Saturday, August 3, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 26


रामू वहाँ पहुंचा और उसने राक्षस का हाथ थाम लिया। 
''रामू! नेहा ने गुस्से में भरी एक चीख मारी जबकि उसकी माँ अपना आँचल आँखों पर रखकर सिसकियां लेने लगी। रामू का दिल एक पल को मचला लेकिन उसे इस वक्त अपने दिमाग से काम लेना था। राक्षस ने उसका हाथ थाम लिया और दरवाज़े की ओर बढ़ा। 
''रुक जा मेरे लाल। वह राक्षस तुझे खत्म कर देगा।" उसकी माँ ने पीछे से पुकार लगाई। 

एक पल को रामू ठिठका। उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था। कहीं उसका डिसीज़न गलत तो नहीं। अगर ऐसा होता तो वह कहीं का नहीं रहता। फिर उसने अपने दिल को दिलासा दिया और माँ व नेहा की पुकार अनसुनी करके आगे बढ़ गया। 

अब वह उस संरचना के ठीक आगे पहुंच चुका था। उसने घूमकर देखा माँ और नेहा दोनों ही उसे तेज़ी से हाथ हिला हिलाकर बुला रही थीं। उसने राक्षस की ओर देखा। 
''अभी मौका है तुम्हारे पास। वापस भी जा सकते हो तुम।" राक्षस ने डरावनी आवाज़ में कहा। 
''नहीं। मैंने तय कर लिया है। वापस नहीं जाऊंगा।" रामू ने दृढ़ता के साथ कहा। 

उसके इतना कहते ही राक्षस ने उस समीकरण रूपी संरचना पर हाथ रख दिया। दूसरे ही पल उस क्यूब का आगे का हिस्सा गायब हो गया और राक्षस उसे लेकर अन्दर प्रवेश कर गया। 
जैसे ही दोनों अन्दर पहुंचे आगे का हिस्सा फिर बराबर हो गया। रामू ने देखा कि आगे का हिस्सा साफ शीशे की तरह बाहर बाग़ का दृश्य दिखा रहा था। जहाँ नेहा और उसकी माँ दोनों का जिस्म धीरे धीरे पारदर्शी हो रहा था। और फिर दोनों के जिस्म बिल्कुल ही दिखना बन्द हो गये। 

रामू ने एक गहरी साँस ली और बड़बड़ाया, ''इसका मतलब कि मेरा अंदाज़ा सही था।" 
''अगर तुम उन दोनों में से किसी के साथ आते तो तुम भी उनही की तरह गायब हो जाते हमेशा के लिये।" राक्षस ने कहा।

''उस कटे सर ने ठीक कहा था कि होशियार रहना क्योंकि आगे का रास्ता ज्यादा मुश्किल है। इससे पहले तो सिर्फ शारीरिक कष्ट ही झेलना पड़ता था। लेकिन इस बार तो दिमाग़ की भी चूलें हिल गयीं। रामू ने एक गहरी साँस ली और इधर उधर देखने लगा। 

फिर उसे एहसास हुआ कि वह एक ऐसे बक्से में मौजूद है जिससे बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं। सामने शीशे की दीवार से सामने बाग़ का मंज़र दिखाई दे रहा था जबकि बाकी तीन तरफ की दीवारें, छत और फर्श सभी स्टील की मोटी चादर के बने मालूम हो रहे थे। 

''कहीं तुमने मुझे कैद में लाकर तो नहीं फंसा दिया है?" रामू ने उस राक्षस को घूर कर देखा। 
''तुमने ऐसा क्यों सोचा?" राक्षस के चेहरे पर हमेशा की तरह यांत्रिक मुस्कुराहट बनी हुई थी। 
''अगर मैं कैद में नहीं हूं तो आगे बढ़ने का रास्ता किधर है?" 
''इस समय तुम जिस कमरे में हो यही कमरा तुम्हें आगे ले जायेगा।"

''वह कैसे? यह तो शायद अपनी जगह पर जाम है।" रामू ने उसकी ओर बेयकीनी से देखा।
''मैं ठीक कह रहा हूं। लेकिन इसके लिये तुम्हें अपना ज़ीरो मुझे सौंपना होगा।" राक्षस ने उसकी ओर हाथ फैलाया।

रामू एक बार फिर ज़हनी कशमकश में फंस गया। उस ज़ीरो ने कई बार उसकी मदद की थी। फिर उसे वह उस राक्षस को कैसे सौंप देता। शायद राक्षस ने अभी तक इसीलिए उसे नुकसान नहीं पहुंचाया था क्योंकि वह करिश्माई ज़ीरो उसके हाथ में था। लेकिन ज़ीरो को अपने से अलग करते ही वह ज़रूर किसी न किसी नयी मुसीबत में फंस जाता। 

''क्या सोच रहे हो?" उसे यूं विचारों में गुम देखकर राक्षस ने पूछा। 
''इस बात की क्या गारंटी है कि तुम ज़ीरो लेने के बाद मुझे धोखा नहीं दोगे।" रामू ने उसी से पूछ लिया।
''गारंटी तो कोई नहीं। लेकिन जब तक ज़ीरो मेरे पास नहीं आता मैं कुछ नहीं कर सकता।" राक्षस ने रामू को और उलझन में डाल दिया था। 

''तुम्हें कम्प्यूटर के बाइनरी सिस्टम के बारे में सोचना चाहिए।" थोड़ी देर बाद राक्षस फिर इतनी सी बात बोला और चुप हो गया। 
'भला यहाँ कम्प्यूटर का बाइनरी सिस्टम कहाँ से टपक पड़ा।" रामू ने झल्लाकर कहा। यह राक्षस भी पहेलियों में बातें कर रहा था। रामू बेचैनी से इधर उधर टहलने लगा। जबकि राक्षस अपनी जगह हाथ बांधे हुए खड़ा था। उसके चेहरे पर सजी फिक्स मुस्कुराहट अब रामू को सुलगा रही थी। 

फिर उसने अपने दिमाग को ठंडा किया। अभी तक उसे जो कामयाबी मिली थी वह ठंडे दिमाग से सोचने का ही परिणाम थी। उसने उस राक्षस की बात पर विचार करना शुरू किया और कम्प्यूटर के बाइनरी सिस्टम के बारे में गौर करने लगा। उसके कम्प्यूटर के टीचर ने बताया था कि कम्प्यूटर की पूरी गणित केवल दो अंकों पर आधारित होती है। ज़ीरो और वन। इन दोनों के मिलने से सारी गिनतियाँ बन जाती हैं। 

रामू के दिमाग का बल्ब फिर रोशन हो गया। ज़ीरो तो उसके हाथ में था जबकि वह राक्षस क्यूबिक समीकरण के मान 'वन को निरूपित कर रहा था। अब दोनों को अगर मिला दिया जाता तो जिस तरह बाइनरी सिस्टम में समस्त संख्याएं बन जाती हैं, उसी तरह यहाँ पर दोनों के मिलने से कोई नयी शक्ति पैदा होने का पूरा चाँस था जो रामू को इस मुशिकल से उबार सकती थी। 

हालांकि इसमें रिस्क भी था। हो सकता था कि ज़ीरो के मिलते ही वह राक्षस उसके लिये घातक सिद्ध होता। काफी देर सोचने विचारने के बाद रामू ने यह रिस्क लेने का फैसला किया। वैसे भी और कोई चारा नहीं था। अगर वह रिस्क न लेता तो शायद पूरी जिंदगी उस छोटे से कमरे में गुज़ार देनी पड़ती।
.............continued

1 comment:

vimla said...

कल की पोस्ट का िइंतजार है