Wednesday, July 21, 2021

रोमांचक सस्पेंस कहानी - नक़ली जुर्म

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Wednesday, June 30, 2021

ड्रामा 'अकबर की जोधा'

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Monday, June 21, 2021

फीरान का झूला

 


उस आवाज़ के मुंह से यह सुनकर कि वे फीरान के झूले में प्रवेश कर चुके हैं, सभी हैरत में पड़ गये थे। अभी तक तो जो उन्होंने सुना था उसके मुताबिक तो वो एक खतरनाक जगह थी। लेकिन यहाँ तो सामने फूलों की घाटी नज़र आ रही थी जिसके एक कोने पर सोने का छोटा सा पहाड़ तो दूसरी तरफ रेनबो बिखेरता नीला आकाश। और साथ में उनकी खिदमत के लिये एक बौना गुलाम। बस बदसूरत था थोड़ा सा।

‘‘कितनी अजीब बात है।’’ थोड़ी देर बाद महावीर बोला।
‘‘क्या अजीब बात?’’ सैफ ने पूछा।
‘‘ये मेहनती बौना हमारी इतनी मदद कर रहा है और हमने इसे शुक्रिया भी नहीं कहा अभी तक। चलो इससे हाथ मिलाकर शुक्रिया कहते हैं।’’ कहते हुए महावीर बौने की तरफ भेजा।
‘‘हैलो मिस्टर खादिम तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया।’’ महावीर ने शेकहैण्ड के लिये अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया लेकिन बौना पीछे हट गया।
‘‘खादिम को शोभा नहीं देता कि वह अपना हाथ मालिक के साथ मिलाये।’’ बौना पूरे विनय के साथ बोला।
‘‘अच्छा तुमको शाबाशी तो दे सकता हूं कंधा थपथपाकर।’’ कहते हुए महावीर फिर उसकी तरफ बढ़ा लेकिन बौना फिर पीछे हट गया।
‘‘नहीं। मेरा बदन हमारे मालिकों के लिये अछूत है।’’ वह फिर जल्दी से बोल उठा।
‘‘ये तो ऐसा अपने को बचा रहा है जैसे हमारे छूते ही पिघल जायेगा।’’ सैफ बड़बड़ाया।
महावीर ने आगे कुछ नहीं कहा और न ही उसकी तरफ बढ़ने की कोशिश की।
‘‘ये हमें अपने जिस्म से दूर रखने की कोशिश कर रहा है। आखिर क्यों?’’ इसबार उसने सैफ से कोडवर्डस में कहा।
‘‘मुझे लगता है कि यह चूंकि एक थ्री डी इमेज ही है इसलिए हमारे हाथ लगाने से वह इमेज बिगड़ सकती है।’’ कोडवर्डस में ही सैफ ने अपना ख्याल ज़ाहिर किया। ज़ाहिर है इस पूरे तामझाम के पीछे का दिमाग उनकी सारी बातें सुन रहा था। ऐसे वक्त में कोडवर्डस में ही बातें करना मुनासिब था।
‘‘मुझे इसके पीछे कोई और गहरा राज़ मालूम होता है।’’
‘‘तुम लोग यहीं बैठे मक्खियां मारते रहो बैल की औलादों। ऐसे निकम्मे लोग निकले हें खज़ाने की तलाश में। अब मैं अकेले जा रहा हूं सोना बटोरने।’’ अचानक वडाली ने बोलकर सभी को चौंका दिया।
उन्होंने देखा, कहने के साथ ही उसने सोने की पहाड़ी की तरफ दौड़ लगा दी थी।
‘‘अबे खुदाई किससे करेगा?’’ सैफ ने पुकारा।
‘‘अपने हाथों से।’’ दौड़ते हुए ही उसने जवाब दिया।
‘‘लगता है उसके हाथ हाथ नहीं बल्कि लोहे के बेलचे हैं। क्या तुम लोग उसका साथ नहीं दोगे? फड़वा और तसला बनकर?’’ सैफ ने नताशा और बामर की तरफ देखा।
नताशा ने बुरा सा मुंह बनाया, ‘‘हम खज़ाने की तलाश में यहां तक आकर एक गलती कर चुके हैं। अब इस बेवकूफी में और नहीं पड़ेंगे।’’ शायद अब नताशा सैफ और महावीर के सामने अपना लालच ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी। पहले ही अच्छी खासी बेइज़्ज़ती हो चुकी थी।
‘‘हाँ। और क्या प्लेन तो तबाह हो गया। हम खज़ाना ले कैसे जायेंगे?’’ बामर ने भी हां में हां मिलायी।
‘‘खज़ाना मिल जाये तो दूसरा खरीद लेना। फिर उसी पर लादकर निकल जाना।’’ सैफ ने मशविरा दिया।
‘‘ये तो वही बात हुई कि मुर्गी खरीदकर उससे अंडा निकलवाया जाये या अंडा खरीदकर उससे मुर्गी निकलवाई जाये।’’ महावीर हंसकर बोला।
‘‘हम लोग खुद को यहां से निकाल ले जायें यही बड़ी बात है।’’ गोल्डी भी बोल उठा।
‘‘लेकिन हम लोग किसी अंडे के अन्दर थोड़ी न बन्द हैं।’’
‘‘क्या पता। हो सकता है ये जगह किसी एलियेन का अण्डा ही हो। किसी बहुत बड़े एलियेन का अण्डा।’’ इस वक्त महावीर भी तफरीह के मूड में आ चुका था।
‘‘कुछ भी हो लेकिन लगता नहीं हम यहां से बाहर निकल पायेंगे।’’ गोल्डी इस तरह बोल रहा था मानो उसकी जान निकली जा रही हो।
‘‘तो क्या तुझे यहां से निकलने की उम्मीद नहीं? तू तो यहां कई बार आ जा चुका है।’’ सैफ ने गोल्डी को घूरा।
‘‘पहले और अब में बहुत फर्क दिखाई दे रहा है। अब तो ये जगह मेरे लिये पूरी तरह अजनबी हो चुकी है।’’ गोल्डी मुंह बनाकर बोला।
सैफ आगे कुछ बोलने वाला था लेकिन उससे पहले ही नताशा बोल उठी।
‘‘मैं तो जाती हूं फूल तोड़ने। बहुत खूबसूरत फूल लगे हैं यहाँ।’’ नताशा झाड़ियों की तरफ बढ़ी जो शायद मुश्किल से दो सौ मीटर के फासले पर थीं। सैफ और महावीर दोनों को जाते हुए देख रहे थे जबकि गोल्डी और बामर एक दूसरे के कंधे पर हाथों को रखे हुए आगे के बारे में सोच रहे थे। ये अलग बात है कि आगे करना क्या है किसी की समझ में नहीं आ रहा था। बौना अलग अपनी जगह बुत बना खड़ा हुआ था।
‘‘अबे क्या तेरी बैटरी किसी ने निकाल ली?’’ सैफ ने उसे पुकारा।
‘‘खादिम की बैटरी फुल है। आप हुकम तो करें।’’ बौना सर झुकाकर बोल पड़ा।
‘‘हमारा हुकम है कि तू जा और उस सोने के पहाड़ को उठाकर यहीं लाकर पटक दे।’’ बौने की डिमाँड पर सैफ ने हुक्म दे दिया।
‘‘माफ कीजिए ये खादिम की क्षमता से बाहर का हुक्म है।’’ बौना फिर सर झुकाकर बोला।
‘‘बोल तो ऐसे रहा था जैसे अलादीन के चराग के जिन का बड़ा भाई है तू। अच्छा छोटा सा काम कर दे। मेरा सर बहुत दर्द कर रहा है। चल दबा दे।’’
‘‘माफ कीजिए ये खादिम की क्षमता से बाहर का हुक्म है।’’ बौने ने अपना डायलाग हूबहू पहले की तरह से दोहरा दिया।
‘‘तो फिर हमें ऐसे नालायक खादिम की कोई ज़रूरत नहीं। भाग जा यहाँ से।’’
‘‘माफ कीजिए ये खादिम की क्षमता से बाहर का हुक्म है।’’ इसबार वाकई सैफ का दिल चाहा कि वहीं पड़ी ईंट उठाकर अपने सर पर मार ले। उसने खून का बड़ा सा घूंट अपनी हलक के नीचे उतारा और गोल्डी की तरफ घूम गया।
‘‘यार गोल्डी, तेरा बाप यकीनन बहुत बड़ा बेवकूफ था।’’ सैफ ने उसे छेड़ा।
गोल्डी ने उसे व्यंगात्मक भाव से देखा, ‘‘हां था तो। तेरी बात का बुरा नहीं मानूंगा। बेवकूफ न होता तो तेरी खाल में भूसा भरवाकर अपने महल में लटका चुका होता।’’
‘‘अरे नहीं। इस नाकामी की ज़िम्मेदार तो तेरी बेवकूफी है। मैंने उसे बेवकूफ इसलिए कहा कि जहाँ पर सोने का इतना बड़ा पहाड़ मौजूद हैं वहां तेरे बाप को ज़रा सा खज़ाना छुपाने की ज़रूरत क्या थी।’’
‘‘ज़रूरत थी। मैं नहीं जानता ये इतना बड़ा पहाड़ कहां से आ गया। क्योंकि जब डैड यहां काम कर रहे थे तो इस विशाल पहाड़ का नामोनिशान नहीं था।’’
‘‘क्या?’’ हैरत से सैफ का मुंह खुल गया।
‘‘नामुमकिन।’’ बामर बड़बड़ाया, ‘‘इस तरह का पहाड़ बनने में हज़ारों लाखो साल लग जाते हैं। क्या यहां कोई जादूगर पाया जाता है जिसने छूमंतर कहकर ये पहाड़ पैदा कर दिया?’’
‘‘पता नहीं। मैं तो पहली बार ही इसे देख रहा हूं। जबकि इस जगह का चप्पा चप्पा हमारा छाना हुआ है।’’ गोल्डी कंधे उचकाकर सर खुजलाने लगा।
‘‘इस जगह अजीबोगरीब घटनायें घट रही हैं।’’ महावीर बीच में बोला, ‘‘अब यही देखो सैफ, तुम्हारी भूतपूर्व अम्माजान अभी तक उस झाड़ी तक नहीं पहुंच सकी हैं। फूलों को तोड़ने के लिये।’’
‘‘अरे!’’ सैफ के साथ साथ वहां मौजूद सभी हैरत में पड़ गये। क्योंकि जिस रफ्तार से नताशा उन झाड़ियों की तरफ बढ़ी थी उससे तो अबतक उसे उनसे भी आगे निकल जाना चाहिए था। ऐसा मालूम होता था कि वह कदम आगे बढ़ा रही है और नीचे की ज़मीन पीछे की तरफ खिसक रही है किसी ट्रेडमिल की तरह।
‘‘नताशा तुम आगे की तरफ क्यों नहीं बढ़ रही हो?’’ बामर ने पुकारा।
‘‘जा तो रही हूं। लेकिन आखिर मैं उन फूलों तक क्यों नहीं पहुंच पा रही?’’ नताशा की भी हैरत से भरी आवाज़ आयी।
‘‘क्या वडाली की संगत में रहकर अम्माजान का दिमाग पलट गया है?’’ सैफ बड़बड़ाया।
उसी वक्त वडाली की दहशतभरी आवाज़ ने उनका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया, ‘‘ब...बचाओ मुझे।’’
‘‘अब तुझे क्या हुआ?’’ सैफ ने पूछा।
‘‘म...मैं गिरने वाला हूं। कोई मुझे आकर थाम लो प्लीज़। वरना खाई में गिरकर मेरी हड्डियों का सुरमा बन जायेगा।’’ वडाली फिर रोहांसी आवाज़ में बोला। उन्होंने देखा वडाली एक जगह जाकर रुक गया था और कुछ इस तरह से अपने जिस्म को हरकत दे रहा था जैसे किसी बहुत पतले रास्ते पर अपने को बैलेंस कर रहा हो।
‘‘चिपरेलीन की आखिरी बोतल तो टूट गयी थी फिर इसे इतना नशा कैसे हो गया?’’ सैफ डा0बामर की ओर घूमा।
‘‘म...मैं क्या बताऊं।’’ डा0बामर भी हक्का बक्का था।
‘‘कमबख्तों क्या तुम लोग बहरे हो गये हो? मेरी फरियाद सुनाई नहीं देती।’’ वडाली फिर चीखा।
‘‘अरे लेकिन तू तो समतल ज़मीन पर खड़ा है। किधर से गिर जायेगा?’’ बामर भी चीखा।
‘‘तुम सब अंधे हो गये हो क्या? दिखाई नहीं देता।’’ वडाली भी चीखा, ‘‘मैं एक बहुत पतले रास्ते पर चल रहा हूं जिसके दोनों तरफ गहरी खाई है। अरे कोई तो मुझे बचा लो।’’ वह लगभग रो देने वाली आवाज़ में कह रहा था।
‘‘मुझे पक्का यकीन है कि खज़ाना न मिलने की मायूसी ने इसका दिमाग पलट दिया है।’’ बामर ने ख्याल ज़ाहिर किया।
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Monday, May 31, 2021

