Monday, October 13, 2008

ताबूत - एपिसोड 12

नक्शा देखने के बाद प्रोफ़ेसर बोला, "नक्शे के हिसाब से तो रास्ता इन पहाड़ियों में होना चाहिए.

"फिर उन्होंने काफ़ी देर पहाडियों में कोई रास्ता, कोई दरार इत्यादि ढूँढने की कोशिश की, किंतु कहीं कोई रास्ता नही मिला.
"मेरा ख्याल है कि यह स्थान आराम करने के लिए काफी अच्छा है. इस समय आराम किया जाए, सुबह दिन की रौशनी में रास्ता ढूँढा जाएगा."सभी प्रोफ़ेसर की बात से सहमत हो गए और आराम करने के लिए वहीँ लेट गए. जल्द ही सबको नींद ने आ घेरा.

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अगले दिन सुबह उठकर वे लोग फिर पहाड़ियों के पास पहुंचे और ध्यान से उनका निरीक्षण करना शुरू कर दिया, कि शायद कहीं से कोई दर्रा इत्यादि दिख जाए जो उन्हें पहाड़ियों के दूसरी ओर पहुँचा दे. किंतु लगभग दो घंटे की माथापच्ची के बाद उन्हें दर्रा तो क्या दरार भी न दिखी.
"मेरा ख्याल है कि हमें पहाड़ियों पर चढ़कर इन्हें पार करना चाहिए." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"लेकिन यह पहाडियाँ तो एकदम सीधी हैं. इनके ऊपर कैसे चढा जाए?" रामसिंह ने विवशता के साथ कहा.

"यदि अक्ल हो तो हर काम हो सकता है. वह पेडों कि लताएँ देख रहे हो," प्रोफ़ेसर ने पेडों की ओर संकेत किया, "उसे बट कर हम लोग रस्सी की सीढ़ी बनाते हैं फिर उसके द्वारा इन पहाड़ियों पर चढा जाएगा."
"गुड आईडिया प्रोफ़ेसर. हमें इस कार्य में देर नही करनी चाहिए." शमशेर सिंह ने कहा. फिर वे लोग पेडों की तरफ़ चल पड़े. शमशेर सिंह ने कुल्हाड़ी उठाकर लताओं को काटना शुरू कर दिया और बाकी दोनों उसे बटकर रस्सी बनाने लगे. लगभग तीन घंटे के परिश्रम के बाद उन्होंने काफ़ी लम्बी रस्सी तैयार कर ली थी. प्रोफ़ेसर ने उसके ऊपर एक हुक लगा दिया.
"अब हम लोग पहाडी पर चढ़ सकते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"लेकिन इस रस्सी को पहाडी के ऊपर कैसे फंसाएंगे?" रामसिंह ने पूछा.

"इसकी चिंता मत करो. मेरे पास इसका भी इलाज मौजूद है." कहते हुए प्रोफ़ेसर ने अपना सूटकेस खोलकर एक पटाखे वाला रॉकेट निकाला और कहा, "यह रॉकेट इस हुक को लेकर पहाड़ियों पर जाएगा. यह है तो छोटा, किंतु बहुत शक्तिशाली है. और इसको मैंने ख़ुद बनाया है."
प्रोफ़ेसर ने हुक को रॉकेट के साथ बाँध दिया और रॉकेट की दिशा पहाड़ियों की ओर करके उसके पलीते में आग लगा दी. रॉकेट सर्र सर्र की आवाज़ करते हुए उड़ गया और पहाड़ियों के ऊपर जाकर गिरा.. इसके साथ ही रस्सी में लगा हुक भी पहाड़ियों के ऊपर पहुँच गया. प्रोफ़ेसर ने रस्सी को दो तीन झटके दिए किंतु हुक नीचे नहीं आया.

"हुक पहाड़ियों पर अच्छी तरह फँस गया है. अब हम रस्सी के सहारे ऊपर पहुँच सकते हैं." उसने कहा. फिर उन्होंने रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया. सूटकेस उन्होंने अपने कन्धों पर डाल लिए थे. प्रोफ़ेसर उन तीनों में सबसे आगे था.
कुछ ऊपर चढ़ने के बाद अचानक प्रोफ़ेसर को कुछ ख्याल आया और उसने चौंककर चिल्लाते हुए कहा, "तुम दोनों मेरे साथ क्यों आ रहे हो? तीन लोगों के बोझ से यह रस्सी टूट नही जाएगी?" प्रोफ़ेसर की बात पूरी होते ही उसकी आशंका भी सत्य सिद्ध हो गई और रस्सी टूट गई. फिर वे एक के ऊपर एक गिरते चले गए.

1 comment:

DHAROHAR said...

waiting for the next...