Sunday, September 21, 2008

ताबूत - एपिसोड 2


"फिर तुम दांत निकाल निकाल कर इतना खुश क्यों हो रहे हो?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"बात ये है कि इस बार मैं ने छुपा खजाना ढूंढ लिया है."

"क्या?" दोनों ने उछालने की कोशिश में प्यालियों कि चाए अपने ऊपर उँडेल ली. अच्छा ये हुआ कि चाए अब तक ठंडी हो चुकी थी.

"हाँ. मैं ने एक ऐसा खजाना ढूँढ लिया है जो आठ सौ सालों से दुनिया की नज़रों से ओझल था. अब मैं उसको ढूँढने का गौरव हासिल करूंगा." प्रोफ़ेसर अपनी धुन में पूरे जोश के साथ बोल रहा था.
"करूंगा? यानी तुमने अभी उसे प्राप्त नही किया है." शमसेर सिंह ने बुरा सा मुंह बनाया.

"समझो प्राप्त कर ही लिया है. क्योंकि मैं ने उसके बारे में पूरी जानकारी नक्शे समेत हासिल कर ली है."

"कहीं वह शहर के पुराने सीवर सिस्टम का नक्शा तो नही है?" रामसिंह ने कटाक्ष किया.

"ऐसे नक्शे तुम ही को मिलते होंगे." प्रोफ़ेसर ने बुरा मानकर कहा, "यह नक्शा मुझे एक ऐसी लाइब्रेरी से मिला है जहाँ बहुत पुरानी किताबें रखी हैं. पहले तुम ये किताब देख लो, फिर आगे मैं कुछ कहूँगा." कहते हुए देवीसिंह ने एक किताब उसकी तरफ़ बढ़ा दी. किताब बहुत पुरानी थी. उसके पन्ने पीले होकर गलने की हालत में पहुँच गए थे.
"यह किताब तो किसी अनजान भाषा में लिखी है."

"हाँ. मैंने ये किताब भाषा विशेषज्ञों को दिखाई थी. उनका कहना है कि यह भाषा असमिया से मिलती जुलती है. और यह देखो." कहते हुए प्रोफ़ेसर ने पन्ने पलटकर एक नक्शा दिखाया."यह कहाँ का नक्शा है?"
"ये तो भारत के पूर्वी छोर का नक्शा लग रहा है." रामसिंह ने कहा.

"हाँ. ये भारत के पूर्वी छोर का नक्शा है. इसमें असम साफ़ दिखाई पड़ रहा है. इसका मतलब ये हुआ कि ये किताब असम से सम्बंधित है. और यह एक और नक्शा देखो. क्या तुम्हें यह मिकिर पहाडियों का नक्शा नही लग रहा है?"
"लग तो रहा है." दोनों ने एक साथ कहा.
"मुझे पूरा विश्वास है कि यह खजाने का नक्शा है. जो मिकिर पहाडियों में कहीं छुपा हुआ है. क्योंकि मैं ने पढ़ा है कि वहां पहले एक सभ्यता आबाद थी. जो बाहरी आक्रमण के कारण नष्ट हो गई थी. उसके अवशेष अब भी वहां मिलते हैं. वह सभ्यता बहुत धनवान थी. मैं ने यह भी सुना है कि वहां का राजा बाहरी आक्रमण से पहले ही आशंकित था. इसलिए उसने अपने फरार का पूरा इन्तिजाम कर लिया था. और इसी इन्तिजाम में उसने अपना खजाना एक गुफा में छुपा दिया था. हालाँकि वह फरार नही हो पाया क्योंकि महल के एक निवासी ने गद्दारी कर दी थी. शत्रु राजा ने उस राजा को मरवा दिया किंतु उसे राजा का खजाना नही मिल सका. उसके बाद खजाने का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई, किंतु कोई सफलता नही मिली."
"तुम्हारे अनुसार उसी खजाने का यह नक्शा है?" रामसिंह ने पूछा.

3 comments:

Udan Tashtari said...

खजाने का नक्शा ही होगा-अच्छा लगा पढ़ना.

seema gupta said...

'this story is going to be very interesting day by day. waiting for next epesode with great cureousty.."

Regards

KAHI UNKAHI said...

साइंस फ़िक्शन हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही है और हिन्दी लेखकों से मेरी शिकायत भी कि हिन्दी में शायद ही विज्ञान कथाएँ लिखी गई हों...। आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई, अच्छा लगा...। ताबूत पढ़ना शुरू किया है...लग तो रहा है कि अच्छा जाएगा...।
इन प्रयासों के लिए मेरी शुभकामना और बधाई भी...।

प्रियंका गुप्ता