Sunday, September 5, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 67

वह मकान अँधेरे में डुबा हुआ था और साथ ही बन्द भी था।
‘‘यह मकान तो खाली लग रहा है।’’ राहुल ने कहा। वह जग्गू के साथ अभी अभी यहां पहुंचा था।
‘‘हाँ। यह मकान केवल कभी कभी आबाद होता है। हमारे लिये यह अच्छा ही है। तलाशी लेने में आसानी होगी।’’ जग्गू ने मकान का निरीक्षण करते हुए कहा।

‘‘तुम यहीं ठहरो। मैं ऊपर जाता हूं। यदि कोई आता दिखे तो दो बार उल्लू की बोली बोलकर मुझे सावधान कर देना।’’ जग्गू ने कहा।
‘‘किन्तु यह मकान किसका है?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘खोका संगठन के एक कार्यकर्ता का। तुम्हें जेल भिजवाने में उसका भी बड़ा हाथ था।’’

‘‘किन्तु तुम किस बात के लिये तलाशी लेना चाहते हो?’’
‘‘यह देखने के लिये कि वह व्यक्ति वास्तव में कौन है। तलाशी लेने में शायद कोई ऐसी वस्तु हाथ लग जाये जिससे उसके व्यक्तित्व के बारे में पता चल जाये। अब तुम कोई सवाल न करना वरना देर हो जायेगी। मैं अब ऊपर जा रहा हूं।’’

जग्गू ने जूते उतारकर राहुल को दिये और एक पाइप के सहारे ऊपर चढ़ने लगा जो छत तक गया था। कुछ ही पलों में वह छत पर था। उसने राहुल को देखकर हाथ हिलाया फिर गायब हो गया। वह शायद सीढ़ियों से दूसरी ओर उतर गया था। अब राहुल ने चारों ओर की निगरानी आरम्भ कर दी। खास तौर पर मकान के सामने के गेट की। वहाँ चूंकि अँधेरा था अत: उसे देख पाने की संभावनाएं काफी कम थीं। वह वहाँ खड़ा रहा और समय बीतता रहा। 

लगभग पन्द्रह मिनट बाद जग्गू फिर छत पर दिखाई दिया। उसने तेज़ी से पाइप द्वारा उतरना आरम्भ किया। और कुछ देर बाद वह राहुल के पास था।
‘‘कोई खास बात तो नहीं हुई?’’ उसने राहुल से पूछा।

‘‘नहीं। क्या हुआ? कुछ मिला मकान से?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘हाँ। यह तलाशी पूरी तरह कामयाब रही। अब यहाँ से निकल चलो जल्दी।’’ जग्गू बोला और राहुल के कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ने लगा।

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है जाने की।’’ एक तीसरी आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया जिसने पीछे से उन्हें संबोधित किया था। दोनों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा जहां सुंदरम खड़ा मुस्कुरा रहा था।
‘‘जग्गू। हम लोग फंस गये।’’ राहुल का चेहरा पीला पड़ गया था किन्तु वहां इतना प्रकाश नहीं था कि राहुल का चेहरा देखा जा सकता।

‘‘हाँ। हम लोग वास्तव में फंस गये। हमें नहीं पता था कि सी-आई-डी- का यह अफसर हमारी गंध् पा चुका है।’’ जग्गू ने ठंडी साँस भरते हुए कहा।
‘‘अब तुम लोग चुपचाप मेरे साथ चलो। किन्तु इससे पहले वह कागज़ात हमारे हवाले कर दो जो तुमने इस मकान से निकाले हैं।’’ सुंदरम के एक हाथ में रिवाल्वर चमक रहा था।

जग्गू ने एक और ठण्डी साँस भरी और अपनी जेब से कुछ कागजात निकालकर सुंदरम के हवाले कर दिये। फिर उन्होंने आगे चलना शुरू कर दिया। पीछे से सुंदरम रास्ता बताता जा रहा था। फिर उन्हें एक जीप दिखाई दी जिसमें तीन सिपाही बैठे हुए थे। सुंदरम ने उन्हें जीप में बैठने का आदेश दिया। उनके बैठते ही जीप चल पड़ी।
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खोका का चीफ कौन-----?
गृहमन्त्री की हत्या किसके इशारे पर हुई----?
कंकाल नुमा रोबोट का रहस्य----?
जग्गू की असलियत----?
इन सब सवालों के जवाब आपको मिलने वाले हैं अब--कहानी की अंतिम कड़ियों में!