Sunday, July 5, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 4

दो तीन बार हाथ मारने के बाद दरवाजा खुला और एक सज्जन बाहर आये। इन्होंने भी शमशेर सिंह की तरह केवल जांघिया और बनियान पहन रखी थी।
‘‘नमस्ते रामदयाल जी।’’ शमशेर सिंह बोला।
‘‘अरे शमशेर सिंह तुम?? क्या घर की सफाई कर रहे थे??’’ शमशेर सिंह का हुलिया देखकर रामदयाल ने अनुमान लगाया।

‘‘ऐसी कोई बात नहीं। बात ये है कि आज मेरा एक इंटरव्यू है। अत: आप मेरी वह शर्ट दे दीजिए जो परसों आपने किसी शादी के डिनर में पहनने के लिए ली थी।’’
‘‘ओह! अच्छा वह शर्ट?? लेकिन वह शर्ट तो---’’ रामदयाल अपना वाक्य पूरी करने में हिचकिचाया।
‘‘क्या हुआ शर्ट को??’’ शमशेर सिंह ने आतुरता से पूछा।
‘‘बात यह है कि वह शर्ट डिनर में कुछ गंदी हो गयी थी।’’ रामदयाल ने बत्तीसी दिखाते हुए कहा।
‘‘अब चाहे गंदी हो या साफ। काम तो चलाना ही पड़ेगा।’’ शमशेर सिंह बोला और रामदयाल शर्ट लेने अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद उसने गुलाबी रंग की एक शर्ट शमशेर सिंह को लाकर थमा दी।

शमशेर सिंह ने उसे फैला कर देखा तो सामने का भाग आधा गुलाबी दिखाई दिया और आधा पीला।
‘‘क्यों जी! ये डिनर में भोजन तुम कर रहे थे या मेरी शर्ट को करा रहे थे।’’ आग बबूला होकर शमशेर सिंह ने पूछा।
‘‘वो बात यह है कि हमारे यहां चलन है कि डिनर के बाद लोग बचे हुए शोरबे से होली खेलते हैं। यही कारण था कि मैं वहां अपनी शर्ट पहनकर नहीं गया।’’

शमशेर सिंह ने खून का घूंट पीया और वापस पलट आया क्योंकि उसे इंटरव्यू के लिए देर हो रही थी।

घर पहुँचते ही उसकी दृष्टि रामसिंह और प्रोफेसर पर पड़ी और उसकी त्योरियों पर बल पड़ गये।
‘‘मैंने तुमसे कहा था कि आज मुझे डिस्टर्ब न किया जाये। लेकिन तुम माने नहीं।’’ उसने रामसिंह से तेज आवाज में कहा।
‘‘हम लोग तो तुम्हें इंटरव्यू देने के गुर बताने आये हैं। ताकि तुम्हारा इंटरव्यू फर्स्ट क्लास हो जाये।’’ प्रोफेसर ने कहा।
‘‘मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा गुर वुर। अब तुम लोग यहा से दफा हो जाओ और मुझे तैयार होने दो। इंटरव्यू में बहुत कम टाइम रह गया है।’’ शमशेर सिंह बोला और कमीज पहनने लगा।

‘‘ठीक है। फिर हम लोग जाते हैं। हमने तो तुम्हारे भले के लिए कहा था।’’ प्रोफेसर ने कंधे उचकाकर कहा और वे लोग वहाँ से बाहर जाने लगे। चलते चलते रामसिंह बोला, ‘‘हम लोग शाम को फिर आयेगे। तुम्हारी कामयाबी की खुशखबरी सुनने।’’
‘‘ठीक है। अब तुम लोग चलते फिरते नजर आओ। और मुझे इंटरव्यू की तैयारी करने दो।’’

‘‘सारा मूड चौपट कर दिया।’’ बड़बड़ाते हुए वह जूता पहनने लगा। साथ ही साथ वह घड़ी भी देखता जा रहा था, ‘‘बाप रे। साढ़े नौ बज गये। केवल डेढ़ घण्टा और बाकी रह गया।’’ जूता पहनकर उसने चलने का इरादा किया किन्तु उसी समय उसे कुछ साद आया, ‘ओह पैण्ट तो मैं पहनना ही भूल गया। इन कमबख्तों ने आकर मेरा दिमाग चौपट कर दिया।’’
उसने वापस आकर जूते उतारे और फिर पैण्ट पहनी। इस बार तैयार होकर उसने अपना पूरा निरीक्षण किया। और फिर बाहर जाने के लिए कदम बढ़ाये। इस समय बौखलाहट उसके चेहरे से प्रकट हो रही थी।

3 comments:

Arvind Mishra said...

पढ़ रहा हूँ वातावरण सृजित होने लगा है पात्र मुखर हो रहे हैं

Abhishek Mishra said...

Interview Dress ki yeh sthiti! Bahut bura hua Shamsher Singh ke sath.

Science Bloggers Association said...

रोचक एवं जिज्ञासा को बांध कर रखने वाली कहानी।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }