Wednesday, December 28, 2011

उर्दू में साइंस फिक्शन - एक मुताल्या


प्रस्तुत लेख मैंने दिनांक 26 व 27 दिसंबर 2011 को नेशनल डिग्री कालेज, लखनऊ मे आयोजित कार्यशाला के दूसरे दिन पढ़ा। ये कार्यशाला विज्ञान प्रसार, नेशनल बुक ट्रस्ट व तस्लीम के संयुक्त तत्वधान में आयोजित हुई।

हिन्दी साइंस फिक्शन के शौकीनों को दो नाम खास तौर पर आकर्षित करते हैं। ये नाम है प्रोफेसर दिवाकर और डा0रमन। लेकिन जब कोई इन नामों के लेखकों के बारे में छानबीन करता है, तो उनका कहीं कोई अता पता नहीं मिलता। दरअसल ये दोनों नाम ही असली नहीं हैं और सच्चाई ये है कि इन नामों से लिखने वाला उर्दू का मशहूर मुसन्निफ इज़हार असर है। इज़हार असर ने एक हज़ार नावेल लिखकर रिकार्ड बनाया जिनमें सौ से ऊपर साइंस फिक्शन शामिल हैं। जबकि इस गिनती से वह नावेल अलग है जो उन्होंने हिन्दी में प्रोफेसर दिवाकर और डाक्टर रमन नामों से लिखे। इससे हम अन्दाज़ा कर सकते हैं कि उर्दू लिटरेचर साइंस फिक्शन के मामले में दूसरी भाषाओं के मुकाबले कहीं कमतर नहीं ठहरता। हालांकि आमतौर पर जब उर्दू लिटरेचर की बात होती है तो शेरो शायरी, ग़ज़ल, जाम व साक़ी का ही तसव्वुर ज़हन में आता है। उर्दू साइंस फिक्शन का वजूद तो बहुत ही दूर की कौड़ी नज़र आता है। लेकिन हक़ीक़त इसके बरअक्स है।
उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन के मामले में निहायत ज़रखेज़ है। उर्दू के कई मुसन्निफों ने साइंस फिक्शन से मुताल्लिक आला दर्जे का लिटरेचर दुनिया के सामने पेश किया है। इस लिटरेचर में बहुत से नये अछूते ख्यालात को जगह दी गयी है। उर्दू को फरोग़ देने में शहरे लखनऊ का नाम अव्वल दर्जे पर आता है। उर्दू का पहला साइंस फिक्शन राइटर देने का भी सेहरा इसी शहर के सर है। और उस राइटर का नाम है खान महबूब तरज़ी। इन्होंने पहला साइंस फिक्शन नावेल आज़ादी से पहले लिख लिया था। हालांकि ये बताना बहुत मुश्किल है कि उनका पहला साइंस फिक्शन नावेल कौन सा था, क्योंकि उनके बारे में बहुत कम रिकार्ड उपलब्ध् है। आज़ादी से पहले के दौर में लिखे गये उनके कुछ नावेल है, ‘क़यामत-ए-सुग़रा’, ‘सफर-ए-ज़ोहरा’, ‘शहज़ादी शब-ए-नूर’ और ‘फौलादी पुतली’ वगैरा। ये सभी नावेल लखनऊ के मशहूर पब्लिकेशन नसीम बुक डिपो ने प्रकाशित किये थे। उनके नावेलों में टाइम मशीन और रोशनी की तेज़ रफ्तार से गुज़रकर महाभारत की लड़ाई जैसे गुज़िश्ता वाक़ियात को देखना शामिल है। आगे उर्दू के जिन मुसन्निफों ने इसपर काम किया है उनमें शामिल हैं इब्ने सफी, इज़हार असर, मज़हर कलीम, मुश्ताक़ क़ुरैशी, एच-इक़बाल, एम-ए-राहत वगैरा। 
अकेले इब्ने सफी ने ही ढाई सौ से ऊपर नावेल लिखे, इनमें सत्तर के लगभग उच्च कोटि के साइंस फिक्शन शामिल हैं। इब्ने सफी के उपन्यास कहने को तो जासूसी हैं किन्तु उनमें सस्पेंस, एडवेंचर, हास्य हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वो पाठक वर्ग को ऐसी रोमांचक दुनिया की सैर कराते हैं जो पाठक को आसपास के वातावरण से बेखबर कर देती है। उनके उपन्यासों में सबसे बड़ा रंग है साइंस फिक्शन का और यह कहने में कोई हिचक नहीं होती कि उर्दू में जासूसी साइंस फिक्शन की शुरूआत की है इब्ने सफी ने। सन 1953 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘मौत की आंधी  इस तरह का पहला उपन्यास था। जिसमें एक ऐसे लौह मानव की कल्पना है जो मशीन से कण्ट्रोल होता था और जानवरों व इंसानों की बू पाकर झपटता था और उनके दो टुकड़े कर देता था। इस लौह राक्षस को बनाने वाले कुछ सिरफिरे वैज्ञानिक थे जो पूरी दुनिया को अपने कब्ज़े में करना चाहते थे।  
इब्ने सफी ने साहित्य में जासूसी साइंस फिक्शन की एक नयी शुरूआत की है। उनकी कहानियां भूत प्रेतों और राक्षस व पिशाचों की कल्पनाओं का मज़ाक उड़ाती हुई हर घटना की साइंटिफिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। उनकी कहानियों में अनेकों अद्भुत वैज्ञानिक कल्पनाएं देखने को मिलती हैं। उनकी शोला सीरीज़ में ऐसी घातक किरणों की कल्पना है जिनसे सिर्फ चमड़े का लबादा पहनकर बचा जा सकता है। उनकी कहानियों में वैज्ञानिक रूप से निहायत तरक्कीयाफ्ता कुछ मुजरिमों ने एक नया मुल्क ज़ीरोलैण्ड नाम से बसाया है और जिनके पास ऐसे उड़नतश्तरी नुमा वायुयान हैं जिन्हें दूसरे देशों का राडार सिस्टम कैच नहीं कर पाता। और जिसे लोग दूसरी दुनिया के प्राणियों का यान समझते हैं। उनके पास गदानुमा ऐसे हथियार भी मौजूद हैं जिनसे गोलियां टकराकर अपनी दिशा बदल देती हैं।
