Wednesday, July 1, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 1

प्रोफेसर डेव उर्फ देवीसिंह अपने प्रयोग में बुरी तरह लीन था। इस बात का सुबूत थे उसके माथे पर बिखरे बाल और नाक पर लटकता धूप का चशमा। जो उसने वैज्ञानिक रूपी दिखने के लिए लगा रखा था। सामने रखी लकड़ी की मेज पर विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक उपकरण रखे थे। इनमें परखनलियां, बीकर, फ्लास्क, गिलास, स्टोव, साबुन की टिकिया तथा कुछ चीनी के डोंगे रखे हुए थे। एक डोंगे में चीनी और नमक का मिश्रण रखा था जबकि दूसरे में गाय या भैंस का गोबर पड़ा था।
मेज पर एक चुहिया फुदक रही थी। जिसकी टांग वहां रखे स्टोव से बंधी होने के कारण वह भाग नही पा रही थी। प्रोफेसर ने गिलास में पानी लिया और उसमे चीनी नमक का मिश्रण घोलने लगा। जब मिश्रण घुल गया तो उसने डोंगे में से चमचे से गोबर निकाला और उसमें मिला दिया। फिर गिलास हिलाकर अपना रासायनिक कम्पाउण्ड तैयार करने लगा।

अब उसने अपना केमिकल परखनली में लिया और मैग्नीफाइंग ग्लास से उसका निरीक्षण करने लगा। फिर उसने स्टोव जलाया और परखनली को उसपर रखकर गर्म करने लगा। थोड़ी देर गर्म करने के बाद उसने उसे एक चम्मच में रखकर चुहिया के सामने पेश किया। किन्तु शायद चुहिया को वह डिश पसंद नहीं आयी या शायद कुछ ज्यादा गर्म थी। अत: उसने अपना मुंह घुमा लिया। प्रोफेसर ने चम्मच पानी पर रखकर ठण्डा किया और एक बार फिर चुहिया के सामने रखा। किन्तु इस बार भी चुहिया ने अपना सर घुमा लिया। वह भी काफी जिद्दी मालूम होती थी। प्रोफेसर ने अपना सिर खुजलाया फिर मेज की दराज खोलकर एक सिरिंज निकाली। यह सिरिंज उसी प्रकार की थी जिससे दूधवाले अपनी भैंसों को इंजेक्शन लगाते हैं। वह सिरिंज में परखनली का केमिकल भरने लगा।

उसी समय लैब का दरवाजा खुला और रामसिंह ने प्रवेश किया। प्रोफेसर अपने काम में इतना लीन था कि उसने रामसिंह के आने की आहट न सुनी। वह उसके पास आकर खड़ा हो गया।

‘‘प्रोफसर!’’ उसने धीरे से पुकारा। किन्तु प्रोफेसर अपने काम में इतना लीन था कि उसने रामसिंह की आवाज नहीं सुनी।
‘‘प्रोफसर!’’ इस बार रामसिंह ने जोर से पुकारा और प्रोफेसर उछल पड़ा। साथ ही परखनली में भरा केमिकल उसके खुले मुंह में छलक गया। और बीच में कोई रूकावट होने की वजह से पेट में भी उतर गया।

प्रोफेसर ने पहले एक उबकाई ली और फिर रामसिंह की ओर गुस्से में घूमा।
‘‘कितनी बार कहा है कि लैब में ऊंची आवाज में नहीं बोलना चाहिए। मेरा सारा प्रयोग चौपट कर दिया।’’

‘‘लेकिन तुम कर क्या रहे थे??’’ रामसिंह ने मेज की ओर देखते हुए पूछा।
‘‘मैं चूहे को इंसान बनाने का एक्सपेरीमेन्ट कर रहा था।’’ प्रोफेसर ने बताया।

......continued

3 comments:

Arvind Mishra said...

तो जीशान जी आन नाऊ ! हा हा !
मजा आयेगा !

Abhishek Mishra said...

Lekin ab Prof. Sahab ka kya hoga !

महामंत्री - तस्लीम said...

रोचक, अगली कडी का इंतजार।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }