Wednesday, August 12, 2015

इच्छाधारी - हिंदी विज्ञान कथा (भाग 3 )

अब फादर तहखाने में मौजूद अपनी लैब के अन्दर पहुंच चुका था। चारों ने आश्चर्य से उस तहखाने को देखा। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उस पुराने तहखाने में इतनी आधुनिक साइंटिफिक लैब बनी होगी। तहखाने में उन्हें घुटन का एहसास ज़रा भी नहीं हो रहा था। और साथ ही वे ऐसी मशीनें देख रहे थे जैसी इससे पहले उन्होंने कभी नहीं देखी थीं।

‘‘यही वह जगह है जहाँ से मैंने इस धरती पर आने वाले एलियेन का पता लगाया है।’’ कहते हुए फादर जोज़फ ने कुछ मशीनों को चालू किया और वहाँ पर एक सपाट बोर्ड जैसी जगह पर एक ग्राफ व मैप जैसा बनने लगा। उस ग्राफ पर कुछ बिन्दु चमक रहे थे। 
‘‘ये मैप हमारे यूनिवर्स के एक हिस्से का है।’’ फादर ने बताया, ‘‘और इसपर चमकने वाला ये बिन्दु जो तुम देख रहे हो, यह एक ग्रह की लोकेशन है जहाँ बुद्धिमान प्राणी मौजूद हैं। हम लोगों से कई गुना ज़्यादा विकसित हैं ये लोग।’’ 

‘‘वाऊ!’’ दीपा के मुंह से निकला। 
‘‘और मज़े की बात ये है कि इस ग्रह के कुछ प्राणी लंबा सफर तय करके हमारी धरती पर पहुंच चुके हैं। ये ग्राफ जो तुम देख रहे हो, यह उनके रास्ते का है।’’ फादर ने ग्राफ के ऊपर अपना प्वाइंटर लहराया। 

‘‘अगर वह हमारी धरती पर आ चुके हैं तो यहाँ के यन्त्रों ने उन्हें पकड़ा ज़रूर होगा। खास तौर से अमेरिका और रूस जैसे विकसित देशों के यन्त्रों ने।’’ अरुण ने अपना ख्याल ज़ाहिर किया।
‘‘नहीं। मेरी लैब के अलावा दुनिया के किसी भी हिस्से की लैब में इनकी उपस्थिति दर्ज नहीं है। क्योंकि ये लोग बने हैं कुछ अनोखे कणों से। वह कण जो हमारी धरती के वातावरण में होते ही नहीं।’’

‘‘क्या मतलब?’’ दीपा बोल पड़ी।

‘‘ये सन 2007 की बात है। जब हार्वर्ड कालेज के भौतिकी के प्रोफेसर होवर्ड जार्जी ने नये अनोखे कणों का आईडिया पेष किया जो कि वास्तव में कण नहीं होते हैं। इसलिए उन्होंने इन्हें एक नया नाम दिया अनपार्टिकिल यानि कि अकण। ये न तो बोसाॅन होते हैं और न ही फर्मियान।’’
‘‘पहले तो आप हमें फर्मियान व बोसाॅन के बारे में बतायें। क्योंकि हमारी साइंस इतनी अच्छी नहीं है।’’ रिया के टोकने पर संजय ने उसे घूरा। उसे डर था कि कहीं बार बार टोकने पर फादर नाराज़ न हो जाये।

लेकिन फादर इस वक्त पूरे मूड में था। उसने अपनी बात जारी रखी, ‘‘जैसा कि साइंस कहती है कि पृथ्वी पर दो तरंह के कण पाये जाते हैं, एक वह जो पदार्थ को बनाते हैं । इन्हें फर्मियान कहा जाता है। दूसरे वो जो ऊर्जा को षक्ल देते हैं, इन्हें बोसाॅन कहा जाता है। इलेक्ट्रान, प्रोटाॅन इत्यादि फर्मियान हैं जबकि प्रकाष, ऊष्मा इत्यादि के कण बोसाॅन हैं। दोनों तरंह के कणों में मूल अन्तर ये होता है कि फर्मियान में द्रव्यमान होता है और ये एक जगंह नहीं पाये जाते। यानि जिस जगंह एक फर्मियान होगा वहां दूसरा फर्मियान नहीं रह सकता। जबकि बोसाॅन का कोई स्थिर द्रव्यमान नहीं होता। और एक ही जगंह पर कई बोसाॅन रह सकते हैं।’’

चारों ने फादर की बात पर सर हिलाकर ज़ाहिर किया कि वे उसकी बात समझ रहे हैं।

फादर ने आगे कहा, ‘‘लेकिन अनपार्टिकिल या अकणों का जो आईडिया पेष किया गया है उसमें द्रव्यमान तो होता है लेकिन बाकी गुण बोसाॅन की तरंह होते हैं। अनपार्टिकिल के जुड़ने से जो चीज मिलती है जाहिर है वह ‘अपदार्थ’ कहलायेगी।’’
‘‘लेकिन अपदार्थ का एलियेन की खोज से क्या सम्बन्ध?’’ रिया की टोकने की आदत ने अभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ा था।

‘‘बहुत बड़ा सम्बन्ध है।’’ इसबार फादर ने खासतौर से रिया की तरफ देखा, ‘‘मेरी मशीनों ने जिन एलियेन की उपस्थिति दर्ज की है वह अपदार्थ से ही बने हैं।’’ 
‘‘ओह!’’ चारों के मुंह से एक साथ निकला। 

‘‘और इसीलिए अभी तक दुनिया में कहीं और उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो पायी है। क्योंकि अपदार्थ के बने होने की वजह से वे इच्छाधारी हो गये हैं।’’ 

‘‘क्या मतलब!?’’ एक बार फिर चारों को चौंकना पड़ा।

(जारी है)

3 comments:

हरीश गोयल said...

story is heading in right direction.you have maintain the interest .it's a creditable that you have incorporated the new findings of science specially in particle physics in fiction and imagine it fantastically.

Shamsud Ahmed said...

I am not an avid hindi reader but I am liking it.

Zeashan Zaidi said...

Thanks to your valuable comments.