Tuesday, September 7, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 68 (अंत से तीसरी किस्त)

रामदयाल के मकान में इस समय काफी चहल पहल थी। एक बड़े से हालनुमा कमरे में दस बारह कुर्सियां एक दूसरे से मिलाकर रखी गयी थीं। एक कुर्सी उन कुर्सियों के सामने अलग रखी गयी थी। कुछ सिपाही इधर उधर घूम रहे थे।
उस समय दस बजे थे जब लोगों ने आना आरम्भ कर दिया। इन्हें सुंदरम ने आमन्त्रित किया था असली अपराधी के बारे में बताने के लिये। उसने कहा कि असली अपराधी का सुराग मिल चुका है और वह उसके बारे में रहस्योद्घाटन इस मीटिंग में करेगा।

साढ़े दस बजे तक सभी लोग आ चुके थे। सुंदरम अभी गायब था। आने वाले व्यक्ति कुर्सियों पर बैठ गये। इन लोगों में सामने से देखने पर बायीं ओर पहली कुर्सी पर बी-सी-ओ- कंपनी का डायरेक्टर जिम टेलर बैठा था। उसके बाद क्रम से शोरी, साफ्ट प्रो का डायरेक्टर लिपमान, साफ्ट प्रो का मैनेजर सिंगली, गिरधारीलाल , जगदीश कुमार तथा गिरधारीलाल का सेक्रेटरी रामकुमार वर्मा बैठे थे।

‘‘मि0सुंदरम ने हमें यहां क्यों बुलाया है?’’ जगदीश कुमार ने अपने पास बैठे गिरधारीलाल के सेक्रेरी रामकुमार वर्मा से पूछा।
‘‘उसने खोका संगठन के सरगना को पकड़ लिया है और उसी के बारे में बताने के लिये हमें यहां आमन्त्रित किया है।’’ सेक्रेटरी बोला।
‘‘किन्तु खोका संगठन के सरगना से हमारा क्या सम्बन्ध्?’’
‘‘यह तो मि0सुंदरम ही बतायेंगे। हमें उनकी प्रतीक्षा करनी है।’’ 

उनकी यह प्रतीक्षा अधिक लम्बी नहीं हुई और थोड़ी देर बाद सुंदरम ने प्रवेश किया। वह आकर अलग रखी कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा उन लोगों के सामने था। लोगों ने आपस में बातचीत करना बन्द कर दिया और उसकी ओर देखने लगे।
सुंदरम ने एक सिगरेट सुलगाई और कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, ‘‘मैंने आप लोगों को यहां इसलिये बुलाया है कि खोका संगठन और गृहमन्त्री की हत्या की इस कहानी से आप सभी लोगों का किसी न किसी रूप में सम्बन्ध् है।’’

‘‘क्या खोका का सरगना पकड़ा जा चुका है?’’ बी-सी-ओ- के डायरेक्टर ने पूछा।
‘‘जी हाँ। उसकी शिनाख्त हो चुकी है और वह कहानी भी पूरी तरह सामने आ चुकी है जो गृहमन्त्री की हत्या से सम्बंधित है।’’
‘‘हम लोग उस कहानी को सुनने के लिये इच्छुक हैं।’’ इस बार साफ्ट प्रो का डायरेक्टर बोला।

सुंदरम कुछ देर मौन होकर सिगरेट के कश लेता रहा। उसकी आँखें सोच में डूबी हुई थीं मानो वह कहानी की कड़ियां मिला रहा हो। फिर उसने कहना शुरू किया,
‘‘यह किस्सा उस समय आरम्भ होता है जब एक विदेशी कंपनी का खोका से अनुबंध् हुआ। इस अनुबंध् का कारण था भारत के पूर्वी छोर में गैलियम आर्सेनाइड बनाने वाले पदार्थ की खोज। इस पदार्थ की खोज एक आस्ट्रेलियाई कंपनी ने की थी और वह कंपनी अपने ही देश की एक कम्प्यूटर कंपनी के लिये भारत से इस पदार्थ के निर्यात का समझौता चाहती थी। भारत भी इस कंपनी के हित में था।

दूसरी विदेशी कंपनी को इसकी भनक मिल गयी। वह भी कम्प्यूटर कंपनी थी और उसके लिये भी गैलियम आर्सेनाइड का खनिज उतना ही महत्वपूर्ण था जितना आस्ट्रेलियाई कंपनी के लिये। वह कंपनी भी इसका आयात चाहती थी किन्तु इसके पीछे दो कठिनाईयां थीं। एक तो उस खनिज का आधा भाग म्यांमार में था और म्यांमार सरकार से उस कंपनी के सम्बन्ध् खराब थे और दूसरी कठिनाई आस्ट्रेलियाई कंपनी थी जिसको भारत सरकार ने लगभग आज्ञा दे दी थी कि वह उस पदार्थ को आयात कर सकती है।
उस कंपनी ने खोका से मिलकर एक प्लान बनाया। एक ऐसा प्लान जिससे गैलियम आर्सेनाइड की वह खान पूरी तरह भारत में आ सकती थी और आस्ट्रेलियाई कंपनी के भारत से सम्बन्ध् भी खराब हो सकते थे।’’

‘‘एक मिनट---’’, गिरधारीलाल ने हाथ उठाकर उसे रोका, ‘‘यदि उस आस्ट्रेलियाई कंपनी तथा दूसरी कंपनी का नाम मालूम हो जाये तो हमें कहानी समझने में आसानी हो जायेगी।’’
‘‘मेरा विचार है कि अब तक आप लोगों को समझ जाना चाहिए था कि वे कंपनियां कौन सी हो सकती हैं। खैर मैं ही बता देता हूं, वह आस्ट्रेलियाई कंपनी थी बी-सी-ओ- और दूसरी कंपनी थी साफ्ट प्रो।’’

