से बुला लिया गया था।
‘‘ऐसा लगता है इसने रात को अपना सूक्ष्म शरीर बनाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ गड़बड़ हो गयी।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।

‘‘मशीन तो पूरी तरह ओ.के. थी। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मशीन ने गड़बड़ की।’’ डा.आनन्द ने मशीन की तरफ देखते हुए कहा।

प्रो.डेनियल गौर से लाश का निरीक्षण कर रहा था।

‘‘एक बड़ा सवाल यह भी है कि यह रात के सन्नाटे में मशीन का इस्तेमाल करने क्यों आया था। इसे अगर कुछ करना था तो हम लोगों के सामने करता।’’
‘‘अब तो यह मर चुका है। इसलिए इन सवालों का जवाब भी नहीं मिल सकता।’’ विनय बोला।

‘‘जवाब मिल सकता है। यह मशीन ही हमें जवाब देगी।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।
‘‘कैसे?’’ डा.आनन्द ने पूछा।

‘‘तुम्हें शायद याद नहींइस मशीन में एक ब्लैक बाक्स भी है जो सूक्ष्म शरीर द्धारा देखी गयी समस्त पिक्चर को रिकार्ड करता रहता है। उस ब्लैक बाक्स से मेमोरी चिप निकाल कर उसे कम्प्यूटर पर देखो कि गौतम के सूक्ष्म शरीर ने गौतम के मरने से पहले क्या क्या देखा।’’

‘‘ठीक है। डा.आनन्द मशीन से मेमोरी चिप निकालने लगा, ‘‘वैसे चिप तभी मेमोरी रिकार्ड दिखाएगी जब गौतम का सूक्ष्म शरीर निर्मित हुआ होगा।’’

‘‘अभी थोड़ी देर में सब मालूम हो जायेगा।’’ प्रो.डेनियल ने कहा।
...........

अब वे सब मेमोरी चिप को कम्प्यूटर पर लगाकर गौतम के सूक्ष्म शरीर की गतिविधियां देख रहे थे जो निर्मित हो चुका था।

‘‘यह तो लैब के बाहर जा रहा है।’’ विनय ने कहा।
फिर उन्होंने देखा वह सूक्ष्म शरीर शहर के एक रास्ते पर चला जा रहा है।
‘‘लेकिन यह जा किधर रहा है?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘रास्ते तो जाने पहचाने लग रहे हैं।’’ विनय बोला।

‘‘वो तो होंगे ही। क्योंकि रास्ते तुहारे ही शहर के हैं।’’

‘‘लेकिन यह रास्ता तो मेरे ही घर की तरफ जा रहा है।’’ डा.आनन्द हैरत से बोला, ‘‘और अब मेरे ही घर में यह प्रवेश भी कर रहा है। इसे ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी मुझसे?’’

जल्दी ही यह राज भी खुल गया। क्योंकि अब गौतम का सूक्ष्म शरीर नेहा के चारों तरफ चक्कर काट रहा था। फिर वह डा.आनन्द की पत्नी के शरीर में विलीन हो गया।

उसी समय रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और कम्प्यूटर स्क्रीन पर अंधेरा छा गया। डा.आनन्द ने आगे बढ़कर कई बटन दबायेलेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।

‘‘रहने दो। मेमोरी चिप में आगे कुछ भी रिकार्ड नहीं हुआ है।’’ प्रो.डेनियल ने उसे रोका।
‘‘इसका मतलब कि गौतम कैसे मरामेमोरी चिप भी इसके बारे में कुछ नहीं बता सकी।’’

‘‘मेरा ख्याल हैमेमोरी चिप बहुत कुछ बता रही है।’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अभी मैं कुछ नहीं कह सकता। पहले तो मुझे सारी कड़ियां मिलानी होंगी। कुछ इन्क्वायरी भी करनी होगी। तभी कोई नतीजा निकाल पाऊँगा।’’ प्रो.डेनियल उठकर कमरे में टहलने लगा। गौतम की लाश अभी भी मशीन के बीचोंबीच पड़ी हुई थी।
............

