Saturday, September 11, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 70 (अंतिम किस्त)

‘‘बिना सुबूतों के मैं यह बात मुंह से भी नहीं निकालता कि साफ्ट प्रो इस काम में शामिल है। पहला सुबूत तो वह कँकालनुमा रोबोट है जिसके सारे कलपुर्जों पर जापानी ट्रेडमार्क है। दूसरी बात ये कि आपकी कंपनी ने कुछ दिनों पहले सरकार से गैलियम आर्सेनाइड के निर्यात की बात की थी जबकि उस समय तक यह बात पूर्ण रूप से गुप्त थी। केवल आस्ट्रेलियाई कंपनी और भारत सरकार जानती थी कि यहाँ गैलियम आर्सेनाइड खनिज की खोज हुई है। इससे सिद्ध होता है कि तुम्हारी कंपनी इस काम में सम्मिलित है। मुझे उस झोंपड़ी से भी कुछ चिन्ह् मिले जिसमें रोबोट द्वारा दी गयी वस्तुएं पहुंचती थीं। इन चिन्हों में उंगलियों के वे निशान शामिल हैं जो झोंपड़ी में रखी मेज़ के नीचे मिले। वे निशान तुम्हारी उंगलियों के थे। मेज़ के ऊपर के निशान तो तुम मिटा देते थे किन्तु नीचे के निशान किसी प्रकार बाकी रह गये थे।’’

‘‘ये तो कोई ठोस सुबूत नहीं है जिनके आधार पर तुम मेरे विरुद्ध कार्यवाई कर सकते हो।’’ लिपमान अभी भी शांत था।
‘‘हाँ। ये सुबूत वास्तव में ठोस नहीं हैं। तुमने बहुत चालाकी के साथ अपने काम किये हैं। किन्तु सरकार को तुम्हारी कम्पनी का भारत में व्यपार बन्द करने के लिये केवल शक काफी है। और यही हम तुम्हारे लिये पर्याप्त समझते हैं। क्या तुम्हारी कंपनी के लिये गैलियम आर्सेनाइड की हानि काफी नहीं होगी?’’ सुंदरम ने कहा। 

जवाब में लिपमान कुछ नहीं बोला।
उसके बाद यह मीटिंग खत्म हो गयी। गिरधारीलाल को जेल भेज दिया गया।
-------

राहुल के पास एक सिपाही आया और बोला, ‘‘तुम्हें इंस्पेक्टर साहब बुला रहे हैं।’’
राहुल उसके साथ चलकर दूसरे कमरे में प्रविष्ट हुआ। कमरे में प्रवेश करते ही उसका दिमाग भक से उड़ गया क्योंकि जग्गू सुंदरम के सामने बैठा हुआ था। दोनों चाय पीने के साथ हँस कर बातें भी कर रहे थे।

‘‘आओ राहुल यहाँ बैठो।’’ जग्गू ने एक कुर्सी की ओर संकेत किया और राहुल वहाँ जाकर बैठ गया।
‘‘मैंने मीटिंग में किसी को नहीं बताया कि मि0डी तुम ही हो।’’ सुंदरम ने जग्गू से कहा, ‘‘मि0डी अर्थात मि0 धीरज कौशिक, जिसने मेरे साथी का काम किया है।’’

‘‘मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं। जग्गू कौन है?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘तुम जिसे जग्गू नाम का एक साध्रााण गुण्डा समझ रहे हो, वे केन्द्रीय कमांडो फोर्स के चीफ मि० धीरज कौशिक हैं जिन्होंने तुम्हारी निर्दोषिता सिद्ध करने के लिये काफी काम किया है। मेरा विचार है कि मि0 धीरज आप ही पूरी बात बताईए।’’ सुंदरम ने कहा।

