Saturday, July 20, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 13


''अरे नेहा तुमने ये नोटिस पढ़ा?" पिंकी ने नेहा का ध्यान नोटिस बोर्ड की तरफ दिलाया और वो सब एक साथ नोटिस बोर्ड को पढ़ने लगीं। 
''कल प्रेयर के बाद रामू क्या बताने जा रहा है?" तनु ने अपने दिमाग पर जोर डालने के लिए नाक भौं चढ़ाई।
''पता नहीं। अब तो लगता है उसका दिमाग यहाँ के टीचरों की समझ से भी बाहर हो गया है।" नेहा ने कंधे उचकाते हुए कहा।
''मैं बताऊं?" पिंकी बोली और दोनों उसकी तरफ घूम गयीं।

''क्या?" नेहा ने पूछा। 
''मुझे लगता है कल रामू पूरे स्कूल के सामने तुम्हारे और अपने प्यार का एनाउंसमेन्ट करने जा रहा है। हो सकता है कल सबके सामने वह तुम्हें सगाई की अँगूठी पहना दे।" पिंकी अपनी गोल गोल आँखें छटकाते हुए बोली।

''यह खुराफाती विचार तुम्हारे भेजे में आया कहाँ से?" नेहा ने उसे घूरा।
''अरी यार, मेरा दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता है। मैं उसकी आँखों में बहुत दिन से तुम्हारे लिये प्यार देख रही हूं।" 
''काश कि ये सच होता।" नेहा ने एक ठंडी साँस ली, ''लेकिन यह बस एक हसीन सपने के सिवा और कुछ नहीं।" 
''क्यों सपना क्यों? मैंने कह दिया सो कह दिया। कल वह यही करेगा जो मैं कह रही हूं।" 

पिंकी ने झटके के साथ अपनी उंगली ऊपर उठायी और उसी समय उसे पीछे से एक जोरदार झटका लगा। वह उई कहकर पीछे घूमी तो एक लड़का उसके पीछे औंधे मुंह लेटा हुआ था। एक भारी भरकम गुलदस्ता उसके हाथ से छूटकर साइड में गिर चुका था। फिर कराहते हुए वह लड़का जब ऊपर उठा तो उन्होंने उसके चेहरे पर कीचड़ भरा होने के बावजूद उसे पहचान लिया। यह गगन था।

''अरे गगन! तुम्हें क्या हुआ?" तनु ने हैरत से पूछा।
''ऐक्चुअली अपने भारी भरकम गुलदस्ते की वजह से सामने देख नहीं पाया और नाली से ठोकर खा गया।'' गगन ने खिसियानी हंसी हंसते हुए कहा।
''यह गुलदस्ता मेरे लिये है न। गगन तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो।" पिंकी खुश होकर बोली और गगन ने बुरा सा मुंह बनाया। पूरे स्कूल में यही लड़की ऐसी थी जो उसे एक आँख नहीं भाती थी।

''आपको मैं किसी टाइम इमामदस्ता दे जाऊंगा। मसाला कूटने वाला। ये गुलदस्ता तो नेहा तुम्हारे लिये है।" गगन ने गुलदस्ता जमीन से उठाया और नेहा की तरफ बढ़ा दिया।
''मेरे लिये? भला मैं इस गुलदस्ते का क्या करूं?" नेहा ने कोई रिस्पांस नहीं दिया।
''ऐक्चुअली आज मैं तुम्हारे सामने वह बात निकाल देना चाहता हूं जो बरसों से तुमसे कहने के लिये तड़प रहा हूं।" गगन इस वक्त पूरा रोमांटिक होने की कोशिश कर रहा था। यह अलग बात है कि शक्ल से कुछ और ही लग रहा था।

''कमाल है! बात न हुई कब्ज का मर्ज़ हो गया कि जब तक न निकले आदमी तड़पता रहे।" तनु की बीच में टपक कर बोलने की आदत कभी कभी सामने वाले को दाँत पीसने पर मजबूर कर देती थी।
''तो फिर जल्दी बोल कर अपनी तड़प निकालो। मुझे काम से जाना है।" नेहा ने अपनी घड़ी पर नजर की। 
''नेहा, आई लव यू सो मच और मैं तुमसे मंगनी और शादी दोनों करना चाहता हूं। ये देखो मैं अंगूठी भी लेकर आया हूं मंगनी के लिये।" गगन ने जेब से अंगूठी निकालकर दिखायी। 

नेहा ने एक गहरी साँस ली और पिंकी की तरफ घूमी, ''पिंकी, तुम्हारी भविष्यवाणी तो कल की बजाय आज ही सच हो गयी।" 
''अरे क्या मेरे बारे में कोई भविष्यवाणी की गयी थी?" खुश होकर गगन ने पूछा।
''हाँ।" नेहा ने कहा।
''क्या?" दाँत निकालकर गगन ने पूछा।

''यही कि एक गुलदस्ता तुम्हारे सर पर टूटने वाला है।" नेहा ने उसी का गुलदस्ता उसके सर पर दे मारा। और तेजी के साथ वहाँ से निकलती चली गयी। जबकि गगन अपने सर को सहलाता गुलदस्ते वाले को कोसता रह गया जिसने इतने भारी बरतन में रखकर वह गुलदस्ता बनाया था।
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पता नहीं उस वक्त क्या बज रहा था जब खट पट की आवाज सुनकर रामू की आँख खुल गयी। उसने अपनी पोजीशन पर नजर डाली। उस पत्थर पर काफी अच्छी नींद आयी थी उसे। फिर उसका ध्यान अपने कमरे की तरफ गया जिसकी खिड़की उसकी तरफ खुलती थी। उसने देखा कि उसके कमरे में रौशनी हो रही थी। यानि कमरे में कोई मौजूद था। उसने धीरे धीरे अपना सर खिड़की की तरफ बढ़ाया। वह देखना चाहता था कि कमरे में कौन मौजूद है। 

