Tuesday, July 14, 2009

प्लैटिनम की खोज - एपिसोड : 11

इस समय शमशेर सिंह का दिल बल्लियों उछल रहा था। क्योंकि उसे इंटरव्यू में चुन लिया गया था। इंटरव्यू कमेटी के चेयरमैन ने उससे कहा था, ‘‘मि0 शमशेर सिंह, इंटरव्यू के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आप एक निडर, साहसी और ज्ञानी व्यक्ति हैं। अत: हम आपको अपनी कंपनी में एप्वाइंट कर रहे हैं।’’
‘‘क्या सच!’’ शमशेर सिंह ने उछलते हुए कहा।
‘‘जी हां। फिलहाल तो आप इसे सच ही समझिए।’’

‘‘अब मैं देवीसिंह और रामसिंह को बताऊंगा, जो वह कह रहे थे कि मेरा कहीं सेलेक्शन ही नहीं हो सकता।’’ वह ऊंची आवाज में बड़बड़ाया।
‘‘ये देवीसिंह और रामसिंह कौन हैं?’’ लाल टाईवाले ने पूछा।

‘‘हैं दो साले। बनते हैं दोस्त, लेकिन हमेशा जड़ खोदने में लगे रहते हैं। उस देवीसिंह को तो वैज्ञानिक बनने का शौक है। साला अपने को प्रोफेसर कहलवाता है। आज तक ढंग की कोई चीज़ नहीं बना सका। उसकी बात मानना तो सीधे कुएं में गिरने के बराबर होता है। कब कौन सा मिक्सचर पिलाकर ऊपर का टिकट काट दे कुछ कहा नहीं जा सकता।’’ इस समय उसके बड़बड़ाने के साथ साथ दांत पीसने की भी आवाज़ें आ रही थीं।
‘‘ये लोग कहां रहते हैं?’’ चेयरमैन ने पूछा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
‘‘हमारे घर से थोड़ी ही दूर पर जी। किन्तु आप उनके बारे में क्यों पूछ रहे हैं?’’ उसने चौंक कर पूछा।

‘‘कुछ नहीं। कोई विशेष बात नहीं। बात यह है कि हम जिसे अपनी कंपनी में एप्वाइंट करते हैं, उसके दोस्तों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं।’’
‘‘अच्छा अच्छा। रामसिंह का मकान मेरे घर के बायीं ओर चलने पर चौथी गली का पांचवां मकान है। किसी ज़माने में काफी बड़ा मकान था, लेकिन अब टूट फूट कर केवल दो कमरों का रह गया है। रामसिंह को आप दूर ही से पहचान लेंगे। क्योंकि उसके जितना दुबला पतला और लम्बा व्यक्ति पूरे मुहल्ले में दूसरा कोई नहीं है।’’

‘‘वह करता क्या है?’’ चेयरमैन ने पूछा।
‘‘कुछ नहीं। दिवंगत बाप की दौलत पहले ही उड़ा चुका है। अब किसी पुराने खजाने की तलाश है जो उसे फिर से पुरानी हालत में लौटा दे।’’

‘‘और तुम्हारा दूसरा दोस्त?’’
‘‘देवीसिंह, रामसिंह की गली से मिली एक दूसरी गली में रहता है। उसके मेन गेट पर एक बड़ी सी परखनली बनी हुई है।’’
‘‘वह कहीं नौकरी करता है?’’

‘‘उसका एक बुक स्टाल है। जहां से उसे अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। लेकिन उसी बुक स्टाल ने उसे किताबें पढ़ने और नये नये एक्सपेरीमेन्ट करने का चस्का लगा दिया है। उसकी इस आदत से हम लोग काफी परेशान हैं।’’

इस प्रकार शमशेर सिंह ने अपना तथा अपने दोस्तों का पूरा परिचय दे दिया था। इंटरव्यू कमेटी ने उसके दोस्तों से मिलने की इच्छा प्रकट की थी जिस पर कुछ पलों के लिए उसका मुंह बना था। किन्तु बाद में नौकरी मिलने की खुशी में वह नार्मल हो गया।

और इस समय राह चलते हुए उसके पांव भूमि पर नहीं टिक रहे थे और मन कुछ गुनगुनाने को कर रहा था। फिर वह वास्तव में ऊंची आवाज में किसी नयी फिल्म का गाना गुनगुनाने लगा। गाने के साथ साथ वह थिरकता भी जा रहा था। और इस कार्य में उसकी तोंद उसका पूरा साथ दे रही थी।

पास से गुजरने वाले राहगीर उसे पागल समझकर उसका पूरा आनन्द ले रहे थे। किन्तु शमशेर सिंह आंखें बन्द किये अलाप लेने में लीन था।

फिर उसे तब होश आया जब एक जोरदार धक्के ने उसे किनारे पड़े कूड़े के ढेर पर विराजमान कर दिया। उसने आँखें खोलीं तो दुर्घटना का कारण भैंसों की लाइन दिखाई पड़ गयी जो नदी की सैर करके आ रही थीं।
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2 comments:

seema gupta said...

फिर उसे तब होश आया जब एक जोरदार धक्के ने उसे किनारे पड़े कूड़े के ढेर पर विराजमान कर दिया।
हा हा हा हा शुकर है बच गया.......आगे???

regards

Abhishek Mishra said...

Ab naya adventure shuru hone ko lag raha hai.