Tuesday, July 30, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 22


'ऐसा लगता है कि यहाँ से पूरी पृथ्वी को देखा जा सकता है और उसकी घटनाओं को कण्ट्रोल किया जा सकता है। तो क्या मैं कथित एम-स्पेस के कण्ट्रोल रूम में पहुंच गया हूं?' उसके दिमाग में यह विचार आया। लेकिन उसी वक्त एक आवाज़ ने उसके विचारों को भंग कर दिया।
'तुम गलत सोच रहे हो। उसने देखा यह आवाज़ उस कटे सर से आ रही थी। उसके होंठ हिल रहे थे। ऐसे .दृश्य को देखकर रामू की उम्र का कोई भी लड़का भूत भूत चिल्लाते हुए भाग निकलता। लेकिन इस दुनिया के पल पल बदलते रंगों में रामू पहले ही इतना हैरतज़दा हो चुका था कि अब कोई नयी घटना उसके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डालती थी। वह उस कटे सर के पास पहुंचा।

''मैं क्या गलत सोच रहा हूं?" उसने उस सर से पूछा। इतना तो उसे एहसास हो ही गया था कि यह सर मायावी एम स्पेस की कोई नयी माया है। 
''जिस जगह तुम खड़े हो वह एम-स्पेस का कण्ट्रोल रूम नहीं है। लेकिन कण्ट्रोल रूम तक जाने का रास्ता ज़रूर है।" उस सर ने कहा। 

''वह रास्ता किधर है?"
''मैं मजबूर हूँ नहीं बता सकता। वरना मेरी मौत हो जायेगी। वह रास्ता तुम्हें खुद ढूंढना होगा।"
''लेकिन तुम्हारे कटे सर से तो यही मालूम हो रहा है कि तुम मर चुके हो। फिर अब कैसा मरना?"
''एम-स्पेस की एक तकनीक ने मेरे सर को धड़ से जुदा कर दिया है। लेकिन मैं जिंदा हूं।" 

''अच्छा यह बताओ कि मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं कण्ट्रोल रूम पहुंच गया?" रामू ने फिर पूछा। उसके मुंह से हालांकि बन्दर की ही खौं खौं की भाषा निकल रही थी लेकिन वह कटा सर उस भाषा को बखूबी समझ रहा था। रामू की बात के जवाब में वह सर बोला, ''जिस जगह तुम मेरा कटा हुआ धड़ देखोगे वही जगह होगी कण्ट्रोल रूम।"

''लेकिन तुम हो कौन?" 
''मैं कौन हूं, इसका पता तुम्हें उसी वक्त चलेगा जब तुम कण्ट्रोल रूम तक पहुंचने में कामयाब हो जाओगे। और अब होशियार रहना क्योंकि आगे का रास्ता ज़्यादा मुश्किल है।" 

रामू ने सर हिलाया और चारों तरफ देखने लगा। अब इससे ज़्यादा मुश्किल और क्या होगी कि वह तेज़ाबी बारिश और साँप बिच्छुओं का सामना करके आ चुका था। वैसे उस सर ने काफी हद तक उसका मार्गदर्शन कर दिया था। यानि एम स्पेस के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिये कण्ट्रोल रूम तक पहुंचना ज़रूरी था। उसे तलाश थी अब कण्ट्रोल रूम तक पहुंचने के रास्ते की। जिसके बाद न सिर्फ उसकी जान बच जाती बल्कि वह सम्राट की साजि़शों को भी बेनक़ाब कर देता जो कि ईश्वर बनकर पूरी दुनिया पर कब्ज़ा करने का ख्वाब देख रहा था। उसके मकसदों पर पानी फेरने के लिये इस दुनिया के तिलिस्म को तोड़ना ज़रूरी था।

वह आगे के रास्ते की तलाश में पूरे कमरे का निरीक्षण करने लगा। फिलहाल कहीं कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। दीवारों पर तो टीवी स्क्रीन लगे हुए थे जबकि फर्श व छत बिल्कुल सपाट थी। एक गोल मेज़, जिसपर कटा सर रखा हुआ था, उसके अलावा कमरे में कोई सामान भी नहीं था।

'लेकिन रास्ता यकीनन है यहाँ पर।' रामू ने अपने मन में कहा। और उस गुप्त रास्ते का सम्बन्ध या तो मेज़ से है या फिर टीवी स्क्रीनों से। इन दोनों के अलावा और कोई वस्तु तो यहाँ पर है नहीं।
उसने मेज़ से शुरूआत करने का इरादा किया। पहले उसने मेज़ को हिलाने की कोशिश की। लेकिन वह फर्श से जड़ी हुई थी, अत: टस से मस नहीं हुई । मेज़ को किसी भी तरह हिलाने डुलाने की उसकी कोशिश नाकाम रही। उसने हाथ में पकड़े करिश्मायी ज़ीरो से भी मेज़ को टच किया लेकिन कुछ नहीं हुआ। फिर उसने फर्श को भी जगह जगह अपने ज़ीरो से टच करके देखा लेकिन कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने टीवी स्क्रीनों के आसपास कोई स्विच ढूंढने की कोशिश की लेकिन उसकी ये कोशिश भी कामयाब न हो सकी। 

थक हार कर वह वहीं फर्श पर बैठ गया। और स्क्रीन पर पल पल बदलते दृश्यों को देखने लगा। कुछ देर उन दृश्यों को देखने के बाद उसपर एक नया रहस्योदघाटन हुआ। टीवी स्क्रीन थोड़ी देर विभिन्न दृश्य दिखाने के बाद एक सेकंड के लिये बन्द हो जाती थी। 

वहाँ पर कुल पाँच टीवी स्क्रीनें उस गोलाकार दीवार पर एक के बाद एक मौजूद थीं और सभी में यह बात दिखाई दे रही थी। हालांकि उनके बन्द होने का वक्त अलग अलग था। 

'लगता है इनके बन्द होने के वक्त में ही कोई गणितीय पहेली मौजूद है।' ऐसा सोचकर उसने एक स्क्रीन पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। जब उसने मन ही मन हिसाब लगाया तो उसे अंदाज़ा हुआ कि हर पाँच सेकंड के बाद ये स्क्रीन बन्द हो जाती थी। फिर उसने दूसरी स्क्रीन को देखा तो मालूम हुआ कि छ: सेंकड बाद वह स्क्रीन बन्द होती थी। तीसरी स्क्रीन दस सेंकड बाद बन्द हो रही थी जबकि चौथी बारह सेकंड बाद। सबसे ज्यादा देर पाँचवीं स्क्रीन में लग रही थी। वह पद्रह सेंकड बाद बन्द हो रही थी।

3 comments:

kamlesh kumar diwan said...

mayavi gintiyon mai t.v. screen ke band hone ka samay kuch second hi diya gaya hai ese jaduai banae ki jaroorat thee

achcha likha hai dhanyabad ,shukriya

jeevan mohite said...

बहुत आच्छा लिखा है...... पढकर दिमाग़ तेज हो जाता है.... धन्यवाद

Dr. Zeashan Zaidi said...

Thanks Kamlesh Ji & Jeevan Ji!