इब्ने सफी के उपन्यासों में ज़ेब्राधारी ऐसे मनुष्य पाये जाते हैं जो हाथी से भी ज्य़ादा शक्तिशाली हैं। ये मनुष्य कुछ वैज्ञानिकों के दिमाग की उपज हैं। ज़ीरोलैण्ड पर हुकूमत करने वाली एक ऐसी औरत है जो अपने यन्त्रों द्वारा किसी को हिप्नोटाइज़ करके उससे अपने आदेश मनवा लेती है। वहाँ ऐसे पक्षी पाये जाते हैं जिनकी आँखों में छोटा कैमरा फिट रहता है और वे जासूसी का काम करते हैं। इब्ने सफी के उपन्यासों में ऊर्जा की ऐसी परछाईयां भी मिलती हैं जिनकी रेंज में आने पर बड़ी से बड़ी इमारत ढेर हो जाती है। मशीनों से कण्ट्रोल होने वाले कृत्रिम तूफान भी उनके उपन्यासों में नज़र आते हैं। इस प्रकार की अनेकों कल्पनाएं उनके उपन्यासों में प्रदर्शित होती हैं जिनमें साइंस का पहलू पूरी मज़बूती के साथ संलग्न रहता है।
मनोविज्ञान पर भी इब्ने सफी का कलम पूरी कुशलता के साथ चला है। स्पिलिट पर्सनालिटी (द्विव्यक्तित्व) का विचार उनके उपन्यास ‘जहन्नुम का शोला’ में प्रदर्शित हुआ। जिसमें एक मासूम लड़की अपनी दूसरी पर्सनालिटी में मुजरिमों की टोली की मलिका है। ‘एडलावा’ रेड इण्डियन जाति का बचा हुआ शक्तिशाली व्यक्ति, जिसके अन्दर अपनी जाति मिटाने वालों के खिलाफ गुस्सा फूटकर निकलता है और वह उनके खून से स्नान करता है। एक अपराधी जब किसी तरीके से अपना मुंह नहीं खोलता तो उसे लिटाकर उसके माथे पर लगातार पानी की बूंदें टपकायी जाती हैं। उन बूंदों की धमक उसे चीखने पर मजबूर कर देती है।
उर्दू साइंस फिक्शन में एक और सशक्त हस्ताक्षर इज़हार असर है। इनकी अभी इसी वर्ष 15 अप्रैल 2011 को मृत्यु हुई है। जासूसी और साइंस फिक्शन का मिक्सचर उनकी बहराम सीरीज़ काफी लोकप्रिय हुई। इज़हार असर के साइंस फिक्शन उपन्यासों में भी कई अछूते ख्यालात देखने को मिलते हैं। 1955 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ एक ऐसी औरत की कहानी है जो अपने मालिक के अनैतिक हुक्म को मानने से इंकार कर देती है। उस समय उसका मालिक उसे बताता है कि वह सिर्फ एक रोबोट है जिसे अपने मालिक का हर हुक्म मानने के लिये बनाया गया है। ‘बीस साल बाद’ में दूसरे ग्रह से आये हुए एलियेन एक सुपर ब्रेन का निर्माण करते हैं जो ध्राती पर खत्म हो रही एक जाति की छानबीन करता है। ‘मशीनों की बग़ावत’ में ऐसी इण्टेलिजेंट मशीनों की कल्पना है जिन्होंने ग्रह पर रहने वाले इंसानों के दिमागों पर अपना कण्ट्रोल कर लिया है और किसी भी इंसान के दिमाग में अगर उनके खिलाफ ख्याल भी आता है तो उन्हें पता चल जाता है। लेकिन इसके बावजूद कुछ इंसान अपनी अक्ल से उनके खिलाफ जीतने में कामयाब हो जाते हैं। ‘ज़ीरो ज़ीरो ज़ीरो’ में दिमाग को एटामिक रेडियेशन के ज़रिये इतना ताकतवर बनाने की कल्पना है कि सिर्फ सोच के द्वारा किसी का क़त्ल किया जा सकता है। ‘एटामिक कठपुतलियां’ ऐसे इंसानों की कहानी है जो कभी नार्मल थे, लेकिन एटामिक रेडियेशन ने उन्हें अछूत बना दिया है। यह एक इंसानी किरदार के मशीनी डुप्लीकेट की भी कहानी है जो साइंसदानों की तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी असलियत जान जाता है और एक ग्रह को बचाने के लिये अपने को क़ुरबान कर देता है। 
उर्दू साइंस फिक्शन में मज़हर कलीम ने भी बहुत कुछ लिखा है। हालांकि उनके उपन्यासों में इब्ने सफी के ही किरदार यानि अली इमरान व उसकी टीम नज़र आती है। शायद प्रकाशकों के दबाव में उन्होंने पुराने मक़बूल किरदारों को लेकर कहानियां लिखीं। उनके उपन्यास ‘कायापलट’ में अनोखे बायोवीपन की बात हो रही है। एक साइंटिस्ट ने ऐसे जरासीम बनाये हैं जो इंसान को बुज़दिल बना देते हैं। जिनके असर में आते ही फौज के बड़े बड़े बहादुर चींटी काटने से भी डरने लगते हैं। ‘व्हाइट शैडो’ कहानी में साइंटिस्ट ऐसी सोलर माइक्रोचिप बनाने में कामयाब हो जाता है जिसमें स्टोर की हुई सोलर एनर्जी महीनों चलती है। इब्ने सफी के ही किरदारों को लेकर एच-इक़बाल और मुश्ताक कुरैशी ने ऐसे कई नावेल लिखे जिसमें उन्होंने इन किरदारों को दूसरे ग्रहों की अनजानी दुनियाओं की सैर कराई। एम-ए-राहत की ‘सदियों का बेटा’ नाम से एक उपन्यास सीरीज़ काफी मक़बूल हुई। जिसमें उन्होंने हमेशा ज़िन्दा रहने वाले एक कैरेक्टर के ज़रिये ज़मीन बनने की शुरूआत से लेकर उसकी हर सदी में तरक्की की दास्तान सुनाई थी। खास बात ये कि इस पूरी विज्ञान सम्मत दास्तान में कहीं किसी वैज्ञानिक का रोल नहीं है। पाकिस्तान में सिराते इम्तियाज़ से सम्मानित अशफाक अहमद की तिलिस्म होश अफ्ज़ा भी क़ाबिले जिक्र है जिसमें प्योर साइंस फिक्शन कहानियां शामिल हैं। इस तरह उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन लिटरेचर से भरपूर है।

