Monday, June 7, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 37

राहुल लाकअप में पड़ा हुआ मन ही मन उस घड़ी को कोस रहा था जब उसने शहर आने का निर्णय लिया था।
‘इससे अच्छा तो अपना गाँव था। सब सीधे साधे लोग थे। अगर लड़ाई झगड़ा भी होता तो केवल लाठी डण्डों से सामने आकर। यहाँ तो ऐसा फंसे कि छूटने की कोई राह नहीं दिखाई दे रही है। यहाँ तो कोई जमानत भी नहीं करायेगा। सीधे जेल हो जायेगी, किसी को क्या पड़ी है कि मेरे फटठे में टाँग अड़ाये।’ मन ही मन वह सोच रहा था और कुढ़ रहा था।

पुलिस ने उसे जुर्म कबूलने के लिये रात में कई बार मारा पीटा था किन्तु उसे कुछ पता होता तब बताता। रात को उसे भोजन भी नहीं दिया गया था। अब उसकी आँतें भूख के कारण ऐंठ रही थीं।
कुछ देर बाद हवालात का दरवाजा खुला और एक सिपाही थोड़ा भोजन और पानी रख गया। भोजन क्या था दो सूखी रोटियां और पतली दाल । किन्तु राहुल को इस समय यही खाना स्वर्ग का पकवान मालूम हुआ। वह भोजन पर टूट पड़ा।

यदि मैं इस जंजाल से छूट गया तो कसम खाता हूं कि कभी दोबारा शहर का रुख नहीं करूंगा। वह बड़बड़ाया। उसने भोजन समाप्त किया और उठकर टहलने लगा। 
उसी समय इं-त्यागी दो तीन सिपाहियों के साथ आया, ‘‘तो तुमने क्या फैसला किया?’’ उसने पूछा। 
‘‘कैसा फैसला ?’’ राहुल ने पूछा। 

‘‘वही जो हम रात से समझाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि तुम अपने साथियों के बारे में बता दो तो हम वादा करते हैं कि तुम्हारे विरुद्ध कोई कार्यवाई नहीं की जायेगी।’’ इं-त्यागी बोला। 
‘‘इंस्पेक्टर साहब मैं सच कह रहा हूं। मेरा मुजरिमों से कोई सम्बन्ध् नहीं है। मैं बिल्कुल निर्दोष हूं। मैं तो गाँव से नौकरी की तलाश में आया था। मुझे क्या पता था कि शहर मेरे लिये मनहूस सिद्ध होगा। इंस्पेक्टर साहब मैं निर्दोष हूं। मुझे फंसाया गया है।’’ 

‘‘किसने तुम्हें फंसाया है? कौन तुम्हारा दुश्मन है यहाँ जो तुम्हें फंसायेगा?’’
‘‘मुझे नहीं पता कि मुझे किसने और क्यों फंसाया है। मेरा तो यहाँ कोई दुश्मन भी नहीं है।’’ राहुल ने दोनों हाथों से हवालात की सींखचें पकड़ रखी थीं। उसका चेहरा बिगड़ा हुआ था।
‘‘आज तुम्हें न्यायालय ले जाया जायेगा। तुम अपनी जमानत कराना चाहो तो उसका इंतिजाम कर लो वरना तुम्हें जेल भेज दिया जायेगा।’’

‘‘यहाँ कौन मेरी जमानत के लिये आयेगा। मैं तो अब भगवान भरोसे हूं।’’ राहुल ने निराशाजनक स्वर में कहा।
कुछ देर बाद उसे न्यायालय ले जाया गया। चूंकि उसने अपनी जमानत का कोई इंतिजाम नहीं किया था, अत: उसे वहाँ से जेल भेज दिया गया।
जेल में उसे जिस कोठरी में रखा गया था, उसमें अन्य कोई कैदी नहीं था।

‘तो अब मुझे अकेले रहना पड़ेगा। देखें मेरी किस्मत का क्या फैसला होता है। उस हवालात से तो छुट्‌टी मिली, वरना पुलिस की मार सहते सहते शायद मैं वहीं मर जाता।’ उसने सोचा।
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1 comment:

Arvind Mishra said...

लगता है कहानी अभी लम्बी खिचेगी !