Saturday, May 9, 2009

मजबूर आसमां Part - 1

लेखक : जीशान हैदर ज़ैदी

यह शहर अपनी जगमगाती रोशनियों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध था। अनेकों मल्टीनेशनल कंपनियों के आफिस इस शहर में मौजूद थे। देश की अर्थव्यवस्था में दिल की तरह चौबीस घण्टे धड़कता रहता था यह शहर।
इसी शहर के मध्य में यह गन्दी बस्ती चाँद में लगे हुए बदनुमा धब्बे की तरह मौजूद थी। जहा के लोग दो रोटी के जुगाड़ के लिए रोजाना दो सौ जन्म लिया करते थे। अपनी बस्ती को बड़े पूंजीपतियों और बिल्डर्स के कदमों से बचाने के लिए अक्सर उन्हें बुलडोज़र के सामने भी लेटना पड़ता था।
दोपहर की तेज चिलचिलाती धूप में यही बस्ती इस समय एक बड़ी लाइन के रूप में नज़र आ रही थी। इस लाइन के ठीक सामने एक विशालकाय गाड़ी मौजूद थी। जिसपर विश्व की जानी मानी फूड कंपनी ‘ईट-एन-ज्वाय’ का लोगो लगा हुआ था।
इस गाड़ी के सामने लम्बी लाइन लगने का कारण भी साफ था। आज कंपनी का स्थापना दिवस था, और इस अवसर पर वह इस गरीब बस्ती में फ्री आटे के पैकेट बांट रही थी। जिसकी पब्लिसिटी का भी पूरा इंतिजाम था।
घण्टों चलने के बाद यह प्रोग्राम पूरी कामयाबी के साथ खत्म हुआ। बस्ती का कोई व्यक्ति आटे का पैकेट पाने से वंचित नहीं रहा था।
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‘‘कलुआ, ओ कलुआ।’’ उसी बस्ती में कलुआ की झोंपड़ी के सामने खड़ा मेवालाल उसे आवाज दे रहा था।
कलुआ झोंपड़ी से बाहर निकला, ‘‘क्या बात है मेवालाल?’’
‘‘मेरे घर का आटा खत्म हो गया है। जरा एक कटोरी दे दो।’’
‘‘मेरे घर में भी खत्म होने वाला है। मैं नहीं दे सकता।’’ कलुआ ने इंकार कर दिया।
‘‘अगर रखा है तो थोड़ा दे दो।’’
‘‘रखा तो है, लेकिन मैं दूगा नहीं।’’
‘‘आटा तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।’’
‘‘अगर मैं न दूं तो क्या कर लोगे तुम!’’ गुस्से में कलुआ ने मेवालाल को घूरा।
‘‘बताऊँ !’’ मेवालाल ने अचानक कमर में लगा हुआ गंडासा खींचा और कलुआ की गर्दन पर वार किया। दूसरे ही पल कलुआ खून में नहाया ज़मीन पर पड़ा हुआ लोट रहा था।
यह दृश्य देखकर आसपास खड़े लोगों से बर्दात नहीं हुआ और वे मेवालाल पर पिल पड़े। शायद उन सब पर भी शैतान सवार हो गया था। क्योंकि वे बुरी तरह मेवालाल को पीट रहे थे।
देखते ही देखते मेवालाल भी लाश में बदल गया।
दूर पुलिस का सायरन सुनाई पड़ रहा था।
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पुलिस अधिकारियों की ये मीटिंग फाइव स्टार होटल के एक वातानुकूलित कमरे में कमिनर ने आयोजित की थी। ए-सी- की ठंडक में भी अधिकारियों के चेहरे पसीने से भीगे हुए थे। और इसकी वजह भी थी। दरअसल शहर की गंदी बस्ती में जबरदस्त मार काट मची हुई थी। वहा के लोगों पर जैसे शैतान सवार हो गया था। हर तरफ एक फसाद बरपा था।
‘‘मैं पूछता हूं, आप लोग दंगों को कण्टोल क्यों नहीं कर पा रहे हैं।’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद कमिनर को तैश आ गया।
‘‘मैं तो पहले ही कह रहा था कि इस तरह की गंदी बस्तियां शहर में रहनी ही न चाहिए। पता नहीं कहां कहां से चले आते हैं लोग हमारे शहर में गंदगी फैलाने।’’ एक इंस्पेक्टर जो वहीं का लोकल निवासी था, अपनी नाक सिकोड़ते हुए बोला।
‘‘इस देश का हर नागरिक देश में कहीं भी बसने के लिए आजाद है। संविधान के खिलाफ मत बोलो।’’ कमिनर ने उसे डपटा। इंस्पेक्टर सकपकाकर चुप हो गया।
‘‘कोई किसी काम का नहीं है।’’ कमिनर सबको घूरते हुए उठ खड़ा हुआ।
फिर वह एक इंस्पेक्टर की तरफ मुड़ा,‘‘इं-विशाल, तुम मेरे साथ आओ।’’
इंस्पेक्टर विशाल उठा और कमिनर के साथ चलते हुए दूसरे कमरे में पहुच गया जहा और कोई नहीं था।
‘‘इं- विशाल, इससे पहले कई केस तुमने सफलतापूर्वक हल किये हैं। इसलिए मुझे उम्मीद है कि बस्ती में शान्ति स्थापित करने और झगड़ों की तह तक जाने में तुम कामयाब होगे।’’
‘‘मेरी पूरी कोशिश होगी सर!’’ इं-विशाल ने हल्का सा सर झुकाया।
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2 comments:

Abhishek Mishra said...

‘ईट-एन-ज्वाय’ का ही हाथ लग रहा है इन फसादों के पीछे!

Arvind Mishra said...

धांसूं शुरुआत !