शीले के बनाये नये यूनिवर्स में ज़ारा को हर तरह का आराम मयस्सर था लेकिन दिल का सुकून तो गायब ही हो चुका था।
उसकी आँखों के सामने उसका पूरा ग्रह तबाह हो गया था और उसके माँ बाप व सूरैन के तमाम वासी काल के गर्त में समा गये थे। और आखिर में उसका खुद का बच्चा बिछड़ गया था शायद हमेशा के लिये।
‘‘क्या वह अब मुझे कभी नहीं मिलेगा?’’ मायूसी के साथ ज़ारा ने सवाल किया।
‘‘ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब मेरे पास नहीं।’’ शीले बेबसी के साथ बोला। लेकिन इतना कह सकता हूं कि जब तक वह उस गोले से बाहर नहीं आता पूरी तरह सुरक्षित है।
‘‘लेकिन कब तक? आखिर वह गोला उसकी भूख प्यास कब तक मिटायेगा?’’
‘‘ज़ारा, अगर मेरा बच्चा उस गोले में हमेशा के लिये रह गया तो भी उसे कुछ नहीं होगा। मैंने उस गोले को कुछ इस तरह डिज़ाईन किया है कि किसी भी माहौल में वह बाहरी वातावरण से एनर्जी लेकर हमारे फैम के लिये फूड का बन्दोबस्त करता रहेगा।’’
‘‘लेकिन वह है कहाँ? क्या वह उसी तरह तबाह हो चुके हमारे घर सूरैन के आसपास भटक रहा है?’’
‘‘नहीं। अब वह सूरैन के आसपास कहीं नज़र नहीं आ रहा। शायद किसी ऐसी जगह पहुंच चुका है जहाँ तक मेरी इन्फार्मेशन रेज़ पहुंच नहीं पा रही हैं।
लेकिन तुम फिक्र न करो। अब चूंकि हम बाकोल की खुराफातों से सुरक्षित हो चुके हैं। इसलिए अब मैं इत्मिनान से कुछ ऐसी डिवाईस का इन्वेंशन कर रहा हूं, जो हमें फिर से हमारे बच्चे के साथ सम्पर्क करा देंगी।’’
‘‘तुम किस तरह की डिवाईस बना रहे हो?’’ ज़ारा का सवाल था।
‘‘ऐसी डिवाईस जो टोपोलॉजिकल सिस्टम पर आधारित है और स्पेस टाईम के बदलाव से भी अछूती रहकर अपना काम कर सकती है।
जब वह डिवाईस बनकर तैयार होगी तो हम ऐसे यूनिवर्स में भी झांक सकेंगे जहाँ के नियम हमारे यूनिवर्स से अलग हो सकते हैं।’’ शीले बता रहा था।
‘‘ये सब मैं नहीं जानती। मुझे तो मेरा फैम चाहिए। जल्द से जल्द। मैं उसके लिये पुराने यूनिवर्स में जाने को भी तैयार हूं। भले ही हाबू और उसका शैतान बेटा मुझे डेथ किरणों का निशाना बना दे।’’
शीले बिना कुछ बोले अपना सर खुजलाते हुए कुछ सोचने लगा।
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अब तक पूरे गाँव में खबर फैल चुकी थी कि दल्लू ने एक जिन का बच्चा यानि कि जिन को अपनी कैद में कर लिया है।
कुछ तो डर कर अपने बिस्तर में दुबक गये थे तो कुछ हिम्मत करके दल्लू से मिलने को चले आ रहे थे। लेकिन अब मामला ये था कि कल तक जिस दल्लू को वे अपने घर से दुत्कार देते थे अब उन्हें उससे मिलने के लिये एप्वाइंटमेन्ट लेना पड़ रहा था।
