Monday, April 26, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 23


वह गाँव का निवासी था और गाँव के अधिकतर लोगों की तरह भूत प्रेत में विश्वास रखता था। उसने स्वयं अपने कानों से इस प्रकार की कहानियाँ सुनी थीं और कहानियां सुनाने वालों ने विश्वास भी दिलाया था कि वे सच्चे किस्से सुना रहे हैं।

यह एक विडंबना ही कही जायेगी कि एक ओर तो कृत्रिम बुद्धि वाले कम्प्यूटर बनाये जा रहे हैं, मनुष्य द्वारा बनाये गये राकेट यान दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज कर रहे हैं, मेंढक से कबूतर और चूहे से छिपकली पैदा करने का प्रयोग हो रहे हैं तो दूसरी ओर इस युग में भी अनेकों लोग बरगद के भूत, कब्रिस्तान के प्रेत और इमली की चुड़ैल में बिना देखे ही अन्तर कर सकते हैं। इन भूतों को सबसे अधिक मानने वाले गाँव के वो लोग होते हैं जो दो जून की रोटी और किसी का कर्जा उतारने के लिये खेतों में जान तोड़ मेहनत करते करते स्वयं भूत बन जाते हैं।

इन लोगों में यदि रात को बाग में सोया कोई व्यक्ति स्वप्न देखते हुए करवट बदलते समय चारपायी से नीचे लुढ़क जाता है तो अगले दिन यही किस्सा प्रसिद्ध होता है कि उसे किसी शक्तिशाली प्रेत ने नीचे पटक दिया है। गर्मी की दोपहर में चलते समय लू लगने से कोई जवान बेहोश हो जाये तो कहा जाता है कि उसपर जामुन के पेड़ पर रहने वाली परी आशिक हो गयी है। वहाँ पर किसी दुश्मन को कोसने का सबसे अच्छा ढंग यह होता है कि उसका नाम छुरी से भूमि पर गोदकर उसके ऊपर मुर्गे का खून छिड़क दिया जाये।

राहुल भी ऐसे ही वातावरण में पला बढ़ा था अत: उसका होश खो बैठना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। यह दृश्य तो ऐसा था कि भूत प्रेतों को न मानने वाला एक आधुनिक व्यक्ति भी उनपर विश्वास करने के लिये विवश हो जाता।

राहुल ने पलंग पर लेटने के बाद सर से पाँव तक चादर ओढ़ ली मानो वह चादर नहीं बल्कि कोई अभिमन्त्रित घेरा थी जिसे पार करके वह भूत उसपर हमला नहीं कर सकता था।

काफी देर तक कमरे से खट खट की आवाजें आती रहीं और उसकी श्रुति पर आरे चलाती रही। काँपने के साथ वह गिरधारीलाल की सेवा में हवाई डाक द्वारा उचित शब्द भी भेजता रहा जिसने उसके लिये इस भुतहा मकान का प्रबंध किया था।

लगभग आधे घंटे के बाद वे आवाजें आना बन्द हो गयीं किन्तु राहुल की वह रात जागते ही बीती।
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