पुलिस गौतम की लाश को कस्टडी में लेकर अपनी इन्क्वायरी कर रही थी। लेकिन डा.आनन्द और विनय को पुलिस के नतीजों से ज्यादा इंतिजार प्रो.डेनियल के नतीजों का था।
और आखिरकार उसने उन्हें अपने कमरे में बुला ही लिया।

‘‘तुम यह बताओ कि गौतम सबसे पहले तुम्हें कहां मिला था?’’ प्रो.डेनियल ने आनन्द से पूछा।
‘‘वह तो इस प्रोजेक्ट की शुरूआत से ही से मेरे साथ था। नेट इक्जाम क्लीयर करने के बाद वह मेरी गाईडेन्स में आया था।’’

‘‘और उसका आना जाना तुम्हारे घर में काफी था?’’
‘‘हाँ। जब तक यह प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआवह अक्सर मेरे घर आया करता था।’’
‘‘बस। तो फिर बात साफ हो गई।’’ प्रो.डेनियल ने हाथ हिलाया।

‘‘किधर से साफ हो गई?’’ डा.आनन्द ने हैरत से पूछा।

‘‘सुनो। मसला ये है कि तुम्हारी बीवी बहुत खूबसूरत है। मैं भी उसपर पहली ही नजर में आषिक हो गया था।...नहींनाराज होने की जरूरत नहीं। यह तो नेचुरल है। नेचर की इसी हरकत की वजह से गौतम भी तुम्हारी बीवी पर पर मिटा था। लेकिन उसके अंदर आगे कुछ करने की हिम्मत नहीं थी। और न ही पावर। क्योंकि बहरहाल वह उसके गाइड की बीवी थी।’’

डा.आनन्द मन ही मन प्रो.डेनियल को गालियां दे रहा था। क्योंकि उसकी इस कवायद में उसकी पत्नी का नाम बार बार उछल रहा था।

प्रो.डेनियल ने आगे कहा, ‘‘इन सब के बावजूद उसके दिमाग में तुम्हारी बीवी को पाने की ख्वाहिश कहीं छुपी रही। और दो साल बाद पिछले दिनों जब उसने दोबारा तुम्हारी बीवी को देखा तो उसके दिल के अंदर छुपी यह ख्वाहिश दोबारा उभर आयी। जाहिर हैवह अब भी उसकी पहुँच से दूर थी। अब उसके दिमाग ने एक तरकीब सोची। क्यों न मशीन के द्धारा वह अपना सूक्ष्म शरीर बनाकर तुम्हारी बीवी के पास पहुँच जाये। यानि मामला थाजिस्मानी तौर पर न सही रूहानी तौर पर ही सही।’’

अब डा.आनन्द को भी प्रो.डेनियल की बातों में दम नजर आने लगा था। क्योंकि उसने गौतम के सूक्ष्म शरीर को अपनी आँखों से अपने घर जाते और नेहा के शरीर में प्रवेश होते देखा था।

‘‘उसने अपने मकसद के लिए रात का सन्नाटा चुना और मशीन के पास जाकर उसमें बैठ गया और मषीन चालू कर दी।’’ डा.डेनियल कह रहा था, ‘‘उसका सूक्ष्म शरीर बना और तुम्हारी बीवी तक पहुँच गया। फिर उसके शरीर के भीतर भी पहुँच गया। लेकिन यहीं पर वह घटना हुई जिसकी उम्मीद हमें भी नहीं थी।’’

‘‘कैसी घटना?’’ डा.आनन्द और विनय दोनों ही चैंक पड़े।

‘‘प्रकृति को यह दुनिया शायद ही कभी पूरी तरह समझ पाये। हुआ यह कि जब गौतम के सूक्ष्म शरीर ने तुम्हारी बीवी के शरीर में घुसपैठ करने की कोशिश की तो तुम्हारी बीवी के शरीर को घुसपैठिए की खबर लग गयी। और उसने एक प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न कर दी। चूंकि घुसपैठिया विद्युत रूप में थाइसलिए तुम्हारी बीवी के शरीर की प्रतिरोधक शक्ति भी विद्युत रूप में ही पैदा हुई।

इस प्रतिरोधक शक्ति ने गौतम के सूक्ष्म शरीर को नष्ट करना षुरू कर दिया। गौतम का सूक्ष्म शरीर एक एम्प्लीफायर द्धारा गौतम से जुड़ा हुआ था। जब वह विद्युतीय शरीर नष्ट हुआ तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़कर गौतम के शरीर में पहुंच गया। नतीजे में एक तीव्र विपरीत धारा गौतम के शरीर में पैदा हुई और उसके तेज झटके ने गौतम की जान ले ली।’’ प्रो.डेनियल अपनी बात पूरी करके खामोश हो गया।

