Sunday, June 20, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 42

‘‘मि०शोरी, हम आपके डायरेक्टर से मिलना चाहते हैं। आप उनका पता दे दीजिए।’’
‘‘जी हाँ, जरूर। मैं उनका पता दे देता हूं। आप उनसे केवल आज ही मिल सकते हैं। क्योंकि वे कल आस्ट्रेलिया वापस जा रहे हैं।’’

इं-त्यागी और सुंदरम ने एक दूसरे की ओर देखा। क्योंकि उन्हें शोरी ने डायरेक्टर की आज्ञा के विरुद्ध सच्ची बात बता दी थी। इं-त्यागी ने उससे पता लिया ओर वे बाहर आ गये।
‘‘इसका मतलब ये हुआ कि शोरी को यह पता है कि काल टेप हो रही है। इस प्रकार वह और संदिग्ध हो गया है।’’

‘‘लेकिन यदि वह वास्तव में मुजरिम है तो उसने यह क्यों प्रकट किया कि उसकी काल टेप हो रही है? उसे तो अपने को इन सब मामलों से अलग रखना चाहिए था। यानि उसे अपने को इस प्रकार प्रकट करना चाहिए था मानो उसे मालूम ही नहीं है कि उसकी काल टेप हो रही है।’’
‘‘इस प्रकार मैं यह सोचने पर मजबूर हूं कि उसने हमें जो सच्ची बात बतायी है उसके पीछे कोई और कारण है।’’

‘‘वह कारण क्या हो सकता है?’’ इं-त्यागी ने पूछा।
‘‘हो सकता है किन्हीं कारणों से वह अपने डायरेक्टर के विरुद्ध हो गया हो। यह भी हो सकता है कि उसकी कंपनी ने जुर्म किया हो और वह निर्दोष हो और अब चाहता हो कि कंपनी कानून के बंधन में आ जाये।’’
‘‘तो फिर उसे हमें पूरी तरह सहयोग देना चाहिए। उसे चाहिए कि वह हमें पूरी बात आकर बता दे।’’

‘‘इसमें उसकी कोई मजबूरी होगी। शायद कंपनी उसे ब्लैक मेल कर रही हो या कोई और बात हो।’’ सुंदरम ने कार एक मोड़ पर घुमाते हुए कहा।
‘‘अगर वह निर्दोष है तो उसकी पहली काल के बारे में आपका क्या विचार है?’’
‘‘उसमें भी ऐसी कोई बात नहीं कि हम उसे दोषी मानें। इसमें केवल उस फोन की गोपनीयता हमें शंकाग्रस्त कर रही है। इस काम में शोरी स्वयं कह रहा है कि उसे नही पता कि दीनानाथ और राहुल के बीच टक्कर क्यों करवाई गयी?’’

‘‘मेरा विचार है कि शोरी निर्दोष है किन्तु उसकी कंपनी दोषी हो सकती है। रहा उस काल का मामला तो जल्द ही पता चल जायेगा कि वह काल किसकी थी। मैं इसके बारे में सी-आई-डी के चीफ द्वारा मालूम करूंगा।’’
अब तक वे लोग बी-सी-ओ- के डायरेक्टर के मकान पर पहुंच चुके थे। इस समय मकान पर ताला लगा था। पूछने पर मालूम हुआ कि डायरेक्टर साहब आस्ट्रेलिया गये हुए हैं।
‘‘मि0त्यागी। आप थाने जाकर शोरी की अन्य कालों के बारे में जानकारी लीजिए। मैं डायरेक्टर साहब की कुछ देर यही रुककर प्रतीक्षा करूंगा।’’ जी-सुंदरम ने कहा।

इं-त्यागी वहाँ से चला गया जबकि सुंदरम ने डायरेक्टर की प्रतीक्षा के लिये मकान के पास एक ऐसा ढाबा चुना जहाँ से वह डायरेक्टर के बंगले के दरवाजे पर सीधे नज़र रख सकता था।
फिर समय बीतता गया। सुंदरम को ढाबे में बैठे रहने के लिये चाय की कई प्यालियां हलक से नीचे उतारना पड़ीं किन्तु डायरेक्टर साहब लगता था जैसे अपना मकान भूलकर कहीं और चले गये हों।

फिर उसे वहाँ बैठे हुए डेढ़ घंटा हो गया। अब उस छोटे से ढाबे में काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति उसे घूर घूरकर देख रहा था। फिर उन घूरती निगाहों की गरमी के कारण सुंदरम को उठ जाना पड़ा। वास्तव में उसे अपनी इस प्रतीक्षा का कोई फल नहीं दिखाई पड़ रहा था। उसने थाने फोन करके एक सिपाही को बुलाया जो कुछ देर में वहाँ पहुंच गया।
फिर सिपाही को बंगले की निगरानी पर छोड़कर वह वापस थाने पहुंच गया।

‘‘क्या हुआ? शोरी ने कोई अन्य काल की थी?’’ उसने इं-त्यागी से पूछा।
‘‘फिलहाल शोरी ने कोई विशेष काल नहीं की। दो तीन कालें की थीं किन्तु वे बिजनेस से सम्बंधित थीं।’’
‘‘ठीक है। तुम इसी पर लगे रहो। मैं कुछ देर के लिये लायब्रेरी जा रहा हूं। कुछ पुराने समाचार पत्र देखने हैं।’’
‘‘क्या उनसे केस पर कुछ प्रकाश पड़ने की आशा है?’’
‘‘शायद ।’’ सुंदरम ने कुर्सी से उठते हुए कहा।
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1 comment:

Maria Mcclain said...

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