Monday, July 22, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 15


रामू यानि सम्राट को ईश्वर मानने वालों की संख्या धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी। यह देखकर प्रशासन की आँखों में चिन्ता के भाव तैरने लगे थे। क्योंकि इस नये भगवान को मानने वालों और पुराने भगवानों को मानने वालों के बीच झगड़ों के आसार भी बढ़ते जा रहे थे। पुराने धर्मों को मानने वाले इस नये धर्म के भगवान को पाखंडी बता रहे थे। जवाब में सम्राट के अनुयायी उन्हें मरने मारने पर उतारू थे। हालांकि अभी कोई गंभीर घटना नहीं हुई थी। लेकिन आगे क्या होगा इसकी आशंका सभी को थी।

पुलिस विभाग ने इस नये भगवान की तफ्तीश के लिये एक दरोगा को दो सिपाहियों के साथ भेजा।
''यह तुमने क्या नाटकबाज़ी फैला रखी है!" रामू बने सम्राट के सामने पहुंचकर दरोगा ने आँखें तरेरीं। सम्राट इस समय ऊंचे चबूतरे पर विराजमान था। असली रामू बन्दर के जिस्म में उसकी बगल में बैठा हुआ था। अगर वह मानवीय शक्ल में होता तो कोई भी उसकी चेहरे की परेशानी आसानी से देख लेता। जिस चबूतरे पर वे लोग मौजूद थे उसके आसपास लगभग सौ लोगों का मजमा लगा हुआ था जो भगवान रामकुमार वर्मा की जय जयकार कर रहे थे।  

''यहाँ कोई नाटक नहीं फैला हुआ है। यहाँ तो शान्ति का साम्राज्य फैला हुआ है।" सम्राट ने शांत स्वर में जवाब दिया।
''कौन शान्ति? सिपाहियों, देखो शान्ति किधर गायब है। ससुर दोनों को ले चलकर हवालात में बन्द कर दो।" दरोगा सिपाहियों की तरफ घूमा।
सिपाही तुरंत शान्ति की तलाश में जुट गये।

उधर सम्राट का प्रवचन जारी था, ''शान्ति, सुख और चैन की तलाश हर एक को होती है। लेकिन शान्ति तो तुम्हारे मन के अन्दर ही बसती है। लेकिन तुम उसे पहचान नहीं पाते। ठीक उसी तरह जैसे तुम लोगों को जीवन भर ईश्वर की तलाश होती है। लेकिन अगर ईश्वर सामने आ जाये तो तुम उसे पहचान नहीं पाते और दीवाने बनकर इधर उधर चकराने लगते हो। ऐ दीवानों मुझे पहचानो। मैं ही ईश्वर हूं। मैं ही हूं इस सृष्टि का निर्माता।

''इस दीवाने को ले चलकर हवालात में बन्द कर दो। जब दो डंडे पड़ेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी। ससुर ईश्वर बना रहा है।" दरोगा ने व्यंगात्मक भाव में कहा। सिपाही सम्राट को पकड़ने के लिये आगे बढ़े लेकिन सम्राट के भक्तों ने सामने आकर उनका रास्ता रोक लिया।
''उन्हें मत रोको। मेरे पास आने दो। सम्राट ने शांत स्वर में कहा।" सिपाही आगे बढ़े और जैसे ही उन्होंने सम्राट को हाथ लगाया। बुरी तरह उछलने कूदने लगे और साथ ही इस तरह हंसने लगे मानो कोई उन्हें गुदगुदा रहा है। पबिलक और दरोगा हैरत से उन्हें देख रहे थे। 

''अबे उल्लुओं। ये क्या कर रहे हो तुम लोग। जल्दी से इसे पकड़ो और हवालात में बन्द करो।" दरोगा चीखा। लेकिन सिपाहियों ने मानो उसकी बात ही नहीं सुनी। वे उसी प्रकार उछलने कूदने और कहकहा मारने में व्यस्त थे। 

''नर्क में जाओ तुम लोग । मैं ही कुछ करता हूं।" दरोगा इस बार खुद सम्राट को गिरफ्तार करने आगे बढ़ा। सम्राट शांत भाव से उसे देख रहा था। जैसे ही दरोगा ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, सम्राट ने उसके चेहरे पर एक फूंक मारी। फौरन ही दरोगा दो कदम ठिठक कर पीछे हट गया। अचानक ही उसके चेहरे के भाव बदल गये। चेहरे की सख्ती गायब हो गयी और उसकी जगह ऐसा लगा मानो उसपर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। चेहरा कुछ इसी तरह उदास हो गया था। 

फिर उसकी आँखें छलछला कर निर्मल धारा भी बहाने लगीं। और उसके मुंह से भर्राई हुई आवाज़ में निकला, ''माँ, तुम कहां हो। मुझे छोड़कर किधर खो गयीं तुम। देखो तुम्हारी याद में तुम्हारे बबलू का क्या हाल हो गया है।
सम्राट के पास बैठे भक्त हैरत से दरोगा को देखने लगे थे। 
''बचपन में इसकी माँ अपने आशिक के साथ भाग गयी थी। आज इसे उसकी याद आ रही है।" सम्राट ने बताया।

