Friday, July 30, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 54

‘‘तो वह भोजन आपको वहां नहीं मिला?’’ सुंदरम ने इंचार्ज से पूछा।
‘‘जी हाँ। इसी आधार पर मैं सोच रहा हूं कि उन कैदियों की बात शायद सच थी।’’
‘‘यह भी हो सकता है कि उन कैदियों ने स्वयं वह भोजन गायब कर दिया हो। अपनी बात को सच्चाई में बदलने के लिये।’’ इं-त्यागी ने कहा।

‘‘हो सकता है। किन्तु उसका कोई कारण नहीं दिखायी पड़ रहा है। उनका उद्देश्य वहां से फरारी था और वह पूरा हो गया था।’’ सुंदरम ने कहा।
फिर जोगासिंह अन्दर प्रविष्ट हुआ। दोनों सिपाही उसके दोनों ओर थे।

‘‘जोगासिंह, जब तुमने भोजन उठाया, उस समय क्या अमिताभ बच्चन बंधा पड़ा था?’’ सुंदरम ने पूछा।
‘‘हाँ। जी क्या पूछा आपने?’’ जोगासिंह ने गड़बड़ा कर कहा।
‘‘मुझे जो पूछना था पूछ चुका। और मुझे उसका जवाब भी मिल गया। अब तुम यह बताओ कि किसके कहने पर तुमने भोजन में जहर मिलाया था?’’ सुंदरम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

‘‘क--क्या कह रहे हैं आप। मैंने किसी भोजन में जहर नहीं मिलाया है।’’
‘‘दो बातें ऐसी हैं जो तुम्हारी बात को झूठा सिद्ध करती हैं।’’ सुंदरम ने कठोर स्वर में कहा, एक तो यह कि कैदियों को उनकी कोठरी में भोजन नहीं पहुंचाया जाता जब तक कि वे बीमार न हों। और दूसरे अभी तुमने स्वयं स्वीकार किया कि भोजन तुमने वहाँ से उठाया था। यदि तुम्हारे दिल में चोर न होता तो पहरेदार के बंधे होने का हाल तुम सब को बता देते। अब तुम मेरी बात का जवाब दो । वरना तुम भी पुलिस के आदमी हो और जानते हो कि पुलिस की थर्ड डिग्री कैसी होती है।’’

जोगासिंह ने सर झुका लिया फिर कुछ देर बाद बोला, ‘‘वह मुझे ब्लेक मेल कर रहा है।’’
‘‘कौन है वह?’’ इं-त्यागी ने पूछा।
‘‘पता नहीं। मैंने आजतक उसका चेहरा नहीं देखा। वह सदैव काला चश्मा और लंबी टोपी पहने रहता है। और सदेव ढीले ढाले लिबास में रहता है।’’

‘‘वह तुम्हें कहां मिलता है?’’
‘‘कहीं पर भी। जब उसे मिलना होता है तो वह पहले से बता देता है और समय आने पर मैं उससे मिल लेता हूं।’’
‘‘इस बार वह कहां मिला था?’’ सुंदरम ने पूछा।
‘‘पास ही की एक इमारत में।’’ उसने इमारत के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘हल्के हरे रंग की दो मंजिला है वह। वह मुझे इमारत के गेट पर मिला था।’’

‘‘वह तुम्हें किस कारण से ब्लैक मेल कर रहा है?’’ इं-त्यागी ने पूछा।
जोगासिंह कुछ पलों के लिये मौन हो गया। उसे यह बताने में हिचकिचाहट हो रही थी।

‘‘ठीक है। तुम न बताना चाहो तो न बताओ।’’ सुंदरम ने कहा, ‘‘हम तुम्हें आजाद कर रहे हैं। इस बार यदि वह व्यक्ति मिले तो उसे बता देना कि तुमने वह भोजन गायब कर दिया और वह कैदी जहर से नहीं मरे बल्कि फरार हो गये।’’
‘‘जो आज्ञा सर। मैं वही करूंगा जो आप कहेंगे।’’ जोगासिंह की आँखों में प्रसन्नता के भाव थे।

‘‘और फरार होने की कोशिश मत करना। यह तुम्हारे ही हक में बुरा होगा।’’ सुंदरम ने कहा।
‘‘कोई सवाल ही नहीं पैदा होता सर। मैं आपकी बात समझता हूं।’’ जोगासिंह ने कहा। सुंदरम ने उसे जाने का संकेत किया।

उसके जाने के बाद सुंदरम ने इं-त्यागी से कहा, ‘‘तुम थानेदार से कहकर इसके पीछे सादी वर्दी में कुछ लोगों को लगा दो। वे ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जिन्हें ये पहचानता न हो।’’
‘‘ठीक है मि0सुंदरम’’, इं-त्यागी ने कहा और वहाँ से उठ गया। वह स्वयं जाकर थानेदार से कहना चाहता था।
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2 comments:

Shah Nawaz said...

काफी उत्सुकतापूर्ण कहानी लगती है..... बहुत खूब!

लगता है पीछे से पूरी पढनी है पढेगी और आगे की कड़ियों का इंतज़ार रहेगा.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...


‘तस्लीम’ के आँदोलन में सहभागिता के लिए आभार।