डा.आनन्द की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने असिस्टेंट की मौत का अफसोस करे या खुशियां मनाए। क्योंकि बहरहाल उसने उसकी बीवी पर बुरी नजर डाली थी। 
....समाप्त....
ज़ीशान हैदर ज़ैदी
लेखक 

Saturday, July 2, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 2

‘‘किसी जीवित शरीर की प्रत्येक हरकत एक विद्युतीय स्पंद का नतीजा होती है जो उस शरीर के मस्तिष्क से उत्पन्न होती हैया फिर कभी कभी मेरूदण्ड से। मस्तिष्क द्धारा दिये गये आदेश शरीर के न्यूरानों द्धारा विद्युतीय स्पंद के रूप में उस अंग तक पहुंचता है जिसके लिए वह आदेश होता है। फलस्वरूप वह अंग हरकत में आता है। उदाहरण के लिए अगर मेरा मस्तिष्क मेरे हाथ को कुछ लिखने का आदेश देगा तो यह आदेश विद्युतीय रूप में न्यूट्रानों द्धारा हाथ को मिलेगा और फिर हाथ कलम उठाकर लिखना शुरू कर देगा।’’

डेनियल अब मौन होकर डा.आनन्द की बात सुन रहा था। क्योंकि अब उसे लग रहा था कि डा.आनन्द कुछ खास बताने जा रहा है।

‘‘अब इन विद्युतीय स्पंदों की खास बात यह है कि ये नियत न होकर लगातार बदलते रहते हैं। सो इनमें हम फैराडे का नियम लागू कर सकते हैं। यानि किसी जन्तु के शरीर के पास अगर कोई क्वायल रख दी जाये तो उसमें विद्युत धारा पैदा हो जायेगी। ये अलग बात है कि यह धारा इतनी कम होगी अत्यधिक सेन्सेटिव अमीटर भी उसे नहीं नाप सकता।’’
‘‘ठीक है।’’ काफी देर बाद प्रो.डेनियल बोला।

‘‘लेकिन एक तरीका हैजिससे हम यह धारा बढ़ा सकते हैं।’’
‘‘वह क्या?’’

‘‘शारीरिक धारा और क्वायल की धारा को परस्पर संयुक्त करने का काम करते हैं फोटाॅन। अगर किसी तरकीब से हम उन फोटाॅनों की एनर्जी बढ़ा सकें तो क्वायल में पैदा हुई धारा इतनी बढ़ सकती है कि हम उसका इस्तेमाल कर लें।’’
‘‘लेकिन फोटाॅनों की एनर्जी कैसे बढ़ेगी?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।

‘‘इसके लिए हम लेंसप्रिज्म और एल.सी.डी. जैसे प्रकाशीय यन्त्रों का उपयोग कर सकते हैं। यहाँ का पूरा सेटअप इसी थ्योरी पर आधारित है।’’ डा.आनन्द ने चारों तरफ घूमते हुए कहा।

‘‘लेकिन इस तरह क्वायल की करंट बढ़ाकर तुम करना क्या चाहते हो?’’

‘‘फैराडे नियम के अनुसार जिस पैटर्न में पहली क्वायल में धारा परिवर्तित होती हैवही पैटर्न दूसरी कवायल में धारा परिवर्तन का बनता है। ठीक इसी नियम पर जैसे जैसे जीवित शरीर का मस्तिष्क आदेशों की श्रृंख्ला बनायेगाउसी क्रम में क्वायल द्धारा पैदा हुई धारा कार्य करेगी। दूसरे शब्दों में हम विद्युत धारा के रूप में एक ऐसा सूक्ष्म शरीर बना लेंगे जो पूरी तरह जीवित शरीर के मस्तिष्क से जुड़ा रहेगा और उसके आदेशों पर अमल करेगा।’’

‘‘गुड! आईडिया बढ़िया है। और मेरा ख्याल है वह सूक्ष्म शरीर हमारे बहुत काम का होगा।’’

‘‘श्योर। चूंकि वह सूक्ष्म शरीर हाड़ मांस का नहीं होगा इसलिए हम उसे कहीं भी भेज सकते हैं। अंतरिक्ष मेंसमुन्द्र मेंकिसी जीवित शरीर के भीतरकहीं भीकिसी भी समय। इस तरह हम किसी भी जगह पर खोज कार्य कर सकते हैं। परोक्ष रूप से वहां मौजूद रहते हुए। यहां तक कि अपने उस सूक्ष्म शरीर का उपयोग करते हुए अणुओं को आपस में जोड़ सकते हैंकोई सूक्ष्म सर्जरी कर सकते हैं।या फिर शरीर में मौजूद बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ सकते हैं।’’

‘‘तो फिर देर किस बात की? अपना एक्सपेरीमेन्ट चालू करो फौरन।’’

‘‘बात यहीं पर आकर रूक जाती है। समस्या ये है कि हम अपने एक्सपेरीमेन्ट को कम से कम पांच सौ बार दोहरा चुके हैं। लेकिन सूक्ष्म शरीर बनाने में कामयाबी अभी तक नहीं मिल पायी।’’

‘‘हूँ!’’ प्रो.डेनियल ने सर हिलाया, ‘‘सबसे पहले मैं तुम्हारे प्रोजेक्ट का मैथैटिकल माडल देखना चाहूँगा।’’

डा.आनन्द उसे एक दूसरे कमरे में ले गया और एक मोटी फाइल उसके हाथ में थमा दी। प्रो.डेनियल उसके पन्ने पलटने लगा। थोड़ी देर बाद उसने आनन्द को संबोधित किया, ‘‘तुमने फोटाॅनों के पाथ की जो इक्वेशंस लिखी हैंउसमें प्रोबेबिलिटी का इस्तेमाल तो किया नहीं!’’
‘‘उसकी क्या जरूरतफोटाॅनों का पाथ तो निश्चित होगा न?’’

‘‘यही तो गलती की है तुमने। क्वांटम लेवेल पर किसी भी कण का व्यवहारउसका पथ निश्चित नहीं होता। इसलिए कोई भी वाक्य हम प्रोबेबिलिटी के इस्तेमाल के साथ कहते हैं। अब तुम मुझे इस कमरे में अकेला छोड़ दो। मैं इसपर काम करना चाहता हूँ।’’

डा.आनन्द उठा और खामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल आया। उसे पता था कि अब अगर वह कुछ बोला तो प्रो.डेनियल उसका गरेबान पकड़ लेगा।
...........

पूरे एक सप्ताह बाद प्रो.डेनियल उस कमरे से बाहर निकला था। और यह पूरा सप्ताह उसने एक ही सूट में गुजारा था। जब वह बाहर निकला तो उसकी दाढ़ी और सर के बाल बुरी तरह बढ़े हुए थे।

‘‘चलो काम शुरू करते हैं।’’ वह डा.आनन्द से बोला। दोनों लैबोरेट्री में पहुंचे और उसकी मशीनों में फेरबदल करने लगे।
लगभग दो दिन की मेहनत के बाद प्रो.डेनियल डा.आनन्द के असिस्टेन्ट विनय से मुखातिब हुआ, ‘‘आ जाओ डियर। सबसे पहले मैं तुम्हारा ही सूक्ष्म शरीर बनाऊँगा।’’

‘‘म..मेराक..क्यों?’’ घबराहट के कारण विनय हकलाने लगा था।
‘‘डर क्यों रहे हो डियर। कुछ नहीं होगा तुम्हें। जो कुछ होगातुम्हारे सूक्ष्म शरीर को होगा।’’

विनय को कुर्सी पर बिठा दिया गया। जो एक गोलाकार मशीन के बीचोंबीच स्थित थी। फिर डेनियल ने एक बटन दबाया। और मशीन में मौजूद लेंसों से रंग बिरंगी किरणें निकलकर विनय पर पड़ने लगीं। विनय का पूरा शरीर उन किरणों के कारण इतना चमक रहा था कि बाकी लोगों को उसे देख पाना मुष्किल हो रहा था। खुद विनय की आँखें उन किरणों की चकाचौंध के कारण बन्द हो गयी थीं।

‘‘कुछ दिख रहा है तुम्हें?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘इतनी तेज लाइट में आंखें बन्द हो गयी हैं। दिखाई कहाँ से देगा!’’ विनय के स्वर में झल्लाहट थी।

‘‘अपने दिमाग को केन्द्रित करो और आँखें बन्द किये हुए कोशिश करो कुछ देखने की।’’

