Monday, March 30, 2009

कहानी - दंगाई बंजारे (३)

इं-यश्वन्त इस समय कौड़िया के साथ जंगल की एक पगडन्डी पर चल रहा था।
‘‘अगर आज्ञा हो तो एक बात पूछूं।’’ कौड़िया अचानक बोला।
‘‘क्या?’’
‘‘मामला तो पूरा सुलझ गया है। कंपनी हटने पर राजी हो गयी है। और दंगाईयों के हमले भी कम हो गये हैं। फिर हम अब जंगल में क्यों हैं?’’
‘‘क्योंकि अभी इस मामले की कई कड़ियां मिसिंग हैं। जरा गौर करो कौंध बस्ती के उस मुखिया की बातें। कुछ लोग जंगल में खास जगह जाते हैं। और फिर वहां से शक्ति हासिल करके और पागल होकर निकलते हैं। कोई इवोल्यूशन अचानक इस तरह नहीं होता।’’

‘‘तो फिर अब हमें क्या करना है?’’
‘‘उस मंदिर की तलाश जहां वह देवी पायी जाती है।’’
‘‘लेकिन कैसे? जबकि कोई कुछ बताने को तैयार नहीं।’’
‘‘मैं इधर कई दिनों से कुछ दंगाईयों का पीछा कर रहा हूं और एक नक्शा तैयार किया है मैंने। जिसपर चलकर मुझे विश्वास है कि हम उस मंदिर तक पहुंच सकते हैं।’’
‘‘तो इस समय हम उधर ही चल रहे हैं।’’
‘‘हां।’’
फिर दोनों काफी देर तक चलते रहे। अचानक उन्हें ठिठक जाना पड़ा। सामने एक बहुत पुराना और विशाल मंदिर दिख रहा था। जो पहाड़ों के पत्थर जोड़ जोड़कर बनाया गया था।
‘‘शायद हम अपनी मंजिल पर पहुंच गये।’’ गहरी सांस लेकर कहा इं-यशवंत ने।
‘‘हां शायद।’’ फिर दोनों ने मंदिर के अंदर कदम रखा। सामने एक पत्थर की मूर्ति स्थापित थी।
‘‘यही हैं हमारी देवी धरनी मां।’’ सब इं-कौड़िया ने मूर्ति के सामने अपना सर झुकाया।
‘‘हूं।’’ इं-यशवंत थोड़ी देर मूर्ति का निरीक्षण करता रहा, फिर मंदिर का निरीक्षण करने लगा। फिर उसकी नजरें उस छोटे दरवाजे पर जम गयीं जो मूर्ति के ठीक पीछे स्थित था। वह कौड़िया का हाथ पकड़कर उसकी तरफ बढ़ा और दोनों उस दरवाजे से दाखिल हो गये।

