Saturday, December 16, 2017

यू आई डी - भाग 1

देश के जाने माने साइंटिस्ट प्रोफेसर घनश्याम की कार जब उसकी बहन के दरवाज़े पर रुकी तो उस समय रात के दो बज रहे थे। प्रोफेसर घनश्याम इस समय दूसरे शहर में रहने वाली अपनी बहन से मिलने आया था और इसके लिये पूरी रात उसने खुद ही कार ड्राइव की थी।
उसने काल बेल पर उंगली रखी। 
इससे पहले कि वह दूसरी बार बेल पर उंगली रखता, अप्रत्याशित रूप से दरवाज़ा जल्दी खुल गया। वरना रात को दो बजे कौन इतनी जल्दी बिस्तर से उठना गवारा करता है।

दरवाज़ा खोलने वाली उसकी बहन ही थी जिसकी उम्र अब ढलने लगी थी। वह प्रोफेसर घनश्याम से दस साल बड़ी थी और घनश्याम की उम्र भी पचपन के लगभग थी। 
प्रोफेसर ने देखा कि उसकी आँखें लाल हैं मानो वह रोती रही हो, और ऐसा बिल्कुल नहीं मालूम हो रहा था कि वह सोते से उठकर आयी है। 

‘‘विमला तुम शिकायत कर रही थीं कि मैं तुमसे मिलने नहीं आता। देखो आज मैं सारे काम छोड़कर चला आया।’’ प्रोफेसर घनश्याम गर्मजोशी के साथ बोला। 

‘‘अन्दर आओ घनश्याम।’’ विमला सपाट आवाज़ में बोली और वापस जाने के लिये घूम गयी। 

घनश्याम को एक बार फिर अचरज हुआ लेकिन वह बिना कुछ बोले अपनी बड़ी बहन विमला का अनुसरण करने लगा। जब दोनों ड्राइंग रूम में पहुंचे तो विमला का अधेड़ पति भी मौजूद था और उसके चेहरे पर भी परेशानी की सिलवटें साफ ज़ाहिर हो रही थीं।
‘‘आओ घनश्याम बड़े दिनों के बाद आये।’’ उसने घनश्याम का स्वागत किया लेकिन उस स्वागत में गर्मजोशी तो बिल्कुल नहीं थी।

‘‘लगता है मैं गलत वक्त पर आया हूं। दो बजे रात को मुझे नहीं आना चाहिए था।’’ घनश्याम जो काफी देर से महसूस कर रहा था इस बार उसे ज़बान पर ले आया। वह हमेशा का स्पष्टवादी था क्योंकि वह एक वैज्ञानिक था।
‘‘घनश्याम, तुम गलत समझ रहे हो। सच्ची बात ये है कि हम लोग बहुत परेशान हैं।’’ विमला बुझे हुए स्वर में बोली।

‘‘अरे! तो मैं कोई गैर हूं? आप अपनी परेशानी मुझे बताईए न। हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूं।’’
‘‘इसमें कोई किसी की मदद नहीं कर सकता। प्रकृति के आगे किसका बस चला है।’’

‘‘लेकिन आप लोग अपनी परेशानी बताईए तो सही।’’

‘‘मैं बताता हूं।’’ इस बार विमला का पति यानि प्रो0घनश्याम का जीजा बोला, ‘‘हम लोग अभी थोड़ी ही देर पहले अस्पताल से आये हैं।’’ कहकर वह एक क्षण के लिये चुप हो गया। अब घनश्याम भी बेचैन हो उठा था। उसे मालूम था कि विमला के एक ही इकलौता लड़का है जिसकी अभी पिछले साल ही शादी हुई है। तो क्या लड़का या बहू ...?

‘‘हमारी बहू ने दरअसल एक लड़के को जन्म दिया है।’’ उसकी तन्द्रा को उसके जीजा ने भंग कर दिया।
‘‘ओह! लेकिन ये तो खुशी की बात है। इसमें परेशानी....’’

‘‘परेशानी ये है कि वह लड़का अत्यन्त कुरूप है।’’ इसबार विमला बोल उठी।
‘‘ओह। लेकिन ये तो कोई ऐसी बात नहीं। जन्म के समय तो सारे बच्चे एक ही जैसे दिखते हैं। हो सकता है बड़ा होकर वह अच्छा दिखे। और फिर वह लड़का है, कोई लड़की नहीं जिसकी सुंदरता की आप चिंता करें।’’

’’आप मेरी बात नहीं समझ रहे हो। बेहतर होगा आप खुद उस बच्चे को देख लो।’’ न जाने जीजा के स्वर में क्या था कि घनश्याम फौरन उसके साथ हास्पिटल जाने को तैयार हो गया।
-----

वाकई उस बच्चे को देखकर घनश्याम चौंक गया था। 

पूरी पृथ्वी पर शायद ही कहीं और ऐसी शक्ल व सूरत के बच्चे का जन्म हुआ हो।

नाक हरे रंग की किसी छोटे से पेड़ की तरह दिख रही थी, जिसकी कई शाखाएं हों।
खूबसूरती में गुलाब के फूल की मिसाल दी जाती है। लेकिन अगर किसी बच्चे के कान गुलाब जैसी सूरत में हों तो वो बदसूरत ही कहलायेगा।
और आँखों की जगह दो लहरदार चमकीली लकीरें दिख रही थीं। 

बच्चे का रंग सुर्ख था। यह सुर्खी प्रोफेसर घनश्याम ने आज तक किसी बच्चे या बड़े में नहीं देखी थी।

‘‘अविश्वसनीय!’’ प्रोफेसर के मुंह से अनायास निकला।
‘‘अब इस बच्चे को कुरूप नहीं तो और क्या कहा जाये।’’ बच्चे के दादा के वाक्य में पूरी तरह विवशता झलक रही थी।

‘‘ये बच्चा कुरूप नहीं है ये तो अनोखा है। यूनीक। ऐसा बच्चा पूरी पृथ्वी पर कहीं नहीं।’’

‘‘मामा। आप क्या यहाँ हमारा मज़ाक उड़ाने के लिये आये हैं?’’ उस बच्चे को बाप बोल उठा जो अभी अभी बाहर से कुछ दवाएं लेकर आया था।’’

‘‘नहीं भांजे। मुझे तुम्हारे दुःख का पूरा एहसास है। लेकिन मेरी आदत हर चीज़ को साइंटिस्ट की नज़र से देखने की है। मैं प्रकृति की हर अच्छी बुरी चीज़ को एक ही कोण से देखता हूं कि उसमें खास क्या है।’’

बच्चे की बगल में लेटी हुई उसकी माँ अभी तक मौन थी। शायद उसपर एनेस्थीसिया का असर अभी भी था। वह बच्चा सीज़ेरियन हुआ था।

‘‘लोग कहते हैं कि ईश्वर की बनाई दुनिया परफेक्ट है। तो फिर उसमें  इस तरह की गलतियाँ कैसे हो सकती हैं? वास्तव में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है और न ही ये दुनिया कहीं से परफेक्ट है।’’ प्रोफेसर घनश्याम का जीजा कह रहा था। 
‘‘ये भी मुमकिन है कि इस तरह की गलतियाँ भी परफेक्टनेस का एक हिस्सा हों।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बहुत समय पहले एक व्यक्ति ने सोचा कि ईश्वर ने दुनिया कितनी त्रुटिपूर्ण बनायी है। भारी भरकम तरबूज़ ज़मीन पर कमज़ोर लताओं के साथ बाँध दिये और छोटी छोटी खजूरें बहुत ऊंचे पेड़ों पर लटका दीं। 
लेकिन अगले ही पल जब कुछ खजूरें टूटकर उसके सर पर पड़ीं तो उसे ईश्वर की ‘त्रुटि’ नज़र आ गयी। कई बार हम समझ नहीं पाते कि परफेक्टनेस का मतलब क्या है।’’

‘‘लेकिन इस बच्चे के जन्म में क्या परफेक्टनेस हो सकती है?’’
‘‘कई बार प्रकृति अपनी परफेक्टनेस में लूप होल पैदा कर देती है ताकि उसके द्वारा हम कुदरत के छुपे हुए राज़ों तक पहुंच सकें। अगर इंसान के जिस्म में बीमारियाँ न होतीं तो शायद आज हम मानव शरीर के बारे में कुछ भी न जान पाते। अब मैं इस बच्चे का डी.एन.ए. सैम्पिल ले जाऊँगा और पता लगाने की कोशिश करूंगा कि ये ऐसा क्यों है।’’ 

कहते हुए प्रोफेसर घनश्याम ने बच्चे का डीएनए सैम्पिल लेने की तैयारी शुरू कर दी।
-----
(जारी है )
---ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक) 

1 comment:

Unknown said...

Very nice story