कुछ नदियाँ इतनी विशाल होती हैं कि उन्हें देखने पर किसी समुन्द्र का भ्रम होता है। भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश की दरियाए घाघरा भी ऐसी ही नदी है जो अयोध्या के किनारे सरयू नाम से पुकारी जाती है और इसका एक हिस्सा शारदा नाम से भी जाना जाता है।
इस विशाल नदी के एक किनारे छोटा सा गाँव आबाद है। नाम आप कुछ भी रख सकते हैं। फिलहाल मैं इसे सरायू कहकर पुकारता हूं सरयू की मुनासिबत से।
हिंदू मुस्लिम मिक्स आबादी का ये गाँव हिन्दू मुस्लिम एकता की भी मिसाल है क्योंकि यहाँ उस वक्त भी फसाद नहीं हुआ जब देश के बँटवारे की अफरातफरी का आलम था।
इस गाँव के सभी मुस्लिम एक फकीर के वंशज थे जिसने सबसे पहले उस वीरान जंगल को आबाद किया था। लेकिन गाँव के बीचोंबीच मौजूद वह घर अब वीरान खंडहर हो चुका था जहाँ से आबादी की शुरूआत हुई थी। और इसकी वजह थी।
उस घर में रहने वाली मौजूदा पीढ़ी के ज़्यादातर लोग दूर दराज के शहरों में जाकर बस चुके थे। और अब उस घर को आबाद करने वाला इकलौता फर्द दल्लू बचा था जिसे देसी की बुरी लत लग चुकी थी।
देसी की लत लगने से पहले वह दिलावर खान था और अच्छे खासे खेत व एक अदद खूबसूरत बीवी का मालिक भी था। लेकिन अब न तो खेत बचे थे और न ही बीवी। खेत सारे नशे की भेंट चढ़ गये और जब भुखमरी की नौबत आयी तो बीवी ने भी मायके की राह पकड़ी।
अब वह था और भुखमरी और शाम को कहीं से भीख माँगे हुए पैसों से पेट में उतरती देसी।
फिलहाल शाम होने में काफी वक्त था और अभी उसके पेट के चूहे बुरी तरह उछल कूद मचा रहे थे।
उसने आसपास के पड़ोसियों से कुछ खिलाने की अपील की लेकिन सबने बहाना बना दिया। आखिर कोई किसी बेकार को कितना झेल सकता है। जब खुद उसी की बीवी झेल नही पायी।
हर तरफ से मायूस होकर वह घाघरा के किनारे निकल गया। उसके दिमाग में एक तरकीब आयी थी।
घाघरा के किनारे तक पहुंचते पहुंचते उसे एक घंटा लग गया। और अब उसने अपनी जेब से एक गुलेल निकाली और उसके रबर को खींचकर परखने लगा।
इस वक्त परिन्दे अपने अपने ठिकानों की ओर लौट रहे थे। उसने गुलेल को निशाने पर लेने के लिये अपनी आँखों के करीब किया। उसे यकीन था कि एक मोटा तगड़ा परिन्दा उसे कम से कम दो वक्त की भूख से बचा लेगा।
लेकिन उसे नहीं पता था कि कोई और भी भूखा अपनी भूख मिटाने के लिये उसे ताड़ चुका है। ये एक तेंदुआ था और उसके ठीक पीछे पेड़ों के झुरमुट के बीच मौजूद था।
फिर दो काम एक साथ हुए। इधर उसकी गुलेल से पत्थर छूटा और उधर पीछे से तेंदुए ने उसके ऊपर छलांग लगायी। आहट महसूस होते ही वह फुर्ती से पीछे घूमा। तेंदुआ ठीक उसके सर पर था।
लेकिन इससे पहले कि वह उसे चीड़ फाड़कर हज़म कर जाता, अचानक कहीं से एक फुटबाल साईज़ का गोला आकर उसके सर से टकरा गया।
न जाने उसे गोले में कितनी स्पीड थी कि तेंदुआ चारों खाने चित हो गया। दल्लू का दिल मानो उसकी कनपटियों में धड़कने लगा था। उसे ये भी नहीं होश रह गया कि खुद उसका निशाना अपने ठिकाने पर लगा या चूक गया।
उसने देखा गोले के टकराने से चित हुआ तेंदुआ अब साँस भी नहीं ले रहा था। यानि कि उसका काम तमाम हो चुका था। तो क्या वह गोला किसी तोप का गोला था? क्या उस जैसे फालतू की जान भी इतनी कीमती हो सकती है कि उसे बचाने के लिये किसी ने तोप चलाई हो?
