Saturday, July 11, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 8

‘‘आखिर यह कंपनी करती क्या है?’’ मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ाये दुबले पतले युवक ने पूछा।
‘‘कमाल है। क्या तुमने पूरा ऐड नहीं पढ़ा था?’’ पहले ने उसे घूरा।
‘‘शायद पढ़ा होगा। मैं तो जहां भी अखबार में वैकेन्सी देखता हूं, फट से एप्लाई कर देता हूं। अब मुझे यह कहां याद रहेगा कि कौन सी कंपनी ने काल लेटर भेजा है।’’

‘‘मुझे पहले ही लग रहा था कि तुमने अच्छी तरह ऐड नहीं पढ़ा है। क्योंकि इस कंपनी को तगड़े और ऐडवेंचर के शौकीन लोगों की जरूरत है। और मेरा विचार है कि तुम शायद कालेज जाने के अलावा घर से बाहर ही नहीं निकले।’’

‘‘क्यों? निकला क्यों नहीं हूं। घर के लिए सब्जी खरीदने मैं ही तो निकलता हूं।’’ उंगली से अपना चश्मा सही करते हुए दुबला पतला युवक बोला। उसकी बात सुनकर अन्य उम्मीदवारों के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गयी।

थोड़ी देर बाद चपरासी वापस आया और इस बार उस दुबले पतले युवक को अंदर ले गया। पहला युवक वापस नहीं आया था। जिसका मतलब था कि इंटरव्यू के बाद वह बाहर ही से चला गया था।
दोबारा जब चपरासी तीसरे युवक को बुलाने आया तो उसके साथ वह दुबला पतला युवक भी था। जो अपने माथे के पसीने को रुमाल से साफ कर रहा था।

‘‘कैसा हुआ इंटरव्यू??’’ एक दूसरे उम्मीदवार ने पूछा।
‘‘कुछ मत पूछा। बुरी तरह झिला रहे हैं।’’ वह बोला और वापस जाने के लिए मुड़ गया।
उसकी बात सुनकर शमशेर सिंह के पेट में फिर उथल पुथल होने लगी। और उसका नर्वसपन कुछ और बढ़ गया।

दो तीन और लोगों के जाने के बाद इस बार चपरासी ने पुकारा, ‘‘समसेर सिंह जो शज्जन हों, खड़े हो जावैं।’’
‘‘ज---जी साहब। मैं हूं शमशेर सिंह।’’ हड़बड़ा कर शमशेर सिंह बोला।
चपरासी ने उसे एक बार ऊपर से नीचे तक घूरा फिर बोला, ‘‘जावो इंटरव्यू के लिए।’’

शमशेर सिंह उस कमरे की ओर बढ़ा जिसमें इंटरव्यू हो रहा था। इस समय उसका पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और टांगें लड़खड़ा रही थीं।

किसी प्रकार उसने इंटरव्यू रूम तक की दूरी तय की और दरवाजे तक पहुँच गया जिस पर पर्दा पड़ा हुआ था।
उसने पहले तो पर्दे पर आँखें गड़ाकर अंदर देखने की कोशिश की। किन्तु जब उसे इसमें सफलता नहीं मिली तो उसने डरते डरते उंगली से पर्दा थोड़ा सा हटाया और फिर तुरंत पीछे की ओर हट गया।

कुछ देर वहीं खड़े होकर उसने दो तीन गहरी सांसें लीं और एक बार फिर आगे बढ़ने के लिए उसने अपना सारा साहस एकत्र किया।
इस बार उसने पर्दा खिसकाते हुए एक कदम अंदर रखा और मिनमिनाती हुई आवाज में बोला, ‘‘सर! मे आई कम सकता हूं?’’

फिर उसने यह ध्यान नहीं दिया कि किसी ने उसे अंदर आने की आज्ञा दी या नहीं और वह लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ आया। इस समय वह पूरी तरह बौखलाया हुआ था। और जब उसे खाली कुर्सी दिखाई पड़ी तो वह तुरंत उसपर बैठ गया।

जब उसके सामने अंदर का दृश्य कुछ साफ हुआ तो उसने आश्चर्य से सामने देखा। जहां बजाय इंटरव्यू कमेटी के केवल एक मेज पर घोड़े का मूर्ति रखी थी।

2 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

अरे! आपके ब्लॉग की फीड ले ली। यही पोस्ट भर पढ़ी और सामने आया घोड़े का सिर।
गॉडफादर उपन्यास सा रोमांचक प्रतीत होता है! :)

Abhishek Mishra said...

Are ! Yeh kahan pahuncha kar rok diya hamein aapne.