Wednesday, July 31, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 23


'क्या इन गिनतियों में कोई सम्बन्ध है?' थोड़ी देर विचार करने के बाद उसे इसका जवाब न में मिला। इन गिनतियों में न तो कोई खास क्रम था और न ही कोई सम्बन्ध। फिर उसने एक बात और सोची। 
'वह कौन सी सबसे छोटी संख्या है जिसे ये सभी संख्याएं विभाजित कर देती हैं?' इसे निकालना आसान था क्योंकि अग्रवाल सर ने क्लास में एल.सी.एम. निकालना काफी अच्छी तरह समझाया था। थोड़ी देर की गणना के बाद उसे मालूम हो गया कि यह संख्या साठ है।
 
मतलब ये कि साठ सेंकड अर्थात हर एक मिनट के बाद सभी टीवी स्क्रीनें एक साथ बन्द हो जाती थीं। उसने एक बार फिर टीवी स्क्रीनों पर दृष्टि केन्द्रित कर दी। उसे ये देखना था कि जब सभी स्क्रीनें एक साथ बन्द होती हैं तो उसके बाद उनपर कौन से दृश्य सबसे पहले आते हैं।

उसे ज़्यादा इंतिज़ार नहीं करना पड़ा। जल्दी ही सभी स्क्रीनें एक साथ बन्द हुईं और एक सेंकंड बाद फिर चालू हो गयीं। और उनके चालू होने के बाद जो पहला दृश्य आया वह रामू के लिये आशाजनक साबित हुआ। 
क्योंकि वह दृश्य उसी कमरे के एक भाग का था। सभी स्क्रीनें एक ही दृश्य दिखा रही थीं और वह दृश्य कमरे में मौजूद मेज़ के एक पाये का था। यह पाया मेज़ पर रखे सर के पीछे की ओर दायीं तरफ था। सभी स्क्रीनें उस पाये के निचले हिस्से को दिखा रही थीं। 

लगभग एक सेकंड तक वह पाया दिखाई दिया फिर सभी स्क्रीनों के दृश्य बदल गये। रामू के लिये इतना इशारा काफी था। वह उस पाये के पास आया और उसका व उसके आसपास का गौर से निरीक्षण करने लगा। जल्दी ही उसे पाये से टच करता हुआ वह पत्थर नज़र आ गया जिसका रंग दूसरे पत्थरों से हल्का सा अलग था। जहाँ दूसरे पत्थर गुलाबी रंग के थे वहीं इस पत्थर के गुलाबीपन में बैंगनी रंग की भी झलक मिल रही थी। हालांकि यह झलक इतनी नहीं थी कि कोई आसानी से उसे नोटिस कर सकता। 

उसने पाये को उस पत्थर से हटाने की कोशिश की, लेकिन पाया पूरी तरह जाम था। उसने पत्थर को भी ठोंक बजाकर देखा लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर उसे अपने हाथ में पकड़े ज़ीरो नुमा यन्त्र का ख्याल आया जिसने इससे पहले भी उसकी कई बार मदद की थी। उसने उस यन्त्र को पत्थर से लगा दिया। 

परिणाम इस बार पाजि़टिव था। जैसे ही पत्थर यन्त्र के सम्पर्क में आया, शूँ की आवाज़ के साथ वह हवा में विलीन हो गया। और उसके गायब होते ही उससे मिले सारे पत्थर एक एक करके गायब होने लगे। मज़े की बात ये थी कि एक तरफ तो फर्श के पत्थर गायब हो रहे थे और दूसरी तरफ वह मेज़ जिसपर कटा सर रखा था वह हवा में धीरे धीरे ऊपर उठती छत की ओर जा रही थी। 

फिर वह पत्थर भी गायब हो गया जिसके ऊपर रामू खड़ा था। अब क़ायदे से उसे नीचे बने हुए गडढे में गिर जाना चाहिए था लेकिन वह वहीं हवा में टिका रहा। उसे लग रहा था कि इस जगह की ग्रैविटी पूरी तरह खत्म हो गयी है। वह अब किसी नयी मुसीबत के लिये अपने को तैयार कर रहा था जो कि शायद ज़्यादा ही मुश्किल थी, जैसा कि उस सर ने बताया था। 

सर जिस मेज़ पर रखा था वह मेज़ छत को फाड़कर बाहर निकल चुकी थी, और उसके बाद छत फिर से बराबर हो गयी थी। अचानक उसे अपने पैरों पर नमी सी महसूस हुई। उसने झुककर देखा तो उसे अपने पैरों के पास छोटे छोटे गुलाबी रंग के बादल नज़र आये जो धीरे धीरे घने हो रहे थे। साथ ही यह बादल उसके पैरों से ऊपर भी उठकर पूरे कमरे में फैल रहे थे। 

कमरे का मौसम अचानक बदल गया था। ठंडी ठंडी हवाएं चलने लगी थीं। और उसे कुछ ऐसी ही महक महसूस हो रही थी जैसे बारिश के मौसम में पहली बारिश के ठीक बाद होती है। उसे लग रहा था जैसे वह किसी बाग़ में बैठा हुआ है और मौसम की पहली बारिश शुरू हो गयी है। 

बादल इतने घने हो गये थे कि उसे कमरे की दीवारें और उनपर लगे टीवी स्क्रीन मुश्किल से ही नज़र आ रहे थे। फिर वह दीवारें दिखाई देना बिल्कुल ही बन्द हो गयीं। अब तो उसका पूरा शरीर भी बादलों में छुप गया था। लगभग दस मिनट तक वह बादल उसे घेरे रहे, फिर एकाएक वह सभी बादल गायब हो गये। लेकिन अब वह कमरा भी नज़र नहीं आ रहा था जिसमें वह मौजूद था। 

बल्कि यह तो बहुत ही खूबसूरत एक बाग़ था जिसमें तरह तरह के फल लगे हुए थे। थोड़ी दूर पर एक तालाब भी था। और वह खुद उस बाग़ में पड़े एक झूले पर विराजमान था। अचानक उसे लगा कि उस बाग़ में उसके अलावा कोई और भी है। क्योंकि उसे अपने पीछे हल्की सी आहट महसूस हुई थी। उसने घूमकर देखा तो एक और झूला नज़र आया। और उस झूले पर कोई लड़की बैठी हुई हौले हौले झूल रही थी। उस लड़की की पीठ रामू की तरफ थी। 

रामू ने सुकून की एक साँस ली। क्योंकि पहली बार एम-स्पेस में कोई सही सलामत इंसान नज़र आया था। वह जल्दी से अपने झूले से नीचे कूद गया और उस लड़की की तरफ बढ़ा। उसी वक्त लड़की भी उसकी आहट महसूस करके उसकी ओर घूमी और उसका चेहरा देखते ही रामू की मुंह से हैरत से भरी हुई चीख निकल गयी।

वह लड़की नेहा थी। रामू बेसब्री से उसकी ओर बढ़ा।

...................continued

2 comments:

Ashugeet Mukul Singh said...

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