‘‘बात ये है कि राहुल, मैं तुमसे पूछताछ के लिये जेल गया था। इसके लिये मुझे डी-आई-जी- से सहयोग लेना पड़ा। उन्होंने एक गुण्डे के रूप में मुझे जेल भिजवाया। मैंने तुहारी कहानी सुनी और सोचा कि तुम निर्दोष हो सकते हो। फिर जब तुम्हारे लिये भोजन आया तो यह अनियमितता देखकर मुझे शक हुआ कि इसमें जहर हो सकता है। फिर बाकी की कहानी तुम्हें मालूम ही है। जेल से फरार होने के बाद मैं मि0 सुंदरम से मिला और हमने यह प्लान बनाया कि मैं छुपकर इस केस पर काम करूंगा और खोका पर दृष्टि रखूंगा। फिर मैंने खोका के मकान की तलाशी ली और सुंदरम को संकेत किया कि मुझे काम की वस्तु मिल गयी है। उसके बाद योजनानुसार सुंदरम ने मुझे गिरफ्तार कर लिया खोका को गलतफहमी में डालने के लिये।  और इस प्रकार असली सरगना पकड़ा गया।’’

‘‘अर्थात मेरी निर्दोषिता सिद्ध हो गयी।’’ राहुल ने खुश होकर कहा।
‘‘हाँ। अब तुम आज़ाद हो।’’ सुंदरम ने कहा।
‘‘धन्यवाद इं-साहब।’’ 

‘‘एक बात और मि0 सुंदरम जो आपको नहीं मालूम होगी।’’ शोरी ने वह फोन, जिसका फोन नम्बर आपको नहीं मिला, मुझे ही किया था। वह मेरा दोस्त है और मैंने उसे आपना फोन नम्बर इसलिये दिया था ताकि किसी कठिनाई में पड़ने पर वह मेरी सहायता ले सके।
शोरी की काल के बाद ही मैं इस केस में सक्रिय रूप में आया। इससे पहले का विवरण तो मुझे मालूम हो ही चुका था आपकी रिपोर्टों द्वारा।’’

‘‘तो राहुल अब तुम क्या करोगे?  गिरधारीलाल तो जेल जा चुका खोका का सरगना बनकर। और उसकी कंपनी बंद हो गयी है।’’ सुंदरम ने पूछा।
‘‘मैं तो अब वापस गाँव चला जाऊंगा। वहाँ का सीधा सादा जीवन ही मेरे लिये उपयुक्त है। शहर आकर मैं बहुत भुगत लिया।’’

‘‘साफ्ट प्रो के जिस वैज्ञानिक ने घातक प्रोग्राम बनाया था वह भी कोई जीनियस होगा। या फिर हो सकता है कि यह प्रोग्राम भी साफ्ट प्रो ने कहीं से चुराया हो।’’ धीरज कौशिक बोला।
‘‘हमारी किस्मत अच्छी थी कि वह प्रोग्राम हमारे वैज्ञानिकों ने पुन: उत्पादित कर लिया। वरना हम अँधेरे में हाथ पैर मारते रह जाते।’’ सुंदरम ने गहरी साँस लेकर कहा।
फिर वहाँ खामोशी छा गयी।  
---समाप्त---
  

फिलहाल यह उपन्यास इस ब्लाग के अलावा और कहीं पब्लिश नहीं है। कोई इच्छुक प्रकाशक इसे हार्डकापी में लाना चाहे तो मुझसे सम्पर्क कर सकता है। 
और सभी पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया। 


---जीशान हैदर जैदी

6 comments:

PD said...

zeashan zaidi जी, मजा आ गया पूरा पढ़ कर.. सच कहूँ तो आपके पिछली कहानी से यह बहुत बढ़िया है.. लेखन में मैच्योरिटी आ रही है..

बधाई स्वीकारें..

BTW, मैं आपका सायलेंट रीडर हूँ जो आपके इस ब्लॉग का हर पोस्ट जरूर पढता है..

zeashan zaidi said...

शुक्रिया PD जी. आप मेरे ब्लॉग के रेगुलर पाठक हैं, ये तो मैं जानता हूँ और अक्सर आपकी टिप्पणियाँ भी आती रहती हैं. इसी तरह स्नेह बनाए रखें.

Nilam-the-chimp said...