विनय थोड़ी देर कुछ नहीं बोलाफिर कहने लगा, ‘‘हां। अब मुझे दिखाई दे रहा हैमेरे चारों तरफ छोटे छोटे गोले घूमते दिखाई दे रहे हैं।’’

‘‘गुड!’’ प्रो.डेनियल अब डा.आनन्द की तरफ मुड़ा, ‘‘हमारा एक्सपेरीमेन्ट कामयाब हो चुका है। अब तुम सामने दीवार की तरफ देखो। वहां तुम्हें एक छोटा प्रकाशिक बिन्दु दिख रहा है। वही विनय का सूक्ष्म शरीर है।’’
‘‘करेक्ट डा.डेनियल। हम कामयाब हो गये।’’ डा.आनन्द खुशी से उछल पड़ा।

‘‘लेकिन विनय किस तरह के गोले देख रहा है?’’ इस बार डा.आनन्द के दूसरे असिस्टेन्ट गौतम ने पूछा।
‘‘दरअसल अब बन्द आंखों से जो कुछ भी देख रहा हैअसलियत में वह सब उसका सूक्ष्म शरीर देख रहा है। और वह अपने चारों तरफ घूमते हवा के अणुओं को देख रहा है।’’ डा.आनन्द ने बताया।

‘‘विनयक्या तुम उनमें से किसी गोले को छू सकते हो?’’ प्रो.डेनियल ने पूछा।
‘‘कोशिश करता हूँ।’’ विनय ने हाथ उठाया और हवा में इधर उधर लहराने लगा।

‘‘नहीं सर। इन गोलों की गति बहुत तेज है।’’ आखिर में उसने कहा।

‘‘ठीक है। नाऊ स्टाप दि एक्सपेरीमेन्ट।’’ प्रो.डेनियल के कहने पर डा.आनन्द ने स्विच आॅफ कर दिया। विनय ने आंखें खोल दीं। अब वह चुंधियाई नजरों से चारों तरफ देख रहा था।
.............

वह एक औरत थी और खूबसूरती में अपनी मिसाल आप थी। चेहरे पर कुछ ऐसा आकर्षण था कि देखने वाला अपनी निगाह चाहते हुए भी नहीं हटा पाता था।

कुछ इसी तरह की हालत प्रो.डेनियल की भी हुई थी। जिसके सामने वह औरत मौजूद थी।
‘‘फर्माईएमैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’ उसने नर्म अंदाज में पूछा।

‘‘मैं डा.आनन्द से मिलना चाहती हूँ।’’ औरत ने कहा।
‘‘वह अंदर मौजूद हैं। लेकिन आप उनसे क्यों मिलना चाहती हैं?’’

---- जारी है

Friday, July 1, 2016

अन्डर एस्टीमेट - भाग 1

लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी 

उसने कमरे का दरवाजा खटखटाने से पहले उसपर लगी तख्ती पढ़ीलिखा था, ‘‘डाग्स एण्ड लो नालेज पर्सन्स आर नाट एलाउड।’’
एक पल को उसे अपने कदम डगमगाते महसूस हुए। उसके पास नालेज तो थीलेकिन पता नहीं अंदर बैठे व्यक्ति को कितनी नालेज वाला व्यक्ति पसंद था। अंदर मौजूद व्यक्ति थाप्रोफेसर डेनियल कूपर,  विश्व का जाना माना भौतिकविद व गणितज्ञ।’’

बहरहाल उसने दरवाजा नाॅक किया।

‘‘कम इन।’’ अंदर से आवाज आयी। वह दरवाजे को धक्का देते हुए अंदर दाखिल हुआ। सामने प्रोफेसर डेनियल मौजूद था उसके सामने मेज पर पेपर्स और किताबों का ढेर लगा हुआ था। उसने मेज के दूसरी तरफ रखी कुर्सी पर बैठना चाहा।
‘‘रुको!’’ प्रो. डेनियल ने उसे फौरन रोक दिया, ‘‘पहले मैं तुम्हारी नालेज का टेस्ट लूँगा। मुझे मालूम तो हो कि तुम मुझसे बात करने के काबिल हो या नहीं।’’

इससे पहले कि वह कुछ समझ पाताप्रो. डेनियल ने पहला सवाल दाग़ा, ‘‘एक मीनार की चोटी से दो गेंदें गिरायी गयीं। एक भारीदूसरी हल्की। ग्राउण्ड पर कौन सी गेंद पहले पहुँचेगी?’’
‘‘न्यूटन और गैलीलियो के नियमों के अनुसार दोनों गेंदें एक साथ ग्राउण्ड पर पहुँचेंगी।’’ उसने जवाब दिया।

