Sunday, August 15, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 59

रात के दो बज रहे थे जब राहुल और जग्गू रामदयाल के मकान के पास पहुंचे। इस समय ये लोग ऊपर से नीचे तक काले वस्त्रों में थे और जेब में एक एक नकाब रखा हुआ था। इन वस्त्रों की व्यवस्था जग्गू ने की थी। नकाब इसलिये था ताकि यदि रामदयाल जाग जाये तो वह राहुल को पहचान न सके।

मकान की सारी लाईटें बुझी हुई थीं जिसका मतलब था कि इस मकान के सभी निवासी गहरी नींद सो रहे हैं। ये लोग घूमकर मकान के पीछे पहुंचे।
‘‘दीवारें तो काफी ऊंची हैं। और उनपर शीशे भी लगे हैं। हम लोग ऊपर कैसे पहुंचेंगे?’’ राहुल ने कहा।
‘‘कोई न कोई तरकीब भिड़ानी पड़ेगी।’’ जग्गू ने दीवार का निरीक्षण करते हुए कहा। इससे पहले कि वह कोई तरकीब ढूंढता, मकान के एक भाग की लाइट जल उठी।

‘‘लगता है कोई जाग गया है।’’ राहुल बोला।
‘‘कमाल है। हमने तो कोई आवाज भी नहीं की, फिर वह कैसे जाग गया?’’ जग्गू ने कहा।
‘‘हो सकता है रामदयाल कहीं जा रहा हो। मैंने बताया था कि वह अक्सर रातों को फोन सुनकर कहीं निकल जाता है।’’

‘‘आओ मकान के आगे की ओर चलते हैं। यदि वह कहीं जा रहा होगा तो मालूम हो जायेगा।’’
फिर वे लोग मकान के सामने पहुंचकर दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगे।
‘‘यदि रामदयाल बाहर चला गया तो हमें तलाशी लेने में आसानी हो जायेगी।’’
‘‘मैं कुछ और सोच रहा हूं। यदि मुझे मौका मिला तो मैं यह देखने का अवश्य प्रयास करूंगा कि रामदयाल कहां जाता है।’’ 
‘‘वह किस प्रकार?’’
‘‘बस देखते रहो।’’ जग्गू ने कहा।

थोड़ी देर बाद रामदयाल बाहर निकलता दिखाई दिया। वह गैरेज के पास गया और वहां से कार निकालने लगा।
‘‘यदि मुझे मौका मिला तो मैं कार में सवार हो जाऊंगा। उस दशा में तुम यहीं रुककर मेरी प्रतीक्षा करना।’’ जग्गू ने कहा।
फिर जल्दी ही उसे मौका मिल गया। रामदयाल कार बाहर खड़ी करके गेट बन्द करने लगा। इतनी देर में जग्गू छिपते छिपाते कार के पिछले दरवाजे पर पहुंच गया। संयोग से दरवाजा लॉक नहीं था। उसने धीरे से दरवाजा खोला और पिछली सीट के नीचे दुबक गया। रामदयाल को कोई आभास न हो सका।

वह गेट बन्द करने के बाद कार में आ बैठा और कार स्टार्ट कर दी। कुछ ही देर में कार राहुल की नजरों से ओझल हो गयी।
अब राहुल को यहां प्रतीक्षा करनी थी। वह एक अँधेरे कोने में दुबक गया। उसका दिल जोरों से ध्ड़ाक रहा था। यदि कोई व्यक्ति उसे यहाँ देख लेता तो उसके पास अपनी सफाई देने के लिये कोई विकल्प नहीं था। उसके वस्त्र और खड़े होने का संदिग्ध् अंदाज बिना सन्देह उसे अपराधी घोषित कर देते।

राहुल को वहाँ खड़े हुए काफी समय बीत गया। फिर लगभग डेढ़ घण्टे की जानलेवा प्रतीक्षा के बाद रामदयाल की कार आती दिखाई दी।
‘पता नहीं जग्गू उसमें है या नहीं।’ राहुल बड़बड़ाया। फिर जब कार काफी पास आ गयी तो राहुल ने जग्गू को कार की डिक्की के साथ चिपके देखा। जब रामदयाल गेट खोलने लगा तो जग्गू धीरे से नीचे उतरकर अँधेरे की ओर खिसकने लगा। राहुल की आँखें चूंकि अँधेरे की अभयस्त हो गयी थीं अत: वह जग्गू को देख पा रहा था किन्तु जग्गू को राहुल नहीं दिखाई पड़ रहा था।

फिर जब रामदयाल की कार अन्दर पहुंच गयी तो राहुल जग्गू के पास आया।
‘‘तुम कहाँ थे? मैं तो सोच रहा था कि किसी ने तुम्हें यहाँ तो नहीं देख लिया।’’ जग्गू ने राहुल को देखकर कहा।
‘‘किस्मत अच्छी थी कि कोई इधर नहीं आया। क्या कुछ पता चला रामदयाल के बारे में?’’
‘‘काफी कुछ। आओ अब वापस चलते हैं।’’ जग्गू बोला।
‘‘क्या अन्दर तलाशी नहीं लोगे?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘अब उसकी आवश्यकता नहीं। जो कुछ मालूम करना था मालूम हो चुका।’’ जग्गू ने राहुल का हाथ पकड़ा और वे लोग वापस जाने के लिये कदम बढ़ाने लगे।
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2 comments:

PD said...

वाह.. लगता है अगले भाग में मजा आएगा.. :)

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

मजेदार।
………….
इसे पढ़कर आपका नज़रिया बदल जाएगा ।