Sunday, August 29, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 63

जग्गू सिपाहियों की दृष्टि से छुपते छुपते पेड़ों के उस झुरमुट के पीछे पहुंच चुका था जहाँ से वह कंकाल निकलकर रामदयाल की ओर गया था। इस समय उसके हाथ में एक साईलेंसर लगा रिवाल्वर दिखाई पड़ रहा था।

कंकाल तेज़ कदमों से चलता हुआ उसी की ओर आ रहा था। फिर जग्गू ने कंकाल की दोनों आँखों का निशाना लिया और दो गोलियां दाग दीं। कंकाल का दौड़ना तुरंत रूक गया और वह अपने स्थान पर खड़े खड़े लहराने लगा। जग्गू ने तुरंत अपना स्थान छोड़ा और उसी दिशा में चलने लगा जिधर से आया था।
हालांकि कंकाल को दो गोलियां लगी थीं किन्तु उसके मुंह से पीड़ा की कोई आवाज़ नहीं निकली। लगता था जैसे वह बेजान हो।

जग्गू अब छिपते छिपते उस पेड़ के पास पहुंच गया था, जिसपर राहुल बैठा हुआ था। उसने तुरंत पेड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया। उसका रिवाल्वर पहले ही जेब में पहुंच गया था।
‘‘कहाँ चले गये थे?’’ राहुल ने उसे देखकर पूछा।

‘‘एक आवश्यकता के कारण नीचे उतरना पड़ा। क्या हाल है अब? कोई खास बात हुई?’’
‘‘हाँ। वह कंकाल अब रुक गया है और अपने स्थान पर खड़े खड़े लहरा रहा है।’’ राहुल बोला।
‘‘सब मेरे कारण हुआ है।’’ जग्गू ने कहा।

‘‘क्या मतलब?’’ राहुल ने चौंक कर पूछा।
‘‘मेरा मतलब मैंने एक मन्त्र पढ़कर उसपर फूंका था जो एक बहुत बड़े महात्मा ने मुझे बताया था। उस मन्त्र के प्रभाव से बड़े से बड़ा भूत भी पल भर में धराशाई हो जाता है।’’

‘‘तो मुझे भी सिखा देना वह मन्त्र।’’ राहुल ने उत्सुकता से कहा।
‘‘अवश्य सिखा दूंगा। पहले यहाँ से सही सलामत घर तो पहुंच जायें। अब सामने देखो क्या हो रहा है।’’
वे लोग सामने देखने लगे जहाँ रामदयाल की नकली दाढ़ी मूंछें हटा दी गयी थीं और दो सिपाही उसे पकड़ कर ले जा रहे थे। सुंदरम बाकी सिपाहियों के साथ कंकाल के पास खड़ा था।
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सुंदरम ने एक सिपाही से राइफल ली और उसके लकड़ी के कुंदे से कंकाल के सर पर वार किया। कंकाल नीचे गिर पड़ा।
‘‘वह कोई मनुष्य नहीं है बल्कि कोई और वस्तु है। किन्तु यह दौड़ते दौड़ते रुक कैसे गया?’’ सुंदरम ने कंकाल का निरीक्षण करते हुए कहा।

‘‘सर मेरा विचार है कि इसमें कोई बुरी आत्मा थी जो अब इसे छोड़कर भाग गयी है।’’ एक सिपाही ने अपना विचार व्यक्त किया। 
‘‘तो क्या हम लोग इतने भयानक हैं कि एक बुरी आत्मा हमसे डरकर भाग गयी?’’ सुंदरम ने उस सिपाही की ओर देखा और वह जल्दी से दो तीन कदम पीछे हट गया।

सुंदरम राइफल के कुन्दे से उस कंकाल का शरीर टटोलने लगा। दो तीन बार कुन्दे से इस प्रकार की ध्वनि हुई मानो वह किसी धातु से टकराया हो।

‘‘यह एक रोबोट है अर्थात मशीनी आदमी।’’ सुंदरम ने रहस्योद्घाटन किया।
‘‘क्या?’’ सिपाहियों ने आश्चर्य से कहा।

‘‘हाँ। यह इसको निष्क्रिय करने का स्विच है।’’ सुंदरम ने उसके सर के पीछे स्विच ढूंढ लिया था। उसने उसको ऑफ कर दिया और इसी के साथ कब्रिस्तान में गूंज रही एक भनभनाहट की ध्वनि समाप्त हो गयी।

‘‘जिसको हम लोग किसी कीड़े की भनभनाहट समझ रहे थे वह इस कंकाल की मशीन की ध्वनि थी। अब यह निष्क्रिय हो चुका है। तुम लोग इसे कंधे पर लादो और उठा कर ले चलो। लैबोरेट्री में पता लगेगा कि यह किस प्रकार का रोबोट है।’’ 

सिपाहियों में से दो ने उसे कंधे पर लाद लिया। इससे पूर्व सुंदरम ने उस कंकाल के हाथ से वह पैकेट निकाल कर अपनी जेब में रख लिया था जो रामदयाल ने उसे दिया था।
जग्गू और राहुल ये सारा दृश्य देख रहे थे। जब सुंदरम सिपाहियों के साथ काफी दूर निकल गया तो जग्गू ने राहुल को उतरने का संकेत किया।

‘‘चुपचाप निकल चलो। हम लोग आज बच गये वरना रामदयाल के साथ हम भी धर लिये जाते।’’ जग्गू ने राहुल के साथ चलते हुए कहा।
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2 comments:

Nilam-the-chimp said...

जैदी साहब;
कहानी को जितना लम्बा खिचोंगे, आपके पाठक उतने ही कम होते जायेंगे. सार्थक लेखन तो वह है जहाँ एक शब्द भी अतिरिक्त न उपयोग किया गया हों. पिछले कई एपिसोड से यह स्पष्ट हो चूका है की जग्गू सुन्दरम का ही अन्डर कवर एजेंट है, पता नहीं आप इस राज को कब खोलेंगे?
नीलम

zeashan haider zaidi said...

नीलम जी, बस दो तीन एपिसोड और. कहानी का अंत निकट है. जग्गू की असलियत भी सामने आ जायेगी जो शायद आपके अनुमान से कुछ अलग हो. टिपण्णी के लिए शुक्रिया.