''लेकिन अभी अचानक इसे कैसे माँ की याद आ गयी?" एक भक्त ने पूछा। 
''इसलिए क्योंकि अभी मैंने इसको इसकी माँ की आत्मा के दर्शन कराए हैं।" 
''अरे वाह। भगवान, कृपा करके मुझे अपने बाप की आत्मा के दर्शन करा दीजिए। मुझे उससे उस गड़े धन का पता पूछना है जो उसने ज़मीन में कहीं छुपा दिया था। और फिर हमें बताने से पहले ही उसका दम निकल गया था।" भक्त ने आशा भरी नज़रों से भगवान की ओर देखा।

''इसके लिये तुम्हारे बाप की आत्मा से बात करने का कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि करारे नोटों की शक्ल में जो धन उसने गाड़ा था, वह पूरे का पूरा दीमक चाट गयी है।" सम्राट ने भक्त की आशाओं पर तुरंत आरी चला दी।
उधर दरोगा अपनी माँ की याद में एक कोने में गुमसुम बैठ गया था, अत: अब सम्राट को रोकने वाला कोई नहीं था। अब तो वहां अच्छी खासी तादाद में न्यूज़ चैनल वाले भी पहुंच गये थे। और चीख चीखकर रामकुमार वर्मा के बारे में बहस कर रहे थे कि वह असली ईश्वर है या नक़ली। इन चैनलों के ज़रिये इस भगवान को पूरे देश में देखा जा रहा था। दूसरी तरफ बन्दर बना असली रामकुमार वर्मा यानि रामू अपने दाँत पीस रहा था और मन ही मन सम्राट को सबक सिखाने की तरकीबें सोच रहा था। सम्राट इस समय उसकी तरफ मुत्वज्जे नहीं था। जल्दी ही रामू को उसे सबक सिखाने की तरकीब सूझ गयी। इस समय एक धूपबत्ती उसकी बगल में ही जल रही थी। उसने धीरे से उस धूपबत्ती को सम्राट की तरफ खिसकाना शुरू कर दिया। 

सम्राट इस समय उपदेश देने में तल्लीन था। उसने रामू की हरकत की ओर कोई ध्यान  नहीं दिया। उसे वैसे भी रामू की कोई  चिन्ता नहीं थी। भला बन्दर के जिस्म में मौजूद रामू उसका बिगाड़ ही क्या सकता था।
अचानक रामू ने झपटकर जलती हुई धूपबत्ती सम्राट के पिछवाड़े लगा दी। दूसरे ही पल एक चीख मारकर सम्राट उछल पड़ा। उसने हैरत और गुस्से से बन्दर बने रामू की ओर देखा। पहली बार किसी ने उसे इस धरती पर चोट पहुंचायी थी। 

''ओह। तो तुम्हें भी अब सबक देने की ज़रूरत है।" उसने दाँत पीसकर कहा। उधर पूरी पब्लिक हैरत से दोनों की ओर देख रही थी। उन्होंने साफ साफ देखा था कि एक बन्दर ने उनके भगवान को चीख मारने पर मजबूर कर दिया है।
''भगवान, आपका बन्दर तो बड़ा नटखट है।" एक भक्त ने प्यार से भगवान के बन्दर की ओर देखा। 
''हाँ। ये मुझे बहुत प्रिय है। सम्राट ने ऊपरी तौर पर मुस्कुराहट सजाकर किन्तु भीतर ही भीतर पेचो ताब खाते हुए कहा। 

''अच्छा। अब यह सभा यहीं बर्खास्त की जाती है। मुझे अब ध्यान में लीन होना है।" सम्राट ने उठते हुए कहा। 
''किन्तु ईश्वर तो आप स्वयं हैं। फिर आप किसके ध्यान में लीन होंगे?" एक भक्त ने जो कुछ ज्यादा ही खुराफाती दिमाग का था सम्राट को टोक दिया। 

''मैं स्वयं के ध्यान में लीन होऊंगा। मैं ईश्वर हूं जिसकी सीमाएं अनन्त हैं। उस अनन्त के बोध हेतु ध्यान की ऊर्जा अति आवश्यक है ताकि मैं अनन्त सृजन कर सकूं।" सम्राट ने इस बार कठिन आध्यात्मिक भाषा का इस्तेमाल किया था जिसने भक्तों को भाव विह्वल कर दिया। उधर सम्राट ने बन्दर बने रामू को पकड़ा और हवा में तैरते हुए एक तरफ को निकल गया।

नीचे पब्लिक खड़ी हुई भगवान रामकुमार वर्मा की जय जयकार कर रही थी।
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.............continued

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