Sunday, December 17, 2017

यू आई डी - भाग 2 (विज्ञान कथा)


अभी प्रोफेसर घनश्याम ने अपने शहर पहुंचने का आधा रास्ता ही तय किया था कि तेज़ आँधी तूफान ने उसे घेर लिया। बादल इतने घने थे कि हेड लाइट जलानी पड़ी थी। लेकिन मूसलाधार बारिश में उसे आगे का रास्ता मुश्किल से ही दिखाई दे रहा था। बिजलियाँ भी कड़क रही थीं। प्रोफेसर घनश्याम जल्दी से जल्दी अपनी लैब पहुंच जाना चाहता था ताकि उस अद्वितीय बच्चे का डीएनए टेस्ट कर सके। लेकिन घनघोर गरज के साथ होने वाली बारिश उसकी कार की स्पीड को रोक रही थी। 
अचानक तेज़ चमक में प्रोफेसर की आँखें बन्द हो गईं। लगातार कड़कने वाली बिजली उसकी कार के ऊपर ही गिरी थी। फिर उस भयंकर चमक ने प्रोफेसर के ज़हन को अँधकार के शून्य में डुबो दिया।
-----

जब प्रोफेसर का ज़हन फिर से कुछ सोचने के क़ाबिल हुआ तो उसे महसूस हुआ कि उसका जिस्म हल्का हो गया है और वह हवा में उड़ रहा है। और जब उसने आँखें खोलीं तो उसे लगा कि वह प्रकाश के एक घेरे में कैद शून्य में तेज़ी के साथ कहीं चला जा रहा है। 
‘‘तो क्या मैं मर चुका हूं?’’ उसके मन में पहला विचार यही आया। उसने अपने हाथ पैरों को हिलाना चाहा लेकिन उसे महसूस हुआ कि प्रकाश के उस घेरे ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा है और वह अपनी मर्ज़ी से उंगली भी नहीं हिला सकता है।
‘‘ठीक है। अभी देख लेते हैं कि मरने के बाद इंसान का क्या अंजाम होता है।’’ प्रोफेसर घनश्याम का वैज्ञानिक दिमाग इस हालत में भी अपने ही नज़रिये से सोच रहा था।
-----

ऐसा मालूम होता था जैसे आकृति प्रकाश से बन रही हो। जिस तरह दीपक की लौ होती है उसी तरह वह आकृति हवा में लहरा रही थी। लेकिन उस आकृति के नीचे कोई दीपक नहीं था। वह लौ निर्वात में बिना किसी स्रोत के स्वयं बन रही थी।
फिर उस जगह पर एक और उसी तरह की आकृति का प्रवेश हुआ। दूसरी आकृति पहली के सामने इस तरह लहराई मानो वह पहली का सम्मान कर रही हो। और साथ ही हवा में एक आवाज़ भी गूंजी जो शायद उसी आगंतुक आकृति की आवाज़ थी।
‘‘हब्बल यूनिवर्स के सम्राट के जय हो।’’ दूसरी आकृति की अपनी एक अलग ही भाषा थी जिसका मतलब पृथ्वी की भाषा में शायद यही था।

‘‘क्या खबर है?’’ पहली आकृति ने भी उसी भाषा में पूछा।
‘‘हमने उस बच्चे का जेनेटिक कोड प्राप्त कर लिया है। और जो व्यक्ति उस कोड पर रिसर्च करने जा रहा था, उसे भी हम ले आये हैं।’’ जैसे ही उस आकृति की बात खत्म हुई, प्रकाश के घेरे में कैद प्रोफेसर घनश्याम का वहाँ पर तेज़ी के साथ प्रवेश हुआ।
‘‘लेकिन मैंने सिर्फ जेनेटिक कोड लाने को कहा था, इस व्यक्ति को लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। खैर इसे बाद में देखूंगा हो सकता है जाँच में इसकी ज़रूरत पड़े। पहले तो ये मालूम होना ज़रूरी है कि सिल्टर ग्रह का जेनेटिक कोड पृथ्वी पर बने शरीर में कैसे पहुंच गया। हब्बल यूनिवर्स में ऐसी गड़बड़ पहली बार हुई है। क्या हमारे सृजनकर्ताओं का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है?

‘‘सम्राट। हमारे सृजनकर्ताओं का कहना है कि उनसे कोई गलती नहीं हुई है। यहाँ तक कि जब इस बच्चे के बाप का स्पर्म माँ के अंडे को भेद रहा था उस समय भी सृजनकर्ताओं ने चेक किया था कि स्पर्म व अंडे दोनों के जेनेटिक कोड पृथ्वी के अनुसार ही हैं। फिर षुरूआती तीन हफ्तों की स्टेज यानि प्री एम्ब्रायनिक स्टेज तक बच्चे के बनने की प्रोसेस की पूरी निगरानी की गयी। और फिर उसके बाद बच्चे की पैदाईश तक पूरी निगरानी होती रही लेकिन उसके जन्म से पहले तक किसी गड़बड़ का पता नहीं चला।’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ सम्राट बड़बड़ाया। उसके जिस्म को इंगित करने वाली लौ इस समय शांत थी। जिसका मतलब था कि वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ है। 
‘‘एक काम करो तुम।’’
‘‘जी हुक्म कीजिए सम्राट।’’

‘‘हब्बल यूनिवर्स में हम जब भी कोई नया स्पर्म या नया अण्डा बनाते हैं तो उसको एक नंबर देते हैं। यूनीक आईडी नंबर। यही यूआईडी नंबर डिटेक्ट करता है कि किसी स्पर्म या अण्डे को यूनिवर्स के किस ग्रह पर भेजना है। और इसी यूआईडी नंबर के द्वारा हमारे सृजनकर्ता सृजन की समस्त प्रक्रिया पर नज़र भी रखते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि इसी यूआईडी नंबर में कुछ गड़बड़ हुई है या किसी ने गड़बड़ की है।’’

‘‘लेकिन यूआईडी नंबर जिस ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम में स्टोर होता है उससे ज़्यादा सुरक्षित कोई स्पेसटाइम नहीं है। नामुमकिन है कि यूआईडी नंबर में कुछ गड़बड़ हुई हो या किसी ने गड़बड़ कर दी हो।’
‘‘फिर भी हर चीज़ की जाँच करनी ज़रूरी है। चाहे वह चीज़ कितनी ही सुरक्षित क्यों न हो। तुम मेरे साथ अभी ‘वर्ल्ड-लॉजिक-कर्व’ सिस्टम की तरफ चलो। और हब्बल यूनिवर्स के इस प्राणी को भी ले चलो। जाँच में इसकी ज़रूरत पड़ेगी । उस खास यूआईडी नंबर में स्टोर इन्फार्मेशन को इसके जेनेटिक कोड के साथ मैच कराना पड़ेगा क्योंकि ये उस बच्चे के बाप का क्लोज़ रिलेटिव है।’’

उसी समय प्रोफेसर को महसूस हुआ कि वो दो लहराती हुई ज्वालाएं अपनी जगह छोड़कर किसी अनजान दिशा में चल पड़ी है। और साथ में उसका जिस्म भी फिज़ा में तैर रहा था। इसका तो उसे यकीन हो ही चुका था कि वह मर कर दूसरी दुनिया में पहुंच चुका है। 
-----

(जारी है )
---ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक) 

No comments: