Monday, October 6, 2008

ताबूत - एपिसोड 8

कुछ देर बाद वे लोग गरमागरम काफी पी रहे थे.

"इस वक्त रामसिंह के स्टोव ने काफी काम किया है. हम लोग बेकार में उसके स्टोव लाने की बुराई कर रहे थे." शमशेर सिंह ने कहा.

"मुझसे कभी कोई काम ग़लत नही होता." रामसिंह ने अकड़ कर कहा.
"तुमने सिर्फ़ एक काम ग़लत किया है कि इस दुनिया में पैदा हो गए हो." शमशेर सिंह ने टुकड़ा लगाया.

"और दूसरा ग़लत काम मैंने यह किया है कि तुम्हारे जैसे गधे को अपना दोस्त बना लिया है." रामसिंह ने दांत पीसते हुए कहा.

"ठीक है. अब तुम लोग आपस में लड़ते रहो. खजाने की खोज तो हो चुकी." प्रोफ़ेसर ने दोनों को घूरते हुए कहा.
"सोरी प्रोफ़ेसर, बात यह है कि हम लोग कसरत कर रहे थे."

"यह कैसी कसरत? मैंने तो आज तक ऐसी कसरत नही देखी जिसमें लोग झगड़ा करते हैं." प्रोफ़ेसर ने आश्चर्य से कहा.

"यह ऐसी ही कसरत है. इसमें दिमाग मज़बूत होता है और अगर हाथ पैर चलाने की नौबत आ जाए तो हाथ पैरों की भी कसरत हो जाती है."
"अच्छा अच्छा ठीक है. अब अपने अपने सामान उठाओ. हम लोगों ने बहुत देर आराम कर लिया." प्रोफ़ेसर ने उठते हुए कहा.तीनों ने फिर अपनी यात्रा शुरू की.

अचानक प्रोफ़ेसर देव ने रूककर किसी वस्तु को गौर से देखना शुरू कर दिया."क्या देख रहे हो प्रोफ़ेसर?" शमशेर सिंह ने प्रोफ़ेसर की दृष्टि की दिशा में अपनी दृष्टि दौड़ाई. यह कोई घास थी.
"मैं उस घास को देख रहा हूँ."

"क्यों? उस घास में ऐसी क्या बात है?" रामसिंह ने हैरत से पूछा.

"अगर मेरा विचार सही है तो यह एक महत्वपूर्ण बूटी है जिसके बारे में मैंने किताबों में काफी कुछ पढ़ा है."
"फिर तो कबाड़ा हो गया. क्योंकि अब तुम यहीं अपनी रिसर्च शुरू कर दोगे और खजाना हमारी याद में पड़ा पड़ा सूख कर कांटा हो जाएगा." रामसिंह ने अपने सर पर हाथ मारते हुए कहा.

"अभी जब मैं इस बूटी का नाम बताऊंगा तो तुम लोग खजाने के बाप को भी भूल जाओगे. यह संजीवनी बूटी है जो मुर्दों में भी जान डाल देती है." प्रोफ़ेसर ने रहस्योदघाटन किया.
"क्या?" दोनों उछल पड़े, "तुम्हें कैसे पता?"

"मैंने इसकी पहचान किताबों में पढ़ी है. ऊपर का भाग सफ़ेद होता है, बीच का हरा और नीचे का कत्थई. यह बिल्कुल वैसी ही घास है."
"हाँ. है तो वैसी. फिर तो हम लोगों ने एक नई खोज कर डाली. प्रोफ़ेसर, इसके कुछ नमूने तोड़कर रख लो. घर पर इसका अच्छी तरह टेस्ट कर लेना." शमशेर सिंह ने कहा.

"मैं यहीं इसका टेस्ट किए लेता हूँ." कहते हुए प्रोफ़ेसर ने एक मुठ्ठी घास तोड़कर अपने मुंह में रख ली. "अभी थोड़ी देर में इसका असर पता लग जाएगा. तुम लोग थैलों में इसे भर लो."

वे लोग थैलों में घास भरने लगे. कुछ देर में दो थैले घास से पूरी तरह भर गए. अब उन्होंने आगे का सफर शुरू किया.

4 comments:

seema gupta said...

'aaj to ramsingh, shemshair singh mey nauk jhaunk bhee ho gyee, aagey kya>.....

regards

DHAROHAR said...

Ab to Sanjivani buti ki bhi entry ho gayi, aage kya?

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ही दिलचस्प...

Udan Tashtari said...

रोचक और दिलचस्प-जारी रहें.