बहरहाल उसने अपनी जान बचाने वाले गोले की तलाश में इधर उधर नज़रें दौड़ायीं जो तेंदुए के सर से टकराने के बाद शायद किसी झाड़ी के पीछे जाकर छुप गया था।
और जिस झाड़ी के पीछे छुपा था वहाँ उसकी मौजूदगी का आभास भी हो रहा था। क्योंकि उसने पहले ही देख लिया था कि वह गोला किसी हीरे की तरह रौशन भी है और अब यही रौशनी एक झाड़ी के पीछे से छन कर आ रही थी।
‘आखिर वह है क्या चीज़?’ अब उसके दिल में जिज्ञासा भी पैदा हो गयी और वह धीरे धीरे उस झाड़ी की ओर बढ़ा।
उसकी भूख तो तेंदुए के हमले के साथ ही गायब हो चुकी थी।
वह झाड़ी के पास पहुंचा और उसके पीछे झांकने लगा। गोला वहां मौजूद था। एक मद्धम चमक छोड़ता हुआ।
फिर उसकी आँखों में चौंकने के आसार पैदा हुए क्योंकि उसे महसूस हुआ कि शायद गोले के भीतर कोई चीज़ हरकत कर रही है।
‘क्या हो सकता है? कहीं कोई भूत प्रेत तो नहीं।’ उसने डर कर अपने कदम पीछे खींच लिए। लेकिन फिर उसे याद आया कि उसी ने तो उसकी जान बचायी थी। तो अब उसकी जान तो लेगा नहीं।
वह सहमता हुआ उस गोले के ठीक पास पहुंच गया। और फिर उसने देख लिया कि उसके अन्दर एक बच्चा मौजूद है। अपने हाथ पैर चलाते हुए।
और ये बच्चा किसी इंसान का ही बच्चा था। गोरा चिट्टा।
एक बार फिर उसके दिल में डर अपना सर उभारने लगा। भला एक इंसान का बच्चा किसी गोले में कैसे बन्द हो सकता है।
‘क्या किसी ने उसे इसमें बन्द करके यहाँ फेंक दिया है?’ दूसरा सवाल कौंधा।
‘लेकिन कोई ऐसा क्यों करने लगा?’
‘हो सकता है इस बच्चे का कोई दुश्मन हो। शायद चाचा वगैरा जो इसकी जायदाद हड़पना चाहता हो।’ उसका दिमाग एक तरफ सवाल कर रहा था तो दूसरी तरफ खुद ही जवाब भी दे रहा था।
बहरहाल अब उसका कर्तव्य था कि वह उस बच्चे की जान बचाता। क्योंकि थोड़ी देर पहले अनजाने में ही उसने उसकी जान बचायी थी।
वह घुटनों के बल बैठ गया और उस गोले में किसी खिड़की की तलाश करने लगा, जिसे खोलकर वह उस बच्चे को बाहर निकाल सकता था।
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी उसे उस गोले में कहीं कोई खिड़की या दरवाज़ा नज़र नहीं आया।
फिर उसने तय किया कि वह उसे उठाकर अपने घर ले जाये और वहां इत्मिनान से खोलने की कोशिश करे। वैसे भी शाम का अँधेरा फैलने लगा था और अब तेंदुओं के साथ साथ दूसरे जानवरों के भी टहलने का भी वक्त हो गया था।
उसने गोले को अपनी बगल में दबाया और वापसी का रास्ता पकड़ लिया।
बीच में उसे अपना भी शिकार मिल गया। उसकी गुलेल का निशाना सटीक बैठा था।
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आज गाँव वाले एक अजीब मंज़र देख रहे थे।
हर रोज़ नशे में डूबा रहने वाला मैला कुचैला दल्लू आज नहा धोकर साफ सुथरे लिबास में अपने घर की दलान में बैठा हुआ था। घर में मौजूद इकलौती चारपाई पर।
आम तौर पर उसकी चारपाई किसी झोले की तरह दिखाई देती थी जिसमें पड़ा हुआ वह बैंगन की तरह इधर उधर लुढ़कता रहता था।
