Tuesday, August 31, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 64

सुंदरम ने रोबोट को लैबोरेट्री भिजवा दिया था और अब इस समय उसने रामदयाल को पूछताछ के लिये अपने सामने बुलाया था।
‘‘तुम्हारा जुर्म सिद्ध हो चुका है अत: अब तुम्हें अपनी ज़बान खोल देनी चाहिए।’’ सुंदरम ने उसे घूरते हुए कहा।
‘‘आप सही कह रहे हैं। मैं आपको सब कुछ बता दूंगा।’’ रामदयाल एक पल को रुका, फिर उसने कहना शुरू किया,

‘‘यह सब कुछ लालच के कारण हुआ। जब मैं गाँव से यहां आया तो उस समय मुझ पर पैसा कमाने की धुन सवार थी। मैंने एक बड़ी कम्प्यूटर कम्पनी में नौकरी कर ली।’’
‘‘वह कंपनी देशी थी या विदेशी?’’ सुंदरम ने उसे रोककर प्रश्न किया।
‘‘वह देशी कंपनी थी। अब भी वह भारत की एक बड़ी कंपनी है। डेटावेयर का नाम तो काफी प्रसिद्ध है।’’
‘‘ठीक है। आगे कहो।’’

‘‘मुझे उसमें कार्य करते हुए दो वर्ष हो गये थे और मैं कंपनी का एक स्थायी कर्मचारी हो चुका था। फिर एक दिन एक व्यक्ति मुझे मिला और कहा कि यदि मैं अपनी कंपनी की प्रोग्राम फाइलों की फोटोकापियां उसे दे दिया करूं तो इसके बदले में वह इतना धन देगा कि मैं रातों रात लखपति बन सकता हूं।’’

‘‘वह व्यक्ति कौन था?’’ सुंदरम ने पूछा।

‘‘न तो मैं उस समय उसे पहचान सका था और न अब पहचान सकता हूं। क्योंकि वह जब भी मुझे मिला, उसका चेहरा पूरी तरह छुपा हुआ था।
मैंने उसकी बात मान ली क्योंकि मुझे तो केवल पैसा कमाना था। जब मैंने पहले प्रोग्राम की कापी उसे दी तो उसने उसके बदले में अच्छा खासा धन दिया। फिर यह सिलसिला चल निकला।’’

लगभग एक साल तक मैं उसके लिये काम करता रहा। अर्थात प्रोग्रामों की कापियां निकालकर उस व्यक्ति के हाथ में देता रहा। एक साल बाद उसने यह काम करवाना बन्द कर दिया और कहा कि अब मुझे कुछ सामान उस तक पहुंचाने होंगे जो दूसरे व्यक्तियों द्वारा मुझ तक पहुंचेगे। और ये सामान मुझे उस व्यक्ति को नहीं देना होगा बल्कि कब्रिस्तान में एक कंकाल तक पहुंचाना होगा।

फिर उसने मुझे उस कंकाल के बारे में थोड़ा बहुत बताया और साथ ही उसने एक कोड भाषा भी समझाई जो मुझे उस कंकालनुमा रोबोट से बातचीत में प्रयुक्त करनी थी।
मैंने यह नया कार्य आरम्भ कर दिया। मैं तान्त्रिक के वेश में कब्रिस्तान तक जाता था और वह सामान जो मुझे दूसरे व्यक्तियों से मिलता था, उस कंकाल को दे देता था। कभी कभी मुझे ज़बानी सन्देश भी पहुंचाने होते थे और नये निर्देश वही कंकाल मुझे देता था। मुझे कभी पता नहीं लग पाया कि मैं किसके लिये काम कर रहा हूं।
एक बार मुझे पता लग गया कि वे कागज़ात कैसे होते थे। वे देश के वैज्ञानिक व तकनीकी क्षेत्रों के गुप्त दस्तावेज़ होते थे। मुझे लगा कि यह कोई विदेशी षडयन्त्र है अत: मैंने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। 

इसके जवाब में उन्होंने मुझे कुछ ऐसे कागजात दिखाये जिससे मुझे इस कार्य में लिप्त होने का पता चलता था। वे मेरे विरुद्ध ठोस सुबूत थे। उन्होंने धमकी दी कि यदि मैंने वह काम छोड़ दिया तो ये सुबूत पुलिस तक पहुंच जायेंगे अत: एक बार फिर विवश होकर मैं उनका कार्य करने लगा। अब तक मेरे पास काफी धन हो गया था। मैंने पुरानी नौकरी छोड़ कर स्वयं एक कम्प्यूटर कम्पनी खोल ली और जल्द ही मेरा बिजनेस जम गया। अपने बिजनेस के साथ साथ मैं देश के दस्तावेज़ों को भेजने के कार्य में लिप्त था। यह तो थी मेरी कहानी।’’ रामदयाल कुछ पलों के लिये मौन हो गया।

‘‘तो तुम यह नहीं बता सकते कि किसके लिये तुम कार्य कर रहे हो।’’ सुंदरम ने कहा।

‘‘हाँ। मैं यह नहीं जानता। मैंने कई बार यह जानने की कोशिश की। उस कंकाल का पीछा भी किया किन्तु नाकाम हुआ। अंतिम बार मुझे सख्त चेतावनी दी गयी फिर मैंने यह प्रयास करना छोड़ दिया।’’

‘‘खोका से तुम्हारा सम्पर्क किस प्रकार हुआ?’’

‘‘यह राहुल के मेरे पास आने के बाद की बात है। जब मुझे काले च’मे और लम्बी कैप में एक व्यक्ति मिला। उसने कहा कि मेरे बॉस से उसने कुछ अनुबंध् किया है। वह कुछ कागजात देगा जिसके बदले में उसका बॉस किसी प्रकार से गृहमन्त्री की हत्या करायेगा। उसने यह भी बताया कि वह खोका संगठन का कार्यकर्ता है। मैंने जब ये सन्देश कंकाल को दिया तो उसने कहा कि वह व्यक्ति सही कह रहा था।

उसके बाद मुझे सन्देश मिला कि मुझे कुछ पेटियां एक मकान के तहखाने में पहुंचानी होंगी। मुझे बाद में मालूम हुआ कि वह मकान गिरधारीलाल का था। यह पेटियां मुझे गुप्त रूप से वहाँ पहुंचानी थीं। इस प्रकार कि मकान में रहने वालों को भी न पता चले कि वहाँ कोई सामान पहुंचाया गया है। जब मैं यह कार्य कर चुका तो मुझे आदेश मिला कि गिरधारीलाल से कहकर राहुल को वह मकान दिला दिया जाये। चूंकि वह मकान कई सालों से खाली पड़ा है अत: गिरधारीलाल उसे देने से इंकार नहीं करेगा। उस समय तक गृहमन्त्री की हत्या हो चुकी थी और साथ ही खोका का नाम भी आ चुका था। --- अ एक गिलास पानी मिल सकता है?’’ रामदयाल का बोलते बोलते गला सूखने लगा था। सुंदरम ने एक सिपाही को पानी लाने को कहा।   

No comments: