Monday, December 14, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 72


‘‘फिर तो इसका हो गया कबाड़ा। अब तो इसका घंटों ठीक होना मुश्किल है।’’ शमशेर सिंह ने रामसिंह की ओर देखा जो अब मोली मोली रटने के साथ साथ एक हाथ कमर पर और दूसरा सर पर रखकर डाँस भी करने लगा था।
फिर उसी प्रकार डाँस करता हुआ वह बाहर निकल गया।

‘‘अरे। यह तो बाहर निकल गया। अभी बच्चे पागल समझकर उसपर पत्थर बरसाने लगेंगे।’’ शमशेर सिंह ने आशंका प्रकट की।
‘‘हमें उसके पीछे पीछे रहना चाहिए। वरना कुछ भी गड़बड़ हो सकती है।’’ प्रोफेसर दरवाजे की ओर बढ़ा। शमशेर सिंह ने भी उसका अनुसरण किया।

बाहर रामसिंह एक टीले पर खड़ा होकर जोर जोर से चिल्ला रहा था। कभी वह मुंह आकाश की ओर करके कुछ कहता था, कभी भूमि की ओर झुककर बोलता था। फिर अपने दायें बायें सर हिलाता था। उसके आसपास काफी भीड़ एकत्र हो गयी थी और यह भीड़ बढ़ती जा रही थी।
फिर भीड़ से दो तीन व्यक्ति निकलकर सरदार के झोंपड़े की ओर दौड़े।
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सरदार भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा और रामसिंह के आगे पहुंचकर दंडवत हो गया। उसकी देखा देखी बाकी जंगली भी लेट गये।
‘‘देवता पुत्र को जलाल आ गया है। देवता पुत्र हमसे क्रुद्ध हो गये हैं।’’ सरदार लेटा हुआ चिल्लाने लगा। बाकी जंगलियों के मुंह से डरी डरी आवाज़ें निकलने लगीं।

शमशेर सिंह और प्रोफेसर दूर खड़े हुए तमाशा देख रहे थे। रामसिंह ने छोटे छोटे पत्थर उठाकर जंगलियों की ओर फेंकना आरम्भ कर दिये।
सरदार खड़े होकर चीखा, ‘‘जल्दी से भैंसा गाड़ी ले आओ।’’ उसकी आज्ञा के पालन में दो तीन जंगली दौड़ पड़े।
कुछ देर बाद वहां भैंसा गाड़ी उपस्थित थी।

‘‘देवता को इस समय शान्ति चाहिए। उन्हें शान्ति कुंज में पहुंचा दो।’’ सरदार ने कहा।
दो तीन जंगलियों ने रामसिंह को पकड़ा और गाड़ी की ओर ले चले। 

रामसिंह लगातार अपने हाथ पैर चला रहा था। और साथ ही साथ बड़बड़ा रहा था, ‘‘अरे कोई मुझे ससुराल ले जा रहा है। मैं मायके चला जाऊंगा मुझे देखते रहियो। मेरा पिया घर आयेगा मेरे राम जी। कोई मुझे साजन की ससुराल पहुंचा दे। मेरे दिल में लगी है आग मेरा जीया जलता जाये। एक माचिस का सवाल है आग लगाने के लिए। मुझे तुमसे प्यार हो गया सजना, तुम मेंहदी सजा कर रखना, हाय रूठ गया मेरा बलमा, उफ टूट गया मेरा टखना।’’ उसने कराह कर कहा क्योंकि भैंसा गाड़ी से उसे ठोकर लगी थी।

‘‘ये तो बिल्कुल पागल हो गया है।’’ प्रोफेसर ने कहा।
‘‘लेकिन ये जंगली इसे ले कहां जा रहे हैं?’’ शमशेर सिंह ने पूछा।
‘‘हमें इसके साथ जाना चाहिए।’’ प्रोफेसर ने कहा और वे दोनों भैंसा गाड़ी की ओर बढ़े। जंगलियों ने तुरन्त उन्हें रास्ता दे दिया। वे दोनों भी रामसिंह के साथ भैंसा गाड़ी में बैठ गये। उनके बैठते ही भैंसा गाड़ी चल पडी। भैंसे को आगे बैठा एक जंगली हंका रहा था। 

4 comments:

महफूज़ अली said...

ज़ीशान भाई.... अब शिकायत दूर हो गई शायद....

seema gupta said...

रोचक लग रही है कहानी............आगे.....
regards

JesusJoseph said...

very good post, keep writings.
Very informative

Thanks
Joseph
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aa said...

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