Thursday, August 1, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 24


''नेहा! तुम तुम यहाँ? नेहा कुछ नहीं बोली। एक मधुर मुस्कान के साथ वह बस उसकी तरफ देखे जा रही थी। दो तीन छलांगों में रामू उसके ठीक सामने पहुंच गया। 
''नेहा! तुम यहाँ एम-स्पेस में क्या कर रही हो?" 
''मैं तुम्हें यहाँ से बाहर निकालने आयी हूं। चलो मेरे साथ।" उसने जवाब दिया। और झूले से नीचे कूद गयी। 
''लेकिन तुम यहाँ पहुंचीं कैसे ? क्या सम्राट ने तुम्हें भी कैद कर दिया?"
 
''मुझे कौन कैद कर सकता है। उसे तो मेरा आभास भी नहीं हो सकता।" नेहा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा।
''समझा यानि तुम्हारे पास भी कोई अनोखी शक्ति आ चुकी है।" रामू ने अंदाज़ा लगाया।

''अब बातों में वक्त न बरबाद करो और मेरे साथ आओ। हमें यहाँ से बाहर निकलना है।" वह आगे बढ़ गयी। रामू भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा। उसे लग रहा था कि भगवान ने नेहा के रूप में उसके पास मदद भेजी है। लेकिन नेहा यहाँ तक पहुंची कैसे यह सवाल किसी पहेली से कम नहीं था। 

जल्दी ही वे बाग़ के किनारे पहुंच गये जहाँ सामने एक ऊंची बाउण्ड्री वाल नज़र आ रही थी। 
''आगे तो रास्ता ही बन्द है। भला इस ऊंची दीवार को कौन पार कर पायेगा।" रामू बड़बड़ाया। 
''दीवार के बीच में एक दरवाज़ा भी है। वह देखो उधर।" 

नेहा ने जिस तरफ इशारा किया था जब उधर रामू ने नज़र की तो अजीबोगरीब संरचना दिखाई दी। ये संरचना नीचे से ठोस घनाकार थी और सफेद संगमरमर जैसे किसी पत्थर की बनी हुई थी। वह घन दीवार में फिट था और आगे की ओर निकला हुआ था। उस घन के ऊपर एक काले रंग का वर्ग बना हुआ था। फिर उस वर्ग के ऊपर भी सफेद रंग की छड़ निकल कर और ऊपर गई हुई थी, और उस छड़ के ऊपर काले रंग से 1 लिखा हुआ स्पष्ट दिखाई दे रहा था। 

उस संरचना से सफेद रंग की अलग ही रोशनी निकल रही थी जो बाग़ में फैली रोशनी से थोड़ी अलग थी और उस संरचना को स्पष्ट देखने में मदद कर रही थी। लेकिन नेहा ने जो कहा था कि वहाँ पर एक दरवाज़ा है तो ऐसे दरवाज़े का कहीं दूर दूर तक पता नहीं था। 

''लेकिन दरवाज़ा कहाँ है? वहाँ पर तो मुझे ठोस संरचना दिखाई दे रही है।" रामू ने पूछ ही लिया।
''जिस संरचना को तुम देख रहे हो वही तो दरवाज़ा है बाहर जाने का। तुम चलो तो सही।" नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा। अचानक रामू के दिमाग़ में ख्याल आया कि जिस तरह यहाँ कदम कदम पर गणितीय पहेलियों के दर्शन हो रहे हैं, और उस संरचना के ऊपर भी एक संख्या लिखी हुई है तो हो सकता है कि वह संरचना वाकई आगे जाने का दरवाज़ा ही हो और किसी तकनीक से खुलता हो। ऐसा सोचकर उसने आगे कदम बढ़ाया।

अब दोनों लगभग उस संरचना के पास पहुंच चुके थे। अचानक पीछे से कोई चिल्लाया, ''रुक जाओ रामू बेटा।" 
जानी पहचानी आवाज़ सुनकर रामू फौरन पीछे घूम गया। 
''माँ, तुम यहाँ।" वह चीखा। यकीनन वह उसकी माँ थी जो हाथ फैलाये हुए उसकी तरफ बढ़ रही थी। उसने भी उससे मिलने के लिये आगे बढ़ना चाहा लेकिन उसी समय नेहा उसके सामने आ गयी। 

''कहाँ जा रहे हो रामू। वह तुम्हारी माँ नहीं है।" वह केवल एक धोखा है।
उसी समय उसकी माँ ने उसे आवाज़ दी, ''रामू उस डायन के साथ आगे मत जाना वरना हमेशा के लिये कैद हो जाआगे। अगर तुम्हें यहाँ से बाहर निकलना है तो मेरे साथ चलो।" 

अब तक उसकी माँ उसके काफी पास आ चुकी थी और रामू देख रहा था कि वह वाकई उसकी माँ थी, न कोई धोखा थी और न कोई और उसके मेकअप में था। लेकिन दूसरी तरफ नेहा भी कोई डायन तो मालूम नहीं हो रही थी। 

''रामू इस बुढि़या की बातों में मत आना वरना कभी एम-स्पेस से बाहर नहीं निकल सकोगे। वह एक फरेब है जो तुम्हारी माँ की शक्ल में है। नेहा ने फिर उसे सावधान किया। 
''फरेब तो तू है डायन! जो मेरे भोले भाले बेटे को अपने साथ ले जाकर हमेशा के लिये कैद कर देना चाहती है।" उसकी माँ ने दाँत पीसकर कहा, फिर रामू से मुखातिब हुई , ''बेटा मैंने तुझे अपना दूध पिलाया है। क्या तू मुझे नहीं पहचान रहा। अपनी सगी माँ को नहीं पहचान रहा।" 

रामू ने देखा उसकी माँ आँचल से अपने आँसू पोंछ रही थी। वह तड़प गया। 
''नहीं माँ, मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। पूरी दुनिया धोखा दे दे लेकिन माँ कभी नहीं धोखा देती।" 
वह उसकी तरफ बढ़ा लेकिन उसी समय पास के एक घने पेड़ से कोई धप से ज़मीन पर कूदा। 

रामू ने देखा, यह निहायत काला भुजंग मोटा सा व्यक्ति था जिसके सर पर एक सींग भी मौजूद था। इस कुरूप व्यकित के चेहरे पर निहायत वीभत्स मुस्कुराहट सजी हुई थी।

3 comments:

saurabh said...

great stories..thanks a lot..

vimla said...

Vakai bahut majedar

jeevan mohite said...

Intresting story