वैज्ञानिक राजकुमारी

 एक तेज़ फुफकार ने उसे ठिठकने पर विवश कर दिया।


हालाँकि इस घने जंगल में इस प्रकार की फुफकार अप्रत्याशित नहीं थी। किन्तु यह आवाज़ ठीक सामने से आयी थी। और यह निश्चित था कि सामने स्थित घनी झाड़ियों के दूसरी ओर खतरनाक जीव मौजूद है।
उसका नाम सिकंदर था। एक आयुर्वैदिक डाक्टर जिसे जड़ी बूटियों की तलाश यहाँ इस जंगल में ले आयी थी। वह जड़ी बूटियों का विशेषज्ञ था। और स्वयं चिर युवा रहने का नुस्खा जानता था। यही कारण था कि पचास वर्ष की आयु होने पर भी पच्चीस वर्ष से अधिक का दिखायी नहीं पड़ता था। उसका स्वास्थ्य दुश्मनों में ईर्ष्या का विषय था। इस समय दस घन्टों की लगातार मेहनत भी उसके चेहरे पर एक शिकन भी नहीं ला पायी थी।

उसने सावधानी से रास्ता बदला। और जब वह धने झुरमुट को पार करके दूसरी ओर पहुँचा तो यहाँ वह अजीब जीव मौजूद था जिसकी फुफकार वह इतनी देर से सुन रहा था। अजीब इन अर्थों में था कि उसने इस प्रकार का जीव अपने जीवन में पहली बार देखा था। एक दैत्याकार छिपकली नुमा जीव जो आकार में किसी चीते के बराबर था। रह रहकर उसके मुँह से फुफकार के साथ सफेद रंग की भाप निकल रही थी।
अभी वह जीव को देखकर आश्चर्य के सागर में गोते लगा ही रहा था कि वह जीव एकाएक उसकी ओर घूम गया। लगा, मानो जीव को उसकी उपस्थिति का आभास हो गया है। इससे पहले कि सिकंदर अपने बचाव का कोई उपाय करता, एक तीव्र फुफकार के साथ जीव के मुँह से निकलने वाली भाप उसके चेहरे से टकराई और  उसका सर तेज़ी से चकराने लगा। दूसरे ही पल वह चेतनाशून्य हो चुका था।
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जब उसे होश आया तो एक नर्म बिस्तर उसके शरीर को आराम पहुँचा रहा था।  किन्तु यह बिस्तर आधुनिक न होकर किसी नर्म घास की चटाई थी। वह आँखें मलता हुआ उठ बैठा। जब उसने माहौल का अवलोकन किया तो मन यही चाहा कि दोबारा बेहोश हो जाये। कमरे में थोड़ी ही दूर बैठी वह युवती इतनी ही खूबसूरत थी कि बड़े से बड़ा मानव अपने होश खो बैठता। किन्तु उस युवती से अधिक आश्चर्य जनक उस अनोखे जीव की उसकी बगल में उपस्थिति थी जिसके सर पर वह युवती हौले हौले हाथ फेर रही थी।
‘‘आप कौन हैं ? और यह सब क्या है ? मैं कहाँ हूँ ? सिकन्दर के मुँह से जब बोल फूटे तो बहुत से प्रश्नों में एक साथ परिवर्तित हो चुके थे।’’
 ‘‘तुम इस समय मेरे महल में हो और तुम्हें लाने वाला मेरा यह इकलौता दोस्त है।’’ युवती की आवाज़ भी उसके वाह्य सौन्दर्य की तरह खूबसूरत थी।
‘‘मैं इस तिलिस्मी वातावरण को किसी भी तरह नहीं समझ पा रहा हूँ। आखिर यह सब क्या है ?’’ सिकन्दर के चेहरे से उलझन साफ पढ़ी जा सकती थी।
‘‘अभी तुम्हें सब मालूम हो जायेगा। मेरा नाम सोफिया है। अफ्रीका के इस घने जंगल में तुम्हारे आने से पहले मैं एकमात्र मनुष्य थी।’’
‘‘लेकिन तुम इस जंगल में कहाँ से आयी हो ? यहाँ आने का कारण क्या है ?’’
‘‘मैं इस जंगल में कहाँ से आयी, यह मुझे अब याद नहीं। यहाँ मैं अपने बाप के साथ आयी थी। मेरा बाप बहुत बड़ा वैज्ञानिक था। एक प्रोजेक्ट पर कार्य करने के लिये यहाँ आया था, उस समय मेरा बचपन था। फिर धीरे धीरे वर्ष बीतते गये और वह प्रोजेक्ट चलता रहा। मेरे बाप ने मुझे भी वैज्ञानिक बनाकर उस प्रोजेक्ट पर लगा दिया। अब मेरे बाप की मृत्यु हो चुकी है लेकिन यहाँ एक गुप्त लैब में उस लम्बे प्रोजेक्ट पर कार्य चल है जिसे केवल मेरे हाथ अंजाम दे रहे हैं।’’