बिक्कू, मद्दन और नब्बन दल्लू की दलान में बरगद की तरह जम चुके थे और किसी को अन्दर नहीं जाने दे रहे थे। जब तक कि उनकी जेब में कुछ चढ़ावा नहीं पहुंच जाता। और ये ड्यूटी खुद दल्लू ने ही उन्हें सौंपी थी और बदले में दस फीसद कमीशन देने का वादा किया था।
दल्लू की दलान के आगे एक लंबी लाईन लगी हुई थी इस उम्मीद में कि अलादीन के जिन की तरह दल्लू का जिन भी उसके हुक्म पर कुछ करामात दिखा जायेगा और उनका बेड़ा पार कर देगा।
रामभरोसे ने भी पाँच का सिक्का नब्बन को थमाया और दलान पार करता हुआ दल्लू के कमरे में पहुंच गया। जहाँ दल्लू अपनी कसी हुई चारपाई पर खुद भी कसा हुआ पलथी मारकर बैठा था। बगल में एक चौकी रखी हुई थी जिसपर वह गोला मौजूद था जिसके भीतर था ज़ारा और शीले का बच्चा। अपने हाथ पैर चलाता हुआ।
रामभरोसे ने पहले हाथ जोड़कर उस बच्चे को और फिर दल्लू को प्रणाम किया। दल्लू के आगे चटाई पर मद्दन भी पलथी मारकर बैठा हुआ था जिसे उसने प्रणाम नहीं किया। जब मालिक सामने हों तो नौकरों को वैसे भी प्रणाम नहीं किया जाता।
‘‘कहो रामभरोसे क्या बात है।’’ दल्लू गूंजती हुई आवाज़ में बोला।
‘‘साहब! अब तो राम की कृपा से आपके अण्डर में जिन आ चुका है।’’ टच स्क्रीन वाले मोबाईल ने रामभरोसे को थोड़ी बहुत अंग्रेजी सिखा दी थी जिसे वह बोलने की कोशिश करता रहता था।
‘‘जिन दल्लू भाई के हाथ में आया है हाथ में - अण्डर में नहीं।’’ मद्दन ने डपटा।
‘‘मेरे कहने का वही मतलब है।’’ रामभरोसे फिर हाथ जोड़कर बोला, ‘‘दल्लू महाराज कृपा करके मेरी विपदा जिन बाबा से कहकर हल करा दें।’’
‘‘दो दिन पहले तूने एक विपदा मेरे पीछे लगा दी थी। याद है?’’ दल्लू ने उसे गुस्से से घूरा।
‘‘जी महाराज। मैंने अपने कुत्ते को आपके पीछे छोड़ दिया था, जब आप भिक्षा माँगने हमारे द्वार पधारे थे।
कृपया मेरी उस गलती को माफ कर दें। आप तो महा दयालू हैं महाराज।’’ रामभरोसे गिड़गिड़ाकर बोला।
‘‘अगर तुम सचमुच अपनी गलती मान रहे तो उस भिक्षा को महाराज के चरणों में अर्पित कर दो।’’ मद्दन बोला।
‘‘महाराज पाँच रुपया अभी बाहर ही अर्पित करके आया हूं।’’ रामभरोसे जल्दी से बोल उठा।
‘‘वो तो महाराज से मिलने की फीस है मरदूद।’’ मद्दन ने फिर डपटा।
‘‘कसम से महाराज। अभी केवल पाँच ही रुपया हमारी अण्टी में पड़ा हुआ था। अरे हम तो कल ही से अपनी विपदा में पड़े हुए हैं।’’ उसने फिर से रुहांसी सूरत बना ली।
‘‘रहने दो। अब मुझे इस दुनिया की भिक्षा की ज़रूरत भी नहीं। हमारे अण्डर में तो जिन आ ही गया है। तुम अपनी विपदा बयान करो और फिर निकल लो।’’
‘‘महाराज कल मैंने अपना बकरा अपने कुत्ते के साथ ही बाँधा था। कल रात को पता नहीं कौन मनहूस चोर मेरे घर में घुसा। और कुत्ते को खोलकर भगा ले गया।’’