‘‘गलत!’’ प्रो.डेनियल ने मेज पर हाथ मारा, ‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हलकी पर ज्यादा होगा इसलिए भारी गेंद पहले पहुँचेगी।’’
‘‘ओह!’’
‘‘दूसरा सवाल...एक मीनार की चोटी से दो गेंदें गिरायी गयीं। एक भारीदूसरी हल्की। ग्राउण्ड पर कौन सी गेंद पहले पहुँचेगी?’’

‘‘यह तो वही सवाल....’’
‘‘तुम जवाब दो बेवकूफ!’’

‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हलकी पर ज्यादा होगा इसलिए भारी गेंद....’’
‘‘रांग अगेन! हवा का प्रेशर हारीजोण्टल डायरेक्शन में ज्यादा होगा। इसलिए दोनों गेंदें एक साथ जमीन पर पहुँचेंगी।’’

उसने एक गहरी साँस ली।
‘‘तीसरा सवाल.....एक मीनार की चोटी से दो गेंदें....’’
‘‘आप तो फिर वही सवाल....’’
‘‘बीच में मत टोका करो। अब जवाब दो हाफ माइंड।’’
‘‘चूँकि हवा का प्रेशर हारीजोण्टल डायरेक्शन में ज्यादा होगा। इसलिए दोनों गेंदें एक साथ जमीन पर पहुँचेंगी।’’

‘‘तुम मुझसे बात करने के काबिल ही नहीं हो। अरे बेवकूफगेंदों के प्रारम्भिक वेग पर भी तो बहुत कुछ निर्भर करेगा। डांट वेस्ट माई टाइम एण्ड गेट आउट।’’

वह मायूसी के साथ जाने को मुड़ाफिर वापस घूमकर प्रो.डेनियल से मुखातिब हुआ, ‘‘प्रोफेसर साहबजाने से पहले मैं भी आपसे एक सवाल करना चाहता हूँ।’’
‘‘और वह यकीनन कोई बेवकूफी भरा सवाल होगा। खैर पूछो।’’

‘‘आपके गले में जो टाई लटक रही हैउसके नीचे की शर्ट किधर है?’’
‘‘ऐं!’’ प्रो.डेनियल चैंक कर अपने को देखने लगा। वास्तव में उसके जिस्म पर से कमीज नदारद थी और गले से लटकती टाई उसके नंगे पेट पर इधर उधर झूल रही थी।

‘‘ओ माई गाॅड! आज मैं शर्ट पहनना कैसे भूल गया।’’ प्रो.डेनियल बदहवास होकर बोला।
‘‘अच्छा सरतो मैं चलता हूँ।’’
‘‘नहींरुकोतुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘सरमैं डा.आनन्द हूँ। फ्राम इण्डियायानि कि भारत।’’
‘‘काम क्या है तुम्हें मुझसे?’’

‘‘मैं अपने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आपसे मदद चाहता हूँ। क्योंकि इसमें फिजिक्स की एक बहुत ही मुश्किल प्राब्लम सामने आ रही है।’’
‘‘मैं मदद करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन इसमें मेरी एक शर्त होगी।’’

आनन्द सहमति में सर हिलाते हुए अपने प्रोजेक्ट के बारे में संक्षेप में बताने लगा।

और थोड़ी देर बाद जब वह बाहर निकला तो उसके चेहरे पर इत्मिनान के भाव थे। क्योंकि प्रोफेसर डेनियल ने उसके प्रोजेक्ट में मदद देना स्वीकार कर लिया था। हालाँकि अब उसके जिस्म से कमीज नदारद थी। शर्त के अनुसार प्रोफेसर ने उससे कमीज माँग ली थी।
...........