‘‘ऐसा कौन सा प्रोजेक्ट है जिसने तुम्हें अकेले इस वीरान जगह में जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है।’’ सिकंदर ने पूछा।
‘‘मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें दिखाती हूँ।’’ सोफिया ने उठते हुये कहा।
सिकंदर सोच भी नही सकता था कि ऊपर से छोटी सी झोपड़ीनुमा दिखने वाली यह इमारत अंदर से इतनी विशाल और आधुनिक होगी। सोफिया ने केवल बटन दबाया था और झोपड़ी के फर्श का एक भाग किसी दरवाज़े की तरह खुल गया था। उन्होंने वहाँ बनी सीढ़ियों से नीचे कदम रखा और जब उस तहखाने में पहुँचे तो सिकंदर को महसूस हुआ कि वह किसी साइंस फिक्शन फिल्म के दृश्य का भाग बन गया हो । हर तरफ रखी विभिन्न प्रकार की भारी भरकम मशीनें तारों के जाल द्वारा एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं।
‘‘माई गॉड, मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि इस वीराने में इतनी आधुनिक प्रयोगशाला होगी। सिकन्दर ने चारों ओर दृष्टि घुमाई।
‘‘ अब मैं अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रही हूँ । क्या तुम ऐसी मशीन की कल्पना कर सकते हो जो अपनी तरंगों द्वारा किसी जानवर के मस्तिष्क को प्रभावित कर दे और वह जानवर उन तरंगों के सम्मोहन में बधां हुआ किसी पालतू पशु की तरह हर आज्ञा का पालन करता हुआ उस मशीन के मालिक तक पहुँच जाये।’’
‘‘मुझे तो यह असंभव लगता है।’’
‘‘विज्ञान की दुनिया में असंभव कुछ नहीं। यह देखो, यह रही वह मशीन।’’ सोफिया ने सामने की ओर संकेत किया जहाँ एक विशालकाय मशीन दिखायी पड़ रही थी।
‘‘इस मशीन द्वारा किसी भी जानवर को विशेष प्रकार की तरंगों द्वारा वश में किया जा सकता है। ’’
‘‘तो क्या वह अजीब सा जीव .....!’’
उसका नाम मैगना है। वह एक अद्भुद जीव है जो अपने मुँह से निकलने वाली फुफकार से किसी को भी बेहोश कर सकता है। मैंने इन्हीं मशीनों की सहायता से उसे अपना पालतू बना लिया है।’’
‘‘अद्भुत ! आश्चर्यजनक। कहीं मैं कोई तिलस्मी कहानी तो नहीं पढ़ रहा हूँ। और तुम उस तिलिस्मी कहानी की राजकुमारी हो।’’
‘‘हाँ। मैं राजकुमारी हूँ। लेकिन तिलिस्मी कहानी की न होकर इस वैज्ञानिक दुनिया की राजकुमारी हूँ।
‘‘और राजकुमार कौन है इस राज्य का ?’’
‘‘जल्दी ही तुम्हें मालूम हो जायेगा।’’ उसके शब्द सिकंदर को विस्मित कर गये क्योंकि इससे पहले सोफिया कह चुकी थी कि वह इस स्थान पर एकमात्र मनुष्य है।
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रात का न जाने कौन सा पहर था जब एकाएक सिकंदर की आँख खुल गयी। मस्तिष्क में विभिन्न विचारों की उथल पथल के कारण बहुत देर से उसे नींद आयी थी। इसलिये एकाएक इस प्रकार आंख खुलना अप्रत्याशित था। किसी विशेष कारण से उसकी नींद उचटी थी।
और फिर उसे वह कारण दिख गया। कोई साया था जो उसके सिरहाने बैठा हुआ था।
‘‘कौन हो तुम ?’’ सिकंदर ने जल्दी से उठने की कोशिश की।
‘‘मैं हूँ।’’ यह आवाज़ सोफिया की थी।
‘‘तुम! लेकिन तुम इस समय यहाँ क्या कर रही हो ?’’ सिकंदर चौंक पड़ा।
‘‘आज तुमने पूछा था कि इस वैज्ञानिक दुनिया का राजकुमार कौन है। मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने आयी हूँ।’’
‘‘लेकिन इस समय! यह उत्तर तो कल भी दिया जा सकता है।’’
‘‘इस उत्तर के लिये यही घड़ी सबसे उपयुक्त है।’’ सोफिया ने कहा।
‘‘अब तो मैं इसे सुनने के लिये बहुत अधिक उत्सुक हो गया हूँ।’’
सिकंदर अब उठ कर बैठ चुका था।
‘‘इस दुनिया के राजकुमार तुम हो सिकंदर। मैंने अपने पति के रूप में तुम्हें चुन लिया है।’’ सोफिया के वाक्यों ने मानो वहाँ धमाका किया।
‘‘यह तुम क्या कह रही हो? कहाँ तुम जैसी उच्च कोटि की वैज्ञानिक और कहाँ मैं एक मामूली आयुर्वेदिक डाक्टर।’’
लेकिन तुम मेरे लिये महत्वपूर्ण हो। क्योंकि प्यार छोटा बड़ा नहीं देखता। मैंने तुम्हें उसी समय पसन्द कर लिया था जब तुम जड़ी बूटियों की तलाश में इस क्षेत्र में पहुँचे थे। फिर अपने पालतू जानवर मैगना को भेजा तुम्हें लाने के लिये।’’
‘‘सोफिया, हालाँकि मैंने अभी शादी नहीं की है किन्तु मेरी आयु तुम से बहुत ज़्यादा है। मैं पचास वर्ष पूरे कर चुका हूँ जबकि तुम्हारी आयु मुश्किल से बीस के आसपास है। फिर कैसे हमारा तुम्हारा जोड़ बैठ सकता है?’’
‘‘तुमने मेरे बारे में, मेरी आयु के बारे में गलत अनुमान लगाया है। मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ कि आयु हमारे बीच रूकावट नहीं बनेगी।
सिकंदर के लिये यह अत्यन्त हर्षमिश्रित आश्चर्य था कि एक ऐसी युवती उसके प्रेम पाश में बंध गयी थी जो न केवल सुंदर थी बल्कि उच्चकोटि की वैज्ञानिक भी थी। कोई कारण नहीं था कि वह उसके निमन्त्रण को अस्वीकार कर देता।
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फिर उस सुनसान स्थान पर सिकंदर को सोफिया के साथ रहते हुये तीन माह बीत गये। अब तक वह प्रयोगशाला और यहाँ की मशीनों के बारे में लगभग सम्पूर्ण जानकारी हासिल कर चुका था। किन्तु अभी भी एक रहस्य ऐसा था जिसके पर्दे उसके सामने से नहीं हटे थे। वह रहस्य था प्रयोगशाला से सटा एक कमरा जो सदैव बन्द रहता था।
कई बार सिकंदर ने सोफिया से उस कमरे के बारे में पूछा किन्तु सोफिया ने न केवल बताने से मना कर दिया था बल्कि सख्ती से उसे कमरे के खोलने की मनाही कर दी थी।
किन्तु मानव मन का स्वभाव है कि जिस कार्य से उसे रोका जाता है उसी को करने में सबसे अधिक उतावला रहता है। सिकंदर की खोजी प्रकृति उसे कमरा खोलने के लिये उकसाती रहती थी।
फिर एक दिन उसे अवसर मिल गया।
उस दिन सोफिया अपने पालतू मैगना के साथ प्रयोगशाला से दूर निकल गयी थी और सिकंदर को मालूम था कि उसकी वापसी दो घंटे से पहले नहीं होगी।
सिकंदर ने सोफिया के कमरे की तलाशी ली और जल्द ही उसे वह रिमोट मिल गया जो विभिन्न कमरों के लॅाक खोलने और बन्द करने के लिये प्रयुक्त किया जाता था। रिमोट लेकर वह उस बन्द कमरे के पास पहुँचा और रिमोट का स्विच दबा दिया।
कमरा खुलते ही वह अन्दर दाखिल हो गया।
कमरे में ऐसी कोई वस्तु मौजूद नहीं थी जो रहस्यपूर्ण कही जा सकती। केवल कमरे के बीचोंबीच एक टी.वी. रखा हुआ था। इसके अतिरिक्त सामने दीवार पर एक बूढ़ी औरत की पुरानी पेंटिंग लटक रही थी जो शायद सोफिया की माँ थी।
‘‘फिर आखिर सोफिया ने उसे इस कमरे में आने से क्यों मना किया है?’’ कुछ देर इसी उधेड़बुन में खड़ा रहा। फिर आगे बढ़कर टी.वी. ऑन कर दिया।
उसे स्क्रीन पर सोफिया दिखायी दी। उसने देखा कि सोफिया के बाल धीरे सफेद हो रहे हैं, चेहरे पर झुर्रियां पड़ रही हैं। फिर यह झुर्रियां धीरे बढ़ती गयी। और लगभग दस मिनट बाद स्क्रीन पर सोफिया के बजाय एक बहुत बूढ़ी औरत दिखाई पड़ रही थी। उसने चौंक कर दीवार पर टंगा चित्र देखा, जिसका चेहरा स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरे से पूर्णतः मेल खा रहा था।
उसी समय उसे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी, ‘‘यह तुमने क्या किया सिकंदर!’’
वह चौंककर पीछे की ओर घूमा और आश्चर्यचकित रह गया। स्क्रीन पर दिखने वाली औरत सशरीर उसके पीछे खड़ी थी। और उसकी बगल में मैगना खड़ा था।
‘‘आप कौन हैं ?’’ उसके मुँह से प्रश्नात्मक स्वर फूटा।
‘‘मैं सोफिया हूँ। लेकिन अब तुम मुझे नहीं पहचान पाओगे। मैंने तुम्हें इस कमरे में आने से मना किया था लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी।
‘‘सोफिया ! तुम! तुम्हारी यह हालत कैसे हुई ?’’ सिकंदर आतुरता से उसकी ओर बढ़ा।।
‘‘अब तो मुझे सब कुछ बताना पड़ेगा।’’ सोफिया एक कुर्सी पर बैठते हुये बोली, ‘‘मैंने तुमसे एक बार कहा था कि तुमने मेरी आयु के बारे में गलत अनुमान लगाया है।’’
‘‘हाँ। कहा तो था।’’
‘‘तुम विश्वास नहीं करोगे लेकिन यह वास्तविकता है कि मेरी आयु इस समय एक सौ बीस वर्ष है। और यह सामने टंगी तस्वीर मेरी ही है, आज से दस साल पहले की।’’
सिकंदर की पलकों ने मानो झपकना छोड़ दिया और वह सोफिया को एकटक देखने लगा। सोफिया ने कहना जारी रखा, ‘‘यह टी0 वी0 नुमा मशीन मेरा एक अनोखा आविष्कार है जो किसी भी व्यक्ति का यौवन लौटा सकती है। आज से दस वर्ष पहले मेरी चालीस वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद यह तैयार हुई थी। इसका पहला प्रयोग मैंने अपने ऊपर किया था जो पूरी तरह सफल रहा। और मैं पच्चीस वर्ष की युवती में परिवर्तित हो गयी।’’ सोफिया एक पल को रूकी।

‘‘यह अनोखी मशीन कार्य कैसे करती है ?’’
‘‘वास्तव में बुढ़ापा शरीर की कोशिकाओें के कमज़ोर पड़ जाने के कारण आता है। मेरी यह मशीन विशेष प्रकार की रेडियोएक्टिव किरणों के द्वारा ऐसी कोशिकाओं को पुनः शक्तिशाली बना देती है और यह शक्तिशाली कोशिकाएं व्यक्ति को यौवन की ओर लौटा देतीं हैं। लेकिन शायद मेरे भाग्य में चिरयुवा होना नहीं  लिखा था। इसीलिये तुम इस मशीन तक पहुँच गये।’’
‘‘लेकिन इस मशीन के ऑन करने का तुम पर बुरा प्रभाव क्यों पड़ा ? जबकि यह मशीन यौवन की ओर ले जाती है।’’
‘‘जो बटन तुमने दबाया, वह मशीन को ऑन नहीं करता बल्कि मशीन से निकलने वाली रेडियोएक्टिव शक्ति की सप्लाई रोक देता है। जैसे ही यह सप्लाई मेरी कोशिकाओं को मिलना बन्द हुई, मेरी कोशिकाएं पूर्व रूप में  आने लगीं और कुछ ही पलों में मैं अपना यौवन खो चुकी थी।’’
‘‘इस समय अब तुम पहले वाली अवस्था में लौट चुकी हो। तो क्यों न मैं इस मशीन को पुनः ऑन करके तुम्हें फिर युवा दूँ ?’’ सिकंदर ने पूछा।
‘‘ऐसा सम्भव नहीं है। क्योंकि इस मशीन द्वारा जो कोशिकाएं शक्तिशाली बनने के बाद पुनः कमज़ोर हो गयी हैं उन्हें दोबारा शक्ति देने पर वे नष्ट हो जायेंगी और फिर मेरी मृत्यु हो जायेगी।’’
‘‘ओह ! तो ये बात है। यानि अब तुम्हें इसी रूप में जीवित रहना होगा।’’ सिकंदर ने एक ठंडी सांस ली।
‘‘हाँ ! अब तुम पच्चीस वर्ष की सोफिया को भूल जाओ और वापस अपनी दुनिया में लौट जाओ। मेरे भाग्य में अकेलापन ही लिखा हुआ है। मैंने किसी से प्रेम करने में भी बहुत देर कर दी। इसी की सज़ा शायद मुझे मिली है। उफ इतनी देर बातें करने के बाद कमज़ोरी महसूस होने लगी है। शायद मैं बेहोश हो जाऊँ।’’ सोफिया की आँखें धीरे धीरे बन्द होने लगीं।
‘‘नहीं सोफिया, मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। वह प्यार जो केवल दो शरीरों का मिलन नहीं है बल्कि दो दिलों का मिलन है। मैं यहीं रहूँगा तुम्हारा सहारा बनकर।’’ सिकंदर ने बेहोश होती सोफिया को बाहों में लेकर कहा।
सोफिया ने सिकंदर की आवाज़ पर आँखें खोली। उसे सिकंदर की आँखों में आँसू दिखायी पड़ रहें थे। उसने धीरे से हाथ उठाकर उसकी आँखों से आँसू पांछे और फिर बेहोशी की गहरी गर्त में पहुँच गयी।
सिकंदर उसे सोफे पर लिटाकर उठा। वह उसे फिर से होश में लाने के लिये पानी की तलाश में जा रहा था।

