Wednesday, July 21, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 51

‘‘अरे ओ अमिताभ बच्चन जी, जरा इधर आईए।’’ जग्गू ने पुकारा और पहरेदार पास आ गया।
‘‘अब क्या है मैंने कह तो दिया कि मैं अपनी पत्नी को स्वयं देख लूंगा।’’
‘‘अरे तुम अपनी पत्नी को देखते रहो। जीवन भर सामने बिठाकर देखते रहो। मेरी क्या बदनामी होगी। मैंने तो तुम्हें वह चूहा दिखाने के लिये बुलाया था।’’ जग्गू ने मरे पड़े चूहे की ओर संकेत किया।

‘‘क्यों? क्या हुआ उस चूहे को?’’ पहरेदार ने फाड़ खाने वाले भाव में पूछा।
‘‘मर गया है। मैंने अपने भोजन में से उसे थोड़ा सा अण्डा खिला दिया था। बेचारा पचा नहीं पाया ओर वहीं लंबा हो गया।’’

‘‘तो इस बारे में मैं क्या कर सकता हूं?’’
‘‘अब भी नहीं समझे। तभी तो तुम हेड पहरेदार नहीं बन पा रहे हो। मेरा मतलब है कि हमारे खाने में जहर मिला हुआ है।’’

‘‘ज--जहर! क्या बक रहे हो तुम? भला यहां जहर कहां से आ गया।’’
‘‘तुम्हीं लाये हो। तुम्ही ने हमारे खाने में जहर मिलाया और अब जबरदस्ती हमें खिलाना चाहते हो।’’
‘‘क्या कह रहे हो? मैं कहां तुम्हारे लिये भोजन लाया। मैं तो केवल पहरेदारी करता हूं। भोजन तो जोगासिंह लाया था।’’

‘‘कोई भी लाया हो। मैं तो अब चिल्ला चिल्लाकर सब लोगों को एकत्र करूंगा और कहूंगा कि अमिताभ बच्चन ने हमारे भोजन में जहर मिला दिया। तुम्हें मैं नौकरी से हटाकर रहूंगा।’’ जग्गू ने आँखें तरेरते हुए कहा।
‘‘ल--लेकिन मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। अगर मेरी नौकरी चली गयी तो मेरे बच्चों का क्या होगा!’’ पहरेदार के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी थीं। 

‘‘अगर तुम एक काम कर दो तो मैं तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचाऊंगा।’’
‘‘वह क्या?’’
‘‘तुम इस कोठरी का ताला खोल दो और हमें चुपचाप निकल जाने दो।’’ जग्गू ने धीरे से कहा और वह उछल कर दो तीन कदम पीछे हट गया।

‘‘न--नहीं! यह मुझसे नहीं हो सकता।’’
‘‘सोच लो। फिर मैं शोर मचाकर सबको बुलाने जा रहा हूं।’’ जग्गू ने चीखने के लिये मुंह खोला। पहरेदार ने जल्दी से हाथ उठाकर उसे रोका।

‘‘मेरे ऊपर रहम करो।’’ वह गिड़गिड़ाया, ‘‘यदि मैंने तुम्हें जाने दिया तो मेरी नौकरी चली जायेगी।’’
‘‘ऐसा नहीं होगा। हम यहाँ से जाने से पहले तुम्हें बेहोश करके तुम्हारे हाथ पैर बाँध् देंगे तब तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। और फिर यहां से जाने के बाद मैं तुम्हारा एक काम मुफ्त में कर दूंगा। अर्थात तुम्हें रामकली को लल्लू के साथ दिखा दूंगा।’’

‘‘ठीक है।’’ पहरेदार ने ठण्डी साँस मारकर कहा, ‘‘मैं तुम्हें आजाद कर रहा हूं।’’
वह कोठरी का ताला खोलने लगा। जैसे ही उसने दरवाजा खोला, जग्गू ने उसकी गुद्दी पर एक जोरदार घूंसा जड़ दिया और वह वहीं पट से गिर गया। इस समय बगल की कोठरियों के सभी कैदी सो रहे थे और गश्त पर रहने वाले पहरेदार भी सर्दी के कारण कहीं बैठे हुए अलाव सेंक रहे थे। इस प्रकार इस ओर पूरी तरह सन्नाटा छाया था। 

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