Sunday, August 22, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 61

‘‘क्या तुम्हें यह पता करना है कि रामदयाल कहाँ गया था?’’ जग्गू ने राहुल से पूछा।
‘‘हाँ। तुमने रात को तो कुछ बताया ही नहीं। अब इस समय बता दो।’’ राहुल ने कहा।
‘‘बताने की क्या आवश्यकता है। आज तुम स्वयं देख लेना। ठीक नौ बजे आज रात को तैयार रहना। मैं तुम्हें वहाँ ले जाऊंगा।’’

फिर आठ बजे तक जग्गू घर से गायब रहा। अभी तक राहुल नहीं समझ पाया था कि जग्गू किस पृकृति का आदमी है। वह राहुल के लिये जेल से फरार हुआ था और अब राहुल को फंसाने वाले की खोज कर रहा था। जबकि इससे पहले उन दोनों की कोई जान पहचान नहीं थी। इसके बदले में उसने राहुल से कुछ नहीं चाहा था। जब आठ बजे जग्गू घर आया तो उसने राहुल से तुरंत तैयार होने के लिये कहा।
‘‘वही ड्रेस पहन लेना जो कल रात को पहनी थी।’’ उसने कहा और स्वयं भी तैयार होने लगा।

फिर थोड़ी देर बाद वे लोग काले वस्त्रों में बाहर निकल रहे थे। बाहर एक कार खड़ी थी। जग्गू राहुल को लेकर उसके पास जाने लगा।
‘‘यह कार किसकी है?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘मेरे एक दोस्त की है। जहाँ हमें जाना है वहाँ तक पैदल या आटो रिक्शे द्वारा नहीं जाया जा सकता।’’ जग्गू ने जवाब दिया। वे लोग कार की अगली सीट पर बैठे और जग्गू ने कार स्टार्ट कर दी। कार अपना रास्ता तय करने लगी।

लगभग बीस मिनट चलने के बाद कार ने आबादी छोड़ दी थी और अब राजनगर की सीमा के पास आ गयी थी। यहाँ पर सड़क के दोनों ओर पेड़ों के झुण्ड किसी जंगल का आभास दे रहे थे। फिर जग्गू ने कार कच्चे रास्ते पर मोड़ दी और उसे जंगल में दूर तक लेता गया। फिर एक झाड़ी के पीछे ले जाकर उसने कार रोक दी। यह झाड़ी इतनी ऊंची थी कि उसमें कार पूरी तरह छुप गयी थी। कार का इंजन बन्द करने के बाद वे लोग नीचे उतर आये। 
‘‘अब कहाँ चलना है?’’ राहुल ने पूछा।

‘‘अब यहीं बैठकर प्रतीक्षा करेंगे।’’ जग्गू ने कहा।
‘‘किसी प्रतीक्षा?’’
‘‘रामदयाल की। अभी वह आता ही होगा।’’ जग्गू ने कहा।

लगभग आधे घण्टे की प्रतीक्षा के बाद एक कार की आवाज़ सुनाई दी।
‘‘वह आ गया।’’ जग्गू बोला।
‘‘किन्तु वह इस सुनसान स्थान पर करेगा क्या?’’ राहुल ने पूछा।

‘‘अभी तुम स्वयं देख लोगे। मेरे साथ आओ। यह ध्यान रखना कि रामदयाल को हमारा ज़रा भी आभास न हो वरना सारे किये पर पानी फिर जायेगा।’’ जग्गू ने राहुल का हाथ पकड़ा और एक ओर बढ़ने लगा। अँधेरे और झाड़ियों ने उन्हें पूरी तरह अपने में छुपा रखा था।

फिर उन्हें कार दिख गयी और उसके पास खड़ा व्यक्ति भी। जिसकी अँधेरे में केवल छाया सी विदित हो रही थी।
‘‘क्या यही रामदयाल है?’’ राहुल ने फुसफुसाकर पूछा।
‘‘हाँ। अब चुप रहो।’’ जग्गू ने जवाब दिया।

अब वह व्यक्ति जिसके हाथ में एक थैला था, पगडंडी पर जाने लगा था। लगभग डेढ़ दो सौ मीटर दूरी रखकर इन्होंने उसका पीछा करना आरम्भ कर दिया।
कुछ दूर चलने के बाद वह व्यक्ति एक पुराने कब्रिस्तान में प्रविष्ट हो गया।

‘‘क्या तुम पेड़ पर चढ़ सकते हो?’’ जग्गू ने राहुल से पूछा।
‘‘हाँ। क्यों नहीं। गाँव का तो एक बच्चा भी पेड़ पर चढ़ना जानता है।’’ राहुल बोला। ये लोग फुसफुसाकर बात कर रहे थे।
‘‘तो आओ। इस पेड़ पर चढ़ते हैं। अभी यहाँ एक अनोखा दृश्य दिखाई देगा।’’ जग्गू ने कब्रिस्तान के पास एक पेड़ चुना और उसपर चढ़ने लगा। राहुल भी उसके पीछे पीछे ऊपर चढ़ने लगा। ऊपर चढ़ने पर राहुल को मालूम हुआ कि जग्गू ने यह पेड़ क्यों चुना था। अब तक निकल चुके चाँद की रौशनी में यहाँ से कब्रिस्तान का प्रत्येक भाग स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

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