भरी सभा में सार्वजनिक रूप से यह कह देना की पूर्व मंत्री के बेटे ने कत्ल किये थे. बर्र के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है. सुन्दरम यह सब घोषनाये कैसे कर पाए, हजम करना थोडा मुशकील हैं, यदि पुलिस ने ही वोह सबूत मिटाए थे तो, तो उन्हें दुबारा सुंदरम कैसे जुटा पाया? सिर्फ पुलिस इंस्पेक्टर का बयान तो पर्याप्त माना नहीं जायेगा, तो राजनीती के मंच से तो सुन्दरम ने अपनी आतमहत्या का पूरा इन्तेजाम कर लिया हैं. यह तो सिर्फ एक उदाहरण दे रहा हूँ, पर मुझे लगा की कहानी को पहले लम्बा खेचा गया फिर अंत करने के लिए कई कमजोर पॉइंट नजरअंदाज कर दिए गए.कहानी और उपन्यास में मुलभुत फर्क है, इसे आप कहानी ही रखते और थोडा संक्षिप्त में कहते तो बहुत बेहतर रचना हो सकती थी.

zeashan zaidi said...

@ Nilam-the-chimp Ji,
आपने पॉइंट अच्छे उठाये हैं, लेकिन मैं समझता हूँ की इन सब का जवाब कहानी में मौजूद है.
१. 'भरी सभा में सार्वजनिक घोषणा' ये सभा सार्वजनिक नहीं थी बल्कि इसमें वही लोग शामिल थे जिनका केस से किसी न किसी रूप में सम्बन्ध था.
२. 'राजनीती के मंच पर सुन्दरम की आतमहत्या' ऐसा तो तब होता जब वर्तमान मंत्री के बारे में सुन्दरम कोई घोषणा करता लेकिन यहाँ तो पूर्व मंत्री की बात हो रही है.
३. 'यदि पुलिस ने ही वोह सबूत मिटाए थे तो, तो उन्हें दुबारा सुंदरम कैसे जुटा पाया?' सुन्दरम को वो सुबूत खोका के अड्डे की तलाशी में मिले थे. वरना पुलिस के रिकॉर्ड में तो कुछ नहीं था.
४. कहानी को यदि एक साथ पढ़ा जाए तो मैं नहीं समझता की यह लम्बी मालूम होगी. चूंकि मैंने इसे थोडा थोडा करके किस्तों में दिया था इसलिए ऐसा मालूम हो रहा है.

Nilam-the-chimp said...

Zaidi Sahab;
Bura mat maniyen, lekin me aapko ek udaharan de raha tha. Aapse maine safai nahi maangi thi. Kahaani achchi hain lekin, ise aur behtar hona chaahiyen. Ek behtarin rachna ke liye 6-7 drafts bahut jaruri hote hain, kabhi -kabhi to 15 draft tak lag jaate hain. lekin aapi rachna 3-4 draft ke baad ki lagti hai. Agar flaws ki baat ki jaaye to me yeh lamba kichne ka aur ant karne ke liye khaali chhod diye gaye tantuo ki baat nahi karunga. Balki mai khunga
(1) To kill people using resonance, that too using brainwaves would require a very powerful sound system, how come the program demonstration meant for locating criminal information on web had that powerful system? Let alone the fact that resonating brainwaves is used as brain stimulating activity and i personally use them as substitute for meditation.
(2) Somebody who is supposed to be head or one of the heads of a terrorist organization is always kept in an isolated cell, jaggu/Mr. D may have got sneaked into his cell using his police connections, But how come inspector T, Choga singh, and Girdhaarilal never thought of something fishy?
(3) Jaapan/Germany/China export most of the world's robotic equipments, there was no point in saying robot had Japanese parts so it should have Japanese connection, better you could have taken dutch/Austrian/ any European country(other then Germany) as conspiring company's base
(4) In the most likely case any robot would be having several switches on its body (even the robo dog/robo humanoids that my nephew plays with, has so many switches), How can sunderam finds just the correct switch for turning on and off. (Such a switch is usually hardest to reach)
Once again this is just to list a few, many more flaws are there. You needn't explain them to me, but certainly you need more drafts to get a better story.
Nilam

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Jitni rochak kahani, utna shandar end.
Badhayi.
................
…ब्लॉग चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।