Wednesday, July 17, 2013

मायावी गिनतियाँ : भाग 10


जबकि रामू की शक्ल में मौजूद सम्राट साइकिल पर सवार स्कूल की ओर बढ़ा जा रहा था। इस रोड पर अपेक्षाकृत सन्नाटा रहता था। उसने देखा दूर पेड़ की एक मोटी सी डाल ने रास्ता घेर रखा है। वह डाल के पास पहुंचा और साइकिल से नीचे उतरकर डाल को हटाने लगा। उसी समय झाडि़यों के पीछे से तीन लड़के निकलकर उसके सामने आ गये। तीनों ने अपने चेहरों पर मुखौटे डाल रखे थे और उनके हाथों में चेन तथा हाकियां मौजूद थीं। उसमें से एक उसकी साइकिल के पास पहुंचा और उसके पहिए से हवा निकालने लगा।

''क्या कर रहे हो भाई?" सम्राट उसकी तरफ घूमा।
''अबे दिखाई कम देता है क्या। हम तेरी हवा निकाल रहे हैं।" हवा निकालने वाला लड़का बोला और बाकी दो लड़के कहकहा लगाकर हंसने लगे।
''तुम बहुत गलत कर रहे हो। इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।" सम्राट पूरी तरह शांत स्वर में बोला।

''अरे। ये तो हमें धमकी दे रहा है।" हवा निकालने वाले लड़के ने बाकियों की ओर घूमकर देखा।
''ओह। फिर तो इसकी मौत आ गयी है।" दूसरे लड़के ने अपनी हाकी रामू बने सम्राट की ओर घुमाई। सम्राट ने हाकी से बचने की कोई कोशिश नहीं की। दूसरे ही पल उन लड़कों को हैरत का झटका लगा क्योंकि हाकी सम्राट के जिस्म से दो इंच पहले ही झटके के साथ पलट गयी थी। हाकी पकड़ने वाले लड़के को एक जोरदार झटका लगा और वह गिरते गिरते बचा।

''गगन, अमित क्यों जबरदस्ती अपना और मेरा टाइम खराब कर रहे हो?" रामू उर्फ सम्राट सुकून के साथ बोला। उसकी बात सुनकर लड़कों को मानो साँप सूंघ गया। और वे सब सकपका गये।
''तो तूने हमें पहचान लिया।" उनमें से एक जो वास्तव में अमित था, बोला।

''हमारे चेहरे तो छुपे हुए हैं। लगता है इसने हमें आवाज से पहचान लिया।" सुहैल बोला, जो वास्तव में रामू की साइकिल की हवा निकालने के लिए झुका था।
''अगर तुम लोग अपनी आवाज़ भी बदल लेते तब भी मैं पहचान जाता।" सम्राट ने कहा।
''क्यों? क्या तेरे अन्दर कोई ईश्वरीय शक्ति समा गयी है?" गगन के स्वर में व्यंग्य था।

''कुछ हद तक सही अनुमान लगाया है तुमने।" गंभीर स्वर में बोला सम्राट। 
उसकी इस बात ने मानो वहां धमाका किया और तीनों लड़के उछल पड़े।
''क्या मतलब? क्या कहा तुमने?" अमित तेजी से उसकी तरफ घूमा।
''वही, जो तुम लोगों ने सुना।" सम्राट अपनी साइकिल के पास पहुंचा और हवा निकला हुआ टायर टयूब एक झटके में खींच लिया। अब वह खाली रिम लगे हुए पहिए की साइकिल पर सवार हुआ और तेजी से पैडिल मारते हुए आगे बढ़ गया। तीनों लड़के वहां खड़े एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे।
-------
रामू को एक बार फिर ज़ोरों की भूख लगने लगी। इसलिए वह किचन की तरफ बढ़ने लगा। और जल्दी ही वहां पहुंच गया। उसने इधर उधर देखा। पूरा किचन खाली था सिवाय कुछ जूठे बर्तनों के। उसे पता था कि उसकी मम्मी खाने के बाद बची हुई चीज़ों को सीधे फ्रिज में ठूंस देती हैं। क्योंकि खुले में रखा खाना सड़ने लगता है।
मम्मी की यह आदत इस वक्त उसके लिए मुसीबत बन गयी। फ्रिज खोलना कम से कम उसके बन्दर वाले जिस्म के लिए मुमकिन न था। अब उसके सामने एक ही चारा था कि जूठे बर्तनों को चाटना शुरू कर दे। उसने यही किया। उसे अपनी हालत पर हंसी भी आ रही थी और रोना भी। कभी वह घर में घुसी बिल्ली या चूहे को जूठे बर्तन चाटते देखता था तो मारकर भगा देता था। आज यही काम वह खुद कर रहा था। 

जल्दी ही उसने सारे बर्तन इस तरह चाट कर साफ कर दिये मानो अभी अभी धुले गये हों। लेकिन पेट कमबख्त अभी भी और की डिमांड कर रहा था। यानि अब इसके अलावा और कोई चारा नहीं था कि वह किसी तरह फ्रिज खोलने का जुगाड़ करे। 

वह फ्रिज के पास पहुंचा और उसे खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन उसकी सारी कोशिशें एक बन्दर की जबरदस्ती की उछलकूद से ज्यादा कुछ न कर सकीं। फिर उसे कोने में पड़ा चिमटा दिखाई दिया और उसे एक तरकीब सूझ गयी। उसने फौरन चिमटा उठाया और उसे फ्रिज के दरवाजे में फंसाकर जोर लगाने लगा। 
तरकीब कामयाब रही और फ्रिज खुल गया। अन्दर से आने वाले पकवानों की खुशबू ने उसकी भूख दोगुनी कर दी। उसने एक ढक्कन उठाया और यह देखकर उसकी बाँछें खिल गयीं कि सामने उसकी मनपसंद डिश यानि छोले मौजूद थे। इधर उधर देखे बिना उसने दोनों हाथों से छोले उठाकर खाने शुरू कर दिये।

पेट भरने की कवायद ने उसे आसपास के माहौल से बेखबर कर दिया। अचानक बर्तन गिरने की छनछनाहट ने उसे चौंका दिया। उसने मुंह उठाकर देखा तो भौंचक्का रह गया। किचन के दरवाजे पर उसकी मां मौजूद थी और डरी हुई नजरों से उसकी तरफ देख रही थी। शायद वह किचन में बर्तन रखने आयी थी, जो उसके हाथ से छूटकर जमीन पर पड़े हुए थे।
अब दोनों एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले हुए मूर्ति बने हुए अपनी अपनी जगह एक ही एक्शन में खड़े हुए थे।
-------

1 comment:

Dayanand Arya said...

मजा आ रहा है सर जी!