Saturday, June 26, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 44

‘‘मैं किसी भी प्रकार का गुण्डा नहीं हूं। मेरा नाम राहुल है ओर मैं एक सीधा सादा आदमी हूं। गाँव से यहाँ नौकरी की तलाश में आया था और यहाँ आकर इस झंझट में फंस गया।’’
‘‘ओह! च--च। यह तो बड़ी ट्रेज्डी हुई। मेरे साथ भी एक बार बहुत बड़ी ट्रेज्डी हुई थी। एक बार मैं एक महिला का पर्स झपटने की ताक में उसके पीछे लगा हुआ था, इतने में उसकी साड़ी में मेरा पैर फंस गया। उसने शोर मचा दिया कि यह मुझे छेड़ रहा है। फिर तो लोग जूते लेकर मेरे पीछे पिल पड़े। अब बताओ कि मैंने जो गलती की नहीं थी उसी पर मुझे सजा मिल गयी। मेरा विचार है कि तुमने भी कोई जुर्म नहीं किया है जिसकी सज़ा तुम्हें मिल रही है।’’ वह व्यक्ति हर सवाल के जवाब में लंबा बोलने का आदी था।

‘‘हाँ। बात तो यही है।’’ राहुल ने ठंडी साँस लेकर कहा।
‘‘तो फिर मुझे भी बताओ कि तुम्हारे साथ क्या घटना घटी।’’
राहुल विस्तार से उसे बताने लगा कि किस प्रकार वह खोका के चक्कर में फंस गया है। जग्गू ध्यान से उसकी कहानी सुन रहा था। बीच बीच में वह कुछ प्रश्न भी करता जा रहा था जिसका जवाब राहुल दे रहा था।

जब वह अपनी कहानी समाप्त कर चुका तो जग्गू ने कहा, ‘‘तुम्हारे जैसे सीधे सादे लोग पता नहीं क्यों गाँव छोड़कर शहर आ जाते हैं। यह तो वही बात हुई कि स्वर्ग छोड़कर नर्क में आ बसना। अरे भाई मनुष्य को जीवित रहने के लिये तीन चीजों की जरूरत होती है। स्वच्छ वायु, ठंडा पानी और ताजा भोजन और यह तीनों वस्तुएं गाँव में कहीं अधिक मिलती हैं। शहर किसलिये आते हो? हवा के नाम पर गाड़ियों का धुवां । पानी के नाम पर सीवर का कृत्रिम स्वच्छता का पानी, भोजन के नाम पर मिलावटें। अब यदि शहर आ ही गये हो तो कुछ अक्ल भी इस्तेमाल किया करो। जब तुमने भूत देखे तो या तो वह मकान छोड़ देते या अच्छी प्रकार से दिन में उस कमरे की तलाशी लेते। पुलिस भी इतनी बुद्धिहीन है कि उसे यह नहीं पता कि अपराधी अपने ही घर में खुले रूप में हथियार नहीं रखेगा और न यह बतायेगा कि उस कमरे में भूत हैं। यदि तुम भूत की बात न बताते तो वह तहखाना भी पुलिस कभी खोज न पाती। और तुम पुलिस को देखकर डर भी गये। तुम्हें सीना तानकर साफ मुकर जाना चाहिए था कि तुम्हें इन वस्तुओं के बारे में कुछ नहीं पता।’’

‘‘मैं तो बुद्धू हूं ही किन्तु आप यहाँ कैसे फंस गये?’’ राहुल ने झल्लाहट भरे स्वर में कहा।

‘‘अरे मेरा क्या है। मैं कोई शरीफ आदमी तो हूं नहीं। मेरे लिये जैसा घर वैसी जेल। मेरे लिये तो यहाँ भी वही आराम है जैसा कि घर में होता है। अभी देखो मेरा कमाल।’’ जग्गू ने कहा और कोठरी की सलाखों वाले दरवाजे के पास जाकर खड़ा हो गया।

‘‘ऐ -- हुश --हुश !’’ उसने धीरे से दूर खड़े पहरेदार को बुलाया जो दीवार से टेक लगाये ऊंघ रहा था। वह पहरेदार चौंक पड़ा और उसके पास आया।
‘‘क्या बात है।’’ उसने गुर्राते हुए कहा।

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