Friday, August 9, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 32 (अंत से दूसरा भाग)


ईद मुबारक पाठकों। "मायावी गिनतियाँ" अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है. आशा है इस उपन्यास ने आपका भरपूर मनोरंजन किया होगा। यदि इसके सम्बन्ध में आपके मस्तिष्क में कुछ उमड़ रहा हो तो अपनी टिप्पणियों द्वारा ज़रूर शेयर करें। धन्यवाद।
--जीशान ज़ैदी (लेखक)


मायावी गिनतियाँ : भाग 32

फिर उन्होंने देखा आसमान से एक सिंहासन उतर रहा है। और उस सिंहासन पर रामू बना सम्राट विराजमान था। पब्लिक की जय जयकारों की आवाज़ें और तेज़ हो गयीं। सम्राट का सिंहासन चबूतरे पर उतर गया। और वह शान से सामने आकर पब्लिक को दोनों हाथ उठाकर शांत करने लगा। पब्लिक उसके प्रवचन को सुनने के लिये पूरी तरह शांत हो गयी।

रामू बने सम्राट ने कहना शुरू किया, ''मेरे भक्तों, तुमने मुझे ईश्वर मान लिया है। अत: तुम्हें मैं इसका पुरस्कार अवश्य दूंगा। अभी और इसी समय।" 

''भगवान, लेकिन मैंने तो सुना है कि ईश्वर भक्तों को उनका पुरस्कार मरने के बाद देते हैं।" एक जिज्ञासू भक्त बोल उठा। 

''यह उस समय होता है जब ईश्वर का अवतरण नहीं होता। अब ईश्वर का अवतरण हो चुका है अत: पुरस्कार भी अवतरित होगा।" 

''वह पुरस्कार किस प्रकार का होगा भगवान?" एक भक्त ने भाव विह्वल होकर पूछा। 
''अभी थोड़ी देर में यहाँ पर हीरे मोतियों की बारिश होगी। और वह हीरे मोती केवल मेरे भक्तों के लिये होंगे।" 

सम्राट की बात सुनकर लोगों की नज़रें फौरन आसमान की ओर उठ गयीं। कुछ अक्लमंद भक्तों ने अपने सर पर कपड़े व बैग भी रख लिये। अगर बड़े हीरों की बारिश हुई तो उनकी खोपड़ी फूट भी सकती थी। 

सम्राट ने अपना हाथ हवा में लहराया मानो वह हीरे मोतियों की बारिश करने के लिये कोई मन्त्र पढ़ रहा हो। लोगों ने देखा कि आसमान में चमकदार बादल छाने लगे थे। शायद यही बादल हीरे मोतियों से भरे थे। फिर थोड़ी देर बाद बारिश शुरू हो गयी। 

लेकिन यह क्या? इस बारिश में हीरे मोतियों का तो कहीं अता पता नहीं था। बल्कि यह गंदे बदबूदार पानी की बारिश थी जिसमें साथ साथ मोटे मोटे कीड़े भी टपक रहे थे। वहाँ खलबली मच गयी। लोग बुरी तरह चीखने लगे। कुछ महिलाएं जो सुबह नाश्ते में अच्छी तरह खा पीकर आयी थीं वह वहीं उगलने लगीं। 

''भगवान ये सब क्या है?" कुछ भक्तों ने चीखकर पूछा। लेकिन भगवान खुद ही बदहवास हो चुके थे। ये माजरा उनकी समझ से भी बाहर था। रामू बने सम्राट के सामने चीख पुकार मची थी। लोग अपने ऊपर रेंगते कीड़ों को गिनगिनाते हुए फेंक रहे थे और किसी आड़ में जाने की कोशिश में भाग रहे थे। लेकिन उस मैदान में किसी आड़ का दूर दूर तक पता नहीं था। 

''भगवान .. भगवान! हमें इन बलाओं से बचाईये ।" लोग हाथ जोड़ जोड़कर विनती कर रहे थे। 
फिर रामू बने सम्राट ने चीखकर कहा, ''आप लोग शांत रहें। शैतान ने मेरे काम में रुकावट डाली है। ये मुसीबत शैतान की लायी हुई है। उससे निपट कर मैं अभी वापस आता हूं। 

वह फौरन अपने सिंहासन पर सवार हुआ और वहाँ से रफूचक्कर हो गया। मैदान में पहले की तरह अफरातफरी मची थी।
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अपने सिंहासन पर सवार सम्राट यान में दाखिल हुआ और उसके साथी उसके अभिवादन में खड़े हो गये। सम्राट जल्दी से यान से नीचे उतरा। 

''क्या बात है सम्राट?" उसे यूं हड़बड़ी में देखकर डोव ने पूछा। 
''कुछ गड़बड़ हुई है। मैंने एम-स्पेस द्वारा हीरे मोतियों की बारिश के लिये समीकरण सेट की थी लेकिन वहाँ से कीचड़ और कीड़ों की बारिश होने लगी।" 

''क्या ऐसा कैसे हो सकता है?" सिलवासा हैरत से बोला। 
''कहीं एम-स्पेस में कोई खराबी तो नहीं आ गयी?" रोमियो ने विचार व्यक्त किया।
''या तो किसी ने समीकरण को बदल दिया है।" सम्राट ने अंदाज़ा लगाया। 
''लेकिन ऐसा कौन कर सकता है?" रोमियो ने कहा। 

''ये मैंने किया है।" वहाँ पर एक आवाज़ गूंजी और सब की नज़रें यान की स्क्रीन पर उठ गयीं जहाँ बन्दर के शरीर में रामू नज़र आ रहा था। 
''तुम?" सम्राट ज़ोरों से चौंका। रामू को स्क्रीन पर देखकर सभी के चेहरों पर हैरत के आसार नज़र आने लगे।

''हाँ। मैं जिसको तुम लोगों ने एम-स्पेस के चक्रव्यूह में फंसा दिया था। लेकिन मैं वहाँ से बाहर आ चुका हूं।"
''नहीं। ये असंभव है। पृथ्वी का कोई मानव उस चक्रव्यूह को पार ही नहीं कर सकता।" सम्राट बेयकीनी से बोला।

''तुम लोगों ने पृथ्वीवासियों की क्षमता के बारे में गलत अनुमान लगाया था।" वे लोग एक बार फिर उछल पड़े क्योंकि अब वह बूढ़ा स्क्रीन पर दिखाई दे रहा था जो एम-स्पेस का क्रियेटर था। वह कह रहा था, ''इस बच्चे ने न केवल तुम्हारे चक्रव्यूह को भेद दिया बल्कि कण्ट्रोल रूम तक पहुंचकर मुझे भी आज़ाद कर दिया। और अब तुम लोग अपनी सज़ाओं को भुगतने के लिये मेरे पास आने वाले हो।"

''नहीं!" वे लोग एक साथ चीखे लेकिन उसी समय लाल रंग की किरणें उनके पूरे यान में बिखर गयीं और उन किरणों के बीच वे सभी गायब हो गये।

…………. इस उपन्यास की अंतिम क़िस्त कल पढ़ें।

1 comment:

अभिषेक मिश्र said...

आख़िरकार ये मुसीबत गायब हो ही गई...