---समाप्त --
मासिक 'विज्ञान' के सितम्बर 1999 अंक में प्रथम बार प्रकाशित 

Tuesday, May 18, 2021

अपाहिज एथलीट 

 ‘‘स्टूडेन्ट्स, कल से स्कूल में सालाना गेम्स स्टार्ट हो रहे हैं। इनडोर, आउटडोर हर तरह के गेम उसमें रहेंगे। रनिंग, लांग व हाई जम्प, क्रिकेट और साथ में शतरंज, लूडो वगैरा भी। अगर आप लोग किसी गेम में हिस्सा लेना चाहें तो मेरे पास अपना नाम लिखवा दें।’’

फिर वह महावीर के पास आयी और बोली, ‘‘आई थिंक कि तुम शतरंज के लिये अपना नाम दे दो। आउटडोर में तो तुम्हारे लायक कोई गेम होगा नहीं।’’
‘‘लेकिन मैं आउटडोर गेम में ही हिस्सा लूंगा।’’ महावीर ने दृढ़ स्वर में कहा।
‘‘क्या?’’ टीचर को हैरत का एक झटका लगा, ‘‘तुम कौन सा आउटडोर गेम खेल सकोगे?’’
‘‘रनिंग!’’ महावीर ने जवाब दिया और पूरी क्लास ठहाका लगाकर हंस दी। सभी को यही लगा कि महावीर मज़ाक कर रहा है।
लेकिन महावीर के चेहरे पर मज़ाक का कोई लक्षण नहीं था। वह पूरी तरह गम्भीर था।
‘‘महावीर! ये तुम क्या कह रहे हो?’’ टीचर ने एक बार उसकी टाँगों की तरफ देखा जहाँ सिर्फ दो ठूंठ थे। और फिर उसके चेहरे पर नज़र की जहाँ पहले की तरह गंभीरता छायी हुई थी, ‘‘बगैर टाँगों के तुम दौड़ में कैसे हिस्सा ले पाओगे?’’
‘‘ये मैं कल बताऊंगा।’’ वह टीचर के साथ साथ सारे स्टूडेन्ट को सस्पेंस में डालकर चुप हो गया।
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अगले दिन पूरा स्कूल उस समय हैरत में पड़ गया जब महावीर ने बिना व्हील चेयर के गेट से अन्दर प्रवेश किया। उसने पैंट पहन रखी थी और कायदे के साथ कदम रखते हुए आगे बढ़ रहा था। वहाँ जितने भी बच्चे व स्टाफ वाले उसे पहचानते थे उसे घूम घूमकर देख रहे थे। हालांकि उसके हाथ पहले की ही तरह अपनी जगह मौजूद नहीं थे।
फिर महावीर ही के क्लास की स्टूडेन्ट नैना आगे बढ़ी। वह भी महावीर की तरह विकलांग थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उसकी केवल एक टाँग नहीं थी। वह बैसाखियों का इस्तेमाल करती थी।
‘‘महावीर, ये क्या तुम तो चल रहे हो? यह करिश्मा हुआ कैसे?’’ उसे बातें करते देखकर और भी कई स्टूडेन्ट पास आ गये।
महावीर एक दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘मेरी पैंट को थोड़ा ऊपर करके देखो मालूम हो जायेगा।’’
एक लड़के ने आगे बढ़कर उसकी पैंट को ऊपर किया तो वहाँ पर आधुनिक फाईबर की एक छड़ नज़र आयी। यह फाइबर लचीली प्रकृति का था।
‘‘मैं कई दिनों से छड़ों को अपनी जाँघों से बाँधकर चलने की प्रैक्टिस कर रहा था। इसमें सर्कस के एक कलाकार ने मेरी मदद की है। अब मैं व्हील चेयर का मोहताज नहीं रहा। अपने इन ही पैरों के साथ अब मैं दौड़ में हिस्सा लूंगा।’’
स्टूडेन्ट के साथ साथ टीचर्स भी उसे देखकर दंग थे। तमाम कमियों के बावजूद वह कितना मज़बूत था। शायद उन सब से बहुत ज़्यादा।
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यह दौड़ एक किलोमीटर लंबी थी जिसमें महावीर हिस्सा ले रहा था। लंबी दौड़ होने के बावजूद काफी लड़के इसमें हिस्सा ले रहे थे।
अपने तय समय पर दौड़ शुरू हुई और सभी प्रतिभागी अपने अपने ट्रैक पर दौड़ने लगे। बिना हाथों वाले महावीर को ट्रैक पर देखना अजीब था। लगता था किसी रोबोट को टैªक पर छोड़ दिया गया है। हालांकि उसे देखकर कोई यह अंदाज़ा लगा नहीं सकता था कि उसके पैर ही नहीं है बल्कि वह फाइबर छड़ों के सहारे दौड़ रहा है जो ट्रैक सूट के अन्दर छुपी हुई हैं।
तमाम लड़कों के बीच वह आराम से दौड़ते हुए शायद बीसवें या पच्चीसवें नंबर पर था। धीरे धीरे मंज़िल क़रीब आ रही थी। कुछ लड़के थककर बाहर आ गये थे जबकि महावीर धीरे धीरे आगे आता हुआ सातवें - आठवें स्थान पर पहुंच गया था।
अब केवल सौ मीटर बाक़ी थे। महावीर अब चैथे स्थान पर पहुंच गया था। उसकी रफ्तार में इज़ाफा हो रहा था। पचास मीटर तक आते आते वह तीसरी पोज़ीशन पर आ गया और जब दौड़ खत्म हुई तो उसने और एक अन्य लड़के सैफ ने साथ में फीते को छुआ था।
यह कहना बहुत मुश्किल था कि फस्र्ट कौन है और कौन सेकंड।
फैसला टेक्नालाॅजी पर छोड़ दिया गया। जज दौड़ को रिकार्ड करने वाले कम्प्यूटर की तरफ देख रहे थे। फिर फैसला माइक पर एनाउंस हुआ,
‘इस दौड़ में गोल्ड मेडल जीता है सैफ ने। और दूसरे नंबर पर आने वाले महावीर को सिल्वर मेडल मिला है।’
एक शोर के बीच तमाम लड़के सैफ और महावीर को बधाईयाँ दे रहे थे। सैफ मज़बूत हाथ पैरों वाला महावीर ही की उम्र का लड़का था। विकलांगों के स्कूल में उसका एडमीशन इसलिए हुआ था क्योंकि वह जन्मजात बहरा था। हालांकि माडर्न टेक्नालाॅजी ने उसे इस क़ाबिल कर दिया था कि वह एक मशीन की मदद से अब न सिर्फ दूसरों की आवाज़ सुन सकता था बल्कि उनका जवाब भी दे सकता था। कानों में लगी मशीन आवाज़ को कैच करके उसे विद्युत सिग्नलों में बदलती थी जो सीधे उसके मस्तिष्क में पहुंचकर उसे आवाज़ का एहसास दिला देते थे।
अब उन लोगों को मेडल के लिये स्टेज की तरफ ले जाया जा रहा था।
जैसे ही सैफ एनाउंसर के पास पहुंचा उसने एनाउंसर के हाथ से माइक ले लिया और संयोजकों से कुछ कहने की इजाज़त माँगी। संयोजकों ने इजाज़त दे दी।
उसने माइक पर कहना शुरू किया, ‘‘दोस्तों सेकंड के एक छोटे से हिस्से ने मुझे महावीर से आगे कर दिया लेकिन हक़ीक़त ये है कि महावीर ही इस प्रतियोगिता का विजेता है।’’
उसकी बात सुनकर मजमे में खामोशी छा गयी। तो क्या जजों ने गलत फैसला दिया था?
सैफ ने आगे कहा, ‘‘मैं महावीर को विजेता इसलिए मानता हूं कि मैं अपनी दोनों टाँगों की मज़बूती के कारण इस दौड़ में आगे रहा जबकि महावीर ने बिना पैरों की मदद के अपनी इच्छा शक्ति के बल पर दूसरों को पीछे छोड़ दिया। अतः वास्तविक विजेता वही है और मैं जजों से अनुरोध करूंगा कि गोल्ड मेडल उसे ही प्रदान करें।’’
तालियों की ज़ोरदार गड़गड़ाहट इससे पहले कि जजों को अपना फैसला बदलने पर मजबूर करती, महावीर ने कुछ कहने का इरादा ज़ाहिर किया। उसके सामने माइक लाया गया और वह बोलने लगा, ‘‘ये एक हक़ीक़त है कि मैं नंबर दो पर आया हूं। चाहे उसके पीछे कोई भी वजह हो। इसलिए मैं सिल्वर मेडल ही कुबूल करूंगा। और मुझे यकीन है कि जिन नकली पैरों की मदद से मैं सेकंड पोज़ीशन हासिल कर सका हूं एक दिन उन ही पैरों से मैं फस्र्ट भी आऊंगा।’’ उसके इस मज़बूत लहजे पर इतनी तालियां बजीं कि कान पड़ी आवाज़ सुनाई देना बन्द हो गयी।
जबकि महावीर अब सैफ से कह रहा था, ‘‘साॅरी दोस्त, मैं चाहते हुए भी तुमसे हाथ मिला नहीं सकता।’’
‘‘दोस्ती के लिये हाथों की नहीं दिल के मिलने की ज़रूरत होती है।’’ कहते हुए सैफ ने उसे अपने सीने से लगा लिया। यही उन दोनों की दोस्ती का आग़ाज़ था जो आगे न जाने कब तक चलने वाली थी।
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उपरोक्त कहानी उपन्यास अधूरा हीरो का एक भाग है. पूरा उपन्यास निम्न लिंक  उपलब्ध है : 

Monday, May 10, 2021

हरस का खज़ाना


नताशा और वडाली की शादी हो चुकी थी। और शादी के बाद उन्हें आटे दाल का भाव भी मालूम हो गया था। मालूम भी क्यों न होता, नताशा को तो अरबपति रफीक मस्तान तलाक देकर अपनी सारी प्रापर्टी से बेदखल करके पाई पाई का मोहताज बना चुका था जबकि वडाली चूंकि उसी कंपनी में काम करता था सो बिना रसीदी टिकट बाहर होने के बाद अब चंदे की रसीद खरीदने के भी पैसे नहीं थे।

‘‘मैं कहती हूं कोई बड़ा बैंक लूटने की कोशिश करो वरना गुज़ारा चलना मुश्किल है।’’ नताशा ने होंठों की लिपस्टिक सही करते हुए आठवीं बार ये जुमला सुनाया और बर्तन धोता हुआ वडाली झल्ला गया।
‘‘बैंक कोई मेरे फूफा का घर है जो मुंह उठाया और चले गये। तुम्हें पता है अब बैंकों में कितनी सिक्यिोरिटी होने लगी है। पता नहीं कहां से करमजली थुकहरी औरत मेरी किस्मत में आकर बैठ गयी।’’ जो मुंह कभी नताशा को डार्लिंग और स्वीटहार्ट कहते नहीं थकते थे आज उन ही से मूसलाधार जली कटी निकल रही थी।
‘‘अरे तो फिर गुज़ारा कैसे होगा? मेरा मेकअप बाक्स पूरा खाली हो चुका है।’’ नताशा सर पर हाथ धरे बैठी थी और सामने मेकअप बाॅक्स खुला हुआ रखा था।
‘‘दो दिन पहले पूरा सामान खरीदा था। आज खाली भी हो गया। ऐसे कैसे चलेगा।’’ वडाली ने ठंडी लंबी सी साँस ली और साथ ही अपने माथे पर एक चपत भी रसीद कर दी।
‘‘रहने दो डार्लिग अब मैं बिना मेकअप के ही रहूंगी। तुमको और परेशान नहीं करूंगी।’’ नताशा के लहजे में प्यार ज़रूर था लेकिन उस प्यार भरी आवाज़ को निकालने में नताशा ने जो दाँत पीसे थे उसकी आवाज़ बर्तनों की खड़खड़ाहट के बावजूद वडाली के कानों तक पहुंच गई।
‘‘अरे रे ऐसा जुल्म भी मत करना। अब क्या हार्ट अटैक पड़वाओगी बिना मेकअप की शक्ल दिखलाकर।’’ वडाली घबराकर बोला, ‘‘मैं कोशिश करता हूं। कहीं से फाईनेन्स का जुगाड़ करता हूं। काश कि तुम्हें रफीक मस्तान को मारने में कामयाबी मिल जाती तो आज हम ऐश कर रहे होते। लेकिन तुमसे एक काम भी ढंग का नहीं हुआ।’’ वह एक बार फिर बड़बड़ाने लगा। उसका यूं बड़बड़ाना अब नताशा से झेला नहीं जा रहा था लेकिन अब दोनों को एक दूसरे को झेलना मजबूरी बन चुका थी।
‘‘तुम मेरे ऊपर ब्लेम करना छोड़ो और बर्तन ढंग से साफ करो। सुबह नाश्ते में रात की सब्ज़ी की बू आ रही थी।’’ नताशा लिपिस्टिक लगाना छोड़कर अब पर्स खोलने लगी। फिर उसने सिगरेट निकाली और दो तीन कश मार दिये।
वडाली ने उसे सिगरेट पीता देखा और मुंह बनाकर रह गया। उस औरत के साथ जबसे उसने शादी की थी उसकी नाक में दम हो चुका था। एक तो वह औरत किसी तरफ से लगती ही नहीं थी अजीब मर्दमार टाइप की थी।
उसने सोचा था कि उससे शादी करके वह रफीक मस्तान की अरबों की सम्पत्ति का मालिक बन जायेगा और खूबसूरत जवान बीवी अलग मिल जायेगी। लेकिन पहले सपने पर तो बुलडोज़र चल गया और दूसरा सपना जब हकीकत में बदला तो मालूम हुआ टाॅफी के चक्कर में ऐसी च्यूंगम निगल चुका है जो पहले ही कोई चूसकर जा चुका है।
‘‘मैं पूछती हूं बर्तन धोने में इतनी देर लगाओगे तो झाड़ू पोंछा कब करोगे?’’ इस बार नताशा की लताड़ उसे होश में ले आई और वह जल्दी जल्दी बर्तन धुलने लगा।
‘‘काश कि तुम रफीक मस्तान को मारने में कामयाब हो जाती तो आज ये बर्तन रोबोटिक्स मशीनें धो रही होतीं।’’ वडाली मायूसी के साथ फिर से पुराना राग अलापने लगा।
‘‘अब जो काम हो ही नहीं पाया उसके लिये रोने से फायदा? कुछ नया करना ही होगा। बैंक लूटने का प्लान ही सबसे बेहतर है।’’
‘‘आज के ज़माने में बैंक लूटना नामुमकिन है।’’ वडाली ने हाथ खड़े कर दिये।
‘‘इस दुनिया में नामुमकिन कुछ नहीं। फीरान को मारना भी नामुमकिन था। लेकिन मिस्टर परफेक्ट ने वह कर दिखाया। और उसकी अम्मा ने रफीक को मुझसे बचा लिया। मेरा बस चले तो उसका खून पी जाऊं।’’ नताशा ने दाँत पीसे।
‘‘तो फिर ठीक है। चलो एक बार पूरे शहर का चक्कर लगाकर आते हैं और फिर देखते हैं कौन सा बैंक सबसे बेहतर होगा लूटने के लिये।’’
दोनों में सहमति बन गयी और थोड़ी ही देर में वे तैयार होकर अपने फ्लैट से नीचे उतर चुके थे।
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डा0 बामर को चार महीने की सज़ा के बाद बेल मिल चुकी थी। जेल में पूरे चार महीने तक वह एक ही बात सेाचता रहता था और अब बेल मिलने के बाद जब वह एक रेस्टोरेंट में पहुंचा तब भी वही बात सोच रहा था।
ये वही बात थी जो शोतन ने उसे बतायी थी। यानि हरस का खज़ाना।
हरस का शायद टनों खज़ाना इस ज़मीन के किसी हिस्से में मौजूद था और जिस हिस्से में मौजूद था उसका पता गोल्डी के अलावा किसी को नहीं था। लेकिन गोल्डी तो पागल हो चुका था।
उसने ठंडी साँस ली और किसी बकरे की तरह अपना मुंह चलाने लगा। मुंह इसलिए चला रहा था क्योंकि भूख ज़ोरों की लगी थी और जिस रेस्टोरेंट में बैठा था उसका वेटर शायद घोंघे की खानदान से था। आर्डर लेकर जो गया तो अभी तक वापस नहीं लौटा था।
बोरियत दूर करने के लिये उसने इधर उधर नज़रें दौड़ाना शुरू कर दीं। और फिर एक औसत उम्र के जोड़े पर जाकर उसकी नज़र ठहर गयी जिसमें औरत अच्छी खासी खूबसूरत थी। मर्द कैसा था इससे उसे कोई मतलब भी नहीं था। सबसे खास बात ये कि जैसे ही औरत की नज़र उसकी नज़र से टकराई उस खूबसूरत हसीना ने मधुर मुस्कान उसके ऊपर निछावर कर दी।
एक मर्द को और चाहिए भी क्या होता है। इस मुस्कुराहट ने उसे चारों खाने चित कर दिया। लेकिन उस औरत के साथ बैठा मर्द कौन था?
‘शायद उसका भाई है।’ उसने देखा औरत लगातार उसे देखकर मुस्कुरा रही थी। फिर वह इशारे भी करने लगी। पास आने के इशारे। एक मर्द को औरत से और क्या चाहिए होता है। वह तुरन्त अपनी सीट से उठा और उनके पास पहुंच गया।
‘‘जी आपने मुझे बुलाया?’’ उसने पूरी शालीनता के साथ पूछा।
‘‘जी हाँ। मेरी अपने साथी से शर्त लगी थी आप प्लीज़ बैठिए।’’
वह फौरन खाली कुर्सी पर बैठ गया और पूछने लगा, ‘‘कैसी शर्त।’’
मैंने शर्त लगायी थी कि आप की शक्ल और बाॅडी पूरी तरह एक्स मोंटी से मिलती है लेकिन मेरा साथी इससे सहमत नहीं।’’
सुनते ही डाक्टर बामर कढ़ाही में पड़े भटूरे की तरह फूल गया। अब एक्स मोंटी से तो उस ज़माने का बच्चा बच्चा वाकिफ था। एक्शन फिल्मों का सुपरस्टार। उसके नाम से ही फिल्में हिट हो जाती थीं।
‘‘मैं कहता हूं ये छछूंदर एक्स मोंटी के अंगूठे के बराबर भी नहीं।’’ औरत का साथी गुर्राकर बोला। और डा0बामर को उसपर बेतहाशा गुस्सा आ गया। हालांकि बड़ी मुश्किल से उसने उस गुस्से पर काबू पाया वरना उसकी इमेज औरत की नज़र में तो खराब हो ही जाती।
‘‘तुम्हारे कहने से क्या होता है - वडाली। ये एक्स मोंटी का डुप्लीकेट है तो है।’’ औरत अपनी बात पर अड़ी थी।
‘‘नताशा! तुमको आदमी पहचानने की अक्ल ही ऊपर वाले ने नहीं दी है। मैं फिर कहता हूं ये आदमी छछूंदर का दूसरा भाई है। अरे अगर इसके सामने गली का कुत्ता भी तेज़ आवाज़ में भौंक दे तो इसकी ... गीली हो जायेगी।’’ वडाली बायीं आँख दबाकर बोला।
इतनी बेइज़्ज़जी के बाद तो किसी का भी दिमाग आउट हो सकता था तो डा0बामर का फिर क्यों न होता। उसने झपट कर वडाली का गरेबान थाम लिया।
लेकिन दूसरे ही पल उसके हाथ पैर ढीले हो गये क्योंकि कोई नुकीली चीज़ उसकी पसली में चुभने लगी थी। और चुभाने वाला वडाली ही था।
‘‘बेटा गरेबान छोड़ दे वरना यहीं बैठा बैठा ऊपर पहुंच जायेगा। ये स्पेशल खंजर है अन्दर तक काट भी डालेगा और खून भी नहीं टपकेगा। पोस्टमार्टम से पहले घाव का पता भी नहीं चलेगा।’’ वडाली की धीमी ठंडी आवाज़ डा0 बामर के कानों में पहुंची और उसके हाथ पैर ठंडे हो गये। वो एक साइंटिस्ट था और लड़ाई भिड़ाई से दूर दूर तक उसका नाता नहीं था।
ये तो साफ हो ही गया था कि दोनों कुछ लुटेरे टाइप के प्राणी हैं।
‘‘त..तुम लोग क्या चाहते हो?’’ उसने हांफते हुए पूछा।
‘‘हम चाहते हैं तुम हमारा बिल भर दो।’’ नताशा एक अदा के साथ बोली।
‘‘व...वो तो मैं यूही भर दूंगा। इसके लिये च...चाकू की क्या ज़रूरत।’’ वह कांपते हुए बोला।
‘‘सिर्फ बिल भरने से काम नहीं चलेगा छछूंदर। तुझे हम लोगों के आठ दस दिन के खर्चे का भी इंतिज़ाम करना होगा। हमने पहले सोचा बैंक लूटा जाये लेकिन उसमें रिस्क ज़्यादा है। सो अब तुम्हारे जैसे आसामियों से काम चलाना पड़ेगा।’’
‘‘पर्स इसका काफी भारी लग रहा है। लगता है हमारे पूरे महीने का जुगाड़ हो गया।’’ दूसरी तरफ से नताशा उसका पर्स टटोल रही थी।
उधर डा0 बामर किसी और ही धुन में था। कुछ सोचकर उसके चेहरे पर एक चमक आ चुकी थी। वह धीरे से बोला, ‘‘मेरे पास एक प्लान है अगर कामयाब हो गया तो तुम लोगों को जिंदगी भर किसी को लूटने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।’’
‘‘कैसा प्लान?’’ वडाली उसे घूरकर बोला। उसकी बात पर नताशा भी चौंक पड़ी थी।
‘‘ऐसे नहीं।’’ डा0बामर आगे झुककर धीमी आवाज़ में बोला, ‘‘इतनी ज़रूरी बात न तो चाकू की नोक पर होती है और न रेस्टोरेंट जैसे किसी पब्लिक प्लेस पर। आजकल किस रेस्टोरेंट की दीवार में कौन सा माईक छुपा है कोई नहीं जानता।’’ वह धीरे से पूरी राज़दारी के साथ बोल रहा था।
‘‘तो फिर कहीं और चलते हैं। लेकिन बिल तो तुमको ही पे करना पड़ेगा। हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं है।’’ वडाली सर हिलाते हुए बोला।
‘‘हां वो तो मैं बोल ही चुका हूं।’’ वडाली ने अपना चाकू वापस जेब में रख लिया। फिर डा0बामर ने अपना और बाकी दोनों को बिल चुकाया और तीनों उठ खड़े हुए।
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Tuesday, May 4, 2021