लेकिन आज तो वह चारपाई भी कसी हुई थी और उसपर बैठा हुआ दल्लू भी एकतम तना हुआ था। जिस्म पर हरे रंग का लिबास था और दाढ़ी भी कायदे से संवरी हुई थी।
‘‘का हो दल्लू - तुम्हारी बीवी मायके से वापस आ गयी क्या?’’ सामने से गुजरते हुए बिक्कू से रहा नहीं गया और तपाक से पूछ बैठा।
‘‘जिसको जहन्नुम की आग खीच कर ले गयी हो वह वापस कैसे आ सकता है।’’ दल्लू कुछ इस अंदाज़ में बोला मानो बहुत बड़ा मुल्ला कोई बहुत अहम फतवा दे रहा हो।
‘‘लेकिन तुझे अपनी बीवी से मतलब ही क्या। तुझे तो बस शाम को एक पव्वा चाहिए और उसके बाद मस्त।’’
‘‘नाम मत लो उसका। मैंने छोड़ दी है।’’ दल्लू पूरे सुकून के साथ बोला और बिक्कू के साथ चलते हुए नब्बन और मद्दन भी हक्का बक्का रह गये।
‘‘तुमने क्या छोड़ दी है दल्लू मियाँ?’’ कन्फर्म करने के लिये इस बार नब्बन पूछ बैठा।
‘‘वही - जिसका अभी तुमने नाम लिया।’’
‘‘यानि कि देसी।’’
‘‘हाँ वही। अब तो मैं उसका नाम लेना भी गुनाह समझता हूं।’’ पूरी साधुओं वाली शान के साथ दल्लू बोला।
‘‘यकीन नहीं आता। ये करिश्मा कैसे हो सकता है?’’ बिक्कू आँखें फाड़कर बोला।
‘‘मेरे पास आओ तो बताऊं कि ये कैसे हो सकता है।’’ दल्लू फिर से उसी सुकून भरी आवाज़ में बोला। हालांकि वे उसके पास जाने में हिचकिचा रहे थे क्योंकि सभी उसके उधार मांगने की आदत से पूरी तरह वाकिफ थे। और उस का उधार भी ऐसा वैसा नहीं। जेब में हाथ डालकर सीधे निकाल ही लेता था और जो निकालता था वो हमेशा के लिये उसकी देसी में डूब जाता था।
‘‘अरे सोच क्या रहे हो। मैं तुम लोगों से कोई उधार नहीं मांगने वाला। क्योंकि मेरी तमाम ख्वाहिशें
मिट चुकी हैं हमेशा के लिये।’’
अब इन लोगों को पक्का यकीन हो गया कि हो न हो कोई भूत प्रेत आकर दल्लू के सर पर वार हो चुका है और वही उसके मुंह से ये नयी नयी बातें कहलवा रहा है।
नब्बन और मद्दन ने सर पर पैर रखकर भागने का इरादा किया लेकिन बिक्कू ने हिम्मत की और दल्लू की दालान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिये। उसकी देखा देखी नब्बन और मद्दन की भी हिम्मत बंधी और तीनों दल्लू के सामने पहुंच गये।
‘‘हाँ, अब बताओ क्या हुआ तेरी खोपड़ी को। यकीन नहीं आता कि तूने देसी छोड़ दी है।’’ बिक्कू उसकी खोपड़ी सहलाता हुआ बोला।
‘‘मैंने तुम लोगों से कहा कि अब मैं उसका नाम लेना भी गुनाह समझता हूं। क्योंकि रात को मेरे सपने में हज़रत बाबा आये थे।’’
हज़रत बाबा वो लोग उसी फकीर को पुकारते थे जिसने इस गाँव को आबाद किया था और जिसकी नस्ल से ये लोग थे। हज़रत बाबा की मज़ार उस गाँव के बीचोंबीच मौजूद थी।
‘‘तेरे सपने में हज़रत बाबा आ जायें ये नामुमकिन है।’’ मद्दन बोल उठा और दल्लू का चेहरा लाल हो गया।
‘‘अबे मेरे सपने में नहीं आयेंगे तो क्या तेरे जैसे क़साई के सपने में आयेंगे।’’
पेशे से मद्दन का काम कसाई का ही था। और गाँव से मिले हुए बाज़ार में उसकी दुकान मौजूद थी बकरे के गेश्त की।
‘‘तू अपनी बात कर। मेरे सपने में तो रोज़ ही आते रहते हैं और मेरी बीवी को दुआएं देकर चले जाते हैं।’’
