Monday, August 5, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 28


अगली किस्त प्रस्तुत करने से पहले फेसबुक का एक छोटा सा संवाद दो सुधी पाठकों के बीच :

श्री ओमप्रकाश कश्यप : 'मायावी गिनतियां' में डायन भी है, सिर पर काले सींग वाला काला भुजंग राक्षस भी. क्या विज्ञान गल्प को ऐसा ही होना चाहिए....उपन्यास गणित की गहन विचित्रताओं या कहें कि गूढ़ताओं को सामने लाने के लिए रचा गया प्रतीत होता है, लेकिन लगता है बीच रास्ते ही उसे तिलिस्मी अजूबों ने घेर लिया है.
सुश्री विमला भंडारी : कहानी की गल्प नहीं होगी तो आपकी बेसुरी गूढता पड़ेगा कोन।आप पाठक को पढने के लिए मजबूर तो नहीं कर सकते?रचना में जिज्ञासा का तत्त्व ही मूल बात है विज्ञान चाहे लेखक का उद्देश हो पर होता यह biproduct है।जो back door entry की तरह मगज में गुस्ता गुनता है। ये बहुत सफल होता है अपने मकसद में। ये ही रचना की सफलता है।

दोनों सुधी पाठकों का धन्यवाद। विशेष रूप से सुश्री विमला भंडारी जी का जिन्होंने न केवल उपन्यास के मर्म समझा बल्कि खूबसूरती से उसे समझाया भी.

और ओमप्रकाश जी, जो आपने कहा कि ये कैसा विज्ञान गल्प? जिसमें राक्षस भी है डायन भी और भी पता नहीं क्या क्या। अरे भाई, फ्रेंकेंस्टाइन में भी एक अदद राक्षस था। ये अलग बात है कि उसका नाम हिन्दी में नहीं था। फिर आप उसे क्यों विज्ञान गल्प मान लेते हैं? क्या आपने ऐसे विज्ञान गल्प नहीं पढ़े हैं जिसमें शैतानी दिमाग रखने वाले वैज्ञानिक राक्षसों, चुड़ैलों, खतरनाक जानवरों इत्यादि की रचना कर डालते हैं। और क्या जुरासिक पार्क के डायनासोरों को राक्षस नहीं कहा जा सकता?

और अब "मायावी गिनतियाँ" की अगली किस्त का आनंद लीजिये।   

मायावी गिनतियाँ : भाग 28

रामू ने अपनी अक्ल लगानी शुरू की और सूराखों पर अपनी नज़रें गड़ा दीं। सूराख काफी ज़्यादा संख्या में थे। 
'अगर उन्हें बन्द कर दिया जाये तो?" रामू ने सोचा और कमरे में इधर उधर नज़र दौड़ाने लगा कि शायद कोई चीज़ उन सूराखों को बन्द करने के लिये मिल जाये। उसे निराश नहीं होना पड़ा। क्योंकि कमरे में स्टेज के पास ही लकड़ी के ढेर सारे गोल ढक्कन पड़े हुए थे जो उन सूराखों के ही साइज़ के थे। 

'अरे वाह! सूराखों को बन्द करने के औज़ार तो यहीं पड़े हैं।" रामू ने खुश होकर आठ दस ढक्कन एक साथ उठा लिये और मच्छरों से बचते बचाते उन सूराखों की ओर बढ़ा। उसने पहला ढक्कन एक सूराख पर फिट किया। लेकिन यह क्या? हाथ हटाते ही वह ढक्कन नीचे गिर गया था क्योंकि उसे धक्का मारते हुए उसी समय कई मच्छर बाहर निकल आये थे।

'क्या इन ढक्कनों को लगाने की भी कोई ट्रिक है?" रामू सोचने लगा। यहाँ पर खड़े रहकर सोचना काफी मुश्किल था क्योंकि मच्छर लगातार डिस्टर्बेंस पैदा कर रहे थे। वह सूराखों से निकलते हुए मच्छरों को गौर से देखने लगा। और उसी समय उसपर एक नया राज़ खुला।

हालांकि सूराख लगभग पूरी दीवार में वर्गाकार क्षेत्र में बने हुए थे। लेकिन उन सबसे हर समय मच्छर नहीं निकल रहे थे। बल्कि उनके बाहर आने में एक पैटर्न नज़र आ रहा था। एक खड़ी लाइन में बने तमाम सूराखों में से कभी सभी सूराखों में से मच्छर निकल आते थे तो कभी कुछ सूराखों से। और जब एक लाइन के सूराखों से निकलने वाले मच्छर कम होते थे तो उसके आसपास की कुछ लाइनों से निकलने वाले मच्छरों की संख्या बढ़ जाती थी। 

