Thursday, June 24, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 43

राहुल की कोठरी में अब तक कोई अन्य कैदी नहीं आया था। उसने एक बार रामदयाल से सम्पर्क करने की कोशिश की किन्तु पता चला वह अभी बाहर से आया नहीं। उसे आशा थी कि रामदयाल उसकी जमानत करा लेगा। वह उठकर टहलने लगा।

‘समझ में नहीं आता कि गाँव यह खबर कैसे भेजूं। वहाँ तो लोग यह समझ रहे होंगे कि राहुल शहर में कमाने गया है और यहाँ राहुल जेल में पड़ा है। गाँव के लोग तो यही समझते हैं कि शहर जाते ही व्यक्ति बहुत बड़ी नौकरी पा जाता है जबकि वह व्यक्ति शहर के छोटे होटलों में जूठे बर्तन माँज रहा होता है।’ उसकी तन्द्रा भंग हो गयी क्योंकि दो सिपाही किसी कैदी को लेकर अन्दर आ रहे थे।
हालांकि डील डोल से वह कोई बॉडी बिल्डर लगता था किन्तु इस समय वह दोनों सिपाहियों के बीच में झूलता हुआ चल रहा था और यदि सिपाहियों ने उसकी भुजा न पकड़ रखी होती तो वह शायद वहीं गिर पड़ता। साथ ही साथ वह कुछ बड़बड़ाता भी जा रहा था। जब वह कुछ पास आया तो राहुल को उसकी बड़बड़ाहट स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी।

‘‘हाय--हाय, उन कमबख्तों ने इतना मारा कि चला भी नहीं जा रहा है। अरे माना कि तुम पुलिस वाले हो और तुम्हें हम लोगों को मारने का अधिकार है। किन्तु ऐसा भी क्या मारना कि जैसे किसी भैंसे को भैंसा गाड़ी में जोत कर उसके जैसी हालत बना दी जाये। हाय हाय लगता है एक एक हड़डी अलग होकर भजन कर रही है। भगवान ही समझेगा तुम पुलिस वालों से, तुम केवल अपनी पत्नियों के सामने भीगी बिल्ली बनते हो---।’’ उसकी लगातार चलने वाली जबान उस समय बन्द हुई जब पुलिस वालों ने कोठरी का दरवाजा खोलकर उसे अन्दर ध्क्काा दे दिया। वह लड़खड़ाता हुआ सीधे सामने की दीवार सें जा टकराया और फिर आँख बन्द करके वहीं पसर गया।

सिपाही कोठरी में पुन: ताला लगाकर वापस चले गये। कुछ देर वह उसी प्रकार पड़ा पड़ा कराहता रहा, राहुल उसे ध्यान से देख रहा था। फिर उसने एक आँख खोलकर चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और राहुल को देखकर उसने अपनी दोनों आँखें खोल दीं और उछल कर खड़ा हो गया।
‘‘क्या तुम्हें अधिक चोटें आयीं हैं?’’ राहुल ने पूछा।

‘‘अरे जग्गू को कौन मार सकता है। मैं तो बहाना कर रहा था। इन पुलिस वालों से बचने के लिये तो बस मुट्‌ठी गर्म होनी चाहिए। वैसे आप कौन महाशय हैं? मैं तो समझ रहा था कि मैं यहाँ अकेला पड़ा पड़ा बोर होता रहूंगा किन्तु पुलिस वाले मेरा काफी ख्याल रखते हैं। जब मैं पिछली बार आया था तो क्या ठाठ थे। जैसे कोई बादशाह अपने महल में रह रहा हो। वैसे इससे तुम यह अनुमान न लगा लेना कि जग्गू कई बार पकड़ा जा चुका है। यह दूसरा मौका है जब मैं पुलिस के हाथ लगा हूं। अपने इलाके का थानेदार तो बहुत सीधा है जो कुछ भी दे देता हूं ले लेता है, किन्तु इस बार मेरी ही गलती थी जो डी-आई-जी- के यहाँ पहुंच गया। फिर तो थानेदार की मजबूरी हो गयी कि वह मुझे पकड़कर बन्द कर दे।’’ उस व्यक्ति को लगता था कि बोलने की बीमारी है। उसकी सुपर फास्ट इस समय इसलिये रुकी कि उसके गले में कुछ फंस गया था और अकस्मात उसे खांसी आ गयी थी।

‘‘तो तुम्हारा नाम जग्गू है।’’ राहुल बोला।
‘‘जी हाँ। मैं जग्गू हूं। वैसे मेरा असली नाम कुछ और है किन्तु प्यार से लोग मुझे जग्गू कहते हैं। जग्गू दादा के नाम से मैं काफी प्रसिद्ध हूं। वैसे आप कौन से साहब हैं? मुझे तो नहीं लगता कि आप इस शहर के कोई पेशेवर गुण्डे हैं।’’ उसने राहुल के चेहरे को गौर से देखते हुए कहा।

1 comment:

सर्प संसार said...

तरंगों का असर देख रहे हैं हम।
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क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।