इस विशालकाय कमरे में चारों तरफ मशीनों का जाल बिछा हुआ था। प्रत्येक मशीन से जुड़े हुए अनगिनत छोटे बड़े लेंस कमरे की खूबसूरती को बढ़ाने का काम कर रहे थे।
लेकिन इस खूबसूरती से ज्यादा महत्वपूर्ण वह एक्सपेरीमेन्ट था जो यहाँ पर हो रहा था। और यह तथ्य वहाँ मौजूद डा.आनन्द और उसके दोनों असिस्टेन्ट विनय और गौतम भली भाँति जानते थे।

‘‘आज हमें अपने एक्सपेरीमेन्ट को हर हाल में कामयाबी की मंजिल तक पहुँचाना है।’’ डा.आनन्द ने दृढ़ स्वर में कहा।
‘‘कामयाबी तो आज मिलनी ही चाहिए सर।’’ विनय बोला, ‘‘पिछले दो सालों से नाकामी देखते देखते हमारी तो हिम्मत ही जवाब दे गयी है।’’

‘‘क्या गारण्टी है कि हम आज भी कामयाब होंगे?’’ गौतम ने शंका जाहिर की।
‘‘अगर प्रो.डेनियल का दिमाग घूम गया तो हमारे प्रोजेक्ट की कामयाबी निश्चित है।’’

‘‘तो क्या वह यहाँ आ रहे हैं?’’ विनय ने हैरत से कहा। डा.आनन्द को जवाब देने की जरूरत न पड़ी क्योंकि उसी समय वहाँ डेनियल ने प्रवेश किया।
‘‘डा.आनन्दहाऊ आर यू!’’ प्रो.डेनियल ने विनय की तरफ हाथ बढ़ाया।

‘‘एक्सक्यूज मीडा.आनन्द मैं हूँ।’’ डा.आनन्द ने जल्दी से कहा।
‘‘ओह साॅरी। लेकिन मेरी मीटिंग तो इनके साथ हुई थी?’’ डा.डेनियल ने हैरत से कहा।

‘‘आप भूल रहे हैं सरआपकी मीटिंग मेरे साथ ही हुई थी।’’ बड़ी मुश्किल से डा.आनन्द ने अपने ऊपर कण्ट्रोल करते हुए कहा। उसे आश्चर्य हो रहा था कि यह गायब दिमाग प्रोफेसर इतना बड़ा भौतिकविद कैसे बन गया।

‘‘कौन आनन्द है कौन नहींमुझे इससे कोई मतलब नहीं। तुम अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताओ।’’

‘‘प्रोफेसर साहबमेरा प्रोजेक्ट कुछ इस टाइप का है।’’ कहते हुए आनन्द एक मेज के पास पहुँचा। जिसके ऊपर ताँबे के तार की दो क्वायल एक दूसरे से थोड़ी दूर पर रखी दिख रही थीं।

‘‘मैंने पहली क्वायल में ए.सी. करेन्ट पास की और आप देख रहे हैं कि दूसरी क्वायल से जुड़ा अमीटर उसमें भी करेण्ट दिखाने लगा। ऐसा होता है फैराडे के इलेक्ट्रोमैगनेटिक इंडक्शन नियम की वजह से जिसकी वजह से दोनों क्वायल परस्पर जुड़ी न होते हुए भी इलेक्ट्रिक रूप से जुड़ जाती हैं।’’

‘‘तुम मेरा भेजा क्यों चाट रहे हो! दुनिया के जाने माने भौतिकविद को यह हाईस्कूल लेवेल की बच्चों की बातें क्यों बता रहे हो!’’ प्रो.डेनियल लगभग चीखते हुए बोला।
‘‘क्योंकि बिना यह बताये मैं अपने एक्सपेरीमेन्ट को एक्सप्लेन नहीं कर सकता।’’ डा.आनन्द शान्त स्वर में बोला।
‘‘तो फिर चाटते रहो भेजा।’’

डा.आनन्द ने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘दो बिल्कुल अलग अलग क्वायल को जोड़ने में जिम्मेदार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल प्रकाशीय कणों यानि फोटाॅनों के वितरण से पैदा होता है।’’

‘‘ये भी मुझे मालूम है।’’ इस बार प्रोफेसर डेनियल शांत लहजे में बोलालेकिन लग यही रहा था कि अभी वह फट पड़ेगा।

‘‘अब जो मैं बताने जा रहा हूँवह आपको नहीं मालूम। मैं इसी इलेक्ट्रोमैगनेटिक इंडक्शन का इस्तेमाल दो शरीरों को जोड़ने में करने जा रहा हूँजिनमें एक जीवित शरीर होगा और दूसरा उसका इलेक्ट्रिक प्रतिरूप।’’

‘‘क्या मतलब!’’ इस बार वाकई प्रो.डेनियल चौंक पड़ा था।

---- जारी है