तस्वीर

 


‘‘क्या मुसीबत है। इस कार को भी यहीं खराब होना था।’’ विवेक ने इग्नीशन में चावी घुमायी लेकिन कार का इंजन हर बार एक घरघराहट की आवाज करने के बाद खामोश हो गया। उसकी बगल में बैठी उसकी पत्नी के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें उभर आयी थीं। अभी तक आराम से चलने से चलने वाली कार इस जगंह आने के साथ ही बन्द हो गयी थी और फिर लाख कोशिशें भी उस कार को स्टार्ट नहीं कर पा रही थीं।

विवेक ने इधर उधर नज़रें दौड़ायीं, कहीं कोई मनुष्य नहीं दिख रहा था। सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था जिसमें से आने वाली जानवरों की आवाजें माहौल को डरावना बना रही थीं।
‘‘इस जंगल में तो हम किसी की मदद भी नही ले सकते।’’ विवेक ने चिन्ताजनक लहजे में कहा।
‘‘शायद कारबोरेटर में कुछ कचरा वगैरा आ गया है।’’ उसकी पत्नी सीमा ने कहा।
‘‘देखता हूँ।’’ विवेक ने बोनट उठाया और इंजन पर नजर दौड़ाने लगा। काफी देर माथापच्ची करने के बाद भी खराबी पकड़ में नहीं आयी। आखिरकार वह पसीना पोंछता हुआ सीधा हो गया।
‘‘लगता है यह रात यहीं वीराने में गुजारनी पड़ेगी।’’ उसने निराशाजनक स्वर में कहा। एकाएक दूर से आने वाली ट्रक की हेडलाइट में उसकी कार चमकने लगी।
‘‘क्यों न उस ट्रक से हम लोग लिफ्ट ले लें।’’ सीमा ने सुझाव दिया।
‘‘कोशिश करते हैं कि वह हमारी मदद करने पर तैयार हो जाये।’’ विवेक ने कहा और ट्रक के पास आने की प्रतीक्षा करने लगा। जब ट्रक करीब आया तो उसने उसे रोकने के लिए हाथ दिया। ट्रक कार के पास आकर रुक गया।
‘‘क्या बात है भाई जी ?’’ ड्राइवर ने सर निकालकर पूछा।
‘‘हमारी कार खराब हो गयी है। क्या तुम हमें शहर तक लिफ्ट दे दोगे?’’ विवेक ने पूछा। उसकी बात सुनकर ट्रक में सवार व्यक्ति नीचे उतर आये। ड्राइवर समेत यह तीन लोग थे।
‘‘हम लिफ्ट जरूर देंगे।’’ उनमें से एक बोला, ‘‘लेकिन सिर्फ तुम्हारी बीवी को। तुम्हें नहीं।’’ उसकी आवाज में छुपी शैतानियत ने विवेक के मस्तक पर चिन्ता की रेखाएं डाल दीं। सीमा भी बुरी तरह घबरा गयी थी। वह विवेक के पीछे छुपने की कोशिश करने लगी, लेकिन ड्राइवर ने आगे बढ़कर उसका बाजू पकड़ लिया। विवेक उसे छुड़ाने की कोशिश करने लगा, लेकिन दरिन्दे तीन थे। इसलिए वह बेबस हो गया।
‘‘क्या हो रहा है यहाँ ?’’ एकाएक वहाँ किसी औरत की कमज़ोर आवाज़ गूँजी। सबने चौंक कर आवाज़ की दिशा में देखा। जंगलों की तरफ एक बुढ़िया खड़ी हुई थी। जिसके हाथ में एक लालटेन थी।
‘‘यह बुढ़िया कहाँ से टपक पड़ी।’’ ड्राईवर बड़बड़ाया, फिर बुढ़िया से मुखातिब हुआ,‘‘ए बुढ़िया! हमारे बीच मत बोल, भाग जा यहाँ से।’’
‘‘बेटा। तुम लोग ये बहुत बुरा कर रहे हो।’’ बुढ़िया ने फिर कहा।
‘‘अगर तू जवान होती तो हम तेरे साथ भी यही करते।’’ ड्राईवर ने सीमा का बाजू खींचते हुये कहा। बाकी दोनों उसकी बात पर कहकहा मारकर हंस पड़े।
‘‘तुम लोग अंधेरे में धंस चुके हो। तुम्हें रोशनी की ज़रूरत है।’’ कहते हुये बुढ़िया ने लालटेन ऊपर की। उसी वक्त उस लालटेन से एक तेज़ रोशनी निकलकर ड्राईवर और उसके दोनों साथियों पर पड़ी। दूसरे ही पल विवेक और सीमा ने देखा कि तीनों धू धू करके जलने लगे थे और चीख पुकार मचा रहे थे। चन्द सेकेन्ड के अंदर ही उसके जिस्म खाक हो चुके थे।
‘‘ये क्या ? कैसे हुआ ?’’ विवेक के स्वर में हैरत थी।
‘‘कुछ भी हो। माँ जी ने मेरी इज़्ज़त बचाई है। आओ हम उनका शुक्रिया अदा करें। अगर आप न होती तो न जाने वे बदमाश क्या करते हमारे साथ।’’ सीमा ने बुढ़िया के हाथ पकड़कर उन्हें चूमना चाहा, लेकिन बुढ़िया दो कदम पीछे हट गयी। ‘‘दूर रहो! मत छूना मुझे।’’ उसने जल्दी से कहा। विवेक और सीमा ने एक दूसरे की तरफ प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा। वे बुढ़िया की बात का कोई अर्थ नहीं निकाल पाये थे।
‘‘तुम लोगों की गाड़ी खराब हो गयी है। इस वक्त कहीं भी जा नहीं सकते  तुम। मेरे साथ चलो और रात भर वही रहो। सुबह चले जाना। ’’ कहकर वह जंगल की तरफ घूम गई। विवेक और सीमा ने उसका अनुसरण किया। काफी देर तक बुढ़िया चलती रही, और उसके पीछे वो लोग। उन्हें हैरत थी कि घने जंगल के बीच बुढ़िया कहाँ और कैसे रहती है।
आखिरकार उनका सफर एक खंडहरनुमा इमारत के सामने जाकर खत्म हुआ। बहुत प्राचीन इमारत लग रही थी जो जगह जगह से टूट फूट रही थी। उसकी दीवारों पर उगे पेड़ पौधे इतने बड़े हो चुके थे कि उनके बीच दीवारों की बस थोड़ी सी झलक दिख रही थी।
‘‘आओ। अन्दर आ जाओ’’ बुढ़िया ने पीछे मुड़े बगैर कहा।
‘‘ये मकान तो बहुत पुराना लगता है।’’ विवेक ने चारों तरफ नज़र घुमाते हुये कहा।
‘‘मेरे बाप ने इसे बहुत चाहत से बनवाया था अपनी इकलौती बेटी, यानि मेरे लिये।’’ बुढ़िया ने जवाब में कहा।
‘‘मुझे तो ऐसा मालूम होता है जैसे बरसों से इस उजाड़ जगह पर कोई आया ही नहीं।’’ बड़े बड़े मकड़ी के जालों को देखकर सीमा के मुँह से निकला।
‘‘न जाने माँ जी इस वीराने में कैसे रह लेती हैं।’’ विवेक ने कहा।
आखिर में बुढ़िया के साथ चलते चलते वे एक कमरे में पहुँच गये जो अपेक्षाकृत साफ सुथरा था।
‘‘तुम लोग यहाँ आराम करो। सुबह होते ही यहाँ से चले जाना।’’ कहकर बुढ़िया वापस जाने को घूमी।
‘‘रूको !’’ विवेक ने कहा, ‘‘क्या हमें एक गिलास पानी मिल सकता है ?’’ बहुत प्यास लगी है।’’
‘‘इस कमरे के पिछवाड़े एक कुआं मौजूद है। तुम लोगां को खुद तकलीफ करके वहाँ तक जाना होगा और बाल्टी डालकर पानी निकालना होगा। और हाँ अगर तुम्हें भूख लगी है तो वहीं फलदार वृक्ष भी लगे हुये हैं। उनके फल तुम लोग खा सकते हो।’’
‘‘तो क्या आप भी यहाँ सिर्फ फल खाकर रहती हैं ?’’ सीमा ने पूछा।
‘‘मेरे बारे में सवाल मत करो और आराम से बैठकर सिर्फ अपनी फिक्र करो। मैं जाती हूँ।’’ वह जल्दी से अपनी लालटेन उठाकर बाहर निकल गयी।
‘‘यह बुढ़िया कुछ अजीब सी नहीं लगती तुम्हें ?’’ सीमा ने विवेक को मुखातिब किया।
‘‘कुछ किया ? यह तो पूरी तरह रहस्यपूर्ण साबित हुई है। तुमने देखा नहीं किस तरह उसने तीनों बदमाशों को राख के ढेर में बदल दिया।’’ विवेक ने सोचने के अंदाज़ में कहा।
‘‘इसके रहने की जगह भी कम रहस्यपूर्ण नहीं है। पूरा भूत बंगला मालूम होता है यह तो। विवेक, कहीं वाकई ये कोई भूत प्रेत का चक्कर तो नहीं ?’’ इस बार सीमा की आवाज़ में कंपन विवेक ने साफ महसूस किया।
‘‘क्या बकवास है। बायोटेक्नालाजी और रोबोटिक्स के ज़माने में तुम भूत प्रेतों  के चक्कर में पड़ी हुई हो। यह सब कुछ नहीं, खामोशी से सो जाओ। सुबह देखेंगे कि बुढ़िया वास्तव में कौन है।’’ कहकर वह बिस्तर पर लेट गया।
