Friday, July 12, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 5


जबकि बंदर बने रामू की जान सांसत में थी। सामने मौजूद विशालकाय साँप उसे गटकने के लिए तैयार खड़ा था। उसने बचाव बचाव कहने के लिए मुँह खोला। लेकिन मुँह से बंदरों जैसी खों खों निकल कर रह गयी।
साँप ने उसके ऊपर एक झपटटा मारा और वह जल्दी से साइड में हो गया। इस चक्कर में उसके हाथ से डाल छूट गयी। और वह धड़ाक से नीचे चला आया। लेकिन नीचे उसे जरा भी चोट नहीं आयी। क्योंकि वह किसी जानवर की पीठ पर गिरा था। अब जो उसने घूमकर जानवर का चेहरा देखा तो उसकी रूह फना हो गयी। क्योंकि वह जानवर जंगली सुअर था।

जंगली सुअर भी अचानक आयी इस आफत से घबरा गया और सरपट नाक की सीध में दौड़ लगा दी। बड़ी मुशिकल से रामू उसकी पीठ पर बैलेंस कर पा रहा था।
फिर सुअर एक झाड़ी में घुस गया और रामू को नानी याद आ गयी। क्योंकि कंटीली झाडि़यों ने उसके पूरे जिस्म को छेड़ना शुरू कर दिया था। फिर उसके हाथ में एक मजबूत पौधा आ गया और वह उसे थामकर लटक गया। सुअर आगे भागता चला गया।

''हाय हाय कहाँ फंस गया मैं। इससे अच्छा तो गणित ही पढ़ता रहता मैं।" कराहते हुए रामू सोच रहा था। फिर उसने इरादा किया शहर वापस लौटने का।
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''सुनिए, मैं आपसे कुछ ज़रूरी बात करना चाहती हूँ।" बिस्तर पर करवट लेते हुए मिसेज वर्मा ने मिस्टर वर्मा के कंधे को हिलाया।
''अब सोने दो। मुझे नींद आ रही है।" मिस्टर वर्मा ने फौरन आँखें बन्द कर लीं।
''आप तो हमेशा इधर बिस्तर पर पहुँचे और उधर अंटा गफील हो गये।" मिसेज वर्मा ने शिकायत की।
''तो क्या तुम चाहती हो मुझे नींद न आने की बीमारी हो जाये?"

''बकवास मत करिये और मेरी बात सुनिए। मुझे राम आजकल कुछ बदला बदला सा लगता है।"
''हाँ। मैं भी देख रहा हूँ। उसका रंग आजकल कुछ ज्यादा ही साँवला हो गया है।"
''मैं रंग की बात नहीं कर रही हूँ।" मिसेज वर्मा ने दाँत पीसे, ''मुझे उसके व्यवहार में कुछ बदलाव लग रहा है। हर वक्त खोया खोया सा रहता है। मुझसे आजकल किसी बात की जिद भी नहीं करता। जो कुछ कहती हूँ फौरन मान लेता है।"
''ये तो अच्छी बात है। तुम्हारी प्राब्लम साल्व हो गयी। तुम ही तो शिकायत करती थीं कि वह तुम्हारी बात नहीं सुनता।"

''पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि उसके शरीर में कोई भूत आ गया है।"
''अब तुमने शुरू कर दीं जाहिलों वाली बातें। मुझे नींद आ रही है। मैं सोता हूँ।" दूसरे ही पल मि0 वर्मा के खर्राटे गूंजने लगे थे। मिसेज वर्मा थोड़ी देर कुछ सोचती रही फिर वह भी अण्टा गफील हो गयी।
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अग्रवाल सर के घर पर उनके चहेते शिष्य डेरा जमाये हुए थे। यानि गगन, अमित और सुहेल सभी आपस में इस तरह सर जोड़कर बैठे थे मानो किसी गंभीर सब्जेक्ट पर विचार विमर्श कर रहे हों।
''सर, समझ में नहीं आता कल का गोबर गणेश रामू एकाएक इतना तेज कैसे हो गया।" अमित बोला।
''आश्चर्य मुझे भी है। लेकिन अब उसे नीचा दिखाना ही होगा। वरना और सर चढ़ जायेगा।" अग्रवाल सर बोले।
''हाँ सर। अब तो पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा है। अब तो वह आपको भी कुछ नहीं समझता।"
''अच्छा।" अग्रवाल सर ने पैर पटका। और तीनों ने मुस्कुराहट छुपाने के लिए अपने मुँह पर हाथ रख लिए। क्योंकि अग्रवाल सर की पैंट की जिप खुली थी। जो पैर पटकने से ज़ाहिर हो गयी थी।