उसकी आँखें खिड़की के बराबर में पहुंचीं और तब उसने देखा कि उसकी कुर्सी पर कोई उसी के डील डौल का लड़का मौजूद है जिसकी पीठ खिड़की की तरफ थी। वह लड़का कोई किताब पढ़ रहा था। रामू ने गौर से किताब को देखा और यह देखकर उसके देवता कूच कर गये कि यह किताब उसकी नहीं बल्कि उसके बाप की थी जिसे वह हाल ही में किसी कबाड़ी मार्केट से खरीद कर लाये थे। यह किताब प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान पर आधारित थी। रामू ने एक बार उसे उठाया था और फिर कवर पेज देखकर रख दिया था।

'तो यह है वह बहुरूपिया जो रामू बनकर मेरे घर पर कब्जा जमाये हुए है।' रामू ने अपने मन में कहा।
वह लड़का तल्लीनता से किताब की स्टडी में जुटा हुआ था। इतनी तल्लीनता से तो रामू अपने कोर्स की किताबें भी नहीं पढ़ता था जैसे वह उसके बाप की किताब पढ़ रहा था।
'मौका अच्छा है। मैं आज इसका सर तोड़ दूंगा। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।' बन्दर बने रामू ने इधर उधर नज़र दौड़ाई और जल्दी ही एक भारी पत्थर पर उसकी निगाहें गड़ गयीं। वह पत्थर के पास गया और उसे अपने हाथों में थाम लिया। अब वह धीरे धीरे खिड़की की ओर बढ़ा। खिड़की की चौखट पर उसने पत्थर रख दिया और फिर उचक कर खिड़की पर चढ़ गया। जबसे उसे बन्दर का शरीर मिला था, उसकी किसी भी हरकत में कोई आवाज़ नहीं पैदा होती थी। और वह लड़का तो वैसे भी किताब की स्टडी में इतना तल्लीन था कि उसे रामू के अन्दर आने का कोई एहसास ही नहीं हुआ।

रामू धीरे धीरे चलता हुआ उसके ठीक पीछे पहुंच गया। उसने उस लड़के की खोपड़ी तोड़ने के लिये पत्थर को अपने सर से बलन्द किया। और उसी पल वह लड़का उसकी तरफ घूम गया। उसकी आँखें रामू की आँखों से टकराईं और रामू को ऐसा लगा मानो उसके हाथों को किसी ने जकड़ लिया हो। उसने अपने हाथों को हिलाने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। 
लेकिन रामू को अपनी दशा से भी ज्यादा एहसास उस हैरत का था जो उस लड़के का चेहरा देखकर पैदा हुई थी। वह लड़का हूबहू उसकी फोटोस्टेट कापी था। जरा भी दोनों में फर्क नहीं था। उस लड़के ने अपने सर को झटका दिया और रामू के हाथ से पत्थर छूटकर नीचे गिर गया।

''तो तुम आ ही गये अपने घर।" उस लड़के के मुंह से आवाज़ निकली और रामू को आश्चर्य हुआ। क्योंकि उसने उसे पहचान लिया था। उसके बन्दर की शक्ल में होने के बावजूद।
''कौन हो तुम?" रामू ने पूछना चाहा लेकिन उसकी ज़बान से एक बार फिर बन्दरों वाली खों खों निकल कर रह गयी।

''मैं ... रामू हूं। क्या शक्ल से नहीं दिखाई देता।" उस लड़के ने अपने चेहरे की ओर इशारा किया। रामू ने एक गहरी साँस ली। इसका मतलब उसका हमशक्ल उसकी ज़बान समझ रहा था। 
''ल.. लेकिन रामू तो मैं हूं।" उसने हकलाते हुए कहा।
''तुम रामू नहीं हो। तुम सिर्फ एक बन्दर हो, जिसके अन्दर रामू का दिमाग फिट किया गया है।" उस लड़के ने कहा। इसका मतलब उस लड़के को सारी बातें मालूम थीं। और शायद उसी का इन सबके पीछे हाथ भी था।
''तुम हो कौन जिसने मेरे शरीर और घर दोनों पर अपना अधिकार कर लिया है?" रामू ने इसबार बेबसी के साथ पूछा।

''जल्दी ही जान जाओगे मेरे बारे में। अगर तुम अपनी भलाई चाहते हो तो मेरे साथ ही रहना अब। क्योंकि मेरे अलावा इस दुनिया में तुम्हारी भाषा और कोई नहीं समझ सकता है। और तुम्हारे मेरे पास रहने से मेरे बहुत से मकसद आसानी से हल हो जायेंगे?" वह लड़का इस तरह उसकी कुर्सी पर बैठा था मानो कोई सम्राट बैठा हो।
''कैसे मक़सद?" रामू ने पूछा।
''मैंने कहा न उतावली ठीक नहीं। धीरे धीरे तुम्हें सब मालूम हो जायेगा।"

''अरे रामू, किससे बात कर रहा है?" बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आयी। और फिर वह अन्दर दाखिल भी हो गयी।
''मैं इस बन्दर से बात कर रहा था माँ।" रामू बने सम्राट ने बन्दर बने रामू की ओर इशारा किया और रामू सिर्फ दाँत पीसकर रह गया।
''अरे! ये अन्दर कैसे आ गया? वैसे बहुत समझदार बन्दर है ये। तुम इसे पालतू बना लो। काम आयेगा।"
''पालतू तो मैं इसे पहले ही बना चुका हूं।" रामू बने सम्राट ने अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया।
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