Monday, January 12, 2009

ताबूत - एपिसोड 45

कुछ देर बाद जब परदे पर भोजन करने का दृश्य आया तो ये लोग एक बार फ़िर बेचैन हो गए.
"अरे वे लोग तो भोजन करने लगे. हम लोग इतनी देर से बैठे हैं हमें कुछ मिल ही नहीं रहा है."
"शायद वे लोग स्वयें खाने के बाद हमारे लिए ले आयें." चोटीराज ने दिलासा दिया.
फ़िर उसके बाद परदे पर विभिन्न प्रकार के सीन आते रहे और उसके उत्तर में इनकी विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं होती रहीं. उनके आसपास बैठने वाले काफ़ी शरीफ मालुम हो रहे थे वरना अब तक इनका गरेबान पकड़ा जा चुका होता. दो तीन लोगों ने इन्हें घूरकर देखा किंतु कोई कुछ बोला नहीं.

उसके बाद वह दृश्य भी आया जहाँ कई गुंडे मिलकर हीरो से फाइटिंग कर रहे थे.
"अरे चोटीराज, देखो कैसा अत्याचार हो रहा है. उस बेचारे को कई लोग मिलकर मार रहे हैं और कोई बोल भी नहीं रहा है." चीन्तिलाल ने दांत पीसकर कहा.
चोटीराज कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और चीखकर बोला, "उसे छोड़ दो वरना यदि मैं आ गया तो मार मारकर उल्टा लटका दूँगा." "अबे ओये, बैठ जा अपनी कुर्सी पर. क्या चिल्ला रहा है." चारों ओर से आवाजें आने लगीं. चोटीराज पर लोगों की बोलियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह उसी प्रकार परदे के बदमाशों को वार्निंग देता रहा. अब चीन्तिलाल भी अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया था. भीड़ का शोर अब और अधिक हो गया था. फ़िर जब हीरो को कई बदमाशों ने गिराकर पीटना शुरू कर दिया तो चोटीराज ने आव देखा न ताव और बगल में रखी किन्हीं सज्जन की गठरी उठाकर परदे की ओर उछाल दी. किंतु परदा काफ़ी दूर था अतः वह गठरी हवा में तैरती हुई एक सज्जन की पत्नी के सर पर जाकर ठहर गई.
"अरे मर गई." उनकी पत्नी की जब सुरीली चीख गूंजी तो वह बौखला कर खड़े हो गए. उन्होंने देख लिया था की वह गठरी किधर से आई है.

उन्होंने बदला लेने के लिए किसी हथियार की तलाश शुरू कर दी और जल्द ही उनका स्वयें का त्फिन बॉक्स उनके हाथ में आ गया और वह उन्होंने चोटीराज की ओर उछाल दिया. किंतु उन्होंने शायद क्रिकेट कभी नहीं खेला था अतः वह टिफिन बॉक्स अपनी मंजिल पर पहुँचने की बजाये बीच ही में बर्स्ट होकर एक पहलवान नुमा सज्जन की तोंद पर जाकर ठहर गया.
"ये कौन बदतमीज़ है." फ़िर पहलवान जी को वह बदतमीज़ दिखाई पड़ गया और वे गिरते पड़ते वहां पहुँच गए और फ़िर वहां पूरा हंगामा खड़ा हो गया. अब लोग दो दो फाइटिंग एक साथ देख रहे थे. जिसमें से एक असली थी और दूसरी नकली.

फ़िर कोई चीखा, "भागो यहाँ बम ब्लास्ट होने वाला है." और फ़िर वहां भगदड़ मच गई. लोग एक दूसरे पर गिरते पड़ते गेटों की ओर भाग रहे थे. फ़िर हाल खाली होने में एक मिनट भी पूरा नहीं लगा. चोटीराज और चीन्तिलाल भी सबके साथ हाल से बाहर आ गए.
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फ़िर मारभट की दृष्टि फलों के एक ठेले पर पड़ी और उसकी ऑंखें चमक उठीं.
"वह देखो, फल मिल गए. आओ खाते हैं." उसने कहा और दोनों ठेले की ओर बढ़ गए.
'क्या हम फल खा सकते हैं?" मारभट ने फलवाले से पूछा.

"अवश्य खाइए." फलवाले ने कहा और मन ही मन कहने लगा, "ये लोग अवश्य कहीं बाहर से आए हैं. दाम भी नहीं पूछे. आज लगता है काफ़ी अच्छी आमदनी होगी.

अगली पोस्ट इस ब्लॉग की सौवीं पोस्ट होगी. जिसमें पढिये कुछ ख़ास.

1 comment:

Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) said...

100वीं पोस्‍ट की अग्रिम बधाई।