Wednesday, June 1, 2011

एक महान विज्ञान कथा लेखक की मृत्यु - खबर जो देर से मिली


जब कल मुझे डा0 अरविन्द मिश्र जी ने फोन पर बताया कि मशहूर उर्दू विज्ञान कथा लेखक इज़हार असर नहीं रहे तो एक झटका सा लगा। और जब उन्होंने ये बताया कि ये सानिहा 15 अप्रैल ही को हो चुका है और इसकी सूचना उन्हें मराठी विज्ञान कथा लेखक व मित्र श्री देशपाण्डे जी से मिली तो मेरे दु:ख का एहसास कुछ और बढ़ गया। क्योंकि अपने बीच के किसी लेखक की खबर डेढ़ महीने बाद और वो भी बाहर से मिले इससे बड़ी अफसोस की बात और क्या होगी। शायद हम अपने में कुछ ज्यादा ही गुम हो चुके हैं।

एक हज़ार से ऊपर उपन्यास लिखने वाले मशहूर उर्दू उपन्यासकार इज़हार असर उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर के करतपुर गाँव में 15 जून 1928 में पैदा हुए। शुरूआती शिक्षा वहीं हुई और मैट्रिक करने के बाद 1942 में लाहौर जाकर कपड़े की मिल में नौकरी कर ली। उसके बाद उन्होंने जूते की दुकान में भी नौकरी की। फिर 1947 में जब बँटवारे के फसाद शुरू हुए तो वे लाहौर छोड़कर दिल्ली आ गये। ऐसे वक्त में जबकि भारतीय मुसलमान पाकिस्तान जाकर मुहाजिर बनना पसंद कर रहे थे, इज़हार का लाहौर छोड़कर दिल्ली में बसना एक प्रशंसनीय और हालात को देखते हुए साहसिक क़दम था। उनका यह कदम सही साबित हुआ जब दिल्ली ने उनके अन्दर की साहित्यिक प्रतिभा को उभारा। और फिर उनके अनवरत लेखन का सिलसिला शुरू हुआ और जब 15 अप्रैल 2011 में 84 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई तो इस समय तक वे 1000 उपन्यास लिख चुके थे। हालांकि इसमें वो उपन्यास शामिल नहीं जो उन्होंने छद्म नाम से किसी पब्लिकेशन की माँग पर अक्सर लिखे। इनमें हिन्दी में प्रोफेसर दिवाकर और डा0 रमन के नाम से लिखे गये कई साइंस फिक्शन उपन्यास शामिल हैं। 

उनके उपन्यासों के खास विषय रहे जुर्म, जासूसी, रहस्य और साइंस फिक्शन। 1950 में प्रकाशित उनकी नागिन सीरीज़ के उपन्यास बेस्ट सेलर साबित हुए। उनका पहला विज्ञान कथात्मक उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ था जो 1955 में प्रकाशित हुआ था। जासूसी क्षेत्र में उनकी तुलना उर्दू के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार इब्ने सफी से की जाती है। जबकि साइंस फिक्शन के क्षेत्र में इज़हार असर उर्दू साहित्य में सर्वश्रेष्ठ हैं। जासूसी और साइंस फिक्शन का मिक्सचर उनकी बहराम सीरीज़ पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। सन 2006 में इज़हार असर को ग़ालिब सम्मान से नवाज़ा गया। सामाजिक साहित्यकार के तौर पर भी इज़हार का कार्य उल्लेखनीय है। उनके सामाजिक ड्रामे ‘दो आँखें’ और ‘मेहरबान कैसे कैसे’ काफी लोकप्रिय हुए। 

इज़हार के साइंस फिक्शन उपन्यासों में कई नये विचार देखने को मिलते हैं। मिसाल के तौर पर उनका उपन्यास ‘आधी जिंदगी’ एक औरत की कहानी है जो अपने मालिक के अनैतिक हुक्म को मानने से इंकार कर देती है। उस समय उसका मालिक उसे बताता है कि वह एक रोबोट है जिसे सिर्फ अपने मालिक का हुक्म मानने के लिये बनाया गया है। उनका नावेल ‘शोलों के इंसान’ अन्तरिक्ष यात्रा पर आधारित है। ‘बीस साल बाद’ में दूसरे ग्रह से आये हुए एलियेन एक ‘सुपर ब्रेन’ का निर्माण करते हें जो धरती पर खत्म हो रही एक जाति के बारे में छानबीन करता है। 

इज़हार असर ने आधुनिक साइंस के बारे में आसान अलफाज़ में समझाने के लिये तीन किताबें भी लिखीं। साइंस के प्रति उनका समर्पण उनकी शायरी में भी देखा जा सकता है जहां उन्होंने कई वैज्ञानिक विचारों को जगह दी है। इज़हार असर एक मासिक डाईजेस्ट ‘इज़हार असर डाईजेस्ट’ के ताउम्र प्रकाशक भी रहे। इसकी प्रतियां उनके निवास Y-5, Dda Flats, Ranjit Nagar, Delhi - 110008 (Ph : 011-25702905) से प्राप्त की जा सकती हैं।   
           

3 comments:

अभिषेक मिश्र said...

इस महानात्मा को विनम्र श्रद्धांजलि.

Arvind Mishra said...

अच्छा किया अपने इस पोस्ट को यहाँ भी लगाकर

city said...

thanks for sharing...