Wednesday, September 24, 2008

ताबूत - एपिसोड 4

अचानक बस एक झटके के साथ रूक गई. ऊंघने वाले इस झटके से चौंक पड़े और आँखें फाड़ फाड़ कर बस के ड्राईवर की तरफ़ देखने लगे, मानो वह किसी दूसरी दुनिया का व्यक्ति हो. हो सकता है यह बात कुछ लोगों के लिए सत्य रही हो. क्योंकि वे लोग शायद सपना देख रहे हों कि उनकी यात्रा किसी रॉकेट पर दूसरे ग्रह के लिए हो रही है. वैसे इस बारे में सपने देखने वाले ही बता सकते थे.
जब कुछ देर बीत गई और बस नही चली तो वे लोग बेचैन होने लगे. फिर किसी ने ड्राईवर से कारण जानना चाहा.

"बस के इंजन में लगता है कुछ खराबी आ गई है. मैं देखता हूँ." उसने खटारा बस का टूटा फूटा बोनट उठाया और कुछ देर इधर उधर इंजन में हाथ चलाया.

फिर इंजन स्टार्ट करने की कोशिश की. लेकिन इंजन ने साँस लेने से साफ इंकार कर दिया.

"क्या हुआ? खराबी समझ में आई?" कंडक्टर ने पूछा.

"कुछ समझ में नही आ रहा है. हमारा क्लीनर भी छुट्टी पर गया है. वरना वही कुछ करता."

उधर यात्री बेचैन होकर बार बार कंडक्टर और ड्राईवर से गाड़ी के बारे में पूछ रहे थे. कुछ यात्री बस से उतर कर इधर उधर टहलने लगे. अंत में कंडक्टर ने कहा,
"अब यह बस सुबह से पहले नही चल सकती. वैसे यहाँ से मिकिर पहाडियां ज़्यादा दूर नही हैं. जिन लोगों को वहां जाना है वे पैदल जा सकते हैं।"

लोगों में यह सुनकर घबराहट फ़ैल गई. वे लोग जिन्हें केवल मिकिर पहाडियों तक जाना था, अपना सामान उठाकर चलने का निश्चय करने लगे.
"क्या विचार है? इन लोगों के साथ निकल लिया जाए या सुबह तक रुका जाए?" रामसिंह ने पूछा.

"मेरा ख्याल है कि सुबह तक देख लिया जाए. हो सकता है बस तब तक ठीक हो जाए. वैसे भी इस समय अंधेरे में हम लोग रास्ता भटक सकते हैं." शमशेर सिंह ने कहा.
"बस का ठीक होना तो मुश्किल है. एक काम करते हैं. सामने दो व्यक्ति जा रहे हैं. वे लोग ज़रूर पहाड़ियों की ओर जा रहे हैं. उनके साथ हो लेते हैं." प्रोफ़ेसर ने अपनी राए दी.
"तो फिर जल्दी आओ. वे बहुत दूर निकल गए हैं."रामसिंह ने कहा. फिर वे लोग उन व्यक्तियों के पीछे चल पड़े.

लगभग आधा घंटा चलने के बाद एक आबादी दिखाई पड़ी. जिसमें केवल सात आठ घर थे. शायद ये कोई छोटा मोटा गाँव था. वे व्यक्ति चलते हुए एक मकान में घुस गए.

"क्या यही हैं मिकिर पहाडियाँ?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"अबे बेवकूफ यहाँ तो मैदान है. पहाडियाँ किधर हैं?" रामसिंह ने शमशेर सिंह को ठहोका दिया.

3 comments:

manvinder bhimber said...

essa to aaee din hota hai...achcha anubhaw hai

seema gupta said...

क्या यही हैं मिकिर पहाडियाँ
" oh I think a thrilling suspense is waiting in hills" waiting to know about it..."

Regards

फ़िरदौस ख़ान said...

बेहतरीन तहरीर है...