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Thursday, December 17, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 74


‘‘चिन्ता मत करो। तुम्हारा सामान लेकर भी कोई तुम्हारे जैसा वैज्ञानिक नहीं बन सकता।’’ शमशेर सिंह ने प्रोफेसर के कंधे पर हाथ रखकर कहा।
रामसिंह अब आराम से खर्राटे ले रहा था। सपनों की दुनिया में मग्न उसे इस बात का कोई होश नहीं था कि इस समय उसे उसकी प्रेमिका की बस्ती से मीलों दूर ले जाया जा रहा है।

‘‘क्यों भाई शान्ति कुंज अभी कितनी दूर है?’’ प्रोफेसर ने कोचवान से पूछा।
‘‘अभी बहुत दूर है। किन्तु शाम तक हम पहुंच जायेंगे।’’ कोचवान ने जवाब दिया।
‘‘यह किस प्रकार का स्थान है?’’ शमशेर सिंह ने पूछा।

‘‘शान्ति कुंज ऐसा स्थान है जहां हम उन व्यक्तियों को छोड़ते हैं जिन्हें जलाल आ जाता है। कुछ समय वहां अकेले बिताने के बाद वह व्यक्ति शांत हो जाता है। कभी कभी पूरी तरह शांत हो जाता है। अर्थात उसकी मृत्यु हो जाती है।’’ कोचवान बता रहा था।
‘‘किन्तु वहां पर क्या है?’’ प्रोफेसर ने पूछा।

‘‘ वहां अजीब अजीब वस्तुएं दिखाई देती हैं। हमें तो वह भूतों का डेरा मालूम होता है।’’
‘‘क-- क्या! फिर वहां क्यों जा रहे हो?’’ शमशेर सिंह काँपते हुए बोला। दोनों की हालत पतली होने लगी थी।

‘‘मुझे यही आदेश मिला है। किन्तु मैं वहां तक नहीं जाऊंगा। बल्कि कुछ दूर पर आप लोगों को छोड़कर वापस पलट आऊंगा।’’
‘‘तो क्या हमें भूत नहीं परेशान करेंगे?’’ शमशेर सिंह ने पूछा।

‘‘नहीं। क्योंकि आप लोग देवता पुत्र हैं। भला भूतों की क्या मजाल कि वे आपसे छेड़खानी करें।’’
शमशेर सिंह ने कहना चाहा कि वह कोई देवता वगैरा नहीं है। बल्कि उन्हीं की तरह अँधेरे से डरने वाला एक मनुष्य है। लेकिन फिर बनी बनाई इज्जत मिट्‌टी में मिलने के डर से खामोश रहा।

प्रोफेसर ने पूछा, ‘‘तुमने यह तो बताया ही नहीं कि वहां पर कौन सी अजीब वस्तुएं दिखाई देती हैं?’’
‘‘वहां पर हमें ऐसी गाड़ियां दिखाई देती हैं जो बहुत तेज चलती हैं। किन्तु आगे कहीं कोई जानवर जुता हुआ नहीं दिखाई देता। वहां पर एक बहुत लम्बी चौड़ी काली पट्‌टी है जिसका छोर हमें कभी नहीं दिखाई दिया। वहां पर एक लम्बा चौड़ा तालाब भी है। उस तालाब के दूसरे छोर पर हम कभी नहीं गये क्योंकि उधर की ऊंची ऊंची झाड़ियों के पीछे से अजाब प्रकार की आवाजें सुनाई देती हैं। लगता है मानो सैंकड़ों भूत मिलकर चिल्ला रहे हों।’’ कोचवान बता रहा था।

‘‘किन्तु वहां हम लोग किस स्थान पर रुकेंगे?’’ प्रोफेसर ने पूछा।
‘‘तालाब के इसी ओर एक झोंपड़ी बनी है। उसी झोंपड़ी में आपके ठहरने का प्रबंध किया गया है।’’
‘‘यह प्रबंध कैसे कर दिया गया? क्या किसी को मालूम था कि रामसिंह अचानक पागल हो जायेगा और हमें यहां आना पड़ेगा?’’

‘‘यह प्रबंध सदैव वहां रहता है क्यांकि अक्सर हम अपने साथियों को वहां भेजते रहते हैं।’’
उसके बाद प्रोफेसर ने कुछ नहीं पूछा। शमशेर सिंह भी मौन हो गया था। इस प्रकार बाकी रास्ता खामोशी के साथ तय हुआ।

अन्त में एक स्थान पर कोचवान ने गाड़ी रोक दी।

अगले प्लेटिनम जुबली एपिसोड में पढ़ें कुछ ख़ास.

1 comments:

अजित वडनेरकर said...

जीशान भाई,
साइंस का विद्यार्थी रहा हूं। विज्ञान कथाओं का खूब शौकीन हूं और कई प्रसिद्ध विज्ञान फंतासियां पढ़ी हैं। नार्लीकर जी की ज्यादातर अनुदित सामग्री मेरे पास है।

आपके धाम का पता न था। ये मेरी अज्ञानता का सबूत है। गलती से साइंस की जगह भाषा विज्ञान के फेर में पड़ गया हूं। उसमें भी बस, अभी आड़े तिरछे हाथ-पैर मार कर ऊपर ऊपर दिखने की कोशिश ही है। गहरे पानी पैठ में डर जो लगता है।

वादा है कि इन सभी 70+ कड़ियों को एक साथ पढ़ कर टिप्पणी दूंगा। इनके प्रिंट निकाल कर पढ़ूंगा। एक महिने बाद बात होती है।

जैजै

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