--------- ज़ीशान हैदर ज़ैदी (लेखक)


और अब एक बानगी लखनऊ में पत्रकारिता के मौजूदा स्तर की।

लखनऊ का एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र लिखता है,
‘जीशान हैदर जैदी ने उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए कहा कि इससे पहले भी उर्दू के विज्ञान कथाकार लखनऊ में आ चुके हैं।’
(जबकि मैंने कहा था कि उर्दू जगत में पहला विज्ञान कथाकार लखनऊ का था।) 

एक अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने लिखा,
‘उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए विज्ञान कथाकार जीशान हैदर जैदी ने कहा कि मुट्‌ठी भर विज्ञान कथाओं को छोड़ दें तो उर्दू साहित्य में दूर दूर तक विज्ञान कथाओं का कोई अस्तित्व नहीं है।’
(जबकि मैंने कहा था कि उर्दू ज़बान साइंस फिक्शन लिटरेचर से भरपूर है।)  
------लेखक           

5 comments:

दर्शन लाल बवेजा said...

वाह....

Shah Nawaz said...

सही कहा...

DR. ANWER JAMAL said...

Please correct this word 'मुताल्या'.

Nice post .

http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/12/blog-post_28.html

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

Sodhparak aalekh hai Badayi.

बी एस पाबला BS Pabla said...

बढ़िया