रामू को याद आया कि एक बार वह नेहा के साथ लाइब्रेरी गया था और वहाँ पर नेहा ने उसे तरंग गति के बारे में कुछ समझाया था और किताब में तरंग गति का डायग्राम भी दिखाया था। अब यहाँ मच्छरों के निकलने में उसे तरंग गति ही नज़र आ रही थी।

''तुम खड़े सोच क्या रहे हो। मेरी ताकत धीरे धीरे कम हो रही है। जल्दी कुछ करो।" उसके चारों तरफ चकराते फरिश्ते ने उसके विचारों को भंग कर दिया। 
''बस थोड़ी देर और इन्हें झेलो, मुझे लगता है मैं किसी नतीजे पर पहुंच रहा हूं।" फरिश्ता एक बार फिर ज़ोर शोर से उन मच्छरों से मुकाबला करने लगा। जबकि रामू मच्छरों के निकलने के पैटर्न पर और गौर करने लगा था। 

किसी तरंग की तरह एक खड़ी लाइन के सूराखों से निकलने वाले मच्छरों की संख्या पहले बढ़ते हुए सबसे ऊपर व सबसे नीचे के सूराख तक पहुंच जाती थी और फिर घटते घटते एक समय के बाद शून्य हो जाती थी। ऐसा हर खड़ी लाइन में कुछ इस तरह हो रहा था मानो कोई चल तरंग आगे बढ़ रही है। 

फिर रामू ने एक तजुर्बा करने का फैसला किया। एक खड़ी लाइन में जैसे ही मच्छरों के निकलने की संख्या शून्य हुई, उसने उसके बीच के सूराख में ढक्कन लगा दिया। 
परिणाम उसके अनुमान से भी ज्यादा आशाजनक साबित हुआ। न केवल उस सूराख से मच्छरों का निकलना बन्द हो गया बल्कि उस खड़ी लाइन के सभी सूराखों से मच्छरों का निकलना बन्द हो गया। 

रामू को मालूम हो चुका था कि ढक्कन लगाने का सही समय क्या है। उसने यह क्रिया सभी खड़ी लाइनों के साथ दोहरायी और जल्दी ही सूराखों से मच्छरों का निकलना पूरी तरह बन्द हो गया। 

''वो मारा।" फरिश्ता खुशी से चीखा। लेकिन उनकी ये खुशी ज्यादा देर कायम न रह सकी। क्योंकि अब वह दीवार बुरी तरह हिल रही थी जिसके सूराख बन्द किये गये थे। 
''य...ये क्या हो रहा है?" रामू घबराकर बोला। 

''लगता है अब सारे मच्छर दीवार गिराकर बाहर आना चाहते हैं।" फरिश्ता भी घबराकर बोला। अगर ऐसा हो जाता तो दोनों के लिये बचना नामुमकिन था। लेकिन फिलहाल उन दोनों को गिरती हुई दीवार से बचना था। अत: वे कई कदम पीछे हट गये। 

फिर एक धमाके के साथ दीवार नीचे आ गयी। लेकिन ये देखकर उन्होंने इतिमनान का साँस ली कि दीवार के पीछे कोई भी मच्छर नहीं था, बल्कि वहाँ एक और कमरा दिखायी दे रहा था। उस कमरे में हर तरफ लाल रंग की लेसर जैसी किरणें फैली हुई थीं। उसकी रोशनी में उन्होंने देखा कि कमरे के दूसरे सिरे पर एक बन्द संदूक़ मौजूद है। 

''वो संदूक कैसा है?" फरिश्ते ने ही उसकी ओर उंगली से इशारा किया। 

''बचपन में दादी ने कुछ कहानियां सुनाई थीं। जिसमें किसी खज़ाने की रक्षा के लिये इस तरह के तिलिस्म बनाये जाते थे। और उन्हें सख्त सुरक्षा में रखा जाता था। जिस तरह यहाँ खतरनाक टाइप के मच्छर घूम रहे थे, और जिस तरह यहाँ तक आने में रुकावटें पैदा हुईं, हो न हो उस संदूक़ में ज़रूर कोई खज़ाना है।"

...........continued

5 comments:

saurabh said...

kuch baato par dhyan nahi dena chahiye,...jeeshan ji u r a great writer..pls aage badte rahiye...dhanyawad...

Dr. Zeashan Zaidi said...

Thank you Saurabh Ji!

vimla said...

सौरभ ने सही कहा- आगे बढ़ो, सफलता तुम्हारे साथ है। बहुत सुगढ लेखन।

Ashugeet Mukul Singh said...

Behtrin Science fiction likhi h sir ji..

kebhari said...

बहुत खूब