‘‘इसीलिए तो इसकी बीवी का वज़न दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है।’’ नब्बन भी बीच में बोल उठा।
‘‘वो तो रात को बची हुई बकरे की टाँगों का कमाल है जो इसकी बीवी के पेट में ही जाती हैं।’’ बिक्कू ने मामला साफ करना चाहा।
‘‘ये सब छोड़ो तुम बता क्या रहे हो? आखिर सपने में आकर हज़रत बाबा ने क्या बोला तुमसे?’’ नब्बन ने सबको रोका वरना दल्लू की बात अधूरी रह जाती और वे हमेशा के लिये सस्पेंस में पड़े रह जाते।
‘‘हज़रत बाबा ने मुझसे बोला कि दिलावर बेटा अगर तू देसी पीना छोड़ दे तो मैं तुमको अनोखी करामात का मालिक बना दूंगा। और उन्होंने बना भी दिया। क्योंकि मैंने उनसे वादा कर लिया कि आइंदा मैं देसी विदेसी किसी के हाथ नहीं लगाऊंगा।’’
‘‘तो फिर उन्होंने तुमको कौन सी करामत का मालिक बनाया?’’ नब्बन ने पूछा।
‘‘उन्होंने मुझे जिन्नातों
को अपने कब्ज़े में करने की करामत का मालिक बना दिया। अब मैं किसी भी जिन्नात को अपने कब्ज़े में कर सकता हूं।
‘‘अच्छा!’’ मद्दन ने बेयकीनी से अपनी आँखें फाड़ीं। उसे तो क्या बिक्कू और नब्बन को भी यकीन नहीं आया था कि हज़रत बाबा एक शराबी के ऊपर इस तरह मेहरबान हो सकते हैं।
आखिरकार बिक्कू आगे बढ़कर उसके कंधे पर हमदर्दी से हाथ रखकर बोला, ‘‘दल्लू भाई। मैंने सुना है कि अगर किसी लती शराबी के शराब न मिले तो वह बहकी बहकी बातें करने लगता है। आज उन सुनी बातों पर यकीन हो गया मुझे तेरी हालत देखकर। आओ हम लोग तुझे ले चलते हैं। तुझे इस वक्त नार्मल हालत में लाने के लिये दो बूंदें टपकानी ज़रूरी हैं तेरी हलक़ में।’’
बिक्कू की बात पर दल्लू कहकहा मारकर हंस पड़ा। उसकी हंसी देखकर तीनों और भी ज़्यादा सकपका गये। यानि कि वह थोड़ा बहुत नहीं सनका था बल्कि पूरा ही पागल हो चुका था।
फिर दल्लू ने किसी तरह अपनी हंसी रोकी और बोला। लगता है तुम लोगों को मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है। इसलिए दो मिनट रुको, मैं अपनी बात का सुबूत पेश करना चाहता हूं।
वह अपनी चारपाई से नीचे उतरा और घर के अन्दर चला गया। अब तीनों बेवकूफों की तरह एक दूसरे का मुंह देख रहे थे।
‘‘अब ये अन्दर कौन सा सुबूत लेने गया है?’’ नब्बन ने मद्दन की ओर देखा।
‘‘पता नहीं मुझे तो यकीन हो गया है कि देसी ने इसके दिमाग की रगें पिघला दी हैं और ये पूरे का पूरा पागल हो चुका है।’’
फिर उनकी बातचीत पर ब्रेक लग गया क्योंकि दल्लू अन्दर से वापस आ रहा था। और उन्होंने देखा उसके हाथ में फूटबाल के आकार का एक गोला मौजूद है जिसके चारों तरफ से हल्की रौशनी फूट रही थी।
फिर जब वह पास आया तो उनके मुंह से चीख निकल गयी। क्येंकि उस गोले में एक बच्चा मौजूद था। जिंदा अपने हाथ पैर चलाता हुआ।
‘‘य...ये क्या है?’’ हकलाते हुए पूछा नब्बन ने।
‘‘यही है वो जिन जिसे मैंने हज़रत बाबा की दी हुई करामाती ताकत से अपनी कैद में कर लिया है।’’

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