जैसे ही वे उस दरवाजे से पार निकले, अपने को उन्होंने एक बहुत बड़े मैदान में पाया। जो चारों तरफ से पहाड़ियों में घिरा हुआ था।
और उस मैदान के एक कोने में एक औरत मौजूद थी। एक पत्थर की सिंहासननुमा कुर्सी पर बैठी हुई। उस औरत के सामने बहुत से कौंध जनजाति के युवक पलथी मारकर बैठे हुए थे। मानो कोई योगासन कर रहे हों।
औरत ने घूमकर उनकी तरफ देखा और फिर मुंह पर उंगली रखकर उन्हें चुप रहने का इशारा किया। फिर वह उठकर खड़ी हो गयी और उन्हें अपने पीछे आने का इशारा किया। अब वह एक अन्य दरवाजे की तरफ बढ़ रही थी।
ये दोनों थोड़ा हिचकिचाये, फिर उसके पीछे जाने लगे।
दरवाजे से दाखिल होने पर इन्होंने अपने को एक छोटे से कमरे में पाया।
‘‘मैं नहीं चाहती थी कि मेरे भक्तों की तपस्या में तुम लोगों की वजह से कोई रुकावट आये।’’ उस औरत ने जबान खोली। उसकी आवाज उसके चेहरे की तरह ही खूबसूरत थी।
‘‘कौन हो तुम??’’ इं-यशवंत ने पूछा।
‘‘वही। जिसकी तलाश में तुम यहां तक आये हो।’’
‘‘देवी धरनी मां।’’ इं-कौड़िया ने फौरन अपना हाथ जोड़कर सर झुका दिया। लेकिन इं-यशवंत पहले की तरह सीधा खड़ा रहा।
‘‘सुनो। मैं सभ्य समाज से आया हूं और किसी देवी वगैरा को नहीं मानता।’’ इं-यशवंत बोला।
‘‘तुम्हारा सभ्य समाज बहुत सी खोखली बातों को मानता है और बहुत सी सच्चाईयों से मुंह छुपा लेता है।’’
‘‘सच सच बताओ, कौन हो तुम??’’
‘‘हकीकत में मैं देवी धरनी ही हूं ।’’
‘‘वो पूरी भीड़ बाहर बैठी क्या कर रही है?’’
‘शक्ति हासिल करने के लिए तपस्या कर रही है। उसके बाद वे जिसके सर पर हाथ रख देंगे वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा।’’
‘‘ऐसी शक्ति से क्या फायदा जो लोगों को मारने के काम आती हो।’’
‘‘बाहरी लोग इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहे हैं। उन्हें इनके क्षेत्र से भगाना या मारना अति आवश्यक है। मैं इनके अस्तित्व को बचाने के लिए इन्हें शक्ति प्रदान कर रही हूं।’’ देवी ने त्योरियों पर बल डालकर कहा।
‘‘शायद तुम्हें मालूम नहीं, हमने इन लोगों का परीक्षण कराया है। इनके शरीर में डी-एन-ए- डिफेक्ट की वजह से इवोल्यूशन हुआ है। शक्ति मिलने की बात कोरी बकवास है।’’
‘‘शक्ति किसी भी रूप में प्रदान हो सकती है। तुम मान सकते हो कि मैंने ही उनके डी-एन-ए- में परिवर्तन किये। और अब तुम मरने के लिए तैयार हो जाओ।’’ कहते हुए औरत ने अपनी जेब से छोटी सी पिस्टल निकाली और उनकी तरफ तान दी।
‘‘तुम हमें क्यों मार रही हो?’’
‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरा राज़ बाहरी दुनिया तक पहुंचे।’’ उसकी उंगलियां ट्रेगर दबाने के लिए हिलीं। उसी समय इं-यशवंत ने पैर से पत्थर उछाला जिसे वह बहुत देर से तौल रहा था। निशाना सटीक बैठा और पत्थर सीधा पिस्टल वाले हाथ पर लगा। गोली चली लेकिन निशाने पर कोई न था। पिस्टल साईलेंसर युक्त थी, इसलिए कोई आवाज़ भी न हुई।
इतना मौका काफी था इं-यशवंत के लिए। उसने फौरन देवी धरनी को अपने कब्जे में कर लिया। देवी ने प्रतिरोध की कोशिश की लेकिन इं-यशवंत ने उसकी कनपटियां दबाकर उसे बेहोश् कर दिया।
‘‘कौड़िया - रस्सी!’’
‘‘द--देवी को बाँधने के लिए?’’
‘‘ये कोई देवी वगैरा नहीं है बेवकूफ। सिर्फ मामूली सी औरत है। वरना इतनी आसानी से मेरे कब्जे में न आ जाती।’’
बात कौड़िया की समझ में आ गयी। उसने कोने में पड़ी रस्सी उठाकर इं-यशवंत को थमा दी। इं-यशवंत ने फौरन औरत को रस्सियों से जकड़ दिया।
‘‘यहां ज़रूर कोई गहरी साजिश् हो रही है। हमें उसका पता लगाना है। आओ इस तरफ।’’ वहां मौजूद एक छोटे दरवाजे की ओर इं- यशवंत बढ़ा। औरत को उसने वहीं मौजूद एक सोफे की आड़ में डाल दिया। इससे पहले वह उसकी तलाशी लेना न भूला था।
वह छोटा दरवाजा एक लम्बी सुरंग का मुंह साबित हुआ। दोनों काफी देर उसमें चलते रहे।
‘‘क्या बना रखा है इस देवी ने यहां?’’ फिर उन्हें रौशनी दिखाई दी। इसका मतलब था कि अब सुरंग समाप्त हो रही है।
सुरंग समाप्त हुई और सामने का द्रश्य देखकर दोनों बेहोश् होते होते बचे।
यहां एक हाई टेक प्रयोगशाला दिख रही थी। बड़ी बड़ी मशीनों का जाल चारों तरफ घिरा हुआ था। कम्प्यूटर नुमा स्क्रीनों पर लगातार आंकडे बदल रहे थे।
सबसे खास बात बीच में रखे दो बेड थे। जिनके ऊपर दो जनजातीय युवक लेटे हुए थे, शीशे के कैप्सूलनुमा चैम्बर में बन्द। उस चैम्बर से बहुत सी नलियां निकलकर साइड में रखी मशीनों तक गयीं थीं। जिनमें लगे एल-सी-डी- जल बुझ रहे थे।
‘‘य--यहां ये सब क्या हो रहा है??’’ हकलाते हुए पूछा सब इं-कौड़िया ने।
‘‘इवोल्यूशन। लेकिन कृत्रिम तरीके से।’’ गहरी सांस लेकर जवाब दिया इं-यशवंत ने।
‘‘ठीक पहचाना तुमने।’’ पीछे से एक नयी आवाज सुनाई दी। दोनों चौंक कर मुड़े और इं-यशवंत की आँखें उस व्यक्ति को देखकर फैल गयीं। क्योंकि वह और कोई नहीं बल्कि डा0 शशिकांत था।

4 comments:

Arvind Mishra said...

ये दंगा कब तक ? जीशान भाई !

zeashan zaidi said...

Agli baar antim kist Arvind Ji

seema gupta said...

बहुत दिनों बाद एक नई कहनी पढ़ने को मिली अगली कड़ी का इंतजार रोचक है...

Regards

Abhishek Mishra said...

आज पढ़ी तीनों कडियाँ. रोचक लग रही है कहानी, अगली कड़ी का इन्तेजार.