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पूरी रात की भरपूर नींद लेने के बाद सुबह जब विवेक सोकर उठा तो सीमा को जागते हुये पाया। वह कुछ परेशान मालूम हो रही थी।
‘‘विवेक, वह बुढ़िया तो गायब हो गयी है।’’ सीमा ने कहा।
‘‘क्या मतलब ?’’ विवेक ने हैरत से पूछा।
‘‘मैंने पूरा घर देख लिया है। वह कहीं नहीं दिखायी दे रही है।’’
‘‘हो सकता है बाहर किसी काम से निकली हो। आओ तब तक मैं भी इस प्राचीन महल को अंदर से देख लेता हूँ। फिर दोनां ने पूरी इमारत का चक्कर लगा लिया लेकिन बुढ़िया कहीं नहीं दिखायी दी। इस बीच उन्हें एक कमरा दिखायी दिया, जहाँ वह लालटेन रखी हुई थी। और उसी कमरे में उस बुढ़िया की आदमकद तस्वीर लगी हुई थी। हाथ से बनी हुई यह तस्वीर किसी बहुत ही अच्छे आर्टिस्ट ने बनायी थी और उसमें बुढ़िया का हुबहू नक़्शा उतार दिया था।
‘‘ऐसा मालूम होता जैसे बुढ़िया इसी कमरे में रहती है। विवेक ने कहा और आगे बढ़कर उसकी लालटेन उठाने लगा।
‘‘कमाल है। यह तो टस से मस नहीं हो रही है। लगता है जैसे इस ज़मीन में जाम कर दिया गया है।’’ विवेक ने हैरत से कहा।
‘‘बुढ़िया की गैरमौजूदगी में हमें उसकी चीज़ों को हाथ नहीं लगाना चाहिये।’’ सीमा ने राय दी। विवेक लालटेन छोड़कर हट गया।
‘‘अब हमें यहाँ से निकल जाना चाहिये।’’ सीमा ने फिर कहा।
‘‘लेकिन सीमा, हम बुढ़िया का शुक्रिया अदा किये बगैर कैसे यहां से जा सकते है। वह हमारे बारे में क्या सोचेगी।’’
‘‘लेकिन अगर वह शाम तक न आयी तो ? और फिर मुझे तो भूख लग रही है।’’
सीमा ने बेचैनी से कहा।
‘‘ खाने के लिये यहाँ आसपास किचन ज़रूर होगा। वहाँ से कुछ न कुछ मिल जायेगा।’’
‘‘हमने तो पूरा घर छान मारा है। किचन तो कहीं नहीं दिखायी दिया।’’
‘‘अरे हाँ। ’’ विवेक चौंककर बोला, ‘‘ बुढ़िया ने कहा था कि कुंऐ के पास फलदार पेड़ लगे हैं।’’ दोनों कुएं के पास आये जहाँ पेड़ों पर तरह तरह के फल लगे हुये थे। पेड़ो को देखकर अनुमान होता था कि जैसे वे हज़ारों वर्ष पुराने हों। उन्होंने पेट भरकर फल खाये और उस कुंऐ का पानी पिया। बहुत मीठा पानी था यह।
‘‘अब तो काफी वक्त हो गया है। बुढ़िया अभी तक नहीं आयी। हमें अब देर न करते हुये यहाँ से निकल जाना चाहिये।’’ सीमा ने एक बार फिर राय दी।
‘‘मेरी जिज्ञासा अब काफी बढ़ चुकी है। जब तक हम यहाँ के रहस्य का पता नहीं लगा लेते, हमें यहीं रूकना होगा। चाहे एक रात और यहाँ गुज़ारनी पड़े।’’
फिर पूरा दिन बीत गया। बुढ़िया का कोई पता नहीं था।
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यह उस खंडहर में दोनों की दूसरी रात थी। दोनों अपने कमरे में मौजूद थे।
‘‘न जाने वह कहां गायब हो गयी।’’ सीमा ने बेचैनी से कहा।
आओ, उसके कमरे में फिर चलकर देखने हैं। शायद वापस आ गयी हो।’’ विकास ने उठते हुये कहा और चिराग हाथ में ले लिया। दोनों उसी कमरे में पहुंचे जहाँ उन्होंने बुढ़िया की लालटेन और फोटो देखी थी।
‘‘अरे लालटेन कहां गायब हो गयी?’’ विवेक ने हैरत से कहा। अब वाकई वहां लालटेन नदारत थी।
‘‘मालूम होता है वह वापस आ चुकी है।’’ सीमा ने अनुमान लगाया। दोनों पूरे कमरे का निरीक्षण करने लगे। फिर उनकी निगाहें दीवार पर टंगी फ्रेम पर टिक गयीं। फ्रेम अपनी जगह मौजूद था लेकिन उसमें बुढ़िया की फोटो नदारत थी।
‘‘क्या चक्कर है ये। सुबह तो हमने इस फ्रेम में बुढ़िया की फोटो देखी थी।’’ विवेक लगातार हैरत के समुन्दर में गोते खा रहा था और साथ में सीमा भी।
‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी वक्त खामोशी से आयी हो, और दोनो चीजें उठाकर खामोशी से निकल गयी हो।’’
‘‘लेकिन उसने ऐसा क्यों किया ? यह पहेली उलझती ही जा रही है।’’
‘‘तुम लोग यहां क्या कर रहे हो ?’’ एकाएक पीछे से आयी बुढ़िया की आवाज़ सुनकर दोनों उछल पड़े। घूमकर देखा तो वह अपनी जगह मौजूद थी, उसी तरह लालटेन को हाथ में थामे हुये।
‘‘तुम ? तुम कहां चली गई थी ? हम लोग तुम्हें ही ढूंढ रहे थे।’’ विवेक ने थोड़ा संयत होकर कहा।
‘‘लेकिन क्यों ? तुम लोगों को तो सुबह होते ही यहां से चला जाना चाहिये था ?’’
‘‘तुम्हारा शुक्रिया अदा किये बगैर और तुम्हें बताये बगैर हम कहां जा सकते थे’’ सीमा ने जवाब दिया।
‘‘क्या तुम्हें ऐसा नहीं मालूम हुआ कि यह जगह भूत प्रेतों का बसेरा है ?’’
बुढ़िया के सवाल पर दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा।
‘‘हालात यकीनन रहस्यपूर्ण हैं। लेकिन हम भूत प्रेतों पर विश्वास नहीं करते। क्योंकि मैं एक वैज्ञानिक हूँ और सीमा मेरी बीवी भी है और असिस्टेंट भी।’’
‘‘शायद अभी तुम्हें यकीन आ जाये।’’ बुढ़िया ने लालटेन उसकी जगह पर रखी और खुद चलती हुई दीवार पर टंगे फ्रेम के पास पहुंची। दूसरे ही पल वह फ्रेम के अंदर जाकर गायब हो चुकी थी, और खाली फ्रेम में बुढ़िया की तस्वीर नज़र आने लगी थी।
‘‘व-व...... विवेक।’’ सीमा ने विवेक का बाजू मज़बूती से पकड़ लिया। एक पल के लिये विवेक भी भौंचक्का रह गया। फिर थोड़ा संभलकर वह फ्रेम के पास गया और कहने लगा, ‘‘यह जो कुछ भी रहस्य है, मेरी सांइस-मेरा ज्ञान इसकी व्याख्या कर पाने में लाचार है। मेरे ज्ञान से बाहर की चीज़ है यह सब। इसके बावजूद मैं इसे कोई चमत्कार मानने को तैयार नहीं हूँ। अगर यह चमत्कार है भी तो किसी बहुत ही उच्च कोटि के विज्ञान का, जहाँ तक मेरी अक्ल नहीं पहुंच पा रही है।’’
एक बार फिर फ्रेम की तस्वीर वास्तविक रूप में आ गई। बुढ़िया के रूप में दोनों के सामने आकर उसने कहना शुरू किया,‘‘मैं खुश हूँ कि तुमने मुझे भूत प्रेत मानने से इंकार कर दिया। आज से पहले यहां कई लोग आये, लेकिन कुछ क्षणों से ज़्यादा टिक नहीं पाये। कुछ तो पागल भी हो गये। मेरा भी यही मकसद था कि किसी अक्षम व्यक्ति को मेरा और मेरे महल का राज़ न मालूम होने पाये। यह जगह हमेशा गुमनामी के अंधेरे में रहे। लेकिन तुम लोगों को मैं अपना रहस्य ज़रूर बताऊँगी। हाँ उससे पहले तुम्हें एक वादा करना होगा।’’
‘‘कैसा वादा ?’’ विवेक सीमा ने एक साथ पूछा।
‘‘यह कि तुम लोग मेरी बतायी कहानी को अपने सीनों में दफ्न कर दोगे।’’ बुढ़िया ने खाली फ्रेम को घूरते हुये कहा।
इस समय दोनों के सामने उसकी पीठ थी।
‘‘हम वादा करते हैं।’’ दोनों ने कहा।
‘‘ठीक है।’’ बुढ़िया ने अपनी कहानी शुरू की,
‘‘चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का युग भारत का स्वर्ण युग माना जाता है। वैज्ञानिकों, गणितज्ञों और कलाकारों का युग था यह। तकनीक में बेजोड़ अनेकों इमारतें इसी युग में बनीं। यहांँ तक कि अद्भुत मशीनरी से संचालित होने वाले तिलिस्म भी इस युग की पहचान बन गये जिनका बाद के किस्से कहानियों में ज़िक्र मिलता है।
