Sunday, July 25, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 53

‘‘लगता है, उसे विश्वास हो गया था कि अब वह सजा से बच नहीं पायेगा। अत: वह फरार हो गया।’’ इं-त्यागी बोला।
‘‘हूं।’’ सुंदरम ने जवाब में केवल एक हुंकार भरी। वह कुछ सोच रहा था। फिर इं-त्यागी भी मौन हो गया। और बाकी रास्ता खामोशी से तय हुआ।

जब वे जेल पहुंचे तो वहाँ काफी अफरा तफरी मची हुई थी। सभी पहरेदारों के चेहरे उतरे हुए थे। लगता था कैदियों की फरारी के लिये उनपर जमकर लताड़ पड़ी है।
सुंदरम और इं-त्यागी सीधे कैदियों के इन्चार्ज के रूम में पहुंचे। वह इन्हें देखकर खड़ा हो गया और इन्हें बैठने का संकेत किया।

‘‘राहुल के साथ के दूसरे कैदी का क्या नाम था? और वह किस जुर्म में यहाँ आया था?’’ जी-सुंदरम ने पूछा।
‘‘उसका नाम जग्गू था। डी-आई-जी- के घर में चोरी करते घुसा था। डी-आई-जी- ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था।’’ इन्चार्ज ने बताया।

‘‘मैं उस पहरेदार से मिलना चाहता हूं जो वहाँ तैनात था।’’
इन्चार्ज ने एक सिपाही को संकेत किया, ‘‘जाओ अमिताभ बच्चन को यहाँ ले आओ।’’
‘‘नाम तो बड़ा शानदार है।’’ सुंदरम ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘‘हाँ। अपनी अपनी सनक होती है। नाम रखने की भी।’’ इन्चार्ज के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी।

थोड़ी देर बाद रोनी सूरत बनाये हुए पहरेदार आ गया। इस समय वह वर्दी में नहीं था।
‘‘तुम्हारी वर्दी कहाँ गयी?’’ सुंदरम ने पूछा।
‘‘वही साले उल्लू के पट्‌ठे ले गये। आज तक कोई मेरे होते हुए फरार की हिम्मत नहीं कर सका था। यह पहला मौका है।’’ उसने क्रोधित स्वर में  कहा।

‘‘यह बताओ, यह जहर का क्या किस्सा है? उन्होंने तुमसे क्या कहा था?’’
पहरेदार खाने में जहर की कहानी सुनाने लगा। केवल यह छुपाकर कि उसी ने कोठरी का ताला खोला था, सारी बातें बता दीं।
‘‘तुमने स्वयं देखा था मरा हुआ चूहा?’’
‘‘जी हाँ। इसीलिये तो मैंने उसकी बातों पर विश्वास  कर लिया।’’

‘‘क्या तुम्हें विश्वास है कि चूहा भोजन से मरा था। हो सकता है उन्होंने उसे पकड़ कर मार डाला हो। उसके शरीर पर जख्म के निशान थे?’’ सुंदरम ने पूछा।
‘‘इतना तो मैंने ध्यान नहीं दिया। किन्तु मेरा विचार है कि वह जख्मी नहीं था।’’ पहरेदार ने अपने मस्तिष्क पर गौर करते हुए कहा।

‘‘जोगा सिंह कहाँ है? उसी ने शायद वहाँ भोजन दिया था।’’
‘‘उसे हिरासत में ले लिया गया है। मैं उसे भी यहाँ बुलाता हूं।’’ इन्चार्ज ने फिर सिपाही को संकेत किया। वह सिपाही बाहर निकल गया।  

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