‘‘कुत्ते को ले गया?’’ दल्लू ने हैरत से कहा।
‘‘हाँ महाराज। बकरे को ले जाता, तो समझा जाता कि भून कर खा गया। लेकिन कमबख्त मारा कुत्ते को ले गया। मैं तो परेशान हो गया हूं। उसे चोरों से रखवाली के लिये पाला था, और उसी को चोर उठा ले गया।’’
‘‘अजीब बात है। तुम बाहर रुको मैं अपने जिन के द्वारा चोर का पता करता हूं।’’
‘‘आपकी बहुत मेहरबानी महाराज।’’
रामभरोसे हाथ जोड़कर बाहर निकल गया।
उसके जाते ही मद्दन जल्दी से खिसक कर दल्लू की बगल में पहुंच गया।
‘‘दल्लू मियाँ, जिन से कुछ न पूछना।’’
‘‘क्यों?’’ दल्लू चौंक कर उसे घूरने लगा।
‘‘अरे, अब मुझे क्या पता था कि रात के अँधेरे में बकरे की जगह कुत्ते को खोल लाया हूं। वह शोर न करे इसलिए मुंह दबा दिया था। और दबाये दबाये काम भी तमाम कर दिया।’’
‘‘अरे! लेकिन तूने ये किया क्यों?’’ बौखलाकर दल्लू ने पूछा।
‘‘आज एक शादी में सप्लाई करनी थी। उल्लू के पट्ठे ने पैसे कम दिये थे। सो घाटा पूरा करने के लिये सोचा एक बकरा कहीं से फ्री का पार कर लूं। या खुदा उन शादी वालों को ज़रा भी पता नहीं चलना चाहिए कि मैंने उन्हें बकरे की बजाय कुत्ता।’’
उसने हाथ ऊपर करके गिड़गिड़ाते हुए दुआ मांगनी शुरू कर दी लेकिन फौरन ही खामोश हो गया। क्योंकि अन्दर नजीबन बुआ दाखिल हो रही थीं। जिनके बारे में मशहूर था कि वो गाँव का चलता फिरता अखबार हैं।
‘‘अरे मेरा दल्लू बेटा कैसा है तू। तुझे देखने को तो आँखें तरस गयीं। कभी कभी बुआ का घर भी झांक लिया कर।’’ आने के साथ ही नजीबन बुआ शुरू हो गयी थीं और साथ में चट चट बलायें भी दर्जन के हिसाब से ले डालीं।
‘‘बुआ अभी परसों ही तो तुमने मुझे भगाया है घर से। जब मुर्गा पकने की खुशबू सूंघते सूंघते तुम्हारे घर पहुंच गया था।
‘‘ऐ बेटा, तेरे ऊपर से तो मेरे सौ मुर्गे कुरबान। बेटा एक छोटा सा काम है जरा अपने जिन बाबा से कहकर करवा दे।’’ ज़्यादा तफसील में न जाते हुए नजीबन बुआ फौरन मुद्दे पर आ गयीं।
फिर इससे पहले कि दल्लू काम के बारे में पूछता, बुआ ने बताना शुरू भी कर दिया, ‘‘बेटा तुझे तो पता ही है कि हमारे नज्जन को शादी हुए पूरे दस साल हो रहे हैं। लेकिन नासपीटी बहू ऐसी मिली है कि एक अदद पोते के लिये तरसा दिया है मुझे। अभी तक कमबख्त मारी एक केंचुआ भी पैदा नहीं कर पायी। बेटा जरा अपने जिन बाबा से सिफारिश करवा के एक पोता दिला दे मुझे।’’
‘‘कोशिश करता हूं।’’ दल्लू गहरी साँस लेकर बोला।
‘‘लेकिन नजीबन बुआ मैंने सुना है कि नज्जन की बीवी से पटती ही नहीं। दोनों अलग अलग रहते हैं।’’ इसी बीच पट से मददन बोल उठा।
‘‘अरे वो तो अलग अलग मैंने ही करवा रखा है। मेरा लाडला कहीं जोरू का गुलाम न बन जाये इसलिए। अल्लाह नजर से बचाये। मेरा नज्जन तो हमेशा मेरे पास ही सोता है।’’
‘‘और बहू?’’ दल्लू ने पूछा।
‘‘उसकी चारपाई तो मैंने भैंस के तबेले में डलवा दी है। वह भैंसों को शाम का चारा खिलाकर वहीं पसर जाती है।’’
‘‘नजीबन बुआ, ये सेटिंग तुमने कब से कर रखी है?’’ दल्लू आँखें निकालकर पूछने लगा।
‘‘अरे ये तो नज्जन के वलीमे के टाइम से ही कर दिया था मैंने।’’
‘‘फिर तो बुआ, हमारा जिन तो छोड़ो दुनिया का कोई भी शरीफ जिन तुम्हारे पोते का इंतिज़ाम नहीं कर सकता।’’ दल्लू बेबसी के साथ बोला।
‘‘ऐसा मत कहो बेटा।’’ नजीबन बुआ घिघियाकर बोली, ‘‘अगर तू मुझे पोता दिलायेगा तो मैं ऊपर वाले से दुआ करूंगी कि तेरी भागी हुई बीवी वापस आ जाये।’’
‘‘अब मुझे उसकी कोई चाहत नहीं। अब ये जो जिन मेरे कब्ज़े में है, देखना इसकी बदौलत एक दिन मैं दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की से शादी करूंगा।’’
कहते हुए दललू ने बगल में रखा मैंगो फ्लैवर्ड ड्रिंक का पाउच उठाया और मुंह से लगा लिया।
दरअसल उस पाउच में देसी ही थी जिसमें उसने मैंगो का फ्लैवर मिला दिया था ज़माने की नाक से बचने के लिये।
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हाबू उस अँधेरे होल में पड़ा हुआ मन ही मन अपनी किस्मत को कोस रहा था जो उसने पीको जैसा बेटा पैदा कर दिया था।
इस अँधेरे होल में हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसका सगा बेटा खुद उसके लिये इतना ज़ालिम हो सकता है।
उसके बेटे ने बस इतनी मेहरबानी की थी कि उसके खाने पीने का इंतिज़ाम कर दिया था। और ये खाना पानी उसे अपने वक्त पर मिल जाता था। उसने कोशिश की कि किसी तरह उस काल कोठरी से बाहर निकल आये। लेकिन वहाँ हाथ को हाथ तो दिखता नहीं था फिर बाहर निकलने का रास्ता कहाँ से दिखता।
‘‘अगर मैं कुछ दिन इस कोठरी में रह गया तो सच में अंधा हो जाऊंगा।’’
वह बड़बड़ाया, ‘‘काश कि कोई मुझे यहाँ से निकाल देता।’’
अब उसे बस अपने वफादार मंदोरा का ही भरोसा रह गया था। लेकिन मंदोरा को तो शायद पता भी नहीं होगा कि वह कहाँ मर रहा है। और अगर पता होगा तो क्या वह बाप बेटे के बीच दखल देगा? इस तरह के बहुत से सवाल थे जिनके जवाब फिलहाल उसके पास नहीं थे।
‘‘लेकिन मैं अपनी गद्दी वापस लेकर रहूंगा। भले ही मुझे अपने बेटे को अपने हाथों मौत के घाट उतारना पड़े।’’ इस बार वह तेज़ आवाज़ के साथ गुर्राया।
अभी थोड़ी देर पहले वह भरपेट खा चुका था और इस वक्त इस तरह की बातें सोचने की ताकत थी उसके पास।
वह गुस्से में भरा हुआ उस छोटे से स्प्रिंगनुमा होल में नाचने लगा।

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