मेरा बाप भी एक महान वैज्ञानिक था और चन्द्रगुप्त के दरबार की शान था वह। यह जगह उसकी प्रयोगशाला भी थी और घर भी। जहां वह अपनी इकलौती बेटी यानि मेरे साथ रहता था। अपनी जवानी में मैं बहुत खूबसूरत थी। अपने बाप का हाथ बटाते हुये मैं भी एक उच्च कोटि की वैज्ञानिक बन गई थी। उस समय भी यह जगह इसी तरह वीरान थी।
मेरे बाप के मस्तिष्क में एक ऐसा तिलिस्म बनाने का विचार था जिसका हर दरवाज़ा कुछ विशेष लोगों की गंध पाकर खुल जाये। और उनके अलावा और कोई व्यक्ति उस जगह प्रवेश करे तो तिलिस्म के जाल उसे अपने शिकंजे में कस लें। वह दिन रात अपने काम में जुटा हुआ था कि एकाएक उस काली रात में एक भयंकर दुर्घटना हो गयी।’’
दोनों पति पत्नी अपनी सांस रोके हुये उसकी कहानी सुन रहे थे। जो कुछ भी उसकी कहानी में था अविश्वसनीय था।
बुढ़िया ने आगे कहना शुरू किया,‘‘उस दिन मैं कुछ खरीदने शहर गयी हुई थी। वापसी में रात हो गयी। विक्रमादित्य का ज़माना महिलाओं के लिये बहुत सुरक्षित था। उनका बहुत सम्मान किया जाता था। लेकिन उस दिन वह अनहोनी घट गयी  जिसका कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था। जब मैं एक सुनसान पगडंडी पर  मुड़ी तो अचानक तीन बदमाश झाड़ियों के पीछे से निकलकर मेरे सामने आ गये। उन्होंने मुझे झाड़ियों में खींच लिया। और मेरे साथ ज़बरदस्ती की। तब मुझे एहसास हुआ कि एक महिला कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती है। मेरा बाप मेरे साथ हुये कांड का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाया और दिल के दौरे ने उसकी जान ले ली। कुछ दिन तक मैं निढाल सी रही और फिर हालात से समझौता कर लिया। बाप का दिया गया वैज्ञानिक ज्ञान मेरे मस्तिष्क में मौजूद था। मैंने अपना प्रयोग आगे शुरू किया लेकिन अब मेरा मकसद पूरी तरह बदल चुका था मैं महिलाओं की रक्षा के लिये किसी कारगर हथियार की तालाश में जुट गयी थी। जिसमें वह अकेली होते हुये भी अपने दुष्मनों पर भारी पड़े मेरा जीवन तो तबाह हो ही चुका था लेकिन मैं और किसी महिला के साथ यह पुनरावृत्ति नहीं चाहती थी।
फिर मैं बरसों तक कार्य करती रही। यहां तक कि मेरी उम्र अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गयी। आखिरकार मेरे कार्य का पहला चरण पूरा हुआ और एक नायाब यन्त्र मेरे हाथ में आ गया।
‘‘कैसा यन्त्र ?’’ बरबस ही विवेक ने पूछा।
‘‘वह यन्त्र तुम्हारे सामने है। दो भाग है इसके। पहला भाग वह लालटेन है जिससे निकलने वाली रोशनी ने तीनों बदमाशों की जान ली।
‘‘और दूसरा भाग ?’’ सीमा ने पूछा।
‘‘दूसरा भाग मैं खुद हूँ। या फिर फ्रेम में जुड़ी मेरी तस्वीर।’’ बुढ़िया ने कहा।
‘‘लेकिन तुम इतने वर्षों से ज़िन्दा कैसे हो ?’’ हैरत से सीमा ने सवाल किया।
बुढ़िया एक कहकहा मारकार हंस दी,‘‘लो खा गये न धोखा! मैं तो अपने यन्त्र को बनाने के कुछ ही समय बाद मर गयी थी।’’
‘‘तो फिर तुम मेरे सामने कैसे खड़ी हो ? कैसी पहेली है ये ?’’ विवेक ने बेचैनी से पूछा।
‘‘मेरी कहानी पूरी होने तक तुम्हें कुछ समझ में नहीं आयेगा।’’ बुढ़िया ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘सबसे पहले मैं लालटेन के बारे में बताती हूँ। आधुनिक युग की लेसर किरणों का प्राचीन स्वरूप है ये। प्रकाश के कणों के विशेष प्रकार के कंपन द्वारा यह प्रकाश इतना तीव्र हो जाता है कि किसी की भी जान ले सकता है। लालटेन के अंदर मणिभ से बना यन्त्र प्रकाश में ये कंपन कराता है।
लेकिन ये कंपन तभी उत्पन्न होते हैं जब लालटेन अपने ऊर्जा स्त्रोत के साथ जुड़ती है। और ये ऊर्जा स्त्रोत मेरी ऊर्जीय परछाईं के रूप में तुम्हारे सामने मौजूद है।’’
‘‘ऊर्जीय परछाईं ? यह क्या बला है ?’’ विवेक ने पूछा। दोनां पूरी तरह बुढ़िया की कहानी में रम चुके थे।
‘‘मेरा असली आविष्कार तो यही है। यह फ्रेम जो तुम देख रहे हो, इसके अन्दर मौजूद तस्वीर दरअसल एक ऐसा जटिल ऊर्जा स्त्रोत है जिसकी एक निश्चित शक्ल है। फ्रेम के अन्दर बहुत छोटे छोटे छिद्र हैं जिनसे ऊर्जा स्पंद लगातार निकलते रहते हैं। और मेरी तस्वीर के रूप में दिखते रहते हैं। इस फ्रेम में इतनी ऊर्जा का भंडार है जितनी एक परमाणु बम में होती है। अगर तुम मेरी परछाईं को छू भी लो तो फौरन भस्म हो जाओगे। और साथ ही इसके अन्दर कृत्रिम बुद्धिमता का भी समावेश है। एक ऐसा कृत्रिम मस्तिष्क इसमें मौजूद है जो हूबहू मेरे मस्तिष्क की नकल है। इसकी स्मृति में मेरे जीवन की समस्त जानकारी भंडारित है। और साथ ही इसमें ऐसा सिस्टम है कि यह बाद में घटने वाली समस्त घटनाओं को भी रिकार्ड करता रहे। साथ ही आसपास के माहौल को देखकर इसमें फैसला लेने की भी ताकत है। इसकी आधुनिक युग के कम्प्यूटर से तुलना कर सकते हो तुम। लेकिन इसकी टेक्नालॉजी कम्प्यूटर से कही ज़्यादा जटिल एंव अच्छी है।
और इसी मस्तिष्क में यन्त्र को बनाने का उद्देश्य भी समाया हुआ है। यानि किसी महिला को मुसीबत में देखकर उसकी मदद को पहुंच जाना। ऊर्जा की यह परछाईं फ्रेम से बाहर निकलकर आसपास के वातावरण पर नज़र रखती है और किसी भी महिला को मुसीबत में गिरफ्तार देखकर फौरन उसकी मदद को पहुंच जाती है। मैंने इस यन्त्र को तैयार किया और फौरन ही मेरी मृत्यु हो गयी। इसलिये इस यन्त्र की दो कमियां दूर नहीं हो पायीं। ’’
‘‘कैसी कमियां ?’’ विवेक ने पूछा।
‘‘पहली तो यह कि यह सिर्फ रात के अंधेरे में काम करता है। दिन की रोशनी में मेरी यह शक्तिशाली परछाईं मात्र एक बेकार सी तस्वीर बन जाती है जो शक्तिहीन रहती है। दूसरी कमी ये है कि इसके कार्य करने का क्षेत्र बहुत सीमित है। मात्र कुछ किलोमीटर का दायरा है इसका। उम्मीद है अब तुम इस जगह को भूत प्रेत का बसेरा नहीं समझ रहे होगे।’’ बुढ़िया ने अपनी बात खत्म की।
‘‘अद्भुत आश्चर्यजनक। हम तो सोच भी नहीं सकते थे।’’ विवेक के साथ साथ सीमा की आँखें भी आश्चर्य से फटी पड़ रही थी।
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शहर की तरफ आते हुये विवेक ने सीमा से पूछा,‘‘क्या ख्याल है ? इस बात का ज़िक्र तुम और किसी से करोगी ?’’
‘‘मेरा ख्याल है नहीं। उस यन्त्र को अपना काम करने दो। अगर यह खबर फैल गयी तो हो सकता है उसे पाने के लिये लोगों के बीच होड़ लग जाये। और इस चक्कर में या तो वह यन्त्र नष्ट हो जायेगा, या फिर सैकड़ों बेगुनाहों की जानें चली जायेंगी।’’
‘‘बहरहाल यह तजुर्बा हम कभी नहीं भूल पायेंगे।’’ विवेक ने दूर तक फैली काली सड़क अपनी नज़रे गड़ा दी।
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