एक क्षण के लिये वहां सन्नाटा छा गया। फिर सिंगली चीख उठा, ‘‘यह झूठ है। ऐसा हरगिज नहीं हुआ है। यह हमारे ऊपर इल्जाम है।’’
‘‘मि0सिंगली’’, सुंदरम बोला, ‘‘आपको ऐसा कहना ही चाहिए। क्योंकि आप इस मामले से एकदम अंजान हैं। यह आपके उच्चाधिकारियों का बनाया प्लान था। आप इसके बारे में अपने डायरेक्टर लिपमान से पूछ सकते हैं।’’
सिंगली ने लिपमान की ओर देखा जो सुंदरम की ओर देख रहा था। उसने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं वह प्लान सुनना चाहता हूं जो आपके अनुसार साफ्ट प्रो ने खोका के साथ मिलकर बनाया था।’’

‘‘उस प्लान को बताने से पहले मैं एक रोचक बात आपको बता रहा हूं कि न तो साफ्ट प्रो को मालूम है कि खोका का चीफ कौन है और न खोका को मालूम था कि उसने किस कंपनी के साथ अनुबंध् किया है। इन दोनों के बीच सम्बन्ध् स्थापित करने का काम रामदयाल द्वारा होता था। रामदयाल भी नहीं जानता था कि वह किस कंपनी के लिये काम कर रहा है। वह सूचनाएं एक कंकालनुमा रोबोट को देता था तथा उसी से कंपनी के आदेश प्राप्त होते थे। कभी कभी वह गुप्त दस्तावेज कंपनी तक पहुंचाने के लिये दस्तावेज रोबोट के हाथ में दे देता था जिसे वह रोबोट एक कब्र में लगे हुए पाइप में डाल देता था। जहाँ से एक मैकेनिज्म द्वारा वे सब एक झोंपड़ी में पहुंचते थे जो कब्रिस्तान से काफी दूर थी और जिसको पता करने के लिये मुझे एक लम्बी खुदाई करनी पड़ी। उस झोंपड़ी से वे दस्तावेज मि0लिपमान तक पहुंच जाते थे।’’

लिपमान के चेहरे से लग रहा था कि उसे अपने को संभाले रखने के लिये काफी प्रयत्न करना पड़ रहा है।

‘‘तो प्लान के अनुसार खोका ने सरकार के सामने अपनी माँग रखी जिसके बारे में आप सब जानते हैं। यह माँग ऐसी थी कि इसे सरकार द्वारा मानने या न मानने दोनों में खोका को लाभ होता। माँग मानने में जो लाभ होता वह तो साफ है और न मानने में जो लाभ होता उसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा।
फिर योजना का दूसरा चरण आरम्भ हुआ। इसमें पहले दो महत्वपूर्ण लोगों की हत्या की गयी। उसके बाद गृहमन्त्री की हत्या, किन्तु इस हत्या से पहले बी-सी-ओ- को फंसाने के लिये पूरी रूपरेखा बना ली गयी थी। साफ्ट प्रो ने गृहमन्त्री की मीटिंग के लिये बी-सी-ओ- से मिलता जुलता एक प्रोग्राम गिरधारीलाल के पास भेजा तथा कह दिया कि वह कंपनी के किसी कार्यकर्ता द्वारा वह प्रोग्राम विशेष दिन तथा विशेष समय पर वापस भेज दे। उसी समय खोका के सरगना ने शोरी को बी-सी-ओ- के डायरेक्टर की आवाज़ में आदेश दिया कि लैबोरेट्री से सीडी लाने वाला व्यक्ति राहुल से टकराते हुए आये। इस टक्कर से पहले वह स्वयं उसी स्थान पर दो व्यक्तियों से टकरा चुका था। कारण यह था कि तीसरी टक्कर का वहाँ खड़े रामसिंह की दृष्टि में चढ़ जाना और उस टक्कर में दोनों व्यक्तियों का हुलिया याद हो जाना। यह सब काम खोका इसलिये कर पाया क्योंकि साफ्ट प्रो के कुछ जासूस बी-सी-ओ- में थे।

इस टक्कर का उद्देश्य था पुलिस को गलत रास्ते पर लगाना। उसने दीनानाथ अर्थात वह व्यक्ति जो बी-सी-ओ- की सीडी ला रहा था, की हत्या द्वारा पुलिस का ध्यान टक्कर की ओर आकृष्ट कराया ताकि हम लोग यही समझने लगें कि बी-सी-ओ- ने साफ्ट प्रो की सीडी बदलकर स्वयं गृहमन्त्री की मीटिंग में प्रस्तुत की और साफ्ट प्रो के पास घातक प्रोग्राम वाली दूसरी सीडी पहुंचा दी। और यही हुआ भी। हम बी-सी-ओ- को संदिग्ध् समझने लगे और उसका सम्बन्ध् खोका से मानने लगे।’’ 

जी-सुंदरम ने अपने सामने रखे जग से गिलास में पानी उँडेला और पीने लगा। प्रत्येक व्यक्ति साँस रोककर यह कहानी सुन रहा था और प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर आगे जानने की बेचैनी थी। इस समय हाल में इस प्रकार सन्नाटा था कि सुई भी गिरती तो उसकी आवाज़ सुनाई पड़ जाती।  

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