''हाँ सर।" अमित जल्दी से बोला, ''कहता है अग्रवाल सर की मैथ उसके मुकाबले में कुछ नहीं।"
''ऐसा कहा उसने।" गुस्से में उनके मुँह से झाग निकलने लगा था, ''मैं उसे दिखाऊंगा कि गणित किस बला का नाम है। बच्चू को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि मैथ का नाम लेना भूल जायेगा।"
अब तीनों लड़कों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। क्योंकि वे अग्रवाल सर को गुस्सा दिलाने में कामयाब हो चुके थे। अब रामू की खैर नहीं थी।
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उधर बंदर बना रामू अब शहर की सीमा में प्रवेश कर चुका था। यहाँ आकर उसने राहत की साँस ली। 'चलो जंगली जानवरों से पीछा छूटा। यहाँ पर सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं। अब कुत्ते तो भौंकते ही रहते हैं।'
लेकिन यह क्या? कुत्ते तो भौंकते हुए उसी की तरफ दौड़े चले आ रहे थे। उसे याद आ गया कि उसका जिस्म बंदर का है। और कुत्ते बंदरों के अव्वल दर्जे के दुश्मन होते हैं।

एक बार फिर उसे दौड़ जाना पड़ा। उसने छलांग लगाई और एक मकान का पाइप पकड़कर जल्दी जल्दी ऊपर चढ़ने लगा। थोड़ी ही देर में वह मकान की छत पर था।
अब वहाँ मौजूद पानी की टंकी पर चढ़कर वह चारों ओर नजारा कर रहा था। उसे एरिया कुछ जाना पहचाना महसूस हुआ। फिर इस घर को भी वह पहचान गया। यह तो नेहा का घर है। एक वही तो थी पूरे क्लास में जो उससे हमदर्दी रखती थी।

अब उसे थोड़ा इत्मिनान हुआ। वह नेहा को पूरी बात बतायेगा। शायद वह उसकी कुछ मदद कर सके।
रामू को किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। उसने झांककर देखा, नेहा गीले कपड़ों को धुप में डालने के लिए ऊपर आ रही थी।
''काम बन गया। लगता है ऊपर वाला मेरे ऊपर मेहरबान है।" उसने खुश होकर सोचा।
नेहा ऊपर आयी और फिर वहाँ लगे हुए तार पर कपड़े डालने लगी। अभी उसकी नजर बंदर उर्फ रामू पर नहीं पड़ी थी।
''हैलो नेहा! मैं रामू हूँ। प्लीज मेरी मदद करो।" रामू बोला। ये अलग बात है कि उसके मुंह से सिर्फ बंदरों वाली खों खों ही निकल पायी।

नेहा ने घूमकर देखा। और फिर जो कुछ हुआ वह रामू के लिए अप्रत्याशित था।
नेहा ने एक जोर की चीख मारी और मम्मी-बंदर मम्मी-बंदर रटती हुई सीढि़यों से नीचे भागी।
''बंदर-किधर है बंदर.. रामू भी घबरा कर इधर उधर देखने लगा। फिर उसे याद आया कि बंदर तो वह खुद ही बना बैठा है।
''तो नेहा भी मुझे पहचान नहीं पायी।" अफसोस के साथ उसने सोचा।

''किधर है बंदर! नीचे से एक दहाड़ सुनाई दी।" रामू ने घबराकर देखा। नीचे नेहा का बड़ा भाई हाथ में मोटा डंडा लिए नेहा से पूछ रहा था। रामू की रूह फना हो गई। उसने वहाँ से फौरन निकल लेना ही उचित समझा।
फिर एक लम्बी छलांग ने उसे दूसरे मकान की छत पर पहुँचा दिया। यहाँ पहुंचकर वह खुश हो गया। क्योंकि चारों तरफ मूंगफलियां बिखरी हुई थीं। दरअसल उन्हें सुखाने के लिए वहाँ रखा गया था। रामू को जोरों की भूख लग रही थी, लिहाजा उसने आव देखा न ताव और मुटठी भर भर कर मूंगफलियां चबानी शुरू कर दीं।  

 अभी उसने दो तीन मुटिठयां ही मुंह में डाली थीं कि कोई चीज बहुत जोरों से उसके पैर से टकराई। दर्द की एक जोरदार टीस में वह सी करके रह गया। फिर घूमकर देखा तो थोड़ी दूर पर एक लड़का खड़ा हुआ था हाथ में गुलेल लिए हुए।
''आओ बच्चू, ये गुलेल मैंने तुम लोगों के लिए ही तैयार की है।" कहते हुए लड़का गुलेल में फिर से कंकड़ी लगाने लगा।
अब रामू के पास एक बार फिर भागने के अलावा और कोई चारा नहीं था।
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1 comment:

arvind mishra said...

अण्टा